Thursday 6 July 2017

ये कैसे गांव, जहां किसान की सुनवाई नहीं ?

क्या उन पंचों-सरपंचों पर दंड नहीं लगना चाहिए, जिनके क्षेत्र में किसान जान दे रहे हैं?

श्रीकृष्ण ने देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया कि जाओ मेरे मित्र सुदामा के लिए ठीक मेरे महल जैसा भवन बना दो। आदेश पाकर विश्वकर्मा जी सुदामा के गांव वृंदापुरी पहुंचे। सुदामा की धर्मपत्नी वसुंधरा को उन्होंने सूचना दी कि मैं आपके लिए भवन बनाने आया हूं, तब वसुंधरा ने प्रश्न खड़ा कर दिया कि ‘केवल मेरा घर महल जैसा कैसे बनेगा। गांव में जिन लोगों ने हमें भिक्षा देकर सहयोग करके अभी तक जीवित रखा है, उन्हें कैसे भूल जाएं, अगर बने, तो उनके लिए भी महल बने।’
वसुंधरा की इच्छा पूरी हुई। खुशहाल हुआ, तो पूरा गांव हुआ।...लेकिन अब वैसे गांव कहां हैं? कहां हैं वो गांव, जहां कोई भूखे नहीं मरता था, जहां लोग रसोई का बचा हुआ भोजन गांव के बाहर किसी निश्चित पेड़ पर टांग दिया करते थे, ताकि रात के समय कोई भूखा अतिथि आए, तो उसे भटकना न पड़े। कभी हम दूर गांव के लोगों के लिए भी सोचते थे, लेकिन अब अपने गांव के लोगों के लिए भी हमने सोचना छोड़-सा दिया है, तभी तो देश में हर आधे घंटे में एक किसान जान दे रहा है और हम अफसोस जताकर काम चला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने संसद में केवल इतना कहकर आश्वस्त करना चाहा था कि समस्या बहुत पुरानी है, हम समाधान के हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इधर, उत्तरप्रदेश से किसान कर्ज माफी की लहर शुरू हुई, जो पूरे देश में फैल गई है। किसान दुखी-उद्वेलित हैं, आत्महत्या का सिलसिला टूट नहीं रहा। एक महीने से भी कम समय में अकेले छत्तीसगढ़ में १२ से ज्यादा किसान अपनी आर्थिक परेशानियों की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं। कोई आश्चर्य नहीं, सरकार किसी भी आत्महत्या के लिए स्वयं को जिम्मेदार नहीं मानती, हमारे यहां यह बेशर्म परंपरा है। मंत्री, अधिकारी, सब हाथ झाडक़र मुंह फेर लेते हैं, लेकिन कोई पूछे तो सही कि कहां है पंचायत राज? क्या उन पंचों-सरपंचों पर दंड नहीं लगना चाहिए, जिनके क्षेत्र में किसान जान दे रहे हैं? हम शहरों में संवादहीनता का रोना रोते थकते नहीं, लेकिन हमारे गांवों को क्या हो गया है? ये कैसे गांव हैं, जहां ५०० से २००० की आबादी में भी पंचों-सरपंचों को नहीं पता चलता कि कौन किसान कितनी परेशानी में है? क्या गांवों में पंच-पंचायतें केवल ग्रामीण योजनाओं की मलाई की बंदरबांट के लिए चुनी गई हैं? 
किसान आत्महत्या एक बड़ी समस्या है, लेकिन कहीं भी पंचायत चुनाव में यह मुद्दा नहीं बनता, आखिर क्यों? राजनेताओं को निशाना बनाने वाले, राजधानी घेरने वाले और राजपथ जाम करने वाले किसानों व किसान नेताओं के लिए भी यह चिंता का विषय होना चाहिए। गांवों की तमाम परेशानियों के लिए केवल राज्य और केन्द्र सरकार को नहीं कोसा जा सकता। गांव के लोग और परंपरागत ग्रामीण व्यवस्थाएं भी तो कुछ जिम्मेदारी उठाएं। 
किसी गरीब सुदामा का महल भले न बने, लेकिन उसकी रोजी-रोटी तो चलती रहे। उसे आत्महत्या जैसे कदम उठाने की जरूरत तो न पड़े। किसानों को गांव के स्तर पर ही परस्पर मजबूत होना पड़ेगा। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए किसान गांव से बाहर आएगा, तो तमाशा ही बनेगा। जैसे पिछले दिनों तमिलनाडु के किसान सीधे नई दिल्ली पहुंचकर सरकार व मीडिया का ध्यान खींचने के लिए दुखद अमानवीय तमाशे कर रहे थे। प्रकारांतर से वे यही जाहिर कर रहे थे कि उनके गांव मर चुके हैं, जहां उनकी कोई सुनवाई नहीं है, इसलिए वे दिल्ली को सुनाने आए हैं? दिल्ली, रायपुर, भोपाल को सुनाने की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है कि अपने गांवों को सुनाया जाए, गांवों को जिंदा किया जाए। किसान कर्ज माफी को दवा न बनाया जाए, अगर कर्ज माफी दवा होगी, तो इसकी जरूरत हर छह महीने पर पड़ेगी। गांवों को मजबूत किए बिना किसान आत्महत्या की समस्या को खत्म नहीं किया जा सकता। छत्तीसगढ़ के गांव अगर इस उम्मीद में बैठे हैं कि रायपुर से आकर कोई मंत्री-अफसर उन्हें मजबूत करेगा, तो ये भी एक तरह का आत्मघात ही है। गांवों को ऐसे परंपरागत आत्मघात से बचना चाहिए। हां, ऐसे गांव भी हैं, जहां लोग परस्पर एक दूसरे की चिंता करते हैं, जहां आत्महत्या जैसी नौबत नहीं आती, ऐसे गांवों से आज सीखने की जरूरत है। ऐसे आदर्श गांवों का सम्मान होना चाहिए।
महात्मा गांधी ने कहा था, ‘केवल सरकार के भरोसे रहोगे, तो विकास नहीं होगा।’ तो सोचिए कि हम किसके भरोसे बैठे हैं?

Wednesday 12 April 2017

चार चराग तेरे बरन हमेशा


(जितना मैं समझ पाया हूं, उतना पेश है...यह टिप्पणी तब लिखी गई थी जब शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हमला हुआ था )
वे भटके हुए लोग सदियों से चीख रहे हैं कि खुद को सूफी संत कहकर पूजा-आराधना लेने वाले शैतान के नबी हैं, रहमान के नबी नहीं! यह गलत विवेचना एक तरह से भारतीय मानस की आलोचना है।  
सूफी नहीं होते, तो आज का भारत नहीं होता। आज का जो सेकुलर भारत है, उसमें रामानंदियों का जितना योगदान है, उससे थोड़ा ही कम सूफियों का है। सेवन शरीफ वाले हजरत लाल (सखी) शाहबाज कलंदर लगभग रामानंद और कबीर के ही समय के हैं। जैसे अजमेर शरीफ में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, ठीक उसी प्रकार से पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र के दादू जिले में स्थित सेवन शरीफ में शाहबाज कलंदर की दरगाह है। गरीब इन दरगाहों पर मत्था टेककर हज-सा सुख लेते हैं, लेकिन ये बात कइयों को चुभती है। 
वाकई, इसलाम का भारतीय संस्करण है सूफीवाद या सूफीयत। इस्लाम का यह संस्करण उसके अरबी संस्करण से अलग माना जाता रहा है। भारतीय जमीन में जो कलात्मक-विवेचनात्मक उर्वरा, उदारता रही है, उसमें सूफी भाव के जरिये ही इसलाम का बेहतर स्वरूप सामने आया है। भारत में सूफीयत ने ही इस्लाम का वह स्वरूप प्रकट किया है, जिसमें सबके लिए जगह है। जहां सब आसानी से नमाज पढ़ सकते हैं, उर्स मना सकते हैं। वरना अरबी संस्करण के अंदर ही उलेमा की एक कट्टर फौज भी है, जो दरगाहों पर पुष्प चढ़ाने, धूप-अगरबत्ती करने, कुछ प्रसाद-सा बांटने, चौखट चूमने, नमाज पढऩे, वहां नाचने-गाने या धमाल डालने की इजाजत नहीं देती।
यह छिपी हुई बात नहीं है कि अरबी संस्करण का वर्चस्व दुनिया में जिस तरह से बढ़ा है, उसमें सूफीयत के लिए जगह कम होती जा रही है। सूफियों का काम खत्म माना जा रहा है, क्योंकि शायद नाम का इस्लाम बनाने का काम सूफियों का था, जो उन्होंने पूरा कर लिया और अब काम का मुसलमान बनाने का काम अरबी संस्करण ने अपने हाथ में ले लिया है। 
बम-बंदूक की जरूरत पड़ रही है, ताकि दरगाहों में मत्था टेक रहे लोगों को सबक सिखाकर बाकियों को रास्ते पर लाया जा सके। यह रास्ता तबाही की ओर ले जाता है। यह माना जा रहा है कि भारतीय मुस्लिम अपेक्षाकृत उदार है या हो गया है। वह गैर-मुस्लिम और मुस्लिम में सद्भाव की जरूरत को समझने लगा है, इससे कट्टर अरबी संस्करण का प्रचार रुक रहा है, अत: जरूरी है कि अपेक्षाकृत उदार हुए लोगों को पक्का या कट्टर बनाकर फिर प्रचार तेज किया जा सके। 
इसमें कोई शक नहीं कि सूफियों में अभी बहुत ताकत है, उन्हें पराजित करने में कट्टरपंथियों को नाको चने चबाने पड़ेंगे। जिस दिन हजरत शाहबाज कलंदर की दरगाह में नरसंहार हुआ, उसके दूसरे ही दिन सुबह नियम से घंटा फिर बजा और नगाड़ा भी। शाम को धमाल भी डाली गई। सूफी सेवणी हों या अजमेरी...दोनों ने प्रेम और हिम्मत की तलवार हाथों में ले रखी है। तुर्की, भारत, इंडोनेश्यिा से अभी अरब दूर है!
बेशक, दक्षिण एशिया में इस्लाम का प्रचार कराने में सूफी संतों की भूमिका सर्वस्वीकार्य रही है। वे नहीं होते, तो दक्षिण एशिया में पैर जमाना अरबी संस्करण के लिए आसान नहीं होता। आधुनिक दुनिया में सूफीवाद एक बड़ी ताकत है, जहां से कट्टरता को करारा जवाब मिल सकता है। जो लोग हजरत चिश्ती, हजरत शाहबाज, हजरत निजामुद्दीन, बाबा हाजी अली, बाबा फरीद और ऐसे ही हजारों सूफी संतों को नहीं मानते, उनकी इंसानियत पर सवाल वाजिब हैं।  
आप अपने पूर्वजों को ललकार रहे हैं, पूर्वजों को गलत ठहरा रहे हैं। धागा बांधने, पुष्प चढ़ाने का संस्कार, नाचने-झूमने का संस्कार क्या कभी मिट सकता है? 
यह वही भारतीय भूखंड है, जहां आकर ह्वेनसांग ने लिखा था, ‘ये भारतीय कितना नाचते-गाते हैं, भारतीयों ने हर अवसर के लिए गीत-संगीत-नृत्य रच रखे हैं।’ यहां आकर इस्लाम को जो सूफी स्वरूप मिला, वह पूर्ण रूप से वाजिब था और वाजिब है। आप सूफियों को खत्म नहीं कर सकते। सेवण शरीफ के मुस्लिमों ने इस बात को साबित कर दिया। वे नरसंहार से घबराए नहीं, हजरत शाहबाज की दरगाह पर फिर इबादत के लिए जुट गए। दरअसल, पाकिस्तान की मिट्टी भी वही है, जो भारत की मिट्टी है। उस मिट्टी ने सदियों से भारत की मिटï्टी से भी ज्यादा हमले झेले हैं। पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अफगानियों को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्हें महसूस हो रहा है कि उन पर हमले तो पश्चिम से ही हुए हैं, पूरब से नहीं। पाकिस्तान में शांति तभी संभव है, जब वहां सैंकड़ों सूनी पड़ी दरगाहों पर रौनक हो, जब पाकिस्तान पूरे भाव के साथ पूरब की ओर बढ़े। नेकी की राह में कभी देर नहीं। 
पुकार रहा है, चिराग निरंतर जगा हुआ है। आवाज गूंज रही है...
चार चराग तेरे बरन हमेशा, पांजवा मैं बरन आई बला झूलेलालण...

Tuesday 17 January 2017

बिरादरी का बोलबाला


ज्ञानेश उपाध्याय

आपकी जाति क्या है? जाति बता दिया, तो बताइए कि बिरादरी या उपजाति क्या है? जोधपुर शहर में आपकी बिरादरी की जानकारी हालिया माहौल में बहुत जरूरी है। मान लीजिए, आप ‘ए’ बिरादरी के हैं और ‘बी’ और ‘सी’ के लोग पकडक़र आपको बुरी तरह पीट रहे हैं, तो आप कृपया अपनी ‘ए’ बिरादरी के लोगों को ही मदद के लिए पुकारिए।  न बुलाया, पिट गए, पुलिस में शिकायत हो गई। पुलिस सक्रिय हुई, तो ‘बी’ और ‘सी’ के लोग अपनी बिरादरी के आरोपियों के बचाव में लग जाएंगे। कुछ इंतजार कीजिए, हम पुलिस में भी खूब जाति देखेंगे। ‘बी’ गिरफ्तार होगा, तो ‘बी’ बिरादरी वाले चाहेंगे कि गिरफ्तारकर्ता पुलिस वाला भी ‘बी’ हो, मुकदमा लडऩे वाला वकील भी ‘बी’ हो और न्याय के मंदिर में भी कोई ‘बी’ मिल जाए, तो सोने पर सुहागा हो जाए?
शहर के आयोजनों, सभाओं, विवाहों, प्रदर्शनों, रैलियों पर गौर कीजिएगा, लग जाएगा कि हमें बिरादरी में जीने की आदत पड़ रही है। ऐसा लगेगा कि हम देश में नहीं, बिरादरी में सांस ले रहे हैं। हम बिरादरी देखकर प्रतिभाओं के साथ-साथ अपराधियों का भी सम्मान करने लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाले में गिरफ्तार महानुभावों और भय से छिपे लाभार्थियों का जाति-बिरादरीगत विश्लेषण पेश कर दिया गया है और इस आधार पर यह भी बता दिया गया है कि जोधपुर में सरकार किस-किस जाति का शोषण कर रही है। लेकिन यह कोई नहीं देख रहा कि कथित शोषक किस जाति-बिरादरी के हैं। मुख्यमंत्री से लेकर हवालात में ताले लगाने वाले पुलिसकर्मी तक की जाति-बिरादरी की सूची अगर बनाई जाए, तो साफ हो जाएगा कि जाति-बिरादरी का हल्ला बेमतलब है। 
जिस देश में वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष हुआ था, उसी देश में अपनी संकीर्ण बिरादरी को समाज मानते हुए जयकारे लग रहे हैं। जब देश को लूटा और तोड़ा जा रहा था, तब महान संत रामानंद ने सबको जोडऩे के लिए नारा दिया था, जात-पात पूछे नहीं कोई...हरि को भजे से हरि का होई। लेकिन आज सबसे पहले आपसे जाति-बिरादरी पूछी जाती है और देस-देश बाद में आते हैं। चिंतन की संकीर्ण शैली का एक उदाहरण देखिए कि भगवान परशुराम अब केवल ब्राह्मणों के बैनर पर नजर आते हैं, क्या मजाल कि कोई दूसरी जाति-बिरादरी परशुराम के चित्र का इस्तेमाल कर ले।  हालात ऐसे हैं कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की टिप्पणी याद आ रही है। चर्चिल ने भारत को आजाद करते हुए यह भाव प्रकट किया था कि ये इंडियन आपस में लड़ेंगे और इनका देश टूट जाएगा। बेशक, हम भारतीय जन चर्चिल का सपना कभी पूरा नहीं होने देंगे, लेकिन हम यह तो जरूर सोचें कि हम अपनी संगठन शक्ति कहां लगा रहे हैं। किसको संगठित होना चाहिए और कौन संगठित हो रहा है? ये कुछ लोगों के निहित स्वार्थ साधक संगठन किसके काम आएंगे? किस बिरादरी में गरीब या गैरबराबरी नहीं है? बिरादरी की संगठन शक्ति अगर पूरी तरह से बिरादरी में समानता-संपन्नता लाने में लग जाए, अगर बिरादरी के अपराधियों को सुधारने में लग जाए, अगर बिरादरी के भ्रष्ट अफसरों-उद्यमियों को ईमानदार बनाने में लग जाए, तो कोई गलत बात नहीं, लेकिन कहां लग रही है? बिरादरी की कोरी अपणायत हमें कहां ले जाएगी, यह जरूर देखिए और सोचिए। 

published in rajasthan patrika- jodhpur edition

Saturday 7 January 2017

और वो चले गए

प्रो. रामानुज देवनाथन

१८ फरवरी २०१६ को नई दिल्ली में उनसे अंतिम भेंट हुई थी। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी पर केन्द्रित विद्वतापूर्ण आयोजन था। रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य और केन्द्रीय मंत्री उमा भारती के साथ मंच पर विराजमान वे अपना व्याख्यान दे चुके थे। विद्वतापूर्ण माहौल में वे अति प्रसन्न थे। वे भारतीय विद्या भवन के सभागार से दोपहर बाद उठे। मैं साथ था। मैंने पूछा, ‘कहां जाना है, गाड़ी बुलवाकर छुड़वा देता हूं।’ उन्होंने मेरा हाथ थामकर कहा, ‘आप विराजो, मैं चला जाऊंगा।’ फिर भी मेरा मन न माना, मैं बाहर गेट तक आया। वे एक कैब सर्विस को फोन लगा चुके थे। कैब की गाड़ी उन्हें खोज रही थी। शायद विद्या भवन स्ट्रीट से बाहर कैब खड़ी थी। मैंने कहा, ‘आप अकेले कैसे जाएंगे, मैं चौराहे तक साथ चलता हूं।’
लेकिन उन्होंने फिर मेरी हथेलियों को दबाकर कहा, ‘यहीं चौराहे तक ही तो चलना है। आप यहीं रहो, मैं तो चला जाऊंगा।’ 

और वे चले गए। मैं कुछ देर तक उन्हें पैदल जाते देखता रह गया। पवित्र हृदय संस्कृत विद्वान प्रो. रामानुज देवनाथन अब सदा के लिए संसार से ओझल हो गए हैं। अब देखना संभव नहीं, उन्हें बस याद करते रहना है।


इतना सहज, सरल, तपस्वी विद्वान, जिसने यश की ऊंचाइयों को छुआ। बड़े पदों पर रहे, विद्वान छात्रों-शिक्षकों से घिरे रहने वाले, जिन्हें विद्वता से लालबत्ती भी नसीब हुई। आज के दौर में जब लोग कुरसियों पर नहीं बैठते, कुरसियां लोगों पर बैठ जाती हैं, तब देवनाथन जी जैसे ऋषि चरित्र भारतीय संस्कृति के लिए प्रतिमान हैं। सहजता और विद्वता के अनुपम प्रतिमान।

यह देश भोगियों ने नहीं खड़ा किया। यह देश योगियों ने ही खड़ा किया है। तप से खड़ी हुई हैं हमारी विद्याएं। कहते भी हैं कि भारत मोक्ष भूमि है, जबकि बाकी दुनिया भोग भूमि। भारत की मोक्ष भूमि पर रामानुज देवनाथन जैसे चरित्र की महत्ता चमकदार विरासत है। सज्जन-योगियों-तपस्वियों का सम्मान तो आपको करना ही होगा, वरना भोगी आपसे आपका सबकुछ छीन लेंगे। जीवन और चरित्र की उसी कंगाली तक आपको पहुंचा देंगे, जहां केवल भोग-रास-पतन है। 

संस्कृत कोई आम भाषा नहीं है। इस भाषा का अपना विद्युत है। ज्ञान-चरित्र के सुरक्षा कवच और पवित्रता के बिना संस्कृत को छूना विद्युत के खुले तार को छूने जैसा है। आपने गुस्ताखी की, तो या तो आप पगला जाएंगे या फिर आपके परिजन-लोग भी आपको पागल-ढोंगी समझेंगे, दुनिया क्या कहती है या कहेगी, यह चर्चा फिर कभी।

वे भाषाविद् थे, जैसी उनकी संस्कृत, वैसी ही अंग्रेजी और वैसी ही तमिल। हिन्दी में तो उनके लेखन का माध्यम शायद मैं नाचीज ही बना, शास्त्री कोसलेन्द्रदास की मदद से उनसे राजस्थान पत्रिका के लिए शायद पहली बार मैंने ही लिखवाया। और वे लिखते चले गए।

रामानुज देवनाथन जी से मिलकर ऐसा लगता था कि हां, ये सच्चे आधुनिक ऋषि हैं, जिनके मुख से वेद और उपनिषद के शब्द स्वत: साकार हो रहे हैं। एक ऐसा ऋषि जीवन जो केवल कूप जल पर निर्भर था, स्वयं जल निकालना, स्वयं अपना भोजन पकाना, उसे दूसरों की छाया से भी बचाना। कहीं दूर जाना, तो अपना जल-भोजन साथ लेकर चलना। 

सितंबर २०१३ का वह पुस्तिका लोकार्पण कार्यक्रम याद आ रहा है, जो हरिद्वार में हुआ था। वे तब जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति थे। लालबत्ती गाड़ी से ही सपरिवार हरिद्वार पधारे थे। उनके लिए शास्त्री कोसलेन्द्रदास के सहयोग से हरिद्वार में रामानुज संप्रदाय से जुड़ा एक ऐसा आश्रम खोजा गया था, जहां कूप जल की व्यवस्था थी। लालबत्ती गाड़ी से जब एक धवल वस्त्रधारी, चंदनपूर्ण ललाट, ऋषि-रूप कुलपति उतरता था, तब देखकर हर्ष होता था कि संस्कृत के पास एक ऐसा विद्वान भी है, जो दुनिया को संबोधित कर सकता है कि देखो - भारतीय जीवन किसे कहते हैं, भारत कोई ऐसे ही विश्व गुरु नहीं बना था। भारतीय जीवन की ऐसी अनेक परंपराएं हैं, जो लुप्त हो रही हैं। संस्कारित होने की परंपरा, सीखने की परंपरा, विनयशीलता की परंपरा, उज्ज्वल चरित्र की परंपरा, वरिष्ठों को आदर देने की परंपरा, कनिष्ठों को आशीर्वाद देने की परंपरा।

उन्हें देखकर उन पुरानी पीढिय़ों-पूर्वजों की याद आती थी, जिन्होंने देश और देश के निर्माण के लिए अपना सबकुछ लगा दिया। 
कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने एक वाकया मुझे सुनाया था। २६ जनवरी आने वाली थी। तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति होने जा रहे थे। दीक्षांत समारोह में भाग लेने मध्य प्रदेश के सागर विश्वविद्यालय आए थे। ठंड के दिन थे, सर्किट हाउस के बगीचे में धूप में चबूतरे पर बैठकर हाथ में सुई धागा लिए अपने कपड़े दुरुस्त कर रहे थे। यह सहजता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को भारतीयता के ज्ञान के उपरांत ही प्राप्त हुई थी, वरना आज भी उनका जीरादेई में विशाल महलनुमा भवन है। उनकी संपन्नता का अंदाजा आप इसी से लगा लीजिए कि जब राजेन्द्र बाबू छपरा के स्कूल में पढ़ते थे, तब उनके साथ सेवक रहा करते थे।
उन्हीं राजेन्द्र बाबू ने कहा था, ‘हमारी स्वतंत्रता तभी तक सुरक्षित है, जब तक हमारी जरूरतें सीमित हैं।’

जरूरतों को सीमित करके ही तपस्वी चरित्र तैयार होते हैं और ज्ञान की असली गंगा प्रस्फुटित होती है और तब भारत विश्व गुरु बनता है। तब दूर अरब में भी पैगंबर बरबस बोल पड़ते हैं कि मैं पूरब से इल्म की हवा आती महसूस कर रहा हूं।    

वह ज्ञान की पवन आज अवश्य कुछ शांत होगी, उसने अपना एक संत-सैनिक गंवा दिया है। उन्हें हृदय से चाहने वाले दुर्लभ चिंतन वाले सहज विद्वान मंत्री राजपाल सिंह शेखावत ने उचित ही कहा है कि यह संस्कृत की ही क्षति नहीं है, यह संस्कृति और इस ब्रह्मांड के पुण्य की क्षति है।

लेकिन व्यवस्था में राजपाल जी जैसे कितने लोग हैं, जो संस्कृति के वास्तविक महत्व को समझ रहे हैं। स्वयं संस्कृत का समाज क्या यह मान रहा है? अगर आप नहीं समझेंगे और सच्ची भारतीय संस्कृति पर आपको हंसी आएगी, तो फिर आप दिल्ली-बंगलूर से गांवों तक अपनी बहू-बेटियों को असुरक्षित होते देखते रहिए। अच्छे-सच्चे लोग नहीं होंगे, तो अच्छा-सच्चा ज्ञान भी नहीं होगा और तब जो समाज बनेगा, तय है, आपको खून के आंसू रुलाएगा। संस्कृति के निर्माण के लिए भोगी और योगी के अंतर को समझना ही होगा, वरना भारत और भारतीय का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। आप स्वयं भोगी रहना चाहते हैं और दूसरों से योगी होने की आशा कर रहे हैं, तो मुझे कतई माफ न करें, मैं पुरजोर तरीके से कहना चाहता हूं कि आप जरूरत से ज्यादा भोले हैं!

कहना न होगा, यह हमारी व्यवस्था के लिए भी सोचने का समय है कि हमने वास्तविक योगियों के साथ क्या किया। रामानुज देवनाथन ने कभी कहा नहीं, लेकिन शायद वे तनाव में थे। ५७ की उम्र हो चुकी थी, किसी ऐसी जगह पर पोस्टिंग चाहते थे, जहां कूप की व्यवस्था हो, जहां वे अपनी पवित्रता का निर्वाह सही तरीके से कर सकें, लेकिन केन्द्र सरकार और राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के प्रबंधन ने उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें पोस्टिंग दी। उनके तपस्वी जीवन को और दुष्कर बनाया गया। 

दुर्भाग्य से यह हमारी प्रवृत्ति में शामिल होता जा रहा है कि हम अपनी संस्कृति की दुहाई तो देते हैं, लेकिन उसकी पालना नहीं करते और सबसे खौफनाक सच यह कि जो लोग संस्कृति की सच्ची पालना कर रहे हैं, उनकी हम सुनना भी नहीं चाहते। 

रामानुज देवनाथन जिस भारतीय मार्ग से गए हैं, उसी मार्ग से हमारे अनगिन पूर्वज व ऋषि गए हैं। ये उज्ज्वल मार्ग मिटने वाला नहीं है। निश्चिंत रहिए, आ रहे हैं उसी मार्ग पर कई लोग चलते हुए।    

Friday 30 December 2016

Thursday 27 October 2016

हम बच्चों को अमन चाहिए

(अपने बेटे चैतन्य की जिद पर वर्तमान स्थिति पर विगत दिनों लिखी एक बाल कविता)


प्यारी ठंडी पवन चाहिए
हम बच्चों को अमन चाहिए

ना कोई भी दमन चाहिए
सारे दुख का शमन चाहिए 
एक ऐसा हमें देश चाहिए
खूब पढ़ाई, प्यार चाहिए

प्यारी, ठंडी पवन चाहिए
हम बच्चों को अमन चाहिए

मार काट अब तुम छोड़ो तो
क्या पाया है, बहुत लड़े तो
हम बच्चों की बात सुनो तो
थोड़ा तुम इंसान बनो तो

प्यारी, ठंडी पवन चाहिए
हम बच्चों को अमन चाहिए

हम बच्चों की यही तमन्ना 
एक दिन जग सच्चों का होगा
उस दिन जग अच्छों का होगा
वो दिन हम बच्चों का होगा

प्यारी ठंडी पवन चाहिए
हम बच्चों को अमन चाहिए

Food day Package


मेरे लिए जुनून जरूरी है : मेहरा

‘रंग दे बसंती’, ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी शानदार फिल्में बनाने वाले फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा की नई फिल्म ‘मिर्जया’ रीलिज होने वाली है। इस फिल्म की ज्यादातर शूटिंग जोधपुर और राजस्थान में हुई है। मेहरा एक अलहदा निर्देशक हैं, फिल्म कहने-दिखाने का उनका अंदाज निराला है। पेश है पिछले दिनों उनसे ज्ञानेश उपाध्याय द्वारा लिया गया टेलीफोनिक इंटरव्यू...  

पत्रिका : एक ऐसी प्रेम कहानी पर आपने फिल्म ‘मिर्जया’ बनाई है, जिसमें प्रेमी-प्रेमिका एक ही मां का दूध पीकर बड़े हुए? आपको नहीं लगता कि आज के समय में ऐसे विषय पर फिल्म बनाना बड़े साहस या दुस्साहस का काम है?  
मेहरा : यह एक कहानी है। हर कहानी का अपना सच होता है। कोई कहानी कहता है, तो उसके अंदर जो आग जल रही है, वह धुंआ बनकर निकलती है और निकलनी ही चाहिए। साहस और दु:साहस तो दुनिया में कोई भी अच्छा-नया काम करने के लिए जरूरी है।

पत्रिका : आपकी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ का भी अंत बलिदान या दुख के साथ हुआ था और ‘मिर्जया’ का अंत भी बलिदान या दुख के साथ हो रहा है? क्या ये आपको अच्छा लगता है?
मेहरा : अच्छे या बुरे की बात नहीं है। हालांकि यहां केवल बलिदान या दुख ही नहीं है। कहानी पर निर्भर करता है, जो भी गाथाएं हैं, जो प्रेम कहानियां हैं - हीर रांझा, लैला मजनूं इत्यादि, कोई चीझ हमें तभी अपील करती है, जब उसमें बलिदान का जज्बा हो। उसमें सच्चाई, मासूमियत होती है, तभी बात अमर होती है।

पत्रिका : क्या जुनूनी या सनक वाले या भ्रम के शिकार चरित्र आपको ज्यादा अच्छे लगते हैं ?
मेहरा : अच्छे ही नहीं, मुझे समझ ही वे आते हैं। आप कोई भी काम करें, उसमें अगर जुनून न हो, तो शायद वह काम फीका पड़ जाता है। कोई पोस्टमैन का काम हो या स्टूडेंट हो या मां हो, देखिए, मां में कितना जुनून होता है बच्चे को लेकर। मेरे लिए जुनून जरूरी है।

पत्रिका : फिल्म ‘मिर्जया’ इतिहास के कितने करीब है? इस लोकगाथा में आपने कितना बदलाव किया है? 
मेहरा : यह नाटक मैंने दिल्ली में अपने कॉलेज के जमाने में देखा था। आखिर साहिबा ने मिर्जया के तीर क्यों तोड़े, यह बात कहीं न कहीं मेरे जेहन में रह गई। मैंने ३५ साल बाद गुलजार भाई से संदेश भेजकर पूछा कि क्या है ये? मैंने उन्हें यह नहीं कहा कि कोई कहानी लेकर आ रहा हूं। उन्होंने कहा कि आ जाओ। वे मेरे पड़ोसी हैं। चाय पर मैंने उनसे पूछा, साहिबा ने तीर क्यों तोड़े? उन्होंने कहा, बच्चू, (वे मुझे बच्चू ही कहते हैं) तुम यह तो साहिबा से ही जाकर पूछो। मैंने कहा, कब से ढूंढ़ रहा हूं, साहिबा मिल नहीं रही है। तो उन्होंने कहा, चलो हाथ पकडक़र चलते हैं साहिबा को ढूंढ़ते हैं। जब मिल जाएंगी, तो उन्हीं से पूछ लेंगे। तो ऐसे फिल्म समझने, लिखने का काम आगे बढ़ा। 
गुलजार भाई से पूछा कि क्या हम आज के जमाने की मिर्जा-साहिबा को खोज सकते हैं। उन्होंने कहा, बिल्कुल खोज सकते हैं। यह जज्बा ही ऐसा है, इस दुनिया में जिंदगी की रफ्तार कितनी भी तेज हो जाए, दिल तो उसी रफ्तार से धडक़ता है, जैसे वह धडक़ता आया है। हमने आज के जमाने में मिर्जया-साहिबा खोजने की कोशिश की, खोज राजस्थान आकर पूरी हुई। 

पत्रिका : पंजाब और पाकिस्तान की पृष्ठभूमि वाली कहानी को राजस्थान से क्यों जोड़ा गया है? 
मेहरा : यह आज की कहानी है, यह कहानी आपको रूस में भी मिल सकती है, यह तो प्यार है, हर जगह है। यह जात-पात-क्षेत्र से ऊपर है। यह चरित्र हम आज के जमाने में डाल दें, तो क्या होगा? हमारे नायक का नाम आदिल है, साहिबा का नाम सुचित्रा है? राजस्थान में लोहार, बंजारे हैं, अन्य ऐसे अनेक समूह हैं, राजस्थान इस बात के लिए मशहूर है - कथाओं, लोकगाथाओं, ढोला मारू, महाराणा प्रताप इत्यादि। मिर्जया-साहिबा लोक कथा की गूंज आज के राजस्थान से आकर जुड़ती है। आज के यूथ को जोडऩा जरूरी है, हम उन्हें कोई पीरियड फिल्म दिखाएं, तो युवा उतना उससे नहीं जुड़ेगा। मैंने कहानी को इसलिए न पंजाब में रखा न पाकिस्तान में। फिल्म राजस्थान में भी है, लद्दाख में भी। इसमें लोक कथा को साइलेंट रखा गया है। 

पत्रिका : आपके यहां सब्जेक्ट, क्राफ्ट और नेरेशन की विविधता है, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि आप सिनेमा किसके लिए बनाते हैं? 
मेहरा : सिनेमा कहानी कहने का आधुनिक तरीका है। पहले जो लोग ट्रेवल करते थे, कथा सुनाते थे, गाकर सुनाते थे। फिर किताबें आईं, आज का जमाना सिनेमा का है। हम कर वही रहे हैं, जो हजार साल पहले करते थे, कहानियां सुनाना। मैं वही कहानियां सुनाता हूं, जो मेरे अंदर से आती हैं, जिन्होंने मुझे अंदर से हिलाया-झिंझोड़ा है। अंदर से भावना आती है कि मुझे बोलना ही पड़ेगा। हम दुखों से हार नहीं मान सकते। हम चुप बैठ नहीं सकते। फिल्म तभी बनती है, जब फिल्मकार कुछ बताना चाहता है। मैं ऐसी कहानी कहता हूं, जिसे पूरी दुनिया में लोग देख-सुन सकते हैं।

पत्रिका : पिछली फिल्मों की तरह ही आपने अपनी ताजा फिल्म में भी युवाओं पर भरोसा किया है, क्या आज के भारतीय युवाओं पर आपको पूरा भरोसा है? 
मेहरा : अपने से ज्यादा भरोसा मुझे युवाओं पर है। मुझे हमेशा लगता है कि युवा पीढ़ी का समाज बनाने में बड़ा योगदान है। युवाओं से मेरा सम्बंध ज्यादा मजबूत है। मैं उन्हें समझ पाता हूं और वे उससे भी ज्यादा मुझे समझ पाते हैं।  

Sunday 25 September 2016

शहर को किसने डुबोया?

ज्ञानेश उपाध्याय
इतना पानी किसे चाहिए...डूबने को तो चुल्लू भर काफी है, लेकिन क्या शहर का कोई जवाबदेह चुल्लू भर पानी में खुद को डूबने लायक मानेगा? दिक्कत यही है कि हम अपनी कमी और गलती को जल्दी नहीं मानते। लगभग बीस साल बाद ऐसी झमाझम बारिश जोधपुर में हुई है। घंटों तक रुकने का नाम न लेने वाली बारिश ने बहुतों की पोल खोल कर रख दी है कि देख लो, ऊपर वाला देता है पानी, लेकिन रखने की हमारी औकात नहीं है? पानी रखने की औकात तो हमारे पूर्वज रखते थे, हम तो उस औकात की धज्जियां उड़ाकर बस जाम और जमाव का तमाशा देख रहे हैं। पानी की राह में हम कॉलोनियां बसा चुके हैं, तो जाहिर है सडक़ों को हम ने ही नाला बनने पर मजबूर किया है। जिस शहर को वाहन के जरिये एक छोर से दूसरी छोर तक लगभग एक घंटे में पार किया जा सकता है, उस शहर में लोग पांच-पांच घंटे जाम में फंसने के बाद किसी तरह से पानी से तरबतर घर पहुंचे हैं। लाखों बच्चों-परिजनों को हमने अनहोनी की चिंता में डाला है। सडक़ों पर कितने झगड़े हुए हैं, कितने नुकसान हुए हैं, आकलन आने वाले दिनों में होगा। 
लेकिन ऐसा क्यों हुआ? हमारे शासन-प्रशासन को जवाब देना चाहिए। दरअसल, ये अफसर पानी को साल में चार-पांच दिन की समस्या मानते हैं। ये सोचते हैं, ३६५ दिनों में से महज ५ दिन जोर की बारिश होगी, पानी जमा होगा, शहर में जाम लगेगा, जनजीवन अस्त-व्यस्त होगा, फिर पानी उतर जाएगा, तो स्थितियां अपने आप सामान्य हो जाएंगी। ऐसे में, पांच दिन के लिए नालियां क्यों बनाएं, जगह-जगह तालाब क्यों साफ रखें? कोशिश करके देख लीजिए, ऐसा सोचने वाले अफसरों के फोन अभी एक दो दिन व्यस्त या बंद मिलेंगे। मुंह चुराना भी एक मौसमी अदा है।
   आखिर कौन बना रहा है शहर में कंक्रीट की दीवारें? कौन नालों को पाट रहा है, रोक रहा है? निगम, जेडीए ही नहीं, सेना भी इस काम में शामिल है। सडक़ों के दोनों ओर दीवारें खड़ी हैं, सडक़ें नाला बनने को मजबूर हैं। सडक़ें नीचे हैं और कॉलोनियां ऊपर। मतलब साफ है सडक़ें ही आधुनिक नाला हैं, केवल घोषणा शेष है। शहर में ढोल पीटकर मुनादी करा देनी चाहिए कि खबरदार, बारिश होगी, तो सडक़ रूपी नालों में न निकलें। अगर आप बारिश में कहीं बाहर निकलते हैं, तो आप स्वयं अपनी जान की जिम्मेदारी लीजिए, निगम-निकाय और बड़े-बड़े इलाकों के बड़े-बड़े मालिक कतई जिम्मेदार नहीं होंगे? शहर की कहां-कहां की किस-किस सडक़ या हाईवे का नाम लें, आम आदमी या ‘सिविलियंस’ के लिए शायद ही कोई ऐसी सडक़ छोड़ी गई है, जिसे देखकर मूंछों पर ताव देने का मन करे। मूंछें गीली पड़ी हैं और सारी स्मार्टनेस कचरे के साथ सरेआम बहती दिख रही है। वाकई, शहर में तो खूब पानी बह रहा है, लेकिन थोड़ा आंखों में भी जिंदा हो जाए, तो बात बन जाएगी। मिलकर सब देंगे पानी को रास्ता और जगह, तो सडक़ें पानी की गुलामी से आजाद हो जाएंगी। बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें जोधपुर को ऐसा बहुत कुछ बोल गई हैं, लेकिन सुना कितना गया, समय बताएगा।
(राजस्थान पत्रिका जोधपुर में प्रकाशित टिप्पणी)

Monday 1 August 2016

नसीर से नाराज नहीं, हैरान हूं मैं


अमिताभ बच्चन के बारे में एक बार नसीरुद्दीन शाह ने कह दिया था कि ‘उन्होंने तो कोई ग्रेट फिल्म नहीं बनाई, शोले को मैं ग्रेट फिल्म नहीं मानता।’ 
अब नसीर ने कहा है कि राजेश खन्ना के साथ फिल्मों में मीडियोक्रेटी की शुरुआत हुई यानी राजेश खन्ना फिल्मों में अभिनय या कला को दोयम दर्जे पर ले आए। क्या यह सही है ? 

नसीर ने ऐसा क्यों कहा ?

शायद यह अभिनय सीखे होने की श्रेष्ठता का बोध है, जो नसीर को लोकप्रिय अभिनेताओं के प्रति उकसाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से अभिनय पढ़-सीखकर निकले हैं। एनएसडी १९७३ बैच में उनके ही साथ ओम पुरी, भानु भारती और बंसी कौल जैसे नाट्य निर्देशक भी पढक़र निकले थे। एनएसडी में पढऩे का सौभाग्य न तो राजेश खन्ना को मिला था और न अमिताभ बच्चन को मिला। फिर भी दोनों अपने-अपने समय में सुपर स्टार रहे। राजेश खन्ना ने लगातार १६ सुपर हिट फिल्में दीं। ७३ की उम्र में भी अमिताभ का जादू ढला नहीं है। सुपर स्टार होने की सफलता किसी के लिए भी ईष्र्या का कारण हो सकती है। 
बहरहाल नसीर ने एक बहस छेड़ दी है कि क्या राजेश खन्ना मीडियोकर थे। क्या राजेश खन्ना की कला उपस्थिति को ऐसे नकारा या कमतर किया जा सकता है ? 
राजेश खन्ना की कला की ओर उंगली उठाने वाले नसीर यह भूल गए कि राजेश खन्ना को सफलता कोई थाली में परोसकर नहीं दी गई थी। वे टेलेंट हंट प्रतियोगिता में जीतकर फिल्मों में आए थे, उनका चयन तब के बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशकों ने किया था। विनोद मेहरा उस प्रतियोगिता में दूसरे स्थान पर रहे थे और बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन तो शुरू में ही बाहर हो गए थे। उस दौर में टेलेंट हंट जीतना कोई आसान काम नहीं था। 
उन्हें अच्छी फिल्में मिलीं और उन्होंने अच्छा काम किया, दर्शकों का मनोरंजन किया, उन्हें रुलाया-हंसाया-गुदगुदाया। राजेश खन्ना ने हर वह काम किया, जिसकी उम्मीद एक अभिनेता से की जाती है। वे आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपने पीछे एक विरासत छोड़ गए हैं। जिस अभिनेता ने रुपहले परदे पर अपने अभिनय से प्रेम-रोमांस को एक नई ऊंचाई दी, जिस अभिनेता ने हर तरह की भूमिका को स्वीकार किया, जिस अभिनेता ने यादगार चरित्रों के ढेर लगा दिए, जिस अभिनेता ने लाखों लोगों को अपना दीवाना बना दिया, जिस अभिनेता ने फिल्मी दुनिया से जुड़े सैकड़ों लोगों को मालामाल कर दिया, जिस अभिनेता ने फिल्म उद्योग के आकार को विस्तार दिया, जिस अभिनेता ने अनेक अन्य अभिनेताओं, युवाओं को प्रेरित-उद्वेलित किया, क्या वह दोयम दर्जे का मान लिया जाए ?
नसीर किससे लडऩा चाहते हैं? नसीर क्या केवल अपनी ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं? क्या यह टिप्पणी जरूरी थी? इकहरे कलात्मक नजरों से देखते हुए लोकप्रिय राजेश खन्ना को क्या दोयम दर्जे का प्रवर्तक मान लिया जाए? क्या राजेश खन्ना से पहले हिन्दी सिनेमा में सबकुछ आला दर्जे का था? दोयम दर्जे का कुछ न था?  
मोटे तौर पर यह कहने में कोई हिचक नहीं कि जहां शंकर-जयकिशन और खेमचंद्र प्रकाश खड़े हुए, वहां हिन्दी सिनेमा में गीत-संगीत की वास्तविक शुरुआत हुई और जहां दिलीप कुमार खड़े हुए, वहां अभिनय का आगाज हुआ और जहां राजेश खन्ना खड़े हुए वहां हिन्दी सिनेमा में बॉक्स ऑफिस से उपजे सुपर स्टारडम की शुरुआत हुई। सुपर स्टारडम कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे आप चॉकलेटी चेहरे, चंद अच्छे गीत-दृश्य, उम्दा कहानी के जरिये पा जाएं। इसके लिए पूरा पैकेज होता है, जो आपकी छवि को रुपहले परदे पर उभारकर मिथक या आदर्श बना देता है। बेशक, राजेश खन्ना हिन्दी सिनेमा के एक आदर्श हैं। 

अब अभिनय की बात
हम मनुष्यों के आधे चेहरे बंजर होते हैं, तो आधे उर्वर। उर्वर चेहरों में भी कुछ बहुत उर्वर होते हैं। जैसे मिट्टी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, कहीं चावल ज्यादा, तो कहीं बाजरा, तो कहीं केवल केक्टस। राजेश खन्ना के चेहरे की उर्वरा की तुलना अगर नसीर अपने चेहरे की उर्वरा से करना चाहते हैं, तो यह संभव तो है, लेकिन अनुचित है। दोनों के चेहरों की अपनी सीमाएं हैं ? स्वाभाविक है, राजेश कभी नसीर नहीं हो सकते, तो नसीर कभी राजेश नहीं हो पाएंगे।  
जैसे अभिनय मोटे तौर पर दो प्रकार का होता है - ठीक उसी तरह से अभिनेता भी दो प्रकार के होते हैं, लोकधर्मी और शास्त्रधर्मी। राजेश खन्ना लोकधर्मिता के निकट हैं, तो नसीर शास्त्रधर्मिता के निकट। 
नसीर इस बात को अच्छी तरह जानते होंगे कि जब वे एनएसडी में पढ़ते थे, तब उन्हें भरत मुनि का नाट्य शास्त्र नहीं पढ़ाया गया। तब भारत में भी अभिनय के गॉड फादर स्टानिस्लावस्की ही थे। नसीर जिस तरह का अभिनय करते हैं, वह स्टानिस्लावस्की की शैली के करीब है। किरदार में डूब जाओ। जिसे स्टानिस्लावस्की मैथड एक्टिंग कहते हैं, उसे भारतीय नाट्य शास्त्र में भरत मुनि ने पद्धतिबद्ध अभिनय कहा था। दिलीप कुमार, मोतीलाल, बलराज साहनी मैथड एक्टिंग के ही बड़े खिलाड़ी रहे। दिलीप कुमार की खास बात यह रही कि उन्होंने अभिनय की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन अशोक कुमार से गुरु ज्ञान जरूर लिया और फिर अपनी एक शैली विकसित की, जो ९० फीसद से ज्यादा मैथड एक्टिंग है। मैथड एक्टिंग मतलब - ऐसा अभिनय, जिसमें लगे नहीं कि अभिनय किया जा रहा है। अभिनय का खुलासा न हो और सबकुछ स्वाभाविक लगे, मानो सामने घटित हो रहा हो। 
मूलत: नसीर भी इसी श्रेणी के अभिनेता हैं। हालांकि उन्होंने भी कई दफा दोयम दर्जे का काम किया है, यह बात वे स्वयं भी जानते होंगे। नसीर को रोमांस नहीं जमता, लेकिन राजेश खन्ना को खूब जमता है। राजेश खन्ना की अनेक फिल्में हैं, जिनमें उनका अभिनय ऊंचाइयों पर नजर आता है। दो रास्ते, आनंद, आराधना, आविष्कार, अमर प्रेम, रोटी, सच्चा झूठा, हाथी मेरे साथी इत्यादि फिल्में खास यादगार हैं। 

राजेश खन्ना का अभिनय 
आंगिक, वाचिक, सात्विक और आहार्य, ये जो चार प्रकार के अभिनय भारतीय नाट्य शास्त्र ने बताए हैं, उसके आधार पर राजेश खन्ना को देखना रोचक होगा। उनका आंगिक अभिनय उनकी रोमांटिक छवि के अनुकूल था, खास प्रकार से हाथ हिलाना, सिर मोडऩा, मुडऩा, चलना, रुकना इत्यादि। चरित्र की जरूरत के हिसाब से उन्होंने अंग संचालन किया। वाचिक अभिनय की उनकी अपनी शैली है, वे किसी की नकल नहीं करते, उनके अपने शब्द होते थे, उनकी फिल्मों के डायलाग भी खूब बिकते थे। सात्विक अभिनय तो राजेश खन्ना के अंदर से स्वाभाविक रूप से आता है, जिसका जादू परदे पर सबसे ज्यादा चलता है। चेहरा बोल रहा है कि यह भला आदमी है, यह भला करेगा, भलाई के पक्ष में लड़ेगा। इस मामले में तुलना नसीर से करें, तो नसीर खलनायिकी में भी स्वाभाविक जमते हैं, जबकि राजेश खन्ना को कोई खलनायक मानने को तैयार नहीं होगा। जैसे हर चेहरे की अपनी उर्वरा होती है, ठीक उसी तरह से हर चेहरे की अपनी व्यंजना भी होती है। बिना बोले चेहरा कुछ न कुछ बोलता जरूर है। कोई चेहरा प्रथम दृष्ट्या स्वाभाविक रूप से अच्छाई का अहसास कराता है, तो कोई चेहरा बुराई का। 
अभिनेता के रूप में नसीर की लोकप्रियता निस्संदेह बहुत ज्यादा है, लगभग हर अच्छा या सामान्य दर्शक उन्हें जानता है, लेकिन उनके अंदर लोकप्रिय सिनेमा के प्रति खीज क्यों हैï? लोकप्रिय सिनेमा ने उन्हें भी तो सबकुछ दिया है। ‘पार’ जैसी शानदार फिल्म नसीर को कलात्मक खुशी तो दे सकती है, लेकिन उनका घर नहीं चला सकती और कम से कम सिनेमा हॉल तक नहीं पहुंचा सकती।  कलात्मक फिल्में भी खूब बन रही हैं, उनमें दोयम दर्जे की कला-कलाकार भी खूब हैं, जिनका सिनेमा हॉल तक पहुंचना असंभव है।  कौन अभिनेता नहीं चाहता कि वह अधिकतम दर्शकों तक पहुंचे? ऐसा कतई नहीं है कि कला-कला चिल्लाने वाले सभी उम्दा अभिनेता हैं। 

एनएसडी से कब निकलेगा सुपर स्टार ?

नसीर को सिखाने वाला संस्थान एनएसडी अभिनय या कला की समझ तो पैदा कर सकता है, लेकिन सफलता नहीं पैदा कर सकता। सरकारी धन से चल रहे एनएसडी से निकलने वाले सुपर स्टार का अभी इंतजार है। यह एनएसडी को चिढ़ाने वाली बात हो सकती है, लेकिन वहां पढऩे वालों को इससे गंभीरतापूर्वक गुजरना चाहिए। अगर आप एक महान लोकप्रियता को ललकार रहे हैं, तो फिर झेलिए ये सवाल कि आप क्यों महान लोकप्रिय नहीं हो गए। लोकप्रियता और कला में चोली-दामन का साथ क्यों न हो? लोकप्रियता के प्रति यदि बैर भाव एनएसडी में पैदा हो, तो यह ठीक नहीं है। सरकार तो कला क्षेत्र के साथ गड़बड़ कर ही रही है, वहां बैठे लोग कला क्षेत्र को भटकाने का ही काम करते हैं। जनता के पैसे से सरकार चलती है, लेकिन जनता के बीच लोकप्रिय रहे दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेश खन्ना को सरकार ने कभी अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं दिए। इस लीक को अमिताभ बच्चन ही तोड़ पाए, क्योंकि वे राजनीतिक व रणनीतिक रूप से ज्यादा नियोजित होकर चले। 
नसीर को खुश होना चाहिए कि उन्हें दो से ज्यादा बार अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, राजेश खन्ना को एक भी नहीं मिला, लेकिन इसका मतलब कतई यह नहीं कि राजेश खन्ना दोयम दर्जे के थे। 
आज यह जरूरी हो गया कि परस्पर चिढऩा-कुढऩा छोड़ा जाए और कला पूरी ईमानदारी से लोकप्रियता को समझे और लोकप्रियता भी कला को पूरा सम्मान दे। सरकार तो भेद करती है, कम से कम नसीरुद्दीन शाह जैसे उम्दा कलाकार तो भेद न करें।