Wednesday, 29 April, 2009

एक दलाल पर फिर मेहरबानी


ओतावियो के को गैर-जमानती वारंट से मुक्ति न केवल शर्मनाक, बल्कि हमारे देश की कानून-व्यवस्था पर एक तमाचा है। बोफोर्स सौदे में 64 करोड़ की दलाली लेने संबंधी आरोप कभी राजीव गांधी पर ढंग से नहीं चिपका, जनता उन्हें आज भी एक साफ नेता के रूप में याद करती है, लेकिन इस सौदे में क्वात्रोच्ची की भूमिका पर हर जागरूक भारतीय को शक रहा है। अब सीबीआई ने इंटरपोल को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि क्वात्रोच्ची को मोस्ट वांटेड की सूची से हटा दिया जाए। इस सूची से हटते ही क्वात्रोच्ची आजाद हो जाएगा। क्वात्रोच्ची पर अभी भी मुकदमा चल रहा है, मुख भारत आने से बच रहा है क्वात्रोच्ची को मुक्ति देना क्यों जरूरी हो गया था? कांग्रेस को अब अनेक सवालों का जवाब देना होगा।



दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर आए नरेन्द्र मोदी ने भी यूपीए सरकार को निशाने पर ले लिया है, मोदी पूछ रहे हैं, `मोदी को जेल और विदेशी को बेल? कांग्रेस क्या जवाब देगी? कांग्रेस शायद यही कहेगी कि क्वात्रोच्ची को भारत नही लाया जा सकता, इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए, कांग्रेस यह भी कह रही है कि सीबीआई आजाद संस्था है, लेकिन सब जानते हैं कि सीबीआई की छवि कितनी खराब हो चुकी है। अभी विगत दिनों ही कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को सीबीआई के नाम से धमका रहे थे। अब भाजपा ने सीबीआई को नया नाम दिया है, उसे अब `कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशनं कहा जा रहा है। बीच चुनाव में कांग्रेस ने एक निंदनीय कदम उठाया है, इसका बचाव नहीं किया जा सकता।



क्वात्रोच्ची के प्रति यूपीए सरकार की नरमी पहले से ही जाहिर थी। कभी न चुनाव लड़ने वाले गांधी परिवार के समर्पित सेवक व केन्द्रीय विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज अनेक मौकों पर क्वात्रोच्ची को रियायत पहुंचाते दिखे हैं। भारद्वाज के मंत्रालय ने ही क्वात्रोच्ची के दो विवादित खातों पर से रोक हटवाने का फैसला किया था। ये वो दो खाते थे, जिनमें बोफोर्स दलाली की रकम जमा बताई गई थी। भारद्वाज ने सीबीआई को भी नहीं बताया था। खातों पर से रोक हटते ही क्वात्रोच्ची ने दोनों खातों से धन निकाल लिया। एक और उदाहरण, क्वात्रोच्ची फरवरी 2007 में अर्जेंटीना में इंटरपोल की गिरफ्त में आ गया था, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने पूरे 16 दिन तक इस खबर को देशवासियों और यहां तक कि कोर्ट से भी छिपाए रखा था। यही वह समय था, जब भारत में क्वात्रोच्ची का पुत्र अपने पिता के बचाव के लिए नई दिल्ली में मौजूद था। सुबूतों के अभाव में क्वात्रोच्ची को फिर मुक्ति मिल गई। अब अपने कार्यकाल के आखिरी महीने में यूपीए सरकार ने क्वात्रोच्ची को सबसे बड़ी राहत का तोहफा दिया है। हमारे देश को ठगने के आरोपी दलाल क्वात्रोच्ची से कांग्रेस की दोस्ती एक मिसाल बन गई है। किसी अन्य देश में किसी इतने बड़े आरोपी के प्रति ऐसी रियायत असंभव है। सीबीआई अब एक मजाक बनकर रह गई है। उसके सम्मान की वापसी मुश्किल है। उसमें काम करने का लोकतांत्रिक तरीका खत्म हो चुका है, उसे बिल्कुल राजशाही तौर-तरीकों से चलाया जा रहा है। कांग्रेस के विज्ञापनों में आजकल लालबहादुर शास्त्री भी नजर आते हैं, लेकिन शास्त्री जी ने जिस मकसद से सीबीआई को खड़ा किया था, उस मकसद को सत्ता लील चुकी है। केन्द्रीय सत्ता में बैठे और नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले नेताओं से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी।



बीच चुनाव में कांग्रेस ने यह कदम सोच समझ कर उठाया है, कदम अगर चुनाव से पहले उठाया गया होता तो कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होता, खैर ऐसा लग रहा है, कांग्रेस को सत्ता से जाने का अहसास होने लगा है,

Wednesday, 22 April, 2009

क्या- क्या बेचेगी पुलिस ?

हमारी पुलिस में भ्रष्टाचार इस कदर बढ़ गया है कि पुलिस सुरक्षा का अहसास कराने की बजाय भय का अहसास कराने लगी है। जयपुर में एक सिपाही ने ड्यूटी लगाने के बदले रुपये लेने के गोरखधंधे का भंडाफोड़ कर दिया है। पुलिस में ड्यूटी का बिकना जितना शर्मनाक, उतना ही दुखद है। ड्यूटी का बिकना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है। मालदार ड्यूटियों पर लगने के लिए पुलिस वाले ड्यूटी लगाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को रुपये देते हैं। जिम्मेदार अधिकारियों ने ड्यूटी के प्रकार और उससे होने वाली कमाई के लिहाज से उसकी कीमत तय कर रखी है। चूंकि मंत्रियों और बड़े अफसरों के यहां गार्ड की ड्यूटी करने के अपने मजे हैं, इसलिए इस ड्यूटी के लिए 4 से 15 हजार रुपये एकमुश्त अदा करने पड़ते हैं। योग्यता का यहां भी कोई अर्थ नहीं है। यह घूसखोरी है, दलाली है या चौथ वसूली, तीनों ही स्थितियों में ड्यूटी का बिकना पुलिस के नाम पर धब्बा है। पुलिस के आला अधिकारियों को शर्म आनी चाहिए। क्या उन्हें यह पता नहीं होगा? आला अधिकारियों ने इसे रोकने के लिए क्या किया? पुलिस वाले खुद पुलिस वालों से चौथ वसूली कर रहे हैं, क्या यह किसी को दिख नहीं रहा है? पुलिस वाले खुलेआम दारू पीकर अपनी वरदी का मखौल उड़ा रहे हैं, क्या यह नहीं दिख रहा है? चेतक मतलब पीसीआर वैन पर ड्यूटी लगवाने के लिए पैसे लिए-दिए जा रहे हैं, क्या यह भी नहीं दिख रहा? अब रात हो या दिन चेतक को देखकर लोगों को डरना चाहिए या सुरक्षित महसूस करना चाहिए? चेतक पर सवार कई पुलिस वाले क्या-क्या करते हैं, क्या इसकी पड़ताल की जाती है? क्या पुलिस महकमा अपनी सफाई और सुधार का इच्छुक नहीं है? क्या राज्य सरकार को इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए?

कोई पुलिस वाला यह बोल सकता है, `हम तो अपनों को ही बिना लिए नहीं छोड़ते हैं, तो दूसरों को क्यों छोड़ दें? मलाईदार पोस्टिंग के लिए पुलिस में रुपये की लेन-देन कोई नई बात नहीं है। मलाईदार थानें बिकते रहे हैं। कई शिकायतें हैं, पुलिस की नौकरी भी बिकती रही है। नौकरी खरीदने वाला कोई पुलिसवाला अगर ड्यूटी खरीद रहा है, तो फिर इसमें आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे महकमे में यह तो होना ही है। पुलिस में बामुश्किल सौ में से 20 काम ईमानदारी से होते होंगे, वरना रिपोर्ट लिखाने से लेकर कार्रवाई करने तक के पैसे लिए जाते हैं। जयपुर में ही शिकायतें दर्ज होती रही हैं। कोई कार्रवाई करवाने के लिए पैसे देता है, तो कोई कार्रवाई रुकवाने के लिए पैसे देता है। पुलिस की पोल केवल अदालतें खोलती रहती हैं और कोई नहीं? राजनेताओं के लिए तो शायद पुलिस का भ्रष्ट होना ही फायदेमंद है। नेताओं, आला अफसरों और अमीरों के काम समय पर हो जाएं, बाकी सबको पुलिस एक ही डंडे से हांकने में सक्षम है। बेशर्मी तो यह कि पुलिस खुद को ही हांकने लगी है। खुद को हांकते हुए न जाने किस रसातल में जाएगी? कहा जाता है, बेहतर समाज और देश के लिए हमें एक दूसरे के काम आना चाहिए। आज किसी की, तो कल आपकी बारी होगी, लेकिन कई पुलिस वाले तो कल का इंतजार करना नहीं चाहते, आज जितना हाथ में आ जा रहा हो, उसे समेटने में लगे हैं। अपने सम्मान के प्रति लापरवाह होकर बेचने-खरीदने में लगे हैं। यह सिलसिला अगर चलता रहा, तो पुलिस खुद अपना अहित करेगी। अब समय आ गया है, न केवल जयपुर बल्कि देश की पूरी पुलिस व्यवस्था के कामकाज में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। उसे जवाबदेह और ईमानदार बनाया जाए, वरना देश में कानून-व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।