Wednesday, 30 March, 2011

अपनी बात


पत्रकारिता आधार, प्रकार और व्यवहार पत्रकारिता एक अत्यधिक व्यावहारिक क्षेत्र है। यहां मची आपाधापी में शायद ही किसी के पास फुरसत है कि वह समस्याओं के विस्तार में जाए और विधिवत समाधान बताने का कष्ट करे। मैंने पत्रकारिता में अनेक नए व पुराने लोगों को भी अपने सवालों के साथ परेशान-भटकते देखा है। एक बड़ी जमात है, जो गलतियां तो निकालती है, आलोचना भी करती है, लेकिन यह नहीं बताती कि आखिर काम कैसे किया जाए, काम कैसे सुधारा जाए। हर काम अच्छा नहीं होता, लेकिन जो अच्छा नहीं है, उसे अच्छा कैसे बनाया जा सकता है, ऐसे ही अनेक सवाल हैं, जिनके जवाब खोजने की कोशिश में ही धीरे-धीरे यह किताब लिखी गई है। प्रस्तुत पुस्तक में अकादमिक पहलुओं को लगभग छोड़ दिया गया है और केवल व्यावहारिक दृष्टि से उत्तर देने या समाधान बताने की कोशिश की गई है। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैंने इस पुस्तक में अनेक विषयों पर स्वतंत्रतापूर्वक विचार करने की कोशिश की है, समस्याओं के समाधान बढऩे की कोशिश की है। हमेशा इस लक्ष्य का ध्यान रखा है कि पुस्तक लाभदायक बने। इस किताब को लिखते हुए कई बार मैंने विचार किया कि क्या मैं ठीक लिख रहा हूं, क्या ऐसी किताब की वाकई जरूरत है। न जाने कितने नए व प्रशिक्षु पत्रकारों ने अनजाने में ही मुझे यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा दी है, मैं सबसे पहले उन्हीं का शुक्रगुजार हूं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम खंड आधार में मैंने पत्रकारिता के आधारभूत पक्षों को समझने-समझाने की कोशिश की है। प्रकार खंड में मैंने विभिन्न तरह की पत्रकारिता की चर्चा की है। अंतिम खंड व्यवहार में मैंने कुछ ऐसे पक्षों को उठाया है, जिनसे आम तौर पर बचने की परंपरा रही है। पुस्तक में न केवल पत्रकार बिरादरी की बेहतरी की कामना की गई है, बल्कि पाठकों-श्रोताओं-दर्शकों की भी मदद करने की कोशिश हुई है। आदरणीय रामशरण जोशी जी को जरूर याद करूंगा, उन्हें मैंने लगभग साल भर पहले पुस्तक के कुछ अध्याय दिखाए थे और पूछा था कि क्या ऐसी कोई पुस्तक अभी है, क्या मुझे लिखना चाहिए। उन्होंने उत्साह भी बढ़ाया, सुझाव भी दिए। मित्र डॉ. राजेश कुमार व्यास ने मुझे किताब को जल्दी लिखने के लिए हमेशा प्रेरित किया। शास्त्री कोसलेन्द्रदास से हुई चर्चाएं प्रेरणादायी रहीं। राजीव जैन जैसे कुशल युवा पत्रकार और मनीष शर्मा जैसे नवागंतुक को मैंने कुछ अध्याय पढऩे के लिए दिए, ताकि यह पता चले कि मैं जो लिख रहा हूं, वह फायदेमंद है या नहीं। आदरणीय रामबहादुर राय द्वारा प्राप्त सहयोग अतुलनीय रहा। मैं तो न्यू मीडिया जैसे विषय को छोड़कर आगे बढ़ रहा था, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेरित किया और इस विषय पर भी शोध व लेखन की सलाह दी। पुस्तक के रूप में मेरी यह कोशिश अगर पत्रकारों की नई व पुरानी पीढ़ी और पत्रकारिता में रुचि रखने वाले आम पाठकों को थोड़ी भी लाभान्वित कर सके, तो मैं अपनी मेहनत को सार्थक मानूंगा।

Wednesday, 9 March, 2011

मेरी किताब


(मेरी इस किताब का जल्द ही लोकार्पण होने वाला है.)
मीडिया पुस्तकों में सिद्धांत और पत्रकारिता का इतिहास तो पर्याप्त मिल जाता है, लेकिन व्यावहारिक समझ की बातें अधूरी रह जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो हथियार चलाना तो सिखा दिया जाता है, लेकिन युद्ध भूमि में कब किस परिस्थिति में कैसे संघर्ष करना है, यह सब नहीं बताया जाता। अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदना तो आता था, लेकिन उसे नहीं पता था कि चक्रव्यूह के अंदर विराजमान लगभग तमाम महारथी युद्ध के सारे सिद्धांतों-नियमों की धज्जियां उड़ाकर व्यावहारिक हो जाएंगे और उसका वध हो जाएगा। मीडिया जगत में महाभारत निरंतर जारी है, आज अर्जुन होने-बनने की जरूरत है, ताकि चक्रव्यूह को न केवल भेदना, बल्कि उसे जीतना भी संभव हो सके।
आधुनिक दौर में जब पूंजी का नियंत्रण बहुत बढ़ चुका है, जब गलाकाट प्रतिस्पद्र्धा पत्रकारों की प्रतीक्षा कर रही है, तब यह एक स्वाभाविक सत्य है कि एक सीमा के बाद सिद्धांत नाकाम हो जाते हैं और केवल व्यावहारिक होने का विकल्प ही बचा रहता है। प्रस्तुत पुस्तक में चाहे आधार की बात हो या प्रकार की या व्यवहार की, हर जगह यह चेष्टा हुई है कि पत्रकारिता में आने को इच्छुक छात्रों, नए-पुराने पत्रकारों, मीडिया प्रबंधकों और यहां तक की पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी समाधानों का व्यावहारिक संबल प्रदान किया जाए।

Monday, 7 March, 2011

मुंह बाए खड़ा पक्षी



(कोटा चिडिय़ाघर में यह पक्षी विशेष मुद्रा में दिखा, तो न खुद को फोटो खींचने से रोक सका और न कविता लिखने से।)

एक पक्षी
पिजड़े की भीड़ में अकेला
नि:शब्द स्तब्ध
देर से सिर उठाए।
सीमा के अतिरेक तक मुंह बाए।
खड़ा, मानो विराम पर ठहरी दुनिया।
मानो हल होने वाला हो
पापी पेट का सवाल।
इंतजार बढ़ाता कोई दाना
या गले में अटका कोई गाना।
कोई भूला हुआ राग
या ठिठकी हुई रागिनी।
गले में फंसा सुर
या कोई गुप्त गुर।
कोई विचित्र नृत्य
या उसकी कोई विलंबित मुद्रा।
दुख में डूबा या सुख में बिसरा।
या आजादी की संभावनाओं का निकलता दम।
या टूटे सपने का सन्नाटा।
सूर्य या पृथ्वी को निगल जाने का गुमान,
या किसी फतींगे को धोखा देने की तैयारी।
आलस्य का चरम
या भूल गए हों कि मुंह खुला है
या खुले मुंह में आ गई हो नींद।

भकोल है
या बहुत भोला है
शायद नहीं जानता
छूटते प्राणों और
सिमटते जीवनों की दुनिया में
खतरनाक है यों मुंह खोले खड़े रहना।
भयावह होती दुनिया में
खुले मुंह का खतरा
जैसे आ मौत मुझे मार का आह्वान।

हे अनाम पक्षी
अभी बंद रखो मुंह,
खाक में मिलने से पहले तक
जैसे बंद रहती है लाख की मुट्ठी।
क्योंकि अंतत: उसे खुला ही रह जाना है।

Thursday, 3 March, 2011

दिनों बाद दो फिल्में

सिनेमा हॉल में मैंने इतनी कम फिल्में देखी हैं कि बचपन से आज तक मैं गिना सकता हूं कि कौन-कौन-सी फिल्म देखी हैं और किसके साथ देखी हैं। पहली फिल्म शायद गंगा की सौगंध थी, जो पूरे परिवार के साथ देखी थी। फिर नूरी, मासूम, दर्द का रिश्ता, ताजमहल, हम हैं राही प्यार के, हम आपके हैं कौन, बाम्बे, रंगीला, बड़े मियां-छोटे मियां, जख्म, वाटर, सरकार, आजा नचले, सरकार राज इत्यादि। इनमें से हर फिल्म को देखने के साथ छोटी व यादगार कहानी भी जुड़ी है। संक्षेप में कहूं, तो मासूम मैंने राउरकेला, उड़ीसा के रज्जाक सिनेमा हॉल में देखी थी, जिसके लिए टिकट सिनेमा हॉल के बाहर चार घंटे सपरिवार इंतजार के बाद पिताजी ने कहीं से जुटाए थे। हम हैं राही प्यार के, मैंने राउरकेला में ही अफ्सरा सिनेमा हॉल में कालेज के दिनों में अपने अर्थशास्त्र विभाग के संगियों-सहेलियों के साथ देखी थी। याद आ रहा है, अफ्सरा सिनेमा के मालिक गफूर मियां थे, उनका एक शराब का कारखाना हुआ करता था, जहां बनाई शराब अनारकली नाम से बिकती थी। प्रदीप कुमार-बीना राय की मुख्य भूमिका वाली ताजमहल मैंने दरभंगा में देखी, जब फिल्म देखकर निकला था, तो तेज बुखार पीछे छूट चुका था। पहली बार गाजियाबाद में मैंने मल्टीप्लेक्स में सरकार फिल्म देखी, तो सरकार राज राजस्थान के कोटा के सिनेमा हॉल नटराज में देखी। बाकी कहानियां फिर कभी। तो छोटी-सी सूची है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैंने फिल्में कम देखी हैं। छोटे पर्दे पर ही सही, फिल्में ठीक-ठाक संख्या में देख रखी हैं। फिल्मों के प्रति रुचि तब जगी थी, जब राजकपूर को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला था और सिलसिलेवार ढंग से दूरदर्शन पर राजकपूर की फिल्में दिखाई गई थीं। आज फिल्मों की ठीक-ठाक विवेचना कर सकता हूं। लगभग सभी महत्व के अभिनेताओं, अभिनेत्रियों पर बोल व लिख सकता हूं। थोड़ी मेहनत से इतना ज्ञान तो अर्जित कर ही लिया है। हालांकि फिल्मों पर लिखने के अवसर मुझे ज्यादा नहीं मिले हैं, लेकिन फिल्मों के बारे में मैंने दूसरों का ज्ञान अवश्य बढ़ाया है। फिल्म पत्रकारिता पर कुछ काम भी किए हैं और सौभाग्य से दो-तीन बार फिल्म पत्रकारिता पढ़ा भी चुका हूं।
बहरहाल, बहुत दिनों बाद जयपुर के पिंक स्क्वायर में मधुर भंडारकर की फिल्म 'दिल तो बच्चा है जी देखने गया। यह मेरे पौने तीन साल के बेटे द्वारा सिनेमा हॉल में देखी गई पहली फिल्म है, जो उसने जागते हुए और पॉपकॉर्न खाते हुए देखी। यह फिल्म खराब तो नहीं ही कही जाएगी, लेकिन भंडारकर ब्रांड की फिल्म यह नहीं है। आजकल एक ट्रेंड है कि किसी फिल्म में एक साथ अनेक कहानियां चलती हैं। दिल तो बच्चा है जी में भी तीन या चार-पांच प्रेम कहानियां चलती हैं, लेकिन तीनों ही प्रेम कहानियां एकतरफा प्रेम या प्रेम की गलतफहमी की कहानियां हैं। गीत नीलेश मिश्र ने लिखे हैं, जो हिन्दुस्तान टाइम्स में पत्रकार हैं, एक गीत को छोड़ दीजिए, तो फिल्म में गीत-संगीत मामूली ही है, भंडारकर जैसे निर्देशक इस बात को नजरअंदाज कर गए कि प्रेम कहानी या कहानियों पर आधारित फिल्मों में गीत-संगीत आला दर्जे का होना चाहिए। भारतीय समाज में प्रेम और संगीत का चोली-दामन का साथ है। भारतीय फिल्मों में आज भी बिना गीत-संगीत के प्रेम असंभव, अप्रभावी व अनाकर्षक है।
मैंने दूसरी फिल्म ७ खून माफ देखी। ख्यात निर्देशक विशाल भारद्वाज की यह फिल्म रस्किन बांड की कहानी पर आधारित है और भारद्वाज ने एक अमरीकी स्क्रीन प्ले राइटर की मदद से फिल्म भी ठीक-ठाक बनाई है। निर्देशन अच्छा है, लेकिन अंधेरा कुछ ज्यादा है। कई बार फिल्म अपनी मूल धारा से भटक जाती है। अब लगभग सब जानते हैं, फिल्म की नायिका सुजन्ना बारी-बारी से परिस्थितिवश अपने छह पतियों का खून करती है, उसका सातवां पति ईश्वर है। फिल्म अभिनय के लिहाज से शानदार है। प्रियंका चोपड़ा के लिए यह फिल्म यादगार होगी। नील नितिन मुकेश, अन्नू कपूर खास तौर पर प्रभावी हैं, जबकि इरफान खान और नसरुद्दीन शाह ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं। इन चरित्रों में जरूरत से ज्यादा कोण या झोल हैं, जिसकी वजह से यह फिल्म आम दर्शकों के सिर के ऊपर से निकल सकती है। हुआ भी यही, कोटा के नटराज सिनेमा में, ९ बजे के बाद के शो में बामुश्किल २५ लोग थे।फिल्म पर जो चर्चा हुई, उसमें यह बात सामान्य तौर पर उभरी है कि यह बिगाडऩे वाली फिल्म है। साथी या जीवन साथी बारबार बदलने को उकसाने वाली फिल्म है, लेकिन मेरी नजर में इस फिल्म में जो अंत है, उससे गहरा अध्यात्मिक बोध पैदा होता है। यह फिल्म स्थापित करती है कि भोग या काम से ज्यादा महत्वपूर्ण है संयम और मोक्ष। जहां तक मेरा मानना है, यह फिल्म यह भी संदेश देती है कि अगर आप बिगड़े हुए हों, विचलित हों, तो या तो आप मार दिए जाओगे या फिर आप किसी को मार डालोगे। सुजन्ना किसी आम महिला की तरह मारी नहीं जाती, बल्कि मारती है। यह शायद उत्तरआधुनिक नारीवाद है, या बदला या एक तरह का जयघोष है, एक तरह की खोज है, जिसे यह फिल्म मुकाम तक पहुंचाती है। वाकई, यह याद रह जाने वाली फिल्म है।