Friday, 12 February, 2010

नागा साधु हैं, तो हम हैं

कुम्भ में हम : भाग - तीन

अगर आपने नागा साधुओं को नहीं समझा, तो आप यह नहीं जान पाएंगे कि हमारे राष्ट्र में सनातन धर्म की रक्षा के लिए कुछ हजार लोगों को क्यों सर्वस्व लुटाना पड़ा था? सचमुच, सच्चा हिन्दुत्व किसी राजनीतिक पार्टी या संगठन के पास नहीं, कुंभ मेला परंपरा के पास है। चूंकि कुंभ की परंपरा समाप्त नहीं हो सकती, इसलिए हम आश्वस्त रह सकते हैं कि भारत समाप्त नहीं हो सकता। नंग-धड़ंग, जटा-जूट, भभूत, अस्त्र, शस्त्र नागाओं की पहचान हैं। पहली नज़र में वे किसी को भी भयावह नज़र आते हैं।
हरिद्वार में हमने एक युवा साधु को अपने ही चूल्हे की राख से निकाल भभूत लपेटते देखा, तो दूसरे साधु से पूछा, भभूत क्यों लपेटते हैं?
उत्तर मिला, खराब दिखने के लिए। खराब दिखेंगे, तो लोग निकट नहीं आएंगे। आकर्षण नहीं बनेगा। आकर्षण नहीं बनेगा, तो वैराग्य को बल मिलेगा।
यह उत्तर मेरे मन को मथता रहा। खुद को सशक्त बनाने के लिए कितना कष्ट सहा है साधुओं ने। युवा साधु भभूत बड़े मन से लपेट रहा था।
मैंने फिर पूछा, गंगा में नहाएंगे, तो भभूत बह जाएगा।
मुस्कराहट के साथ उत्तर मिला, ये तो गंगा से निकलकर फिर भभूत लपेट लेंगे। उत्तर सुनकर मुझे खुशी हुई। भभूत लपेटने के बाद मात्र हथेली को धो रहे साधु के मुख पर प्रसन्नता तैर रही थी। आकर्षणहीन हो जाने की यह प्रसन्नता भी नागाओं को बल प्रदान करती होगी।
भभूत प्रेमी डरावने नागाओं के पीछे भारत की विशाल संघर्ष कथा विराजमान है। निस्सन्देह, कभी यह देश केवल सीधे-सादे साधुओं का रहा होगा। आज भी है, लेकिन जिन जमातों ने भारत की अपनी परंपरा पर समय-समय पर निर्मम आक्रमण किए, भारत को भारत से अपदस्थ करने हेतु आक्रमण किए, उन आक्रमणों के प्रतिउत्तर स्वरूप हमारी संस्कृति में नागाओं का पदार्पण हुआ। जिन साधुओं ने सहजता से गर्दन कटाना स्वीकार नहीं किया, वे नागा बन गए। शस्त्र-अस्त्र उठा लिया। अपने आप को बाह्य और आन्तरिक रूप से अत्यन्त कठोर बना लिया, ताकि आक्रमणों का उचित प्रतिउत्तर दे सकें, ताकि सनातन संस्कृति को बचाया जा सके, ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि भारतीय साधुओं ने चुडीयाँ नहीं पहन रखी हैं।
इतिहास गवाह है, दूसरे कुछ पन्थों-धमो ने जो अखाड़े दिए, उनसे आतंकवाद पनपा, बच्चों और स्त्रियों की भी हत्या हुई। लेकिन सनातन संस्कृति या हिन्दुओं की पीड़ा से जो अखाड़े उपजे, उन्होंने कभी किसी निर्दोष को नहीं मारा।
कुंभ में नागाओं के जनसमुद्र को देखकर रोम-रोम पुलकित हो जाता है। सुरक्षा अनुभूत होने लगती है। वे हमारी सनातन संस्कृति के माता-पिता नज़र आने लगते हैं। वे हैं, तो हम आश्वस्त हैं कि हमें भारत भूमि से कोई अपदस्थ नहीं कर पाएगा।

2 comments:

vinay said...

उपयोगी जानकारी ।

संतोष पाण्डेय said...

आपके इस आलेख ने नागाओं के प्रति नजरिया बदल दिया है. नमन.