Monday 23 June 2008

भारतीय समझदारी पर शक

परमाणु करार खटाई में जाता दिख रहा है, तो इससे हम भारतीयों को कन्फ्यू’ड मानने वालों की संख्या में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी। हम यह आज तक तय नहीं कर पाए कि अमेरिका से हमें फायदा है या नुकसान। अमेरिका को लेकर एक मानसिकता बन ही नहीं पाई। क्या ऐसे ही दोस्ती की जाती है? क्या ऐसे ही दुनिया में चैन से रहने का स्वप्न देखा जाता है? शीत युद्ध के दौर में भारत की गुटनिरपेक्षता कितनी भारी पड़ी है, यह हमारे देश की गरीबी बयान करती है। इतने बड़े देश को अपने ही स्तर पर संभाल ले जाने का गुमान अभी तक नहीं टूटा है। हम आजाद हो गए, लेकिन आत्मनिर्भर नहीं हैं। वामपंथियों के बच्चे अमेरिका में पढ़ सकते हैं, देश का एक पूरा लंबा-चौड़ा वर्ग अमेरिका जाने को लालायित है। हजारों परिवार अमेरिका और भारत में बंटे हुए हैं, लेकिन जब बाद किसी समझौते की आती है, तो हमें अमेरिका पर शक होता है। अंकल सैम हमें घृणित व्यक्ति लगते हैं, लेकिन उनके डॉलर के बिना हमारा काम नहीं चलता। शेयर बाजार को फूलने के लिए अंकल सैम का पैसा चाहिए, रक्षा के लिए अंकल के हथियार चाहिए, कृषि के अत्याधुनिक तकनीक चाहिए, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अंकल का साथ चाहिए, पाकिस्तान पर लगाम लगवाने के लिए भी अंकल की जरूरत है, लेकिन हम ऐसे ही अनेक काम निकालने के बावजूद अंकल को पसंद नहीं करते हैं। क्या यह दोगलापन नहीं है? हमें अंकल पर विश्वास नहीं है, लेकिन हम अंकल के यहां बसना चाहते हैं? अंकल के यहां से जब हमारे यहां नौकरियां आती हैं, तो हम बड़े खुश होते हैं। पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार भी अमेरिकियों को लुभाने के प्रयास करती रही है, लेकिन वामपंथी कन्फ्यू’ड हैं। दक्षिणपंथी भी नासमझी का भरपूर प्रदर्शन करना चाहते हैं। अमेरिका भारतीयों के करीब आने को लालायित है, दशकों बाद उसने बदलते भारत को समझना शुरू किया है, लेकिन हम उसके साथ क्या कर रहे हैं? कई लोग बोल रहे हैं, करार न हुआ, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वास्तव में ऐसे लोग भारत के विकास के विरोधी हैं? ये लोग अमेरिका को दुत्कारना चाहते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि दुनिया में आखिर हमारे साथ खड़ा कौन होगा? दुनिया में आखिर हम विश्वास किस पर करेंगे? दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश हमसे मित्रता करना चाहता है, लेकिन हम उससे दुश्मनी मोल लेना चाहते हैं? नीतियां ऐसी ही रहीं, तो अगले सौ सालों में महाशक्ति हो जाने की बात सिरे से भूल जाइए।

Friday 20 June 2008

चुभ गया कोटा का कांटा

कोटा से कल ही लौटा, लेकिन खड़े गणेश जी मंदिर की अव्यवस्था को भूल नहीं पा रहा हूं। अव्वल तो बुधवार, 18 जून को पूरे चालीस मिनट लाइन में खड़े होने के बाद दर्शन सुलभ हुए और जब गणेश जी को एक छोटे से कमरे में फूलों से लदे-ढके देखा, तो मन दुखी हो गया। कमरे में दरवाजे के अंदर दरवाजा था, गांवों में एक कमरे वाले जो छोटे मंदिर हुआ करते हैं, उससे भी छोटा है खड़े गणेश जी का मंदिर, लेकिन उसके आसपास तामझाम इतना ज्यादा है कि लगता है, किसी विशाल मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे हों। करीब दो-सौ मीटर दूर मंदिर का मुख्य गेट है, उसके अंदर सौ मीटर तक फुहारों की दिखावटी व्यवस्था है, संगमरमर बिछाया गया है, मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण है, लेकिन गणेश जी के खड़े होने के लिए इतनी कम जगह है कि गणेश जी शायद ही वहां खड़ा होना पसंद करेंगे।
खड़े गणेश जी को देखकर अपने जयपुर में मोती डुंगरी वाले गणेश जी की याद आ गई। जमीन आसमान का फर्क। यहां बैठे हुए गणेश जी वाकई काफी जगह लेकर बैठाए गए हैं, देखकर मन प्रसन्न हो जाता है, लेकिन कोटा में खड़े गणेश जी की दुर्दशा आहत करती है। अंदर जाकर मालूम हुआ कि केवल दो पंडितों के खड़े होने की जगह है, इसलिए लोगों को काफी देर तक लाइन में लगना पड़ता है। गणेश जी को हाथ जोड़कर मन से मैंने प्रणाम किया और बिना तिलक, बिना प्रसाद बाहर निकल आया। मंदिर की बाईं ओर दीप-अगरबत्ती की जगह थी, तो दाईं ओर शिव मंदिर, यहां भी मन बहुत दुखी हुआ। शिवलिंग पर कथित शिव भक्तों ने मिसे हुए लड्डुओं का ढेर लगा रखा था, जल-दूध के प्रेमी शंकर जी को लोग जबरन लड्डू खिला रहे थे। यह शुद्ध बेवकूफी है। शिवलिंग पर लड्डू पोतने वालों की जितनी निंदा की जाए, कम है। वैसे अपने जयपुर में भी भगवानों की फोटुओं पर लड्डू-पेड़ा चिपकाकर लोग बड़े खुश होते हैं कि भोग सीधे भगवान को खिला दिया। पढ़े- लिखे -अपढ़ लोग खिलाने और चिपकाने का फर्क नहीं जानते?
हम खुद अपने साथ ऐसा व्यवहार पसंद नहीं करेंगे, जैसा व्यवहार हम भगवानों के साथ कर रहे हैं। क्या भगवान को सांस लेने की जरूरत नहीं है? क्या उनके मुंह-नाक में लड्डू-पेड़ा ठूंस देना चाहिए? कोई अगर हमारे मुंह-नाक-शरीर में लड्डू लीप दे, तो क्या हम उसे लगे हाथ पांच गालियां नहीं सुनाते हैं? क्या ईश्वर को हम पर रोष नहीं आता होगा? बहरहाल, कोटा में खड़े गणेश जी के मंदिर के बाहर जितने पैसे खर्च किए गए हैं, उतने पैसे से मंदिर के गर्भगृह को आसानी से बड़ा बनाया जा सकता था, खड़े गणेश जी को ठीक से खड़े होने की जगह दी जा सकती थी? लेकिन मंदिरों और भगवानों को बाजारू उत्पाद बनाकर-सजाकर बेचने का शौक रखने वालों को कौन समझाए? लोभी-भोगी पंडितों का वर्ग भी तो इसमें शामिल है?
एक और बात बता दूं, खड़े गणेश जी मंदिर और उसके आसपास मुझे कोई भी स्वयंसेवक, व्यवस्थापक या पुलिस वाला नजर नहीं आया। कोटा का यह कांटा न जाने कब तक मेरे दिल में चुभेगा और याद आएंगे, कमरे में कैद गणेश जी और लड्डुओं में गुम शिव जी।

Wednesday 11 June 2008

वर्दी में शर्म नहीं आती !


कभी-कभी पुलिस का ऐसा निर्मम चेहरा सामने आता है कि शर्म से सिर झुक जाता है। हरियाणा में एक महिला पुलिस वालों के सामने जब न्याय की गुहार लगाते-लगाते हार गई, तब उसने आत्महत्या जैसा मजबूर कदम उठाया। उसके साथ दो पुलिसकमियों ने बलात्कार किया था और महिला की बार-बार गुहार के बावजूद पुलिस दोषियों को बचा रही थी। आला अधिकारी भी कान में तेल डाले बैठे थे, अंतत: महिला द्वारा आत्महत्या के बाद ही पुलिस जागी। दोषी व फरार पुलिसकमियों को बर्खास्त किया गया। आज इस देश का हर जागरूक इंसान इस घटना और पुलिस के व्यवहार से स्तब्ध है। दोषी पुलिसकर्मी फरार हैं और परदे के पीछे रहकर बचने की जुगाड़ बिठा रहे हैं। हरियाणा के पुलिस महानिदेशक भी इस वाकये को पुलिस बल पर धब्बा बता रहे हैं, लेकिन क्या इस मामले में उनका कोई दोष नहीं है? उनके पास भी तो न्याय के लिए दो छोटे-छोटे बच्चों की पीडि़त मां ने आवेदन किया था। महानिदेशक अमानवीय बने रहे। आराम से नौकरी बजा रहे दोनों दोषी पुलिस वाले महिला और उसके पति को आरोप वापस लेने के लिए धमकाने में जुटे हुए थे। हरियाणा की कांग्रेस सरकार को इस शर्मनाक वाकये के लिए माफी मांगनी चाहिए। सोनिया गांधी को इस घटना का संज्ञान लेना चाहिए। दोषियों की गिरफ्तारी होनी चाहिए, उन्हें सजा मिलनी चाहिए। केवल यही नहीं, जो आला अधिकारी कान में तेल डालकर बैठे थे, उनके खिलाफ भी कारवाई होनी चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने कभी पुलिस बल को संगठित गिरोह कहा था। उस टिप्पणी को कोई और नहीं, बल्कि स्वयं पुलिस वाले साबित करते रहते हैं। जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पुलिस को सबसे भ्रष्ट महकमा होने का अपमान हासिल है, तो फिर जयपुर, पटना जैसे शहरों में पुलिस के बारे में क्या कहा जाए? देश की पहली नागरिक महिला हैं, सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भी एक महिला ही हैं, लेकिन क्या इस देश में कोई सभ्य महिला अकेले शिकायत दर्ज कराने के लिए थाने जाने के बारे में सोच सकती है? अफसोस, हरियाणा के इस हादसे ने साबित कर दिया, खूब पढ़-लिखकर आईपीएस बने अधिकारियों में भी मानवीयता का स्तर शर्मनाक हो चला है।

Monday 9 June 2008

डॉक्टर जी डराते हैं

पटना से लेकर जयपुर तक जूनियर डॉक्टरों ने सेवा को तबाह कर रखा है, बार बार हड़ताल कर रहे हैं इस सन्दर्भ में कुछ बातें हैं, जिन पर विशेष गौर करना चाहिए। पहली बात, स्वास्थ्य जीवन-मरण से जुड़ा मसला है, इसलिए इसे हड़ताल से परे रखने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। डॉक्टरी कोई मोबाइल सेवा, दूध सेवा, सड़क सेवा या रेल सेवा नहीं है कि बाधित होने के बावजूद जनता का काम चल जाए। स्वास्थ्य सेवा तो जीवन सेवा है, इसे बाधित करने को भला किस आधार पर सही ठहराया जाएगा? दूसरी बात, यह सरकारी डॉक्टरों की खुशकिस्मती है कि उनके पास मजबूत संगठन हैं और मरीजों का कोई संगठन नहीं है। आज हमें अच्छी, ईमानदार और संतोषजनक सेवा मुहैया करवाने वाला कोई कानून नहीं है। तीसरी बात, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जनता के पैसे पर डॉक्टरों को सस्ती शिक्षा नसीब होती है, लेकिन डॉक्टर बनने के बाद उसी जनता को दुत्कारना कहां तक उचित है? चौथी बात, डॉक्टर हड़ताल, मारपीट, अभद्रता करके वास्तव में अपना ही अहित कर रहे हैं, उनके ऐसे व्यवहार से सरकारी अस्पतालों की प्रासंगिकता खत्म हो रही है। ज्यादा से ज्यादा मरीज उन निजी अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं, जहां डॉक्टरों के सारे अधिकार अस्पताल प्रबंधन के हाथों में होते हैं। क्या ये डॉक्टर किसी निजी अस्पताल या निजी मेडिकल कॉलेज में हड़ताल का दु:साहस कर सकेंगे? पांचवी बात, रेजिडेंट डॉक्टरों की लड़ाई गोखले होस्टल के लड़कों के साथ थी, लेकिन उन्होंने अपना गुस्सा निदोüष मरीजों पर उतार दिया गया। पूरी डॉक्टर बिरादरी को इस दुष्प्रवृत्ति पर विचार करना चाहिए।

Sunday 1 June 2008

कुछ सत्य

दस साल पहले-------आज से दस साल पहले 1998 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल मात्र 10 डॉलर थी। तब भारत में पेट्रोल की कीमत मात्र 23.94 रुपये और डीजल की कीमत 9.87 रुपये प्रति लीटर थी।

जब यूपीए सरकार बनी------मई 2004 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी, तब कच्चे तेल की कीमत 34 डॉलर प्रति बैरल, पेट्रोल की कीमत ३५.71 रुपये प्रति लीटर व डीजल की कीमत प्रति लीटर २२.70 रुपये थी। तब रसोई गैस प्रति सिलेंडर की कीमत २८१।60 रुपये थी।

30 मई 2008 का हाल------स्थितियों में कुछ सुधार के बाद कच्चे तेल का भाव 126 डॉलर प्रति बैरल (शुक्रवार को) पर रहा। पेट्रोल की कीमत ४८।62 रुपये, डीजल ३४.17 रुपये प्रति लीटर और रसोई गैस की कीमत 300 रुपये प्रति सिलेंडर रही।

कुछ और सत्य

तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है लेकिन सरकार फायदे में है, वह पेट्रोल से खूब कमाई कर रही है, पेट्रोल पर बोझआयात और उत्पाद शुल्क शिक्षा अधिभार सहित : १४.78 प्रतिशत, विक्रय कर 28 प्रतिशत, पथ कर अधिभार 50 पैसे प्रति लीटर, डीलर का हिस्सा 1 रुपये पांच पैसे प्रति लीटर (जयपुर मे )डीजल पर बोझउत्पाद, आयात शुल्क अधिभार सहित ४.74 प्रतिशत, विक्रय कर 20 प्रतिशत, पथ कर अधिभार 50 पैसे प्रति लीटर, डीलर का हिस्सा 63 पैसे प्रति लीटर (जयपुर में )

बाबा के ख्वाब का खून देखेंगे


भारत में सामाजिक असमानता की भयानक उबड़-खाबड़ पहाडि़यों पर शोषित लोगों को सहारा देने के लिए आरक्षण का स्वप्न देखा गया था। ऐसा मासूम स्वप्न भारत के ईमानदार लोकतांत्रिक राजनेता ही देख सकते थे, वरना विश्व में ऐसी व्यवस्थाएं कम ही हुई हैं, जिन्होंने अपने यहां दबे-कुचले लोगों के लिए ऐसी विशेष व्यवस्था की है। आरक्षण हमारे देश के लिए एक अद्भुत खूबसूरत संबल था, लेकिन अब इस संबल का जिस तरह से मजाक उड़ाया जा रहा है, उसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी। लोग आरक्षण के नाम से चिढ़ने लगे हैं। मध्य प्रदेश के एक मंत्री जी ने तो यहां तक कह दिया कि जो आरक्षण मांग रहे हैं, वे भिखारी हैं। अब कीजिए बात, एक नेता देता है, तो दूसरा लेने वालों को भिखारी कहता है, क्योंकि वास्तव में जिस जनता को आरक्षण नहीं मिल रहा है, वो जनता ऐसी टिप्पणियों को सुनकर खुश होती है। आरक्षण को कभी इलाज माना गया था, लेकिन अब वह रोग बन चुका है। यह रोग जन-मन से लेकर सड़कों-पटरियों पर फैल गया है। आप एक जगह इस रोग का इलाज करते हैं, तो वह सरककर किसी दूसरी जगह पर उभर आता है।
जिसे भारतीय समाज के लिए अमृत माना गया था, वह विष में कैसे तब्दील हो गया, हम अंबेडकर से बैंसला तक कैसे पहुंच गए? अंबेडकर होते, तो भारत में आरक्षण की व्यवस्था को दस या बीस सालों में समाप्त करवा देते, लेकिन आज के नेताओं के लिए यह अच्छा है कि अंबेडकर नहीं हैं। मायावती खुलकर कई वर्षों तक आरक्षण की राजनीति कर सकती हैं, बैंसला मरते दम तक पटरियों पर विराजमान रह सकते हैं, मुलायम सिंह यादव समाजवाद की आड़ में जातियों की गोटी सजा सकते हैं, लालू जी यादवों-दलितों को भड़का सकते हैं। आरक्षण किसी के लिए रोग है, तो किसी के लिए भोग। जातियां भी अपने आरक्षण के दर्जे में विकास चाहती हैं। लोग खुद को दबा-कुचला कहलाने को बेताब हैं। गुर्जर कोई अकेले नहीं हैं, जिन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल होना है। देश भर में करीब 1000 जातियों ने अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के लिए आवेदन लगा रखा है। बिहार या यूपी में किसी जाति के प्रति इतना डर नहीं है, जितना राजस्थान में कुछ कथित पिछड़ी-दबी कुचली जातियों का है। इसके अलावा बिहार या यूपी में जातियों से कलम ने कभी हार नहीं मानी है, लेकिन राजस्थान में इतना भय है कि कोई साफगोई का परिचय देने को तैयार नहीं है। पूरा प्रदेश भयादोहन का शिकार होने को मजबूर है।

हम डरे हुए हैं। आरक्षण का स्वप्न अब दु:स्वप्न में बदल रहा है। कुछ लोग कहते हैं, यह आरक्षण के अंत की शुरुआत है। कार्ल मार्क्स ने जो स्वप्न देखा था, उसे रूस और चीन में फांसी पर लटका दिया गया। भारत में डॉ। अंबेडकर ने जो स्वप्न देखा, वह कठघरे में खड़ा है उसके खिलाफ मुकदमे की शुरुआत हो चुकी है।