Tuesday, 29 June, 2010

लाइब्रेरी वाला गांव

पिताजी बताते हैं कि कभी हमारे गांव में १३ वकील हुआ करते थे। एक लाइब्रेरी हुआ करती थी, जो पूरे इलाके में मशहूर थी। १३ वकीलों में से १२ लाला जी लोग थे और एक ब्राह्मण। अब उनमें से किसी के वंशज गांव में नहीं हैं। लाला जी लोगों के वर्चस्व के समय गांव को उचित नेतृत्व मिला हुआ था। गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रमों से लेकर साफ-सफाई के लिए अभियान भी चला करते थे। सुविधाओं के लिहाज से भी हमारा गांव बहुत अच्छा था। हमारे बगल के प्रसिद्ध गांव बरेजा से भी आगे था हमारा गांव। बरेजा स्वतंत्रता सेनानी सावलिया जी और गिरिश तिवारी की वजह से जाना जाता था। तिवारी जी बिहार की पहली सरकार में शिक्षा मंत्री रहे थे। जवाहरलाल नेहरू भी बरेजा आए थे। उसे एक समय क्रांतिकारियों का गढ़ माना जाता था। लेकिन ऐसे बरेजा गांव से ज्यादा सुकून शीलतपुर में था, क्योंकि कायस्थ समुदाय ने कमान सम्भाल रखी थी। आंदोलन इत्यादि में वे भी भी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे, लेकिन गांव के बारे में भी बहुत सोचते थे। होली-दीवाली पर उनके पूरे परिवार गांव में जुट जाते थे। चहल-पहल हो जाती थी। सांस्कृतिक-सामाजिक सरगर्मी बढ़ जाती थी। गांव के बारे में कायदे की बातें होती थीं। हमारे गांव में लाला जी लोगों की कृ़पा से ही पांच छह टमटम हुआ करते थे, लेकिन बरेजा में बामुश्किल एक टमटम हुआ करता था। लाला जी लोग स्वयं घोड़े खरीदने के लिए पैसे देते थे। घोड़े के चारे के लिए पैसे देते थे, ताकि सवारी में आसानी हो। शीतलपुर से एकमा रेलवे स्टेशन आना जाना लगा रहता था। कोई बनारस रहता, तो कोई कलकत्ता तो कोई पटना, बलिया। टमटम से स्टेशन पर पहुंचते, तो टमटम वाले को एक-दो रुपया दे देते थे कि जाओ जब हम लौटेंगे, तो सूचना देंगे, हमें फिर लेने आ जाना। अब वह दौर कोई मोटरगाड़ी का तो नहीं था। गांव से रेल स्टेशन एकमा जाने के लिए ये टमटम हुआ करते थे या फिर पैदल ही जाना पड़ता था, तो लाला जी लोग शान से रहते थे और शान को बरकरार रखने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। ऐसा नहीं कि टमटम केवल लाला जी लोगों के लिए होते थे, बाकी दिनों में उनका इस्तेमाल आम लोग भी करते थे, ईमानदारी से किराया देते थे, वर्ना लालाओं के पास जमींदारी तो थी। जबकि बरेजा में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला मामला था, टमटम वाला अगर किराया मांगने की हिमाकत करता, तो ताकतवर समाज के लोग उसकी दैहिक समीक्षा मतलब पिटाई में पीछे नहीं रहते थे। संभवत: १९५५ के आसपास लालाओं का गांव से मोहभंग होने लगा। इसकी एक वजह यह थी कि जो मुख्य परिवार था, उनके लड़के ठीक-ठाक नहीं निकले। बाकी लाला परिवार अच्छे थे, लेकिन उनके लड़के बाहर रहने लगे थे, नेतृत्व के अभाव में उनका भी मन खट्टा होने लगा। जगन्नाथ प्रसाद जी लाइब्रेरी सम्भाले हुए थे। उनके विशाल घर के बड़े-बड़े तीन कमरों में करीब ५० हजार किताबें आलमारियों में भरी हुई थीं। १८५० से लेकर १९५० तक जितनी भी किताबें उपलब्ध हुई थीं, जुटाई गई थीं। वास्तव में यह लाइब्रेरी जगन्नाथ प्रसाद जी के पिता जी दामोदर प्रसाद जी द्वारा जुटाई गई थी। वे अपने जमाने में स्कूल इंस्पेक्टर हुआ करते थे। उनका अपना रुतबा था। हमारे गांव के लाला जी लोग एक से एक बड़े पद पर विराजमान थे। कोई बलिया जा बसा, koi बनारस तो किसी ने कोलकाता, तो kisine पटना या छपरा में घर बना लिया। गांव आना जाना कम हो गया। गांव से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, तो लाइब्रेरी की किताबें धीरे-धीरे बिक गईं। एक अच्छी परंपरा का अंत हो गया। जगन्नाथ जी के लड़के आज भी कला जगत में सक्रिय हैं, उनके बड़े बेटे पाण्डेय कपिल भोजपुरी साहित्य में जाना पहचाना नाम हैं, पटना में रहते हैं। मेरे बड़े पिताजी के क्लासमेट रहे हैं। उनका भी गांव आना जाना खत्म सा हो गया है। ज्यादातर लालाओं ने खेती वाली जमीन बेच दी है। कुछ ने अपने घर भी बेचे हैं, कुछ अभी भी भूले-भटके अपने घर की देखरेख करने आ जाते हैं, लेकिन गांव में टिकता कोई नहीं है। मुझे ऐसा लगता है, लाला जी लोगों के जाने के बाद से ही हमारा गांव नेतृत्वहीन हुआ है। उनमें एक दया व सेवा का भाव हुआ करता था, उन्होंने कभी लूटकर राज नहीं किया। वे अच्छे थे, इसलिए उन्हें शायद गांव छोड़कर जाना पड़ा। वे आराम से शान से रहना चाहते थे, लेकिन गांव के बदलते समाज से उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। हालांकि यह एक तरह का पलायन है, लेकिन फिर भी इस पलायन की एक वजह है। जिसके विस्तार में जाना एक विस्तृत शोध के विस्तार में जाना होगा। गांव या बिहार की परिस्थितियां वाकई शोध की मांग करती हैं। पलायन एक ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे हंसी हो-हल्ले में उड़ाया जा सके। दोषी केवल पलायन करने वाले नहीं हैं। जो पलायन करके जा चुके हैं, आज उनके लिए कौन तड़प रहा है? चिंता तो यह है कि लाला जी जा रहे हैं, तो जाएं, हमें अपना जमीन-घर सस्ते में दे जाएं। मैं जब गांव वालों के बीच में यह बोलता हूं कि लालाओं के जाने के बाद गांव भटक गया, तो सब इधर-उधर देखने लगते हैं, शायद वे शीलतपुर के गौरवशाली अतीत को भूल चुके हैं या भुला चुके हैं या उनके पिता ने उन्हें नहीं बताया कि शीतलपुर पहले कैसा था। मैं तो अपने पिता व बड़े पिता को खोद-खोद कर पूछता हूं कि बताइए शीतलपुर कैसा था, वे बताते हैं कि बहुत अच्छा था और मैं सोचने लगता हूं कि यह फिर कैसे अच्छा होगा।

शीतलपुर या गरमपुर

किसी कवि के नाम पर पड़ा था मेरे गांव का नाम शीतलपुर। शायद उन्हीं की रचना है कि जेकर घर मइल ओकर घर गइल। मतलब घर मैला हुआ तो समझिए घर गया। नाम शीतलपुर है, लेकिन गरमपुर भी कह सकते हैं, क्योंकि किसी न किसी बुरी वजह से यहां माहौल गर्म रहता है। होली और दीवाली का मजा भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। सामूहिकता का भाव बड़ी तेजी से रिस रहा है। दिलों में प्रेम उतनी ही तेजी से घट रहा है, जितनी तेजी भूजल। बताते हैं, पानी में लोहा बढ़ गया है, आर्सेनिक की मात्रा भी बढ़ रही है। जो स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदेह है। शायद यह जगह ही संकेत देने लगी है कि अब यहां किसी मनुष्य का स्वस्थ्य रहना मुश्किल है।
पहले मेरे गांव के लोग कम बीमार पड़ते थे, लेकिन अब ज्यादा बीमार पडऩे लगे हैं। पूछता हूँ , तो हर कोई अपनी या किसी अपने की बीमारी की दास्तान सुनाता है। चेहरों की रौनक बुझने लगी है। क्या हो गया है मेरे गांव को?
कहते हैं, जो गांव पूरब से पश्चिम तक लंबा बसा होता है, उस गांव में बहुत शांति कभी नहीं रहती। किसी की हुकूमत ज्यादा दिन तक नहीं चलती है। बड़े बड़े आते हैं और चले जाते हैं। तो गांव तो उत्तर से दक्षिण दिशा में लंबवत होकर बसना चाहिए। हमारा गांव पूरब-पश्चिम वाला है, उसे चाहकर भी शायद उत्तर-दक्षिण वाला नहीं बनाया जा सकता। मेरा मानना है, यह गांव लंबा होता जा रहा है, लेकिन घर के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि गांव शुरू से ही ऐसा ही है। कभी किसी ने कोशिश नहीं की कि इसे सुधारा जाए। जिसे जहां बसना था, बस गया, घर बना लिया। लेकिन यह बात बिल्कुल सही है कि कभी गांव में किसी की ज्यादा दिन तक नहीं चली। एक से एक लाला जी हुए गांव में, लेकिन कोई जमा नहीं। एक से एक साह हुए, सोनार हुए, लेकिन लंबे समय तक कोई जमा नहीं रहा। ब्राह्मणों का वर्चस्व तो शायद ही कभी रहा हो। अब इधर आरक्षण वाली जमात मजबूत हुई है, उन्हीं का वर्चस्व है, वही तय करते हैं कि किसे सरपंच व मुखिया बनाना है।
पिछली बार एक दागी छवि वाले व्यक्ति को लोगों ने मुखिया बनवाया, हालांकि उनका मुखिया पद छिन चुका है। मुखिया जी की नेतागिरी बिल्कुल ठीक चल रही थी, पूरा सम्मान मिलने लगा था, पैसा आने लगा था, लेकिन शायद उनकी किस्मत खराब थी। एक चाट वाले से लड़ बैठे कि उनके लोग खाएंगे चाट, लेकिन पैसा नहीं देंगे। गरीब चाट वाला अड़ा, तो अपने कुछ दांतों से हाथ धो बैठा। कानून कड़ा है, सिर के किसी भाग पर प्रहार को खास गम्भीरता से लेता है, मुखिया जी को अंदर जाना पड़ा। अब जमानत पर बाहर आ गए हैं, लेकिन उनकी मुखियाई तो गई। नया मुखिया बनाया गया है, वह भी आरक्षित वर्ग से ही है। सब लोगों ने मिलकर उसे पंचायत के बाकी बचे हुए कार्यकाल के लिए मुखिया चुन लिया गया है।
नेता आज भी हैं, लेकिन पहले जैसी गुणवत्ता नहीं रही। सेवा का भाव कम हुआ है। शीतलपुर एक अच्छा गांव है, संपन्न गांव है, उसे आज काफी आगे होना चाहिए था, लेकिन आस-पास के गांवों से भी पिछडऩे लगा है, क्योंकि नेतृत्व उतना कुशल नहीं है, जितना होना चाहिए। आपस में झगड़े सुलझाए नहीं जाते, झगड़े लगाए और कराए जाते हैं। उदाहरण के लिए, मेरे घर के सामने जो सड़क सदियों से है, वह आज भी कागज पर नहीं आई है। व्यावहारिकता में सड़क है, लेकिन वहां कोई ईंट नहीं बिछाता, वहां कोई सिमेंटेड सड़क नहीं बनाता। मुखिया आते हैं, चले जाते हैं। हमारे सामने जिनका घर है, उनसे हमारा झगड़ा है, गांव के चतुर लोग जानते हैं कि सड़क बन जाएगी, तो झगड़ा खत्म हो जाएगा। चलने के लिए सड़क तो है ही, चलते रहिए, कागज पर नहीं है, तो क्या हुआ? कागज पर थोड़े चलने जाना है। एक और बात बता दूं, आसपास के सभी गांवों में सड़कें सीमेंटेड हो गई हैं, लेकिन हमारे गांव में इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं है। तो यह है नेतृत्व?
बहरहाल, मेरी चिंता दूसरी है, गांव के प्रति गांव के लोगों में जो प्रेम होना चाहिए, वह नदारद है। गांव पर गर्व करने के बहाने लगातार कम होते जा रहे हैं। मैंने अपनी उम्र के छत्तीस वर्षों में अपने गांव के समाज को लगातार गिरते हुए, टूटते हुए और बिगड़ते हुए देखा है। शायद जैसे जैसे मेरा गांव पिछड़ता गया है, वैसे वैसे बिहार के गांव और शायद स्वयं बिहार भी पिछड़ता गया है। जैसे जैसे योग्य लोग मेरे गांव को छोड़ते गए हैं, वैसे-वैसे योग्य लोग बिहार को छोड़ते गए हैं।
क्रमश:

Friday, 25 June, 2010

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।
चन्दन खाट कै खटोलना तापर दुल्हिन सूतल हो ।
उठो सखी मोर मांग सवारों दूल्हा मोसे रूठल हो
चारी जाने मिली खाट उठाइन चहुँ दिस धू धू उठल हो।
आये जमराज पलंग चढ़ी बैठे नैनं आंसू टूटल हो।
कहत कबीर सुनो भाई साधो जग से नाता टूटल हो।
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो .

कबीर की ये पंक्तियाँ देर तक और दूर तक पीछा करती हैं । झकझोर कर रख देते हैं कबीर । इतना रेडिकल कवि कोई दूसरा नहीं दीखता । आखिर कबीर इतने बड़े कवि कैसे हैं ? कभी सोचता हूँ तो यही जवाब मिलता है कि कबीर केवल लिखते नहीं थे वे अपने लिखे हुए को जीते थे इसलिए वे उस ऊंचे मुकाम पर नजर आते हैं जहाँ कोई दूसरा कवि नजर नहीं आता । इस देश मे कबीर से बड़ा कवि और गाँधी जी से बड़ा नेता नहीं हो सकता । दोनों मे एक ही साम्यता है कि दोनों कथनी और करनी के भेद को अपने जीवन मे मिटा देते हैं । दोनों की कथनी करनी में ही नहीं बल्कि रहनी में भी साम्यता है । कथनी करनी और रहनी की साम्यता ही वास्तव में किसी को महान बनाती है।

आज कबीर जयंती है दुःख होता है उन्हें याद करने वालों की संख्या क्यों कम है ?

Friday, 11 June, 2010

बिहार मे पूरबी की खोज

पूरबी गीत-संगीत मुझे अच्छा लगता है। वह मुझे बेचैन करता है। कोई पूरबी गाना चले, तो रुककर मैं सुनता हूं। महुआ चैनल की कृपा से कभी-कभी पूरबी सुनने को मिल जाता है, लेकिन मेरी इच्छा है कि पूरबी गानों की एक पूरी सीडी या डीवीडी रखूं। इस बार बिहार यात्रा के दौरान पूरबी की खोज करता रहा। हर जगह निराशा ही हाथ लगी। दुकान वाले नए गाने तो जानते हैं, लेकिन पूरबी संगीत की पहचान न के बराबर लोगों को है। मेरे परिवार में ही पूरबी पहचानने वाले कम लोग हैं, हालांकि सुना सभी ने है। थोड़ा गाकर भी बताया, फिर भी पूरबी खोजने में मुश्किल आई। गुड्डू रंगीला टाइप गानों या फिर अच्छों में मनोज तिवारी ने दुकानों को भर रखा है। पता नहीं किसी ने केवल पूरबी पर काम किया है या नहीं?
लौटने के दिन ४ जून को अंतिम मौका था, थावे वाली माता के दर्शन के लिए गया था। उनके और हरषू भगत के दर्शन के बाद सीडियों की दुकानों को खंगालना शुरू किया। यहां भी वही जवाब। बहुत खोजा, पूछा तो एक जगह गायिका कल्पना के संग्रह में एक पूरबी गाना मिला, उस गाने के नाम पर ही सीडी का नाम था : देवरा तूड़ी किल्ली। जो लोग भोजपुरी थोड़ा भी समझ रहे होंगे, वे इस गाने का अर्थ समझ गए होंगे। इसके मुखड़े का हिस्सा है, आ जा घरे छोड़ के तू दिल्ली, देवरा तूड़ी किल्ली। यह गाना मैं पहले भी सुन चुका था, लेकिन गाना चूंकि पूरबी में है, इसलिए शब्दों को भूलकर उसके धुन में रमना मेरे लिए आसान है। इस सीडी के अलावा भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के गानों की सीडी भी खरीदकर लौटा।
दुख होता है, जो समृद्ध है, वह किनारे पर पड़ा है। भिखारी ठाकुर का पूरा काम और पूरबी, विदेशिया को बहुत ऊंचाइयों पर ले जाया जा सकता है, लेकिन वांछित प्रयास नदारद हैं। जगह-जगह 'चोलिया के हूक राजा जी लगाए दीहीं और 'हम पाड़े हईं टाइप गाने गूंजते सुनाई पड़ते हैं। ऐसे ही गानों का बड़ों और बच्चों पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे ही गाने लोगों की जुबान पर चढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दिनों एनडीटीवी के मनीष बिहार के आरा जिला के गांवों में रिपोर्ट कर रहे थे। इन इलाकों में पानी में आर्सेनिक की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि ऐसे बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी आंख ही नहीं होती है। रवीश कुमार की जानदार आवाज वाली वह डाक्यूमेंट्री मुझे याद है। एक बिना आंख वाला बच्चा कैमरे के सामने नाचते हुए गा रहा था, 'चोलिया के हूक राजा जी लगाए दीहीं। यह सुनकर मैं सिहर गया था, वह सिहरन अभी लिखते हुए भी उतनी ही महसूस हो रही है।
बिहार के संगीत के बारे में मैं कहना चाहूंगा कि संगीत समृद्ध है, लेकिन शब्द भटक चुके हैं। दिलों में काफी उजास है, लेकिन बाहर जो झलक रहा है, वह केवल अंधेरा है।
मैं एक और अच्छा गाना खोज रहा था, जो सुर संग्राम कार्यक्रम में शायद नंदन-चंदन नाम के दो गायक भाइयों ने गाया था, 'काहे खिसियाइल बाड़ू जान लेबू का हो, बोलो हमारा सुगनी परान लेबू का हो। यह भी नहीं मिला। नेट पर खोजा, तब भी नहीं मिला। ३१ मई को जब भतीजे की बारात पटना जा रही थी, तो भतीजों की मांग पर यह गाना मैंने सुनाया था। भतीजों ने कहा है कि वे यह गाना खोजने में मेरी मदद करेंगे।
खैर, बारात यात्रा के दौरान आर।डी बर्मन का एक बांग्ला गाना भी खूब याद आया, उसे भी मैंने गाया।
मोने पोड़े रूबी राय, कोबिताय तोमाके
एक दिन कतोकिरी देखीछे,
आज हाय रूबी राय,
देके बोलो आमाके
तोमाके कोथाय जेनो देखीछे।

रोड जोला दुपुरे, सुर तुले नुपुरे।
बस थाके तुमी जोबे नामते ।
एक टी किशोर छेले, एका केनो डारिये
से कोथा कि कोनोदिनू भाबते।
मोने पोड़े रूबी राय...
इसी गीत के संगीत को बाद में आरडी ने हिन्दी फिल्म अनामिका में इस्तेमाल किया। तब उसके बोल हो गए थे : मेरी भीगी भीगी से पलकों पे रह गए...। बांग्ला गाना आरडी की अपनी आवाज में है। बांग्ला संस्करण में यह गाना किशोर कुमार से भी मीठी आवाज में आरडी ने गाया है। बांग्ला गाना गाते हुए आरडी की सुविख्यात खुरदुरी आवाज रसोगुला माफिक मीठी हो जाती है, शायद यह बांग्ला का जादू है, जो भोजपुरी की पड़ोसी भाषा है। बहरहाल, भोजपुरी पीछे छूट चुकी है, लेकिन बांग्ला तो बहुत आगे है।

इंतहा हो गई

हां, बदल रहा है बिहार, लेकिन समय की परवाह बहुत जरूरी है। बिहार में एक बड़ा तबका समय की कोई परवाह नहीं कर रहा है। ताकतवर लोग समय को अपने हिसाब से हांकना चाहते हैं, शायद यह भी एक कारण है, बिहार के पिछडऩे और बदनाम होने का। अमर उजाला के दिनों में मैंने देखा है, बिहारी पत्रकार भाई लोग छुट्टी पर जाते थे, तो निर्धारित तिथि पर लौटने की गारंटी नहीं होती थी। हम हूँ बिहारी हैं लेकिन जब बिहार गए हैं वापसी का टिकट लेकर गए हैं, खैर समय की बेकद्री पर इस बार चर्चा चली, तो एक बिहारी कर्मचारी महोदय ने सुनाया, एक महोदय ने छुट्टी के लिए आवेदन दिया, जिसमें कब से छुट्टी की तिथि तो अंकित थी, लेकिन कब तक की तिथि की जगह लिखा था, 'लौटने तक, अब लौटने तक की क्या तिथि है, सीमा है? बिहार की वापसी हो तो रही है, लेकिन कब तक होगी, कहना मुश्किल है, नीतीश कुमार भी बिहार के वैभव के लौटने की तिथि नहीं बतला सकते।
बिहार यात्रा में मैंने समय के प्रति लापरवाही को भारी मन से झेला। बड़े भतीजे की बारात पटना जानी थी, ४ चार पहिया वाहन तो निर्धारित समय १ बजे आ गए, लेकिन बस के इंतजार में खूब मगजमारी करनी पड़ी। १२ बजे फोन किया गया, तो पता चला बस सीवान में है, वहां से गांव आने के लिए चल चुकी है। एक घंटे बाद तकादा हुआ, तो पता चला, बस छपरा में है, गांव के लिए चल चुकी है। यहां हम बता दें कि हमारे गांव के लिए सीवान और छपरा दो छोर हैं, जिनके बीच साठ किलोमीटर से भी ज्यादा की दूरी है। जो लोग जयपुर-दिल्ली जैसे हाईवे पर चले हों, उनके लिए साठ किलोमीटर कोई मायने नहीं रखते, लेकिन जो लोग सीवान और छपरा में रहते हैं, उनके लिए साठ किलोमीटर का फासला पूरे एक दिन का फासला भी हो सकता है। सीवान और छपरा सड़क राजमार्ग है, लेकिन वन वे ही है, बामुश्किल दो गाडिय़ां एक दूसरे को लगभग चूमती हुई निकलती हैं। यह राजमार्ग हाजीपुर तक वन वे की तरह ही है। बताते हैं कि फोर लेने की योजना मंजूर हो गई है, लेकिन सवाल फिर वही समय की परवाह का है। तो बस वाला धोखा दे रहा था। बस मालिक का फोन नहीं लग रहा था और बस के बिचौलिये ने अपना मोबाइल ऑफ कर दिया था। सवाल केवल समय के प्रति लापरवाही का नहीं है, सवाल बदमाशी की पराकाष्ठा का है। हमारा परिवार सीधा है, सब नौकरीपेशा, पेशेवर लोग हैं, पहली बार मुझे और मेरे एक डॉक्टर भतीजे को लगा कि परिवार में एक गुंडा टाइप का आदमी भी होना चाहिए, केवल सीधी उंगली से बिहार में घी निकालना मुश्किल है। मजबूरन चौपहिया वाहनों को पटना के लिए रवाना किया गया, यह सोचकर कि कम से कम कुछ लोग तो पटना पहुंच जाएं, ताकि जरूरत पडऩे पर बारात दरवाजे लगाई जा सके। कम से कम ७० लोग बस के इंतजार में पीछे छूट गए। मन मसोसकर मैं भी एक मार्शल से पटना की ओर रवाना हुआ, रास्ते में संभवत: गांव से १५ किलोमीटर दूर कोपा के पास वह बस दिखाई दी, जिसकी बुकिंग थी। बस के ड्राइवर-कंडक्टर सवारी ढो रहे थे, पूछा गया, 'कहां जा रहे हैं, तो कोई जवाब नहीं मिला। पूछा गया कि 'शीतलपुर जा रहे हैं, तो जवाब मिला 'हां, फिर पूछा गया, 'इतनी देर से क्यों जा रहे हैं, तो जवाब मिला, 'मालिक से बात कीजिए। अभद्र ड्राइवर सीधे मुंह बात करने को तैयार न था। देरी का कोई अफसोस नहीं था, आवाज में पूरी बेशर्मी थी। मन में फिर एक बार हिंसा जागी। बहरहाल, एक बजे जिस बस को गांव से बारात लेकर रवाना होना था, वह पांच बजे शाम रवाना हुई। बस को लगभग सवा सौ किलोमीटर की दूरी तय करके पटना पहुंचने में कम से कम साढ़े चार घंटे लगने थे। फिर एक बार जयपुर-दिल्ली हाईवे की याद आई, जहां साढ़े तीन सौ किलोमीटर की दूरी वोल्वो पांच घंटे में पूरी कर लेती है। बारात लेकर पटना जा रही बस भी वोल्वो ही थी, लेकिन सड़क बिहार वाली थी और जाम भी बिहार वाला। उस दिन ३१ मई को खूब लग्न था। जगह-जगह जाम लगा हुआ था। एक और बात बता दें, मैं जिस चौपहिया में जा रहा था, वह सोनपुर पहुंचने तक चार बार पंक्चर हो चुका था। हमने तय कर लिया था हमे पटना ले जा रही मार्शल पांचवी बार पंक्चर हुई, तो पीछे आ रही बस में सवार हो जाएंगे। यह बहुत आम बात है, आजकल बिहार में कारोबारी दिमाग के लोग दिल्ली, बंगाल से खटारा गाडिय़ां खरीद लाते हैं और लगन के मौसम में झोंक देते हैं। गनीमत थी कि केवल हमारी गाड़ी खटारा थी। दो गाडिय़ां तो सरपट दौड़ती हुई रात नौ बजे तक पटना पहुंच गईं। लेकिन बस सहित तीन गाडिय़ां पीछे रह गईं। पटना में प्रवेश से पहले ही गांधी सेतु से पहले भयानक जाम लग गया। एक ट्रक ने तीन-चार महिलाओं व बच्चों को कुचल दिया था। ग्रामीण नाराज थे, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दुर्घटनास्थल पर बुलाने की शर्त के साथ जाम लगाए हुए थे। आगजनी और तोड़-फोड़ भी जमकर हुई थी। खैर उसी लंबे जाम में आगे दूल्हे की गाड़ी थी, बीच में हमारी गाड़ी थी और सबसे पीछे बस थी। जाम कब खुलेगा कोई नहीं जानता था, पुलिस वाले आ रहे थे जा रहे थे। एंबुलेंसें दौड़ रही थीं, फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी गई, लेकिन दुर्घटनास्थल से आने वाला कोई भी यह नहीं बता रहा था कि जाम कब खुलेगा। करीब छह-सात किलोमीटर लंबा जमा था। जाम के दो घंटे के बाद लगभग ग्यारह बजे रात को खूब मान-मनौवल के बाद जाम खुला। जाम से निकलकर धीमे धीमे गांधी सेतु पार करते, पटना में बारात के ठिकाने पर पहुंचते-पहुंचते घड़ी बारह बजा चुकी थी। मजा किरकिरा हो चुका था। सोते हुए शहर के बीच बारात निकलनी थी बेमजा। सबकी जुबान पर एक ही बोल थे कि बस वाले ने पूरी बारात को लेट करवा दिया। बड़े भतीजे की बारात का आनंद लेने का इंतजार न जाने कितने महीनों से था, लेकिन धरे रह गए कई इरादे। बारात लगाते-लगाते डेढ़ बज गया, भोजन के पंडाल में पहुंचे, तो पुलाव और सब्जियां अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर थीं। चुपचाप खाए-पीए, क्योंकि भूख बड़ी जोर की लगी थी।
बहरहाल, लेटलतीफी ने तो पूरे बिहार को पछाड़ रखा है, हम और हमारी बारात की क्या बिसात?

Tuesday, 8 June, 2010

बंद पड़ी मिल

हर बार चाहता हूं
चुपचाप निकल जाना,
लेकिन हाहाकार लिए
लौटता हूं हर बार।


बंद पड़ी मिल में
गरीबी की चुड़ैलें बेखौफ नाचती हैं।
अभाव के विजयी भूत
ही...ही...ही...करते हैं।
बंद सूता मिल के एक पोर्च में
वर्षों से खड़ी है अकेली गाड़ी,
कब के भाग गए ड्राइवर
भाग गई सवारी।
हर बार वह गाड़ी चुनौती देती है
आओ देखो तो सही,
मेरे कितने पुर्जे सही?
ओ, सयाने,
कब तक भागोगे बनाकर बहाने।

सूनी मिल के आहते में सूने मकान
अतीत में लौट जाना चाहते हैं,
लेकिन टूट रहे हैं ईंट दर ईंट
लोग ले जा रहे
नई के अभाव में पुरानी तरक्की
काट-काट कर,
एक दिन पुराना कुछ न बचेगा।
लेकिन अभी तो पोर्च है,
गाड़ी है, मिल है, झाडिय़ां हैं।
इस बार भी जैसे हर बार।

Sunday, 6 June, 2010

बिहार से फिर लौटकर

मेरे बचपन का बिहार अर्थात गर्मी की छुट्टियों वाला बिहार, पके आम, घोड़ागाड़ी, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान, बंसवारी, बगीचों, अनथक धमा-चौकड़ी वाला बिहार, गांव के साप्ताहिक बाजार वाला बिहार, गांव के सुन्दर मंदिर वाला बिहार। अब पीछे छूटता जा रहा है। मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा हूं और उसकी मुझे पकडऩे में कोई रुचि नहीं है। वह शायद चाहता है कि मेरे जैसी थोड़ी समझ वाले लोग बाहर रहें, ताकि उसका कारोबार निर्विघ्न चलता रहे। बदलते बिहार में चिन्ताएं दूसरी दिशा में मुडऩे लगी हैं। बढ़ती उम्र के साथ आंखें कुछ और देखने-खोजने लगी हैं। मेरे लिए अब एक सांस्कृतिक, सामाजिक, मानसिक आघात की तरह होने लगी हैं बिहार यात्राएं। अब मजा कम आता है और तकलीफ ज्यादा होती है। अंधेरा पहले लगता था कि केवल बाहर है, लेकिन सबसे ज्यादा अंधेरा तो लोगों के दिलों में बस गया है। विकास की गाड़ी ठहर गई है, कहीं कोई नरेगा नहीं है, है तो बस लूट है। नीतीश कुमार जहां जाते हैं, वहां सड़कों को कामचलाऊं बना दिया जाता है, जैसे हमारे गांव शीतलपुर बाजार से गुजरने वाली मुख्य सड़क (एकमा-मांझी) को बना दिया गया। सड़क पर बने गड्ढों को मिट्टी और गिट्टी से भर दिया गया है। जब बारिश शुरू होगी, तो नीतीश कुमार बिहार के इस पिछड़े इलाके में झांकने भी नहीं आ पाएंगे। यहां के स्थानीय नेता हमेशा की तरह दूसरों के चेहरे पर अपनी बड़ी गाडिय़ों के बड़े पहियों से कीचड़ उछालते हुए लापरवाह गुजर जाएंगे। विकास का रायता बुरी तरह फैल जाएगा। सड़कों पर बड़े आराम से गड्ढे खोद जाएगी बारिश। अपने गांव में बिजली का मुझे बचपन से इंतजार है। वह आती है, सरकारी बाबुओं की तरह हाजिरी बनाती है और चली जाती है। परंपराओं का पतन हो रहा है। अच्छी बातें बीत रही हैं। खराब बातें जम रही हैं। जर्रा-जर्रा बेईमान होने का बेताब नजर आता है। ज्यादातर लोगों की आंखों में ईष्र्या में सनी बदमाशी नजर आती है। लाज के मोटे-मोटे परदों को लोग बेलेहाज फाड़ रहे हैं। क्रोध से जी मचल जाता है, नायकत्व जागने लगता है कि कुछ किया जाए। आखिर क्यों?
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।

रिस रही अच्छाई,
सिलन से बेहाल दीवारों पर
बचे हैं बस नारे
जिन्हें कोई लिख जाता है
बार-बार बचाकर नजरें।
लिखने-लिखवाने वालों से
मैं समझना चाहता हूं
नारों का सच।

यहां का सच
बाहर नारों से ढंक जाता है
अंदर सिलन से उधड़ जाता है
लेकिन पहलू दो ही नहीं
अनेक हैं।
दीवार में सीमेंट कम
ज्यादा मिट्टी है,
ईंटें कम
बेडौल पत्थर अधिक हैं।
शायद दीवार बनाई नहीं
केवल दिखाई गई है।

या शायद केवल आभास है
कि खड़ी है दीवार।

तभी तो
जो अच्छा है,
सिमटकर थोड़ा बचा है।
जो बुरा है,
चादर फाड़कर पसरा है।