Tuesday 7 July 2009

चाणक्य की कोरी यादें

बजट में गांवों और किसानों का खूब जोर चला है। गांवों के लिए इतना कुछ दिया गया है कि अगर तंत्र ईमानदारी हो, तो एक ही बजट राशि से गांवों का कायापलट हो सकता है। कागज पर नरेगा की सफलता से उत्साहित केन्द्र सरकार ने नरेगा के लिए आवंटित धन को 144 प्रतिशत बढ़ाकर 39,100 करोड़ रुपये कर दिया है। यह धन इतना ज्यादा है कि देश के किसी भी गांव में कोई भी मजदूर ऐसा नहीं बचेगा, जो नरेगा से न जुड़ा हो। इसके अलावा सरकार ने गांवों में सड़कों के लिए 12,000 करोड़ रुपये, आवास निर्माण वाली दो योजनाओं के लिए 10800 करोड़ रुपये, विद्युतिकरण के लिए 7000 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य के लिए 257 करोड़ रुपये प्रस्तावित किए हैं। गरीबी को पचास फीसदी घटाने की कागजी घोषणा भी स्वागतयोग्य है।
लेकिन दुख की बात है कि प्रणव मुखर्जी महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं को विफल करने वाले तंत्र पर कुछ नहीं बोले, उनका तंत्र वही है, जिसने ज्यादातर गांवों में नरेगा के तहत 100 दिन की बजाय लोगों को केवल 10-12 दिन का रोजगार प्रदान किया है। प्रणव अपने बजट भाषण में बार-बार कौटिल्य या चाणक्य का जिक्र कर रहे थे, लेकिन उन्होंने चाणक्य की नीतियों के बारे में कुछ खास नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं बताया कि नरेगा या अन्य योजनाओं का धन खाने वाले भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के लिए बारे में चाणक्य ने क्या कहा था। उन्होंने यह नहीं बताया कि चाणक्य के समय भ्रष्ट लोगों के साथ क्या सलूक होता था। उन्होंने कहा कि आयकर की नई संहिता 45 दिन में आ जाएगी, वित्त आयोग की रिपोर्ट अक्टूबर तक आ जाएगी, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि भ्रष्टाचार पर रोक के लिए संहिता कब आएगी। राहुल गांधी ने भी भ्रष्टाचार पर उंगली उठाई थी, लेकिन प्रणव मुखर्जी योजनाओं में ईमानदारी और पारदर्शिता संबंधी किसी भी घोषणा से बच निकले। गरीबों को तीन रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा कर दीजिए, बजट में अरबों-खरबों आवंटित कर दीजिए, चाणक्य का बार-बार नाम ले लीजिए, लेकिन जब तक बेईमानी है, तब तक बजट बनते रहेंगे और नतीजों के इंतजार में आंखें पथराती रहेंगी।

Saturday 4 July 2009

रेलवे में भी मजहब की पूछ?

मदरसा छात्रों को मुफ्त मासिक टिकट देने का फैसला कितना सही है? यह एक विचारणीय प्रश्न है। क्या यह रेलवे में धर्म आधारित रियायत की शुरुआत नहीं है? क्या यह कदम एक नए तरह के झमेले की शुरुआत नहीं करेगा? अगर हम गंभीरता से देखें, तो यह एक नया ताला खुलवाने जैसी बात है, अयोध्या में ताला खुलवाने का काम श्री राजीव गांधी ने किया था और उसके बाद लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट तक वह खुला ताला कितने कमाल दिखा गया, पूरा देश जानता है।

मुस्लिम विद्वान इस रियायत को किस आधार पर जायज व समानता आधारित ठहराएंगे? सभी भारत को हिन्दू प्रधान देश कहते हैं, लेकिन क्या यहां गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्रों को कभी रेलवे से रियायत मिली है? भारत की अपनी भाषा संस्कृत की सेवा में लगे बच्चों को रियायत के बारे में कोई नहीं सोचता, लेकिन मदरसा छात्रों को खुश करने की कोशिश क्यों होती है? अगर सरकार को मदरसों का भला ही करना है, तो वह मदरसों की डिगि्रयों को देश की मुख्य धारा की डिगि्रयों के समकक्ष क्यों नहीं मान लेती? हर बार मदरसों के लिए कुछ न कुछ घोषणा बजट में होती है, लेकिन इस बार रेलवे ने भी मेहरबानी की है। क्या ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अभी से तुष्टिकरण के महत्वपूर्ण काम में लग गई हैं?

ये नेता नहीं जानते कि मदरसे में पढ़ाई कितनी मुश्किल होती है? मदरसों में पढ़ने-पढ़ाने वालों के घरों में चूल्हे कैसे जलते हैं? उन्हें व्यापक भारतीय समाज में कितनी इज्जत नसीब होती है? उन्हें नौकरी कहां-कहां मिलती है? मदरसों में पढ़कर निकले कितने लोगों को ममता बनर्जी के विभाग ने नौकरी दी है? मदरसों से पढ़कर निकले कितने युवाओं को राहुल गांधी ने भारत के भविष्य के लिए चुना है? ऐसी उम्मीद भाजपा से कोई नहीं कर सकता, लेकिन कांग्रेस से सबको उम्मीद रहती है? लेकिन वह भी मुस्लिमों के विकास के लिए कृत्रिम उपाय करती रहती है, तो आइए, मन मसोस कर नई रियायत का इस्तकबाल करें और उम्मीद करें कि रियायत पाकर पढ़े बच्चे भी कभी लाखों रुपये कमाएंगे।