Tuesday, 29 July, 2008

जाति के जर्रे : पांच

--विवेक हर लेती है गरीबी--
तो जवाहिर राम की आंखों में आंसू छलकने को बेताब थे। वह हमेशा की तरह बाबूजी से आंखें चुरा रहा था। घुटनों तक धोती, घनी मूंछें, छरहरा बदन। सिमट कर घुटनों पर हाथ और हाथ पर मुंह टिकाए बैठा था। बाबूजी सामने खाट पर थे, पूछा, `काहे मुंह लटकाए हो?´ `मोहन भाई दुनिया छोड़ गइलन।´बाबूजी घर के सामने पड़ने वाले नारा वाले खेतों के उस पार स्थित घनी बंसवारी को देखने लगे। मोहन भाई की यादों में उनकी नजरें ठहर गईं। एक साथ कई स्वर, कई घटनाएं, कई संवाद उभर आए। जवाहिर की आंखें बह चली थीं और बाबूजी याद कर रहे थे।

--- मोहन भाई बैलों को हल के लिए तैयार कर रहे हैं। बाबूजी भी खेत जाने के लिए तैयार हैं, `मोहन, आज चंवरा वाला खेत जुत जाना है। बारिश कभी भी शुरू हो जाएगी।´मोहन जोर की आवाज लगाता है, `जी मालिक।´और बैल चंवर की ओर बढ़ चलते हैं, उन्हें रास्ता पता है, बस खोलने और हल की रस्सी गले में बंधने की देर होती है। वे जान जाते हैं आज काम पर जाना है और मोहन भाई के कंठ से जब `चल, चलके´ आवाज निकलती है, तो बैलों का जोड़ा अपने गले में बंधी घंटियां बजाता चल पड़ता है।

हमारे चंवर वाले खेत घर से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ते हैं। चंवर राजपूतों के गांव माने में पड़ता है। उसके पहले बिरती वाले खेत पड़ते हैं, जो नौतन गांव के तहत आते हैं और उसके पहले नहर के पास वाले और उसके बाद नौतन बाज़ार और नारा वाले खेतों की बारी आती है। घर के आसपास भी पर्याप्त जमीन है।जहां तक मेरी बात है, गांव में हमारी कितनी जमीन है, यह आज भी मैं नहीं जानता। कहां-कहां खेत हैं, यह भी मैं नहीं जानता। बस एक अंदाजा है, जिन-जिन खेतों में बचपन में गए हुए हैं, उन खेतों की याद है। विशेष रूप से जिन खेतों में हेंगाई के समय बास की पट्टी पर मोहन भाई ने बैठाया था, वे खेत अच्छी तरह याद हैं। खेत की जुताई यानी खोदाई के बाद हेंगी से खेत को समतल किया जाता है। बैलों के जोड़े के पीछे हल की जगह बांसों को जोड़कर बनाई गई पट्टी बांधी जाती है और बैलों का हांकने वाला हरवाह उस बांस की पट्टी पर चढ़ जाता है, बच्चे भी रस्सी पकड़कर मजे से हेंगी पर बैठ जाते हैं। हेंगी का कुछ भार हो जाता है, बैल चल पड़ते हैं और उबड़-खाबड़ जुते हुए खेत समतल होने लगते हैं। बचपन में हम चारों भाइयों को हेंगी पर बैठने में बड़ा मजा आता था। इतना मजा आता था कि पास वाले खेत में ही दो भाई बैल की भूमिका में होते, तो दो भाई पीढे़ से बनी हेंगी पर बैठकर आनंद लेते। सबसे बड़े भाई दिलीप उपाध्याय हम चार छोटे भाइयों को खेत में खेलते देख गदगद रहते थे और उससे भी ज्यादा गदगद बाबूजी होते थे कि शहरी बच्चे खेत में खेलकर मजबूत हो रहे हैं।

खैर, बाबूजी और मोहन भाई चंवर पहुंचते हैं। वहां पहुंचकर मोहन को खूब जोर की भूख लगती है। वह बाबूजी से बोलता है, ` पेट खाली है, घर जाएंगे, तो खाना भिजवा दीजिएगा।´ बाबूजी खेत बताकर वापस चले आते हैं। उन्हें स्कूल भी जाना है। घर आते हैं, खाना बांधने का आदेश देते हैं। नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। स्कूल जाने से पहले मोहन भाई के पास खाना भी पहुंचाना है। बुआ पोटली बांध लाती हैं, पोटली में दस रोटियों के बराबर चार मोटी रोटियां हैं और बैंगन की सब्जी, मिर्च, नमक, प्याज। बाबूजी फिर चंवर के लिए चल पड़ते हैं। नारा वाले खेतों को पार करते हैं, नहर के पास वाले खेतों के करीब पहुंचते हैं, तो देखते हैं। अपने ही एक बिरादर उपाध्याय के खेत में मोहन की पत्नी अपने एक पुत्र के साथ काम में लगी है। बाबूजी सोचते हैं, मोहन को खाना देने चंवर तक जाऊंगा, तो स्कूल के लिए देर हो जाएगी, क्यों न मोहन की पत्नी को ही खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी दे दूं, यह बेटे को भेजकर खाना पहुंचा देगी। बाबूजी ने ऐसा ही किया, मोहन की पत्नी ने बड़ी ललचाई निगाह से पोटली अपने पास रख ली और आश्वस्त कर दिया कि पोटली मोहन तक पहुंच जाएगी। बाबूजी स्कूल चले गए। दिन भर खूब कड़ी धूप रही थी, पसीने से परेशान जब बाबूजी शाम को स्कूल से घर पहुंचे, तो आश्वस्त थे कि चंवर वाला बड़ा खेत जुत गया होगा, बारिश कभी भी शुरू होने वाली है। मोहन की मेहनत से काम समय से हो गया। तभी बाबूजी के लिए पानी लेकर आई बुआ बताती है, `मोहन तो न जाने क्यों सुबह दस बजे ही बैल दरवाजे पर बांध गया।´ बाबूजी चौंक पड़े। पानी पीना थम गया। यानी चंवर वाले खेत नहीं जुत सके। यह तो बदमाशी है। खाना भी भिजवाया, तब भी मोहन ने दस बजे ही लाकर बैल दरवाजे पर बांध दिए और अपने घर लौट गया। आखिर क्या बात हुई? बाबूजी यही सोचते हुए फिर झटपट तैयार हुए और मोहन के टोले की ओर चले पड़े, जो कि करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पड़ता था। मोहन घर के सामने ही खाट पर चित पड़ा था। बाबूजी को आता देखकर उठ बैठा। बाबूजी ने दूर से ही पूछा, `मोहन, खेत क्यों नहीं जुता? एकदम नाजायज बात है।´मोहन ने रोष के साथ कहा, `खाना नहीं भिजवाए, तो भूखे पेट हल कैसे चलाता?´ बाबूजी दंग रह गए। मामला समझ में आ गया। बोले, `अपनी मेहरारू से पूछो? क्या मैंने उसे खाना तुम्हारे पास पहुंचाने के लिए नहीं दिया था?´मेहरारू सब सुन रही थी, झोंपड़ी के अंदर ही कसमसा रही थी। मोहन ने आवाज देकर उसे बाहर बुलाया, वह बेवक्त बुलाने का बहाना करती मोहन पर नाराज होती हुई बेमन से बाहर आई। मोहन के एक बार पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया, जब मोहन ने डपट कर पूछा, तब उसने आंचल में मुंह छिपाए हुए कहा, `बड़ी भूख लगी थी, हम मां-बेटे ही खा गए, तुम्हारे लिए बचा नहीं।´बाबूजी आगबबूला हुए, `काम दूसरे के खेत में किया और खाना हमारे यहां का खा गई। मेरा खेत यों ही पड़ा रह गया, मेरे बैल गए और घूमकर आ गए, बताओ यह भी कोई बात हुई? सरासर नाजायज? बताओ, मैंने क्या गलत किया?´मोहन भी शर्मिंदा हुआ, बीवी को पीटने को तैयार हो गया, लेकिन वह चुपचाप वहां से खिसक गई। बाबूजी बहुत दुखी मन से घर लौट आए। मोहन एकाध दिन शर्म के कारण नजर नहीं आया। बताते हैं, उसकी बीवी बड़ी चंट थी, शायद अभी भी जिंदा है। उसे बड़ी भूख लगती थी। वह किसी के भी खेत में नजर चुराकर घुस जाया करती थी, सब्जियां कच्ची ही भकोस लिया करती थी। उसे लाज-लेहाज जरा न था। मोहन भी बेचारा क्या करता? समझा- बुझाकर हार चुका था।


बहरहाल, बाबूजी यादों में खोए थे। जवाहिर ने लंबी चुप्पी तोड़ते हुए बताया, `घर में एक भी दाना नहीं है, भाई का श्राद्ध न जाने कैसे होगा?´बाबूजी मानों यादों से जागे, हरकत में आए, `चिंता मत करो, श्राद्ध ढंग से होगा। जाओ घर से मलकिनी से बोलो, बीस किलो आटा, बीस किलो चावल ले लो, कुछ रुपये भी मैं दिए देता हूं। श्राद्ध ठीक से करो। मोहन अपने ही घर का आदमी था। बहुत किया उसने।´ जवाहिर फूट-फूटकर रोने लगा, तो कुछ बच्चे भी वहां जुट गए। बाबूजी ने पूछा, `रोओ मत, बहुत काम है, जाकर निपटाओ।´जवाहिर ने रोते हुए ही कहा, `मालिक, मोहन पर इतनी दया? आप नहीं जानते, हम लोग आपको कितना नुकसान पहुंचाए हैं। खेतों पर हमने क्या-क्या किया है, यह अगर आप जान जाएंगे, तो आपको बहुत दुख होगा। हम लोग दया के लायक नहीं हैं, मालिक।´ बाबूजी बोले, `मैं जानता हूं, याद मत करो, ये सब बेकार बात है।´जवाहिर ने रोते हुए जमीन में नजर गड़ाए हुए कहा, `मालिक, आपकी जगह कोई दूसरा होता, तो हमें बहुत पीटता, लेकिन आपने कभी कुछ नहीं कहा और आप हमारे बारे में इतना सोच रहे हैं। हम लोग कैसा सोचते थे और आप कैसा सोचते हैं? वाह रे मालिक, जाति तो जाति ही होती है न? बड़ा तो बड़ा ही होता है। आपको जान गए, किरिया (कसम) खाते हैं, आगे से हमेशा आपका भला सोंचेंगे। मेरा दोषी भाई भी आपको अजीज है, उसके लिए इतना दे रहे हैं? धन्य है।´ बाबूजी ने कहा, `चुप रहो । नीच-ऊंच मत करो। गलती तुम्हारे या तुम्हारे भाई की नहीं थी। दरअसल भूख और गरीबी अच्छे-अच्छों का विवेक हर लेती है। विवेक न हो, तो आदमी गलतियां करता चला जाता है। तुम लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।´

उसी क्षण जवाहिर की दुनिया बदल गई। उसकी दुनिया हमारे घर के लिए स्वार्थ से परे बस रही थी। जवाहिर आज भी है, हमारी सेवा के लिए समर्पित, अपनों से भी ज्यादा अपनों की तरह। सहज सम्मानित। मोहन भाई चले गए, काश, वे भी जवाहिर की तरह सम्मान से जी पाते, तो कितना अच्छा होता। क्रमश:

Sunday, 27 July, 2008

बेखौफ सफर पर दहशतगर्द

....हैदराबाद, जयपुर, बेंगलुरू के बाद अब अहमदाबाद में वो बेखौफ अपनी हैवानियत को अंजाम दे गया, आखिर क्यों उसकी गर्दन हमारी पकड़ से दूर है?


बेंगलुरू में शुक्रवार को आठ बम विस्फोट हुए थे और अब शनिवार को अहमदाबाद में 17 बम धमाके हुए हैं। लगातार दो दिन आतंकियों ने भारत में धमाके किए हैं, तो लगता है, हैवान आतंकियों को कोहराम मचाने की जल्दी है। पहली नजर में यह पुलिस और उसके खुफिया तंत्र की विफलता है और कुछ व्यापकता में जाएं, तो यह हम सबकी विफलता है। उस तबके की विफलता है, जो अपनी खुशियों में खोया हुआ है। जो होटलों में ऐय्याशी के प्रति चिंतित है, जिसने देश के बारे में सोचना छोड़ दिया है। हर विस्फोट हमें थोड़ी देर के लिए जगाता है और हम फिर कुंभकर्ण की तरह सो जाते हैं, जबकि हमें अपने नेताओं की नाक में दम कर देना चाहिए। ये नेता ऐसी-ऐसी कारगुजारियों-कारस्तानियों में जुटे हैं कि किसी भी भले आदमी का सिर शर्म से झुक सकता है। जो राजनेता समाज को सुरक्षा नहीं दे सकता, उसे नेतागिरी छोड़ देनी चाहिए। देश में आतंकवाद के खिलाफ व्यापक बहस होनी चाहिए। हमें विचार करना चाहिए कि आतंकवाद का सामना कैसे-कैसे किया जा सकता है। इसके लिए अगर संसद का विशेष सत्र भी बुला लिया जाए, तो इससे बेहतर और कुछ नहीं होगा।---

शर्म करो सरकार

जो एटमिक डील को साकार करने में दिन रात एक किए हुए हैं, लेकिन उन्हें आतंकियों को नेस्तनाबूत करने की कोई फिक्र नहीं है। उन्होंने कानून तक लचीले बना रखे हैं। आतंकवाद के खिलाफ हमारी केन्द्र सरकार का प्रदर्शन तो शर्मनाक है। जिस आतंकी को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा सुना दी, उसके प्रति जिस सरकार में हमदर्दी है, वह भला आतंकवाद का खात्मा कैसे करेगी? एक सरकार आतंकियों को कांधार छोड़ आती है, तो दूसरी सरकार आतंकियों को चिकन-बिरयानी खिलाती है, तो भला इस देश में आतंकी नहीं पलेंगे, तो कौन पलेगा? टाडा और पोटा जैसे कानून रद्द कर दिए गए, जो मूल समस्या थी, उसका समाधान नहीं किया गया। गड़बड़ी कानून में नहीं, हमारे तंत्र में है, जो कानून का ढंग से पालन करवाने मे नाकाम रहता है। तंत्र वह है, जो राजनेताओं की जी-हुजूरी में दिन रात एक किए हुए है। अपनी-अपनी पसंद के अफसर बिठाए जाते हैं, अपनी-अपनी पसंद की अदालतें तक बिठाई जाती हैं, तो भला कौन रोकेगा आतंकवाद को? शर्म आनी चाहिए सत्ता में बैठे लोगों को। केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील का आतंकवाद और नक्सलवाद के प्रति रवैया बेहद लचर रहा है। उन्हें यह ध्यान दिलाते देर नहीं लगती है कि ये विस्फोट राज्य सरकार के सिरदर्द हैं। हमारे केन्द्र सरकार के कर्णधारों के कंठ से एक दुरुस्त ललकार तक नहीं निकल सकती। आवाज ऐसी निकलती है कि एक चूहा तक नहीं बिदकता। सरकार वह होती है, जिसकी दहाड़ से दुष्ट अपराधी कांपते हैं, लेकिन जिस सरकार में कोई दहाड़ने वाला न हो, उसका क्या होगा? सरकार में तो लालू प्रसाद यादव जैसे मसखरे शामिल हैं, जो जनता का झूठा मनोरंजन करते फिरते हैं। दागियों से प्यार करने वाली सरकार, दागियों के वोट पर विश्वास मत जीतने वाली सरकार की जितनी आलोचना की जाए कम है? --

अमेरिका से डील पर गुस्सा?

केन्द्र सरकार को अमर सिंह जैसे उत्सव प्रेमियों के साथ मौज मनाना छोड़कर अमेरिका से दोस्ती की कीमत अदा करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। अमेरिका से दोस्ती करने वाला कोई देश दुनिया में सुरक्षित नहीं रहा है। इस्राइल का उदाहरण सबके सामने है, लेकिन इस्राइल आतंकी हमलों को झेलने के लिए हरदम तैयार रहता है। हमें भी तैयार रहना होगा। अमीरी और बुलंदी कीमत मांगती है। देश विकास कर रहा है, तो सुरक्षा के मद में खर्च बढ़ाना ही होगा। सुरक्षा ढांचे को फिर खड़ा करने की जरूरत है। अमेरिका से दोस्ती करनी है, तो अमेरिका जैसा ताकतवर बनना होगा। भारत कहीं से कमजोर नहीं है, जरूरत बस जागने की है। ध्यान रहे, इक्कीसवीं सदी में उन्नीसवीं सदी की पुलिस बार-बार मुंह की खाने को मजबूर है। सरकारों की जो व्यस्तता तबादलों और अन्य फालतू के कामों में दिखती है, वह आतंकवाद के खिलाफ क्यों नहीं दिखती? हमारी राजनीति में एक तबका है, जो गलत लोगों और बांग्लादेशियों को बसाने का काम करता है। अवैध बस्तियों के लिए जिम्मेदार दलालों के राजनीतिक पाटिüयों से गहरे संबंध होते हैं। बस्तियां ढहाई जाती हैं, अवैध लोग खदेड़े जाते हैं, लेकिन अवैधता को अंजाम देने वाले राजनीतिक तंत्र और उसके छुटभैय्ये गुर्गों का बाल भी बांका नहीं होता। आतंकियों की स्लीपींग सेल हर शहर में मौजूद है, तो उसके पीछे हमारी सरकारों की कोताही और लापरवाही ही है। जयपुर, बेंगलुरू और अहमदाबाद में भी बिना स्थानीय मदद के आतंकियों ने विस्फोटों को अंजाम नहीं दिया होगा। हर सरकार के पीछे जो स्याह गलियारा है, उसी से आतंकियों को खाद-पानी मिलता है। सरकारों को अपने स्याह गलियारों और गलत धंधों पर पूरी तरह से अंकुश लगाना होगा, तभी हम आतंक से लड़ पाएंगे।

Wednesday, 23 July, 2008

नोटों का नाद


हेर्बेर्ट बाकर ने संसद भवन डिजाइन किया था। उन्होंने सोचा था, सुंदर भारत के इस सुंदर भवन में अच्छी-अच्छी बातें होंगी। जो बातें होंगी, उन पर समृद्ध इतिहास वाला देश भारत गर्व करेगा, लेकिन यह क्या? इस सुंदर लाल भवन में जब पटल पर नोटों के बंडल रखे जा रहे थे, तब जो शिकायतों का नाद हो रहा था, तब जो इतिहास लिखा जा रहा था, वह निश्चित रूप से इतना काला था कि उसकी कालिमा मिटाए न मिटेगी। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कह दिया, जांच होगी और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। जांच झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड के समय भी हुई थी, कुछ नहीं हुआ। तब रिश्वत लेने वाले माननीय जी आज कोयला मंत्री बनने को लालायित हैं। संसद से ज्यादा गंभीरता तो हमारे क्रिकेट में बची है। अगर किसी क्रिकेट मैच से पहले यह पता लग जाए कि मैच फिक्स हो चुका है, तो जाहिर है शरद पवार जैसे लोग मैच रुकवा देंगे, लेकिन संसद में जो विश्वास मत संघर्ष होने वाला था, उसमें फिक्सिंग की पूरी आशंका नजर आने के बावजूद मैच हुआ। क्या यह मैच नाजायज, अनैतिक नहीं कहा जाएगा? दूसरी कलंक लगाने वाली बात यह कि बसपा सांसदों ने सदन में बाकायदे दस्तावेज पेश करते हुए यह शिकायत की है कि विश्वास मत के पक्ष में मत देने के लिए सीबीआई ने बसपा सांसदों को धमकाया। यह भी जांच का मुद्दा है। तीसरी कलंक वाली बात दागी सांसद पप्पू यादव का आरोप है। पप्पू ने भाजपा नेता विजय कुमार मल्होत्रा पर रिश्वत का प्रस्ताव करने का आरोप लगाया है। तीनों ही कलंक सनसनीखेज हैं, जिनका यथोचित कारवाई के साथ पटाक्षेप होना चाहिए।



जीत गई सरकार


यूपीए सरकार 256 के मुकाबले 275 मतों से विश्वास मत जीत गई। पहली बात, परमाणु करार अब होकर रहेगा। सरकार अब करार के पक्ष में इतनी तेजी से काम करेगी कि बुश प्रशासन भी दंग रह जाएगा। अमेरिका और दुनिया के अमीर देशों को भी यूपीए की जीत से खुशी हुई होगी। दूसरी बात, कांग्रेस अब वामपंथियों के साथ-साथ अन्य विपक्षी नेताओं का सामना काफी रोष और जोश के साथ करेगी। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सरकार का हमलावर रुख झेलना पड़ सकता है। तीसरी बात, कांग्रेस करार की ओर से निश्चिंत होकर अब आर्थिक विकास की ओर ध्यान देने की कोशिश करेगी। महंगाई के खिलाफ कुछ कदमों की उम्मीद जनता कर सकती है। वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की ओर सरकार बढ़ सकती है। चौथी बात, बाजार में खुशी है। विदेशी और विशेष रूप से अमेरिकी आधार वाले निवेशक हमारे शेयर बाजार पर भरोसा कर सकते हैं। सरकार बचाने में लगे कुछ नामी उद्योगपति भी फायदे में रहेंगे। पांचवी बात, सरकार के जो आर्थिक व व्यवस्थागत फैसले वामपंथियों के साथ रहते रुके हुए थे, वे अब धड़ाधड़ संभव होंगे।



अब आगे क्या?


22 जुलाई के बाद देश की राजनीति करवट ले चुकी है। अब लोकसभा चुनाव अगले साल अपने निर्धारित समय पर होंगे। यूपीए का रथ बिना वामपंथियों की मदद के आगे बढ़ चला है। विश्वास मत पर जीत यूपीए के लिए क्वार्टर फाइनल में मिली जीत है। सेमी फाइनल नवंबर में होगा, जब राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली सहित कुछ अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। फाइनल मैच लोकसभा चुनाव होगा, अत: कांग्रेस के पास समय बहुत नहीं है। संसद में आंकड़ों के खेल में वह भले जीत गई हो, लेकिन देश में आम जनता यूपीए सरकार से खुश नहीं है। कांग्रेस को मुसलिम तुष्टिकरण में मुश्किल आ सकती है। अब वामपंथियों के पास अपनी बात रखने और साबित करने का पूरा समय है। भाजपा को भी एक तरह खुश होना चाहिए। भाजपा और राजग के सारे मुद्दे ताजा हैं, महंगाई अकेले काफी है। संसद के आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता के आंकड़े होते हैं। जो भी संसद के आंकड़ों का गुमान पालेगा, वह चुनावी मैदान में मुंह की खाएगा। सरकार दागदार होकर सदन में विश्वास मत जीत गई, लेकिन जनता का दिल जीतने का सबसे अहम काम बाकी है।

Sunday, 20 July, 2008

बहन जी पहले अपना राज्य देखिये

लडाई मनमोहन बनाम मायावती हो गई है, मायावती जानती हैं अगर अब केन्द्र सरकार बच गई तो वे मुश्किल में पड़ जाएँगी, अतः वे सरकार के खिलाफ खुलकर आ गई हैं,
वो साथ ही प्रधानमंत्री बंनने का सपना साकार करने की दिशा में बढ़ चली हैं, यह देश के लिए अच्छी बात नही है, लालू और मायावती जैसे लोगों को कम से कम प्रधानमंत्री के पद को माफ कर देना चाहिए, ये नेता पहले अपने पिछडे प्रदेशों, यूपी और बिहार का विकास कर लें तो देश पर इनकी बड़ी कृपा होगी, देश उनका अहसान मानेगा, धन्यवाद

Tuesday, 15 July, 2008

जाति के जर्रे : 4

--मोहन भाई--
मुझे लगा, इस कथा का एक शीर्षक रख लेते हैं, ताकि सुविधा हो जाए। मोहन भाई हमारे गांव से करीब दो किलोमीटर उत्तर की ओर नौतन बाजार गांव के एक अलग टोले में रहते थे। उनकी टोली अपनी जाति की वजह से गांव से बाहर एक कोने में बसाई गई थी। जहां मोहन भाई के पूर्वज बसाए गए थे, वहां एक जंगल हुआ करता था, जिसे लाला गाछी कहते थे। वहां दिन में भी अंधेरा रहता था, किसी जमाने में बाघ भी रहा करते थे। आजादी के बाद उस जंगल की कटनी शुरू हुई और आज उस जंगल का एक भी पेड़ नहीं बचा है । हम बचपन में जब एकमा रेलवे स्टेशन पर उतरकर टमटम से गांव जाया करते थे, तब भी लाला गाछी में कुछ पेड़ हुआ करते थे, बड़े-बड़े खूब घने, सड़कों पर छाए हुए, कुछ भय लगता था और एक खुशी भी कि लाला गाछी खत्म हुई, अब हमारा आम का बगीचा नजर आने लगेगा। मुझे याद पड़ता है, लाला गाछी के कुछ पेड़ों के आम मैंने चखे थे, खैर, वह जंगल या गाछी अब इतिहास है।
तो बात हो रही थी मोहन भाई की, जो उस जाति के थे, जिसके नाम के बाद का हिस्सा `मार´ है। याद है, लंबे कद के थे, चेहरे पर घनी मूंछें, सांवला रंग, हंसमुख चेहरा, तेज आवाज, मजबूत चुस्त बदन, बड़ी मीठी भोजपुरी बोलते थे। जब वे खेत जोतते थे और बैलों को आवाज देते थे, आव-आव-आव, चल जवान, तब हम देखते रह जाते थे। मोहन भाई हमें बहुत मानते थे। मेरे से बड़े वाले भाई साहब मालू अर्थात लोकेश उपाध्याय उन दिनों थोड़े शैतान हुआ करते थे, मोहन भाई को परेशान किया करते थे, तो मोहन भाई ने उनका नाम झंझट उपाध्याय रख दिया था। वे `उपाध्याय´ को `पधिया´ बोलते थे। जब हम अपने दूर स्थित खेतों से लौटते हुए थक जाते थे, छोटे-छोटे शहरी पांव जब दुखने लगते थे, कटे हुए खेतों से जब घिर जाते थे, तब मोहन भाई हमें कंधे पर बैठा लेते थे। मैं आज भी पसीने से तर-बतर मोहन भाई के ठंडे कंधे को महसूस कर सकता हूं। हमने जाति का भेद तब नहीं जाना था , हमें जाति के भेद के बारे में किसी बुजुर्ग ने बताया भी नहीं था। मुझे मोहन भाई का कंधा इतना सुरक्षित और मजबूत लगता था कि मुझे दुख होता था, यह कंधा शाम होते ही कहीं चला क्यों जाता है, हमारे घर क्यों नहीं रहता।
तब हम चारों भाई छोटे थे, शहर से गरमियों में गांव जाते थे। गांव में हमारे पांचवें बड़े भइया दिलीप उपाध्याय होते थे, पोस्ट ऑफिस में कार्यरत, आज भी नौकरी में हैं। उनके पिताजी यानी बड़े पिताजी, जिन्हें हम भी बड़े भैया की तरह की बाबूजी कहा करते हैं, अपने गांव के दक्षिण में स्थित बरेजा गांव के हाईस्कूल में भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। बाबूजी अर्थात शिवजी उपाध्याय अभी भी हैं, ढेर सारी शानदार पुरानी यादों से लबालब । 1986 में ही रिटायर हो चुके हैं। हार्ट के मरीज हैं। पेंशन मिलती है। समाजसेवा करते हैं। गांव के गिने-चुने अच्छे लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन यह बात अलग है कि गांव में मनमानी करने वाले बहुसंख्य लोगों को अच्छे लोगों की कोई जरूरत नहीं रही । अच्छे लोगों की जरूरत केवल गरीबों को है, जिनके छोटे-छोटे बच्चों को बीमार पड़ने पर भी दो बूंद दूध नसीब नहीं होता, ऐसे ही लोगों के काम आते हैं बाबूजी।
खैर, 1991 की सर्दियों का समय था। दसियों दिन बाद धूप थोड़ी पसर आई थी। सुबह का समय था, मोहन भाई के छोटे भाई जवाहिर मुंह लटकाए बाबूजी के पास पहुंचे। बहुत दुखी थे, मानो कोई बड़ा आघात लगा हो। ...क्रमश:

Wednesday, 9 July, 2008

जाति के जर्रे - 3

मुझे खुशी है, मेरे गांव में जातिवाद का शिकंजा उस तरह से कड़ा नहीं है, जैसा कि हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में रहा है । पिछड़ी जातियों में भी कुछ लोगों ने खूब नाम कमाया है, जैसा भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर भी हमारे ही जिले के थे। वे जाति के नाई थे, उन्हें शुरुआती दिनों में अपमान भी खूब झेलना पड़ा, लेकिन अपने ज्ञान के दम पर उन्होंने पर्याप्त सम्मान अर्जित किया। भिखारी ठाकुर पर मेरे एक प्रिय लेखक संजीव सूत्रधार नाम से बेहतरीन उपन्यास लिख चुके हैं। भिखारी ठाकुर के जरिये बिहारी संस्कृति की श्रेष्ठता का साक्षात्कार हम करते हैं। बिहार में जाति व्यवस्था को जानने में भी सूत्रधार के जरिये काफी मदद मिलती है। बिहार की भूमि ने कला का सदैव सम्मान किया है, यह बात मैं अपने उत्तरी बिहार के बारे में दावे के साथ कह सकता हूं, क्योंकि इस इलाके को मैंने देखा है। नाच जैसी मुश्किल नाट्य शैली इसी क्षेत्र की देन है, जिसे भिखारी ठाकुर ने चरम सम्मान पर पहुंचाया था। नाच बड़े लोगों और पंडितों के बीच भी लोकप्रिय हुआ था, भिखारी ठाकुर पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन बहुत विद्वान थे, उन्हें धर्म के बारे में भी कई ब्राहमणों से ज्यादा ज्ञान था। तो भिखारी ठाकुर के ज्ञान के सामने मत्था टेकने वालों की संख्या कम नहीं थी। कहने का मतलब यह कि कला और ज्ञान के आगे जाति की दीवार को ढहते देर नहीं लगती।

बहरहाल, कला एक राह थी, जिसके माध्यम से दलितों को पर्याप्त सम्मान नसीब हुआ। कोई शक नहीं पिछडों मे जब कोई उभरता है तो उसका फायदा सबको मिलता है । उनके लिए पढ़ने के अवसर तो बाद में बने, क्योंकि शिक्षा सुविधाओं का विस्तार बहुत बाद में हुआ। कुछ दलितों का शोषण मेरे गांव में अवश्य हुआ होगा, लेकिन अगर कोई ब्रह्मण शोषण करता होगा, तो दूसरा ब्रह्मण उसका विरोध भी करता होगा। आज एक बड़ी बात यह है कि दलितों और पिछड़ों के पास अपने नेता हैं, उनका शोषण अकल्पनीय है। राजनीतिक जागरुकता ने पिछड़ों के लिए सुरक्षा कवच का निर्माण कर रखा है। राजनीतिक जागरुकता के कारण उनमें एकता आई है, वे किसी न किसी दबंग खेमे के साथ जा जुड़े हैं और ऐसा जरूरी भी है, क्योंकि अकेले रहने में शोषण की ज्यादा गुंजाइश रहती है। पिछड़े मजदूरों के एकजुट रहने की वजह से हमारे गांव में किसी से बेगार करवाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। तो मैं देखता हूं, दलित-पिछडे़ जहां भी जागरूक और एकजुट हुए हैं, वहां उन्होंने शोषण की स्थितियों से पीछा छुड़ा लिया है। भिखारी ठाकुर भी अपनी स्थितियों से तभी ऊपर उठ पाए, जब उन्होंने अपना एक समृद्ध समुदाय बनाया, कलाकारों की एक मजबूत टोली बनाई।
क्रमश:

Tuesday, 8 July, 2008

अफसोस कामरेड



कॉमरेडों का समूह यूपीए सरकार से जुदा हो गया, भावनात्मक रूप से भारतीय राजनीति के लिए यह महत्वपूर्ण क्षण हैं। आने वाले कुछ वर्षों तक कांग्रेस और कॉमरेडों के बीच तनाव बना रहेगा, क्योंकि कांग्रेस जो परमाणु करार करने जा रही है, उसे वामपंथी खेमा अच्छा नहीं मानता। वामदल फिर कब केन्द्र में सत्ता के साथ खड़े हो पाएंगे, उनका प्रभाव फिर कब केन्द्र की राजनीति पर दिखेगा, यह कहना मुश्किल है। व्यक्तिगत रूप से वामपंçथयों की समर्थन वापसी पर मुझे दुख है। वे इस करार को समझने में नाकाम रहे, वे बदलते हुए दौर को समझने में नाकाम रहे। वाम दलों को चीन की चिंता रही है, लेकिन वे चीन से कुछ भी सीखने या उसे लागू करने के इच्छुक नहीं हैं। कॉमरेडों की नीति भारत को अलग-थलग या निरपेक्ष रखने की है। चीन भी यही चाहता रहा है कि भारत निरपेक्ष रहे, अमेरिका के साथ न जाए, लेकिन हमें सोचना-समझना चाहिए, अपना हित जरूर देखना चाहिए, निरपेक्षता नए दौर में नुकसान पहुंचा सकती है। जो देश दुनिया में अमेरिका के विरोधी रहे हैं, वे कोई हमारे समर्थक नहीं हैं। अगर हम अमेरिका विरोधियों के साथ नहीं हैं, तो हमें कायदे से मुद्दों के आधार पर अमेरिका के साथ होना चाहिए, लेकिन वाम खेमा हमें अलग-थलग रखना चाहता है। अफसोस।


समर्थन वापसी एक तरह से वाम राजनीति की विफलता भी है। वे बार-बार वहीं पहुंच जाते हैं, जहां से चलना शुरू करते हैं। काश, उन्होंने पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा जैसे अपने राज्यों को आदर्श राज्य में तब्दील किया होता, तो उन्हें इस तरह उपेक्षित नहीं होना पड़ता।

Thursday, 3 July, 2008

सभ्य समाज में आंख मारने की बदमाशी

सेकुलर खेमा शांति काल में सांप्रदायिकता की राजनीति करता है और जब विनाशकाल शुरू- होता है या जब दंगे शुरू होते हैं , तो सांप्रदायिक राजनीति का रोना रोता है । उनकी पोल एक बार फिर खुल गई है। राजीव गाँधी ने अयोध्या विवाद का ताला खुलवाया था, तो विवाद कहां तक पहुंचा, सभी जानते हैं । कश्मीर में अमरनाथ बोर्ड को भूखंड देकर वापस ले लिया गया, यह मामला न जाने कहां पहुंचेगा, बीजेपी का बंद चिंता की बात है, तुष्टिकर का दोहरा खेल खेलने वाले ये लोग खुद को सभ्य बोलते हैं, शर्म आती है, वामपंथियों पर, कभी मैं भी एस यफ आई में रहा था। उन कुछ दिनों पर गर्व होता है, लेकिन इस गर्व को छीनने का काम कामरेड कर रहे हैं । जब परमानु करार के विरोध में दिए जा रहे तर्कों से बात नहीं बनी, तो धर्म का कार्ड खेल दिया गया। सबसे पहले माकपा पोलित ब्यूरो के एम के पंढे ने मुसलमान वोट बैंक की चिंता करने की सलाह दी। प्रकाश करात ने लेख लिख दिया करार से सांप्रदायिक ताकतों को फायदा होगा। मतलब ले दकर बस एक सांप्रदायिकता का सहारा है, उसी के दम पर भारतीय राजनीति होगी। मायावती को भी चिंता हो रही है, वे करार को मुसलमान विरोधी बता कर वोट की राजनीति जुट गई हैं । भारतीय मुसलमान नेताओं की वैचारिकता तो सदेव संदेह के दायरे में रही है , व्यापक समाज की बात छोड दीजिए, वे तो अपने समाज की वाजिब वैध बेहतरी के लिए भी खास नहीं कर सकें हैं । केवल सांप्रदायिकता पर गाल बजाते रहते हैं । क्या वाकई इस करार से मुसलमान नाराज हो जाएंगे? क्या करार से फायदा केवल हिन्दुओं को होगा? क्या करार से पैदा होने वाली बिजली केवल हिन्दुओं के घरों को जगमग करेगी ? क्या मुसलमानों के घरों में परमानु करार से बिजली नहीं पहुंचेगी?
सभ्य समाज में एक ही आंख से देखने की बदमाशी में जुटे कथित सेकुलर लोगों को कौन समझाए की यह की करार कोई हिंदू भारत और ईसाई अमेरिका के बीच नहीं हो रहा है। अफसोस की बात है , पढे-लिखे वामपंथी भी कथित मुसलमानों की नाराजगी को लेकर चिंतित थे और अब मायावती भी चिंतित नजर आ रही हैं। साफ दिख रहा है कौन माहौल को सांप्रदायिक बना रहा है, जिस भाजपा पर बार-बार उंगली उठाई जाती है , वह तो चुपचाप अपने चुनावी उम्मीदवार तय करने में जुटी है, वह जीत सकती है , क्योंकि उसके लिए जमीन तैयार करने वालों की कोई कमी नहीं है ।

Tuesday, 1 July, 2008

जाति के जर्रे - २


मेरा गांव यानी शीतलपुर बाजार एकमा रेलवे स्टेशन (सिवान और छपरा के बीच) से करीब चार किलोमीटर दूर पड़ता है, यहां दलितों में पर्याप्त जागृति आई है। जिन परिवारों में अक्षर का प्रवेश हुआ है, उन्होंने तरक्की की है और सुखी हैं, उन्हें कोई नहीं छेड़ता, लेकिन जिन परिवारों ने पढ़ाई का मोल नहीं समझा, उनकी हालत खराब है। मेरे गांव में एक अच्छी बात यह है कि पीडि़त जातियों को पढ़ाई से रोकने का दुस्साहस किसी में नहीं है। गांव के स्कूल में मास्टर भी हर जाति वर्ग से आते हैं, अत: वहां भेदभाव की गुंजाइश न के बराबर है। बिहार गरीबी के लिए बदनाम है, लेकिन जितने भी दिन मुझे गांव में रहने का मौका मिलता है, भयानक किस्म की गरीबी नजर नहीं आती। अभाव जरूर है, लेकिन भूख से किसी की मौत मैंने नहीं सुनी। हालांकि हमारे यहां जब जनेऊ, शादी जैसे अवसर आते हैं, तब मैंने ध्यान दिया है, ढेर सारे गरीब भी अंधेरे में आकर बैठ जाते हैं। बचपन में मुझे आश्चर्य होता था, इतने सारे गरीब कहां से आ जाते हैं, मैं बाबूजी (बड़े पिताजी) से पूछता था, जवाब मिलता था, `ये आसपास के गांव से भी आते हैं। अपने लिए और परिवार के लिए खाना ले जायेंगे ´। जवानों को तो नहीं, लेकिन गरीब बुजुर्गों और बच्चों को मैंने भोजन की प्रत्याशा में बैठे देखा है। हालांकि जूठन की प्रत्याशा में कोई नहीं होता, उन्हें ताजा भोजन ही मिलता है। मुझे ऐसा लगता है, बड़ जातियों को सम्मानजनक रूप से भोजन करते देखने और जल्दी से जल्दी भोजन प्राप्त करने के लिए जमीन पर बैठे उत्सुक लोग जाति से कम और गरीबी से ज्यादा मजबूर होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ब्राह्मण व अन्य सवर्णों में जो गरीब होते हैं, वे भी सम्मानजनक रूप से भोजन करते हैं और उनमें श्रेष्ठता का गुरूर कुछ ज्यादा ही होता है। गरीब सवर्ण बहुत मुस्तैदी से अपनी जाति का अहसास कराता है। उसे लगता है, गरीबी के बावजूद जाति ही है, जो उसके श्रेष्ठता बोध को बचाती है और गरीब दलितों से ऊपर रखती है। नए दौर में जाति अमीरों की जरूरत नहीं रही, लेकिन यह सवर्ण गरीबों की जरूरत है।

क्रमश :

जाति के जर्रे



जाति कहीं हमारे संस्कारों में शामिल है, लेकिन मैंने ईमानदार आत्मसमीक्षा के बाद यह महसूस किया है कि मेरे दिल में भी जाति के कुछ जर्रे विद्यमान हैं, हालांकि वे प्रभावी कभी नहीं रहे। जब वे जर्रे जोर मारते हैं, तो मैं दलितों की दुर्दशा का ध्यान करने लगता हूं। एक सहज उपाय यह है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा `जूठन´ पढ़ लेता हूं और धरातल पर आ जाता हूं। `जूठन´ के बारे में यह कहना चाहूंगा कि यह रचना हर उस सवर्ण मानसिकता वाले व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, जिसे अपनी श्रेष्ठता का गुमान है । `जूठन´ को पढ़ते हुए कम से कम तीन-चार जगहों पर मेरी आंखों में आंसू छलक आते हैं, दिल रोता है, एक अजीब-सा अपराध बोध जागता है। हालांकि मैंने अपने गांव (शीतलपुर बाजार, जिला : छपरा) में जातिवाद के वैसे दृश्य नहीं देखे हैं, जैसे दृश्य `जूठन´ में सामने आते हैं। `जूठन´ का जो दौर है, वह 1960 के दशक का है। हालांकि अभी भी कई गांवों में `जूठन´ का दौर जारी होगा, लेकिन बेगार यानी मुफ्त में काम लेने की परंपरा लगभग खत्म होने के कगार पर होगी। दलितों के पक्ष में बने कानूनों ने बहुत प्रशंसनीय काम किया है, उसका दुरुपयोग हुआ है, लेकिन अगर सवर्णों द्वारा किए गए अन्यायी अत्याचार के संदर्भ में देखें, तो इन दुरुपयोगों ने भी समाज की बेहतरी की दिशा में काम किया है। दलितों के शोषण के प्रति एक भय आया है, इस भय का स्वागत है। मैं लालू प्रसाद यादव और मायावती का आलोचक हूं, क्योंकि इनका आर्थिक विकास की राजनीति से कोई सरोकार नहीं है, लेकिन मैं इन जैसे नेताओं का इस बात के लिए ऋणी हूं कि इन्होंने मेरे समाज को लोकतांत्रिक बनाने में योगदान दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर), बिहार में दलित, चूहड़े, चमार, डोम इत्यादि को भी समान अधिकार रखने वाला इनसान मानने का संस्कार जड़ें जमाने लगा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हालात सुधरे हैं, लेकिन `जूठन´ वाला दौर अभी पूरी तरह से बीता नहीं है।


क्रमश: