Monday 19 July 2010

मैं क्यों भेद करूं?


जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी
पूज्य श्री कह रहे थे, मैं क्यों भेद करूं, जब ईश्वर भेद नहीं करता। सूर्य सबको समान किरण देता है, ब्राह्मण को भी उतना ही जितना शूद्र को, जितना गरीब को, उतना ही अमीर को। हवा भी सबको समान मिलती है, लेकिन भेद तो हम करते हैं। और अधिकतर जो समस्याएं हैं, वो वितरण की अपारदर्शिता के कारण हैं। अगर ईमानदार वितरण हो, तो किसी के साथ भी अन्याय नहीं होगा। पूज्य श्री जाति आधारित जनगणना की चर्चा से चिंतित हैं। उन्हें लगता है, जात-पात पूछने का युग फिर आ जाएगा। जगदगुरु रामानन्दाचार्य जात-पात पर कतई जोर नहीं देते थे। जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे से हरि का होई। पूज्य श्री ने बताया कि वे एक ऐसे अभियान से जुड़े हैं, जिसका कार्य जाति आधारित जनगणना का विरोध करना है। यह जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने मन ही मन यह सोचना प्रारम्भ किया कि पूज्य श्री के चिंतन को कैसे दूर तक पहुंचाया जाए। कई बातें हुईं, वे कह रहे थे, सरस्वती पुत्रों के बीच प्रेम होना चाहिए। सरस्वती पुत्रों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। जरा यह सोचकर देखिए कि पढ़े-लिखे लोग अगर एकजुट हो जाएं, तो राष्ट्र के विकास की गति कितनी तेज हो सकती है। वामपंथ पर बात हुई। मैंने कहा, रामराज्य में ऐसे तत्व हैं, जो उसे वामपंथ से भी आगे रखते हैं। पूज्य श्री ने इसे स्वीकार करते हुए चंडीगढ़ के एक नास्तिक वामपंथी का उदाहरण दिया। एक रामकथा के वाचन के उपरांत उस व्यक्ति ने पूज्य श्री के चरण छुए, तो बहुतों को आश्चर्य हुआ कि जो व्यक्तिमंदिरों में ईश्वर के सामने हाथ नहीं जोड़ता, वह पूज्य श्री को प्रणाम कर रहा है। द्वितीय भेंट में पूज्य श्री ने हरिद्वार कुम्भ को भी याद किया। कुम्भ के प्रति प्रेम से वे लबालब थे। कई घटनाओं को उन्होंने याद किया। यह भी बताया कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हरिद्वार गए थे। उत्तराखंड के राज्य अतिथि थे। यहां मैं यह बता दूं कि पूज्य श्री और अशोक गहलोत में बहुत प्रेम है। मैंने पूज्य श्री के मुख से अशोक गहलोत के लिए केवल प्रशंसा ही सुनी है। बहरहाल, अशोक जी हरिद्वार पहुंचे और पूज्य श्री से कहा, अपना राम मंदिर दिखलाइए। यहां यह बता दें कि हरिद्वार में पूज्य श्री के रामानन्द संप्रदाय की ओर से लगभग १५० करोड़ रुपयों की लागत से भव्य राम मंदिर बन रहा है। यह मंदिर कई तरह की विशेषताओं से युक्त होगा। इसकी पूरे देश में चर्चा है। पूज्य श्री ने टालने की कोशिश की, लेकिन अंतत: अशोक जी के साथ उन्हें हरिद्वार में निर्माणाधीन विशाल राम मंदिर के दर्शन के लिए जाना पड़ा। खांटी कांग्रेसी अशोक जी ने निर्माण देखकर बड़े प्रसन्न होकर अर्थपूर्ण टिप्पणी की, 'उनका तो बनेगा नहीं, अपना बन गया।

Saturday 10 July 2010

जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट


सच कहा गया है, प्रेम की कथा अकथ होती है। हृदय प्रेम में ऐसा स्तब्ध हो जाता है कि भाव प्रवाह ठहर जाता है। वाणी पर ताले पड़ जाते हैं, पड़े भी क्यों न, उसकी चाभी तो मस्तिष्क के पास होती है और मस्तिष्क प्रेम में ऐसा डूबा हुआ होता है, मानो प्रेम में ही समाहित हो गया हो, मानो प्रेम प्रवाह में बह गया हो। कहते हैं रस में रस हो, तो रस की अनुभूति नहीं होती, रस की अनुभूति के लिए पात्र चाहिए और अगर पात्र ही रसमय या रसिक हो जाए, तो फिर रस की पृथक अनुभूति तो असंभव हो ही जाएगी।
ऐसा ही हुआ, जब रामानन्द संप्रदाय के प्रधान पूज्य श्री जगदगुरु स्वामी रामनरेशाचार्य जी से द्वितीय भेंट हुई। हम ऐसे मिले, मानो कभी बिछड़े न हों। जिस भाव धरा पर हम एक दूजे से ३० दिसम्बर २००९ को विलग हुए थे, ठीक उसी भाव धरा पर हम पुन: विराजमान हुए। मुझे तो ऐसा प्रतीत हुआ कि हमारा संवाद ३० दिसम्बर से निरंतर था और अभी भी है। कौन कहता है कि सदेह निकट उपस्थिति ही संवाद के लिए आवश्यक है, संवाद तो सतत है, जैसे प्रेम सतत है, जैसे भक्ति सतत है। दो प्रेमी साथ न हों, तब भी तो उनके हृदय में प्रेम सतत रहता है। संसार में हमारे राम जी कभी हुए थे सदेह, आज सदेह नहीं हैं, तो क्या उनसे हमारा संवाद टूट गया? अनुभूति की शक्ति को सप्रेम प्रज्जवलित करके देखिए, तो राम जी आज भी हमसे संवादरत अनुभूत होते हैं। कुछ अत्यधिक अनुभूत करके देखिए, तो राम जी की सदेह अनुभूति भी असंभव नहीं है। चिंतन में उतर जाइए, तो यह भी अनुभूति संभव है कि आप रामजी की गोद में बैठे हैं। यह अनुभव अभ्यास एक प्रयोग है और प्रयोग करते करते ही कोई आविष्कार होता है। कम से कम मैंने तो स्वयं का अर्थात अपने राम का आविष्कार ऐसे ही किया है। खैर, पूज्य श्री बोल रहे थे, समस्याओं और अविकास पर रोना ठीक नहीं है। यह उनकी खूबी है वे न तो निराश हैं और न दूसरों को निराश करते हैं। उनके अनुसार, विकास हुआ है और साफ दिख रहा है, उसे नकारना नहीं चाहिए। ईंधन की ही बात करें तो यह संकट दूर हुआ है। मैं जब बच्चा था, पढ़ता था रात-रात भर। लालटेन सारी रात जलती, तेल खत्म हो जाता था। कण्ट्रोल से सीमित मात्रा में तेल आता था। उसकी उपलब्धता सहज नहीं थी। दादी जी कहती थीं, तेल जलकर खर्च नहीं होता, ये तेल पी जाता है। इतना पढ़कर को कलेक्टर बनेगा क्या?... पूज्य श्री बोल रहे थे, आज स्थितियां बदल गई हैं, ऊर्जा है, सुविधा है। गरीब भी पढ़ रहे हैं। यही तो विकास है। किन्तु पूज्य श्री के बचपन की यह संक्षिप्त कथा मुझे झकझोर गई। मैं विकास के विषय पर नहीं अटका , मेरा मन कलेक्टर वाली बात पर अटका। धन्य हैं वो पूजनीया दादी जी और राम जी की इच्छा। पूज्य श्री कलेक्टर तो नहीं बने, परन्तु जो बने हैं, वह हजार कलेक्टर भी मिलकर नहीं बन सकते । हृदय यों हुआ, मानो देह-बाड़ तोड़ बाहर आ जाएगा। रात-रात भर की वह पढाई-कमाई आज यों काम आती है कि मेरे जैसे रस- कंगले लूट रहे हैं, छक रहे हैं और जो चीज छक रहे हैं, उसका कोई अंत नहीं है, कोई विकल्प नहीं है।
भारत भूमि की उर्वरा देखनी हो, तो कोई पूज्य श्री के सामने आ जाए। आधुनिक दौर में ज्यादातर फलदार व्यक्ति अकड़कर लंबे-चौड़े हो जाते हैं, झुकने को तैयार नहीं होते, लेकिन इसी दौर में पूज्य श्री जैसा एक फल-समृद्ध भी है, जो विनम्रता में झुका जा रहा है, जो उनसे ग्रहण कर सके , ग्रहण करे। साधु क्या है, जैसी प्रकृति । अच्छे साधु और प्रकृति के बीच भेद मिट जाता है। साधु के पास जो भी होता है, प्राकृतिक होता है। कृत्रिमता उसे तनिक भर भी छू नहीं पाती है। पूज्य श्री भी सहजता के वैभव से ऐसे लबालब होते हैं आपके और उनके बीच की दूरियां पलक झपकते नप जाती हैं, खाइयां तत्काल पट जाती हैं। वे अपनी बातों से ऐसा सेतु निर्मित करते हैं, जिस पर से होते हुए उन तक पहुंचना अति सहज हो जाता है।
उनसे मिलने के बाद मुझे आश्चर्य होता है कि मैं कभी नास्तिक होकर भी सोचता था। मेरी प्रगतिशीलता के अनुभव ऐसे थे कि किसी भी साधु को स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता था। मेरे अनुभव कोष में जिस प्रथम साधु का समावेश हुआ, उनके बारे में मैं बताना चाहूंगा। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सरयू नदी के किनारे उनका आश्रम था, मेरा ननिहाल का गांव बभनियाव उन बाबा जी के आश्रम के समीप था। मैं करीब पांच-छह वर्ष का था, हम लोग सब बैलगाड़ी पर सवार उन्हें देखने गए थे। हम आश्रम पहुंचकर अभी बैलगाड़ी से उतर ही रहे थे कि मचान पर बैठे साधु हमें ‘जाओ-जाओ-जाओ’ कहने लगे। मैं तो उन साधु बाबा को ठीक से देख भी नहीं पाया, वहां जल्दी-जल्दी प्रसाद लेकर हम फिर बैलगाड़ी पर सवार हो गए थे। मौसियों ने बताया था, ‘इहे देवराहा बाबा हउवन।’ मतलब यही देवराहा बाबा हैं।
कुछ बड़ा हुआ, तो पता चला, देवराहा बाबा बड़े-बड़े लोगों से भेंट किया करते थे। उनका बड़ा सम्मान था, पहुंचे हुए संत थे। पिता बताते हैं, वे दो बार उनसे मिलने गए थे और दोनों ही बार उन्होंने पिता से दो बार संवाद किया था। मतलब कि वे हर किसी को नहीं भगाते थे। खासकर वे बच्चों और महिलाओं को दूर रखा करते थे। मेरे मन पर खराब प्रभाव पड़ा कि हम बड़े नहीं थे, इसलिए देवराहा बाबा ने हमें दुत्कार दिया। वे मचान पर बैठे रहते थे और हर आने वाले साधारण व्यक्ति को दूर से ही जाओ-जाओ कहने लगते थे। ये उनका अपना तरीका था। शायद इससे उनका आश्रम भीड़ से बच पाता होगा, वर्ना उनके आश्रम के आसपास तो मेला लगाने की इच्छा रखने वालों की कमी नहीं थी। लेकिन देवराहा बाबा के बचाव वाले ये तर्क मेरे मन में बाद में तैयार हुए। साधु सहज नहीं होते हैं, यह धारणा तो मन में जड़ें जमा चुकी थी। धर्म को जानने की इच्छा तो हृदय में सदैव रही, लेकिन धर्म के समीप जाने की इच्छा बचपन में ही मार दी गई।
मैं हृदय से स्वीकार करना चाहूंगा, पूज्य श्री से भेंट के बाद मैंने आध्यात्मिक बचपन का पुन: प्रारम्भ किया । घोषणा करता हूं मैं फिर जीने लगा हूं। अब केवल शब्दों ही नहीं, सांसों का भी मेरे लिए नया अर्थ है।

Monday 5 July 2010

बदलाव आहिस्ता-आहिस्ता

कहीं मैंने इंटरनेट पर देखा है कि मेरा गांव शीतलपुर बाजार मांझी ब्लॉक का आदर्श गांव है, लेकिन जमीन हकीकत ऐसी नहीं है कि इसे आदर्श गांव कहा जा सके। फिर भी तमाम कमियों के बावजूद धीरे-धीरे बदल रहा है मेरा गांव। लगभग हर घर में मोबाइल फोन है, ज्यादातर घरों में एक से ज्यादा मोबाइल है। प्रति मोबाइल एक से ज्यादा सिम कार्ड है। मतलब गांव में जितने लोग हैं, शायद उतने ही मोबाइल कनेक्शन हैं। कुछ साल पहले एसटीडी बूथों पर लाइन लगा करती थी, बाहर बात करने के लिए एसटीडी बूथों पर घंटों बैठना पड़ता था, लाइन बड़ी मुश्किल से मिलता था। एसटीडी बूथ पर बाहर से भी फोन आते थे। एसडीटी बूथ वाले की बड़ी जिम्मेदारी हुआ करती थी कि जिसका फोन आए, उसे गांव से बुलाना पड़ता था। अब एसटीडी बूथों की रौनक खत्म हो गई है, धंधा चौपट हो गया है। चार-पांच बूथ हुआ करते थे, लेकिन अब एकाध ही बचा है, बस नाम के लिए। घर-घर में मोबाइल हो गया। बिजली नहीं है, कनेक्शन है, बामुश्किल एकाध घंटे के लिए बिजली आती है। उससे मोबाइल को चार्ज करना मुश्किल है। लेकिन जनरेटर से मोबाइल चार्ज करने का धंधा चल निकला है। लोग टीवी देखने के लिए भी जनरेटर से ही बैटरी चार्ज करते हैं। टीवी का क्रेज अब पहले जैसा नहीं है, क्योंंकि दूरदर्शन पर ढंग के प्रोग्राम नहीं आते हैं। रामायण-महाभारत के समय बात ही कुछ और थी। केबल नेटवर्क अभी गांव में नहीं पहुंचा है। हां, कुछ लोगों ने डीटीएच लगवा रखा है।
गांव में बिजली की जरूरत सभी को महसूस होने लगी है। तो बिजली का जुगाड़ भी किया गया है। इस बार मैंने देखा, प्रति प्वाइंट ८० रुपए महीना के दर से जनरेटर से पैदा बिजली का आवंंटन हो रहा है। सिंगल फेज है, बस सीएफएल जलता है। पंखा नहीं चलाया जा सकता। सामान्य बल्ब नहीं जलाया जा सकता। हां, मोबाइल चार्ज हो सकता है। जनरेटर से बिजली पैदा करके बांटने का धंधा चमकने लगा है। गांव में दो-तीन लोगों ने यह धंधा शुरू किया है। शाम को अंधेरा होते ही बिजली आपूर्ति शुरू हो जाती है और करीब तीन घंटे तक आपूर्ति होती है। मैं जब गांव में था, तब साढ़े सात बजे बिजली आती थी और साढ़े दस बजे चली जाती थी। घर में शादी का माहौल था, तो जनरेटर वाले को बोल रखा था कि भइया आधा घंटे देर से जनरेटर बंद करना। कहां जाता है, अगर इच्छा हो, तो राह निकल आती है। बिजली के लिए राह निकल आई है। शायद कोई हिम्मत करेगा और जनरेटर से ही चौबीस घंटे बिजली की आपूर्ति भी संभव हो पाएगी, लेकिन जरूरी है कि लोग बिजली की कीमत समझें और ईमानदारी से कीमत चुकाएं। एक और तब्दीली आई है, जितने साइकिलें हैं, उससे कुछ ही कम मोटरसाइकिलें होंगी। मोटरसाइकिल होने से रात-बिरात कहीं आना-जाना आसान हो जाता है। माहौल खराब है, पूरी तरह से सुधरा नहीं है, लेकिन लोग रात के समय भी जरूरी होने पर आना-जाना करने लगे हैं। अब डर पहले जैसा नहीं है। पहले तो दस-ग्यारह बजे रात में रेलवे स्टेशन की ओर जाने के बारे में सोचना मुश्किल था। लोग रेलवे स्टेशन पर अगर शाम आठ बजे के बाद बाहर से पहुंचते थे, तो वहीं रात गुजारनी पड़ती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अगर आप रात के समय भी स्टेशन पर पहुंचें, तो आपको वहां जीप, सफारी, मार्शल इत्यादि गाडिय़ां मिल जाएंगी। आप रिजर्व करके अपने घर जा सकते हैं। रास्ते में लूट कम हुई है। देर रात कहीं आप जा रहे हों, तो हल्का डर तो लगता है, लेकिन धीरे-धीरे बात करते हुए रास्ता कट ही जाता है। पुलिस की व्यवस्था बिल्कुल नहीं सुधरी है। बिहार में बड़ी संख्या में पुलिस चौकियों की जरूरत है, ताकि कम से कम बड़े गांवों के करीब पुलिस चौकी बने, जो जरूरत पडऩे पर सुरक्षा मुहैया कराने का काम करे। तो एक ओर, जहां मूलभूत ढांचे पर ध्यान देना होगा, वहीं कानून-व्यवस्था भी पुख्ता करने की जरूरत है। बिहार के ये इलाके पिछड़े हुए जरूर हैं, लेकिन यहां लोग पिछड़े हुए नहीं हैं। ज्यादातर लोग मजबूर हैं, कुछ कर नहीं सकते। सुनी-सुनाई बातों के आधार पर जीते हैं। इलाके विधायक और सांसद को ध्यान देना चाहिए। आम लोगों को अभी भी नीतीश कुमार से बड़ी उम्मीदें हैं। नीतीश के साढ़े चार साल में लोग ऊबे नहीं हैं, लोगों में विश्वास जगा है। यह बात नकारात्मक भी है और सकारात्मक भी यहां के लोग जल्दी नहीं ऊबते हैं। लालू से ऊबने में लोगों ने पंद्रह साल लगा दिए। नीतीश से ऊबने में कम से कम दस साल तो लगने ही चाहिए। पांच-छह वर्ष में तस्वीर बदलनी चाहिए, बदल भी रही है, लेकिन रफ्तार धीमी है।