Monday 29 November 2010

नीतीश बनाम लालू

गाल बजाने वाले नेताओं में अगर देखा जाए, तो लालू सबसे आगे नजर आएंगे, जबकि नीतीश में यह अवगुण नहीं है। लालू अपने खुले दांतों के बारे में खामोश रहते हैं, लेकिन अक्सर हमला बोलते हैं कि नीतीश के पेट में दांत हैं। नीतीश कभी भी लिट्टी चोखा, मछली-मांगुर में समय नहीं गंवाते, जबकि लालू के लिए ये खाद्य पदार्थ भाषण के प्रिय अंश हैं। लालू गजब की परिवारवादी नेता हैं, जबकि नीतीश भी पुत्रवान हैं, लेकिन उनके पुत्र की राजनीति में रुचि नहीं है। परिवार की तरफ नीतीश का कोई रुझान नहीं है। नीतीश ने निश्चित रूप से काम किया है, जबकि लालू १५ साल तक केवल गाल बजाते रहे। गांव की एक महिला बता रही थी कि उसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिया है। क्योंकि नीतीश कुमार ने योजना के तहत बिहार में लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल बांटी। पहले घर के कामकाज और स्कूल के दूर होने की वजह से लड़कियों का समय पर स्कूल जाना एक मुश्किल काम था, लेकिन अब लड़कियों के पास स्कूल जाने के लिए साइकिल है। मैंने खुद देखा, स्कूल के समय स्कूल जा रही लड़कियों का रेला निकलता है। ऐसा लगता है, मानो नीतीश कुमार की रैली गुजर रही हो। लड़कियां बहुत खुश हैं और उससे ज्यादा खुशी उनके परिवार वाले हैं। पहले लोग पढ़ाई करने के बाद कमाई करके साइकिल खरीदते थे, लेकिन अब तो पढ़ाई के समय ही साइकिल मिल रही है। साइकिल वितरण से गांव-गांव में परिवर्तन आया है, इसे नकारा नहीं जा सकता। राजग का वह विज्ञापन वाकई सच्चाई बयान करता है, जब एक बिहारी महिला यह सोच रही है कि अगर नीतीश पहले बिहार के मुख्यमंत्री होते, तो वह भी साइकिल से स्कूल जाकर पढ़-लिख लेती। लेकिन नीतीश के पहले तो राबड़ी, लालू और जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने बिहार की एक पूरी पीढ़ी को बिगाड़ कर उद्दंड बना दिया। साइकिल इफेक्ट से लालू भी परेशान थे, तो उन्होंने लड़कों को सपने दिखाने की कोशिश की। चुनावी रैली में बोल दिया, लड़कों को स्कूल जाने के लिए मोटरसाइकिल देंगे। इसका जवाब नीतीश ने अपनी रैली में दिया, लालू स्कूली लड़कों को अपराधी बनाना चाहते हैं। १८ साल से कम उम्र के किशोरों, बच्चों को आखिर ड्राइविंग लाइसेंस कैसे मिलेगा? तो लालू चुप हो गए, मोटरसाइकिल वितरण के वादे पर गाल बजाना बंद कर दिया। अब उनके लिए वैसे भी गाल बजाने के मौके कम हो गए हैं। अब तो नेता प्रतिपक्ष पद पर भी उनका वाजिब हक नहीं रहा। उनकी बोलती बंद है, उन्हें स्वभाव बदलना पड़ सकता है, क्योंकि बिहारियों ने संकेत दे दिया है कि वे बदल रहे हैं। वाकई बिहार बदल रहा है। स्वागत है।

अब काम का समय

जब चुनाव के समय १० दिन बिहार में था तब लग तो रहा था कि नितीश कुमार को लोग फिर मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं , लेकिन इतनी बड़ी जीत का सपने में भी अनुमान नहीं था. क्योंकि मेरे जिले मतलब सारण में विकास नहीं के बराबर हुआ है इसकी सबसे बड़ी गवाही एकमा और मांझी के बीच की सड़क देती है इस सड़क पर चलना मुश्किल है . एकमा में तो इतना कम काम हुआ है कि इलाके के विधायक रहे गौतम सिंह को चुनाव लड़ने के लिए मांझी आना पड़ा , गौतम सिंह बिहार सरकार में मंत्री रहने के बावजूद एकमा की सूरत नहीं बदल पाए अब वे मांझी से भरी अंतर से जीते हैं तो इसके लिये लोग नीतीश कुमार को ही श्रेय दे रहे हैं .
मांझी में पूर्व मंत्री रविन्द्र नाथ मिश्र खटिया चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में थे . उन्होंने भी अपने समय में कोई काम नहीं किया था . वे तीसरे स्थान पर रहे. वहां लोगों ने चुनाव नतीजों के बाद एक जुमला चला दिया : लालटेन के पेंदी फूट गइल, बंगला जर गइल , हाथ टूट गइल और खटिया खड़ा हो गइल.
नीतीश की विशालता के आगे लालू बहुत बौने साबित हुए हैं. अब गौतम सिंह जैसे विधायकों और मंत्रियो को भी अपने काम से अपनी विशालता साबित करनी चाहिए . इतनी ताकत जनता बार बार नहीं देती है, ताकत का उचित इस्तेमाल होना चाहिए वरना पांच साल बीतेते ज्यादा समय नहीं लगेगा. नीतीश की टीम के निकम्मे सदस्यों को यह ध्यान रखना चाहिए कि काम न करने की वजह से ही लालू की ऐसी दुर्गति हुई हैं,