Wednesday, 19 December, 2012

दाग-ए-दिल्ली

हमारी राष्ट्रीय राजधानी अगर बलात्कार की राजधानी कहलाने लगी है, तो फिर इससे दुखद और चिंताजनक कोई बात हो नहीं सकती। राष्ट्रीय राजधानी का यह स्याह सच अब शर्म की हदें पार करने लगा है। निजी वाहनों में बलात्कार का दुस्साहस तो राजधानी ने पहले भी देखा है, लेकिन सार्वजनिक बस में एक पैरा-मेडिकल छात्रा से बलात्कार जघन्यतम अपराध की श्रेणी में कहा जाएगा, इतना ही नहीं, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित यह बोल चुकी हैं कि महिलाएं रात के समय अकेले न निकलें, वह छात्रा तो अकेली भी नहीं थी, उसके पुरूष मित्र को बुरी तरह से घायल करके सामूहिक दुस्साहस को अंजाम दिया गया। छात्रा को हत्या की हद तक घायल करके बस से धकेल दिया गया, अब वह जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। राजधानी के अपराधी इतने दुस्साहसी कैसे हो गए हैं? क्या उन पर किसी का अंकुश नहीं है? कहां है पुलिस और क्या करती रहती है? दूसरे देशों में भी राजधानियां हैं, जिन्हें आदर्श बनाने पर पूरा जोर रहता है, ताकि देश के दूसरे शहरों को सबक मिले। दिल्ली को तो शायद दशक भर से न जाने क्या हो गया है, अपराघियों, बलात्कारियों और छेड़छाड़ करने वालों के दिल से डर ही खत्म हो गया है। यहां यह गिनाने की जरूरत नहीं कि राष्ट्रीय राजधानी में सर्वोच्च अदालत है, जनप्रतिनघियों की सर्वोच्च पंचायत है, सर्वोच्च अफसर और सर्वोच्च नेता और सर्वोच्च चिंतकों का जमघट रहता है, क्या देश के सर्वोच्च कर्णधारों की चिंता व जमघट का कुल निचोड़ यह है कि राजधानी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, दिल्ली उत्तरोत्तर बदनाम होती चली जा रही है। सबको सोचना होगा कि दिल्ली का सामाजिक, भावनात्मक ढांचा तार-तार क्यों हो गया है? संसद में सवालों का सामना करते हुए एक केन्द्रीय राज्यमंत्री की हंसी ने जवाब दे दिया कि सरकार गंभीर नहीं है। यह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात है। किसी भी शहर में सभ्यता तभी जीवित रह सकती है, जब वहां मां-बहनें सुरक्षित हों। समाज के कर्णधारों को सोचना चाहिए कि हमें कंक्रीट के जंगल नहीं बनाने, हमें ऎसे शहर बनाने हैं, जहां लोग इज्जत से रह सकें, जहां कानून का राज हो, जहां लोग एक दूसरे की परवाह करें। चयन लोगों को करना है, कैसी सरकार चाहिए, कैसा शहर चाहिए। अगर हम इस अक्षम्य शोषण के सिलसिले को मिलजुलकर नहीं तोड़ेंगे, तो फिर सबको तैयार रहना चाहिए, क्योंकि दुनिया में किसी का भी समय हमेशा अच्छा नहीं रहता। - edit written by me for patrika and rajasthan patrika-

Monday, 10 December, 2012

कांग्रेस और अशोक गहलोत कितने सच्चे?

आप अपने घर में रोटियां कम सेंकिए, क्योंकि रोटियां सेंकने का काम तो राजनेताओं का है, हां, यह बात जरूर है कि उनकी राजनीतिक रोटियों से किसी का पेट नहीं भरता। सितम्बर महीने से अब तक अगर आप तीन सिलेंडर ले चुके हैं, तो सावधान हो जाइए, चौथा सिलेंडर आपको ३८८ रुपये की बजाय ८६५ रुपये का पड़ेगा। मैंने लिया है ८ दिसम्बर को ८६५ रुपये का सिलेंडर। गैर-रियायती सिलेंडर की कीमत रियायती सिलेंडर की कीमत से ४७७ रुपये ज्यादा है। केन्द्र सरकार के प्रवक्ता और सोनिया गांधी के भाषण लेखक जनार्दन द्विवेदी ने ताल ठोंककर सितम्बर में घोषणा की थी, ‘कांग्रेस की राज्य सरकारें अपनी ओर से ३ सिलेंडर रियायती देंगी, कांग्रेस शासित राज्यों की जनता को ९ सिलेंडर हर साल रियायती दर पर मिलेंगे, और भाजपा सरकारों को अगर जनता की चिंता हैं, तो वे भी अपनी ओर से अपने राज्य के लोगों को तीन सिलेंडर रियायती दें।’
गैर-रियायती सिलेंडर का रसीद, रियायती सिलेंडर का रसीद, दोनों कीमतों का अंतर ४७७ रुपये
द्विवेदी जी और कांग्रेस के दावे की हवा निकल चुकी है। राजस्थान के मुख्यमंत्री एकाधिक मौकों पर कह चुके हैं, ‘राजस्थान सरकार अपनी ओर से तीन रियायती सिलेंडर का वादा जरूर पूरा करेगी, चाहे इसके लिए केन्द्र से पैसा मिले या न मिले।’ गौर करने की बात है कि राजस्थान सरकार अगर अपनी ओर से तीन रियायती सिलेंडर देती है, तो उस पर लगभग ८०० करोड़ रुपये का भार आएगा। राजस्थान सरकार चाहती है कि यह भार केन्द्र सरकार उठाए, इसके लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रयास भी किए, लेकिन नाकाम रहे। राजस्थान में सितम्बर के बाद जिन लोगों ने भी चौथा सिलेंडर लिया है, सबको ८६५ रुपये चुकाने पड़े हैं। कहां है अशोक गहलोत का दावा? उन्होंने पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व की बात क्यों नहीं स्वीकारी? क्या यह अनुशासनहीनता नहीं है? क्या कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व अशोक गहलोत के खिलाफ कार्रवाई करेगा? क्या कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने देश की जनता और अशोक गहलोत ने राजस्थान की जनता को धोखा नहीं दिया है? हमारे नेता इतने बड़े-बड़े झूठे दावे क्यों करते हैं? क्या ये जनता को मूर्ख समझते हैं? संभव है, गुजरात में चुनाव के बाद केन्द्र सरकार रियायती सिलेंडरों की संख्या बढ़ा देगी। तब शायद हर साल ६ की बजाय ९ सिलेंडर मिला करेंगे, लेकिन जो लोग अभी गैर-रियायती सिलेंडर के लिए ४७७ या ५०० रुपये ज्यादा चुका रहे हैं, क्या उनके नुकसान की भरपाई सरकार करेगी?

Sunday, 9 December, 2012

डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्म स्थान

कुछ तर्स्वीरें, जीरादेई रेलवे स्टेशन, कुछ कमरे ठीक, तो कुछ कबाड़
ये खाट है जिस पर कभी गाँधी जी ने विश्राम किया था

Tuesday, 4 December, 2012

क्षिप्रा स्नान या नर्मदा स्नान?

उज्जैन में रामघाट, क्षिप्रा नदी का मनोरम तट। हम जब वहां पहुंचे, तो शाम हो रही थी और झाल, मंजीरे, घंटियां बजने लगी थीं, आरती शुरू हो गई थी, नदी के पार भी आरती हो रही थी। सूर्य अस्ताचल में जा चुके थे, हल्की रात घिर रही थी, एक ऊंची जगह पर खड़े होकर मैं निहार रहा था, चारों ओर। यही वह पावन स्थान है, जो सदियों से सिंहस्थ कुंभ के केन्द्र में रहा है। यही वह जगह है, जहां करोड़ों तपस्वियों, महा-मानवों, ऋषियों ने स्नान किया होगा। न जाने कितनी पूजा हुई होगी, न जाने यहां कितना दान हुआ होगा। न जाने कितने लोग मिले होंगे और कुछ बिछड़ भी गए होंगे।
आरती की घंटियों के अनहद नाद के बीच समय तेजी से सरक रहा है, किन्तु अब क्षिप्रा नहीं सरक रही। सुना है, नर्मदा का जल अब क्षिप्रा के जल को सरकाएगा, क्षिप्रा में नर्मदा का जल बहेगा। . . .अब मध्य प्रदेश सरकार की योजना साकार हो गई है, नर्मदा जल क्षिप्रा में बहने लगा है। सिंहस्थ कुंभ २०१६ की तैयारियां शुरू हो गई हैं। नदी जोड़ की यह योजना क्या धार्मिक आधार पर सही है? जिन नदियों को जिन नदियों के साथ मिलना था, उन्हें ईश्वर ने स्वयं मिला दिया, किन्तु अब हम मानव नदियों को मिला रहे हैं। सरकारों को चाहिए था कि वे धर्म से जुड़ी तमाम नदियों को बचातीं, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्हें यही ज्यादा सहज लगा कि नदियों को नदियों से मिला दो, जो काम ईश्वर ने नहीं किया, वह हम कर रहे हैं, हमारी सरकारें कर रही हैं। तो अब क्षिप्रा में स्नान कीजिए और ध्यान रखिए कि उसमें वास्तव में नर्मदा जल बह रहा है। क्या कहेंगे क्षिप्रा स्नान या नर्मदा स्नान? सरकारों ने नहीं सोचा, आप सोचिए. . .

Tuesday, 30 October, 2012

शब्दों ने फिर देखा सपना

(प्रांतीय प्रगतिशील लेखक संघ, जयपुर के एक अधिवेशन की रिपोर्ट) प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) पहले भी एक संभावना था और आज भी है। आज के दौर में तो संगठन इतने संकीर्ण हो गए हैं कि वहां उनके अपने विचारों के टहलने के लिए भी जगह कम पडऩे लगी है। क्रांति का सपना देखने वाले भी अब यह मानने लगे हैं कि कोई भी संगठन या आंदोलन तभी सफल हो सकता है, जब वह सत्ता के सापेक्ष होकर चले। चूंकि सत्ता को विचारों का मुंह बंद करने का शौक होता है और यह उसकी मजबूरी भी है कि वह ‘फंड’ और पदों के जरिये विचारों का ट्रैफिक कंट्रोल करे, इसलिए स्वतंत्र विचारों के पीछे-पीछे गिरफ्तारी के वारंट लहराते चलते रहे हैं। आप जैसे ही समझौता करते हैं, वारंट गायब हो जाते हैं। समझौता टूटा या समझौता न हुआ, तो वारंट फिर पीछा करने लगते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ प्रेमचंद के जमाने अर्थात आजादी के पहले से ही सत्ता का प्रतिपक्ष रहा है, इसलिए वह देश के सफलतम लेखक संगठनों में शामिल है। विरोध के स्वर को आवाज देना उसे आता है, गलत पर उंगली उठाना उसे आता है। यह मैंने फिर महसूस किया। सात साल बाद प्रलेस के किसी अधिवेशन में जाना हुआ, मैंने फिर महसूस किया कि उसके पास वह जगह और वह विस्तार है, जहां अनेक विचारधाराएं टहल सकती हैं। विशेष रूप से इलाहाबाद के अली जावेद और जयपुर के मोहन श्रोत्रिय को सुनने में वह सुख मिला, जो प्रलेस को सुनने पर मिलना चाहिए। अली जावेद खासतौर पर वह बौद्धिक प्रेरणा या अहसास दे गए, जिसके लिए मैं प्रलेस के अधिवेशन में गया था। वसुधैवकुटुम्बम और प्राचीन भारतीय संस्कृति को लाजवाब बताने वाले अली जावेद ने कहा कि आज कौसल्या मां भी अगर आ जाए, तो नहीं बता पाएंगी कि राम जी कहां जन्मे थे, लेकिन आडवाणी जी और उनके साथियों को यह पता है कि राम जी कहां जन्मे थे। अली जावेद ने इलाहाबाद के ही सांसद रहे मुरली मनोहर जोशी से पूछा था कि बाबर से पहले या बाबर के दौर में भारत में क्या कोई राम मंदिर था? उत्तर मिला कि तथ्य और तर्क की बात नहीं, प्रश्न आस्था का है। आडवाणी जी भी यही मानेंगे कि राम मंदिर का प्रश्न आस्था का प्रश्न है, ऐसे प्रश्न न उठाए जाएं, जिनसे आस्था को चोट पहुंचती है। अनेक लोगों को यह लगेगा कि अली जावेद वही बात कर रहे हैं, जिसकी उम्मीद उनसे मुस्लिम होने के नाते की जा सकती है, लेकिन ठहर जाइए, अली जावेद की पूरी बात सुन लीजिए, उन्होंने यह भी कहा :- बहुत हुई तुम्हारी तकरीर, मौलाना बदली नहीं मेरी तकदीर, मौलाना। वे गरीब मुस्लिमों की बात कर रहे थे। उन्होंने शायर जोश मलीहाबादी को याद किया, जोश इंसानों का मूल्य खुदा तुल्य बताने वाले शेर लिख रहे थे, आज वैसे शेर लिखना संभव नहीं है। जावेद अली पाकिस्तान में तालिबानी हमले की शिकार हुई मलाला के पक्ष में खड़े नजर आए, उन्होंने मंच से तालिबानी सोच वालों को ललकार दिया। यही ताकत है प्रलेस की। यही ताकत है, जिससे प्रलेस की प्रासंगिकता बनी थी और आज भी बनी हुई है। अधिवेशन के दूसरे सत्र में मोहन श्रोत्रिय ने भी झकझोरा और प्रलेस के विचार व प्रासंगिकता को जीवंत कर दिया। अन्ना के आंदोलन की चर्चा किसी और ने उस तरह से नहीं की थी - जैसे श्रोत्रिय जी ने की। उन्होंने अन्ना के आंदोलन पर किए जा रहे संदेह पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि ये केजरीवाल जैसे लोग यह मानकर चल रहे हैं कि सत्ता या व्यवस्था तो बस यों ही एक दो आंदोलनों-खुलासों से बदल जाएगी, उन्हें पता नहीं है कि पूंजी और सत्ता का गठजोड़ कितना ताकतवर हो चुका है। सत्ता या व्यवस्था को बदलने के लिए हमें ऐसे आंदोलनों के पार जाकर सोचना होगा। उन्होंने मजाक भी किया, आज किसी भी मुंगेरीलाल को असली मुंगेरीलाल से भी ज्यादा हसीन सपने देखने का हक है। उन्होंने बताया कि सत्ता और व्यवस्था को कमजोर समझकर अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ था, जिसकी परिणति हम आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में देख रहे हैं। पहले सत्र में तुलसीराम जी और सुबोध नारायण मालाकार जी ने भी अच्छा भाषण दिया। प्रगतिशील लेखक संघ में जेएनयू की अपनी आवाज रही है, हालांकि उस आवाज से संघ का कितना भला हुआ, इस पर विचार की जरूरत है। तुलसीराम जी और मालाकार जी ने जो खतरा बताया, उसे अधिवेशन के दूसरे सत्र के संयोजक माधव हाड़ा जी ने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में बहुत अच्छी तरह से व्याख्यायित किया। हाड़ा जी ने प्रलेस की एक बड़ी कमजोरी को भी रेखांकित किया, उन्होंने कहा कि प्रलेस ने संस्कृति की उपेक्षा की है, जिसका उससे असहमत लोगों ने पूरा लाभ उठाया है। संस्कृति के मूल्य को समझने की जरूरत है। यह सही बात है, प्रलेस ने लंबे समय से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोध किया है और जिसकी वजह से प्राचीन-भारतीय चेतना व संस्कृति की घोर उपेक्षा की है। तुलसीराम जी के मुंह से मेरे लिए यह नई जानकारी पाकर अच्छा लगा कि कार्ल माक्र्स अपने आखिरी दिनों में संस्कृत सीख रहे थे। इसके अलावा उन्होंने उत्तरी दुनिया और दक्षिणी दुनिया की बात कही, डिजिटल डिवाइड की बात कही। हालांकि डिजिटल डिवाइड की बात का दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने विरोध किया और कहा कि अगर हम डिजिटल या आईटी तरक्की का लाभ नहीं उठाएंगे, तो हमारे विरोधी उठाएंगे, जो हमारे लिए ठीक नहीं होगा। तकनीक का लाभ प्रगतिशील लेखक संघ को भी लेना चाहिए। मालाकार जी ने पूंजी और अमरीका की भूमिका पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि पूंजी और अमरीका इस कोशिश में है कि सबकी अपनी-अपनी आइडेंटिटी मजबूत हो, ताकि समाज की एकता टूट जाए, समाज धर्म, जाति, समुदायों में बंटा रहा, समाजवाद-साम्यवाद की संभावना समाप्त हो जाए। इसे हाड़ा जी ने अपने तरीके से बेहतर समझाते हुए कहा कि पहचान की राजनीति में दोनों तरह की बातें हैं, यह जरूरी भी है और नुकसान वाली बात भी, तो पहचान की राजनीति कहां तक होगी, यह हमें तय करना होगा। हाड़ा जी ने एक और अच्छी बात कही कि हम सहमत होने को प्रयासरत हैं, यह खतरनाक बात है, असहमति होती है, तभी आविष्कार होते हैं, विकास होता है। समाज में असहमति होनी चाहिए। राजाराम भादू जी ने राजस्थान में चल रहे जनआंदोलनों की समीक्षा करना चाह रहे थे, जो उन्होंने संक्षेप में किया। उनकी आवाज पूरी तरह से साफ नहीं हुई। प्रोफेसर व पूर्व कुलपति श्यामलाल जी ने परिवर्तनशीलता और प्रगतिशीलता का पक्ष लिया। दूसरे सत्र में लेखक राघव प्रकाश के हस्तक्षेप से एक और अच्छी बहस इस पर हुई कि क्या शब्द चूकने लगे हैं, लेखक चूकने लगे हैं और अब केवल लेखन से काम नहीं चलेगा, कार्रवाई के लिए सडक़ों पर उतरना पड़ेगा। लेखक को एक्टिविस्ट होना पड़ेगा। खैर इस बात का विरोध भी खूब हुआ। कुल मिलाकर सहमति इस बात पर बनती दिखी कि जिन लेखकों को एक्टिविस्ट बनना हो, बनें, लेकिन लेखन अपने आप में सम्पूर्ण कर्म है। ------------------ अधिवेशन के आधार पर एक अध्ययन - जिस तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास सेवानिवृत्त लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है, ठीक उसी तरह से प्रगतिशील लेखक संघ में भी बूढ़ों की भीड़ बढ़ रही है। युवा कार्यकर्ताओं का ऐसा अभाव है कि माइक भी स्वयं प्रांतीय अध्यक्ष महोदय ही सेट कर रहे थे। जो युवा हैं, वे बड़े काम और बड़े नाम के इंतजार में हैं, उन्हें माइक सेटिंग जैसे छोटे-मोटे कामों में कोई रुचि नहीं है। - संगठन में अहंकार बढ़ रहा है, जो बहुत नुकसानदायक बात है। प्रगतिशील लेखक संघ में यह अहंकार मैंने दिल्ली इत्यादि जगहों पर उतना नहीं देखा था। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि विचारधारा का नुकसान होगा और संगठन का विस्तार रुकेगा। इस बात पर अधिवेशन में मोहन श्रोत्रिय जी ने भी प्रकाश डाला और चेताया कि जैसे आदमी की आयु होती है, ठीक उसी तरह से कहीं ऐसा न हो कि प्रलेस की भी आयु हो, एक एक्सपायरी डेट हो। दरअसल, जहां से अधिवेशन शुरू होना चाहिए था, वहां आकर वह खत्म हो गया। - संगठन का मीडिया मैनेजमेंट लगातार कमजोर हो रहा है। मीडिया को इतना ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है कि मीडिया से दूरी बढ़ती जा रही है। व्यक्तिगत रूप से कुछ लेखक मीडिया के करीब होंगे, लेकिन सांगठनिक रूप से मीडिया के आलोचक ही हैं। - प्रलेस में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है, जो जरूरत पडऩे पर अपने लाभ के लिए कांग्रेस के साथ भी जा सकते हैं और भाजपा के साथ भी। १९९० के दशक में जब भाजपा सरकार भोपाल में भारत भवन को निशाना बना रही थी, तो प्रलेस के कई लोग भाजपा के साथ हो लिए थे। कलावाद को समझने में भूल की गई थी। - भाजपा और कांग्रेस में बंटे प्रदेश में प्रलेस का काम आसान नहीं है, लेकिन प्रलेस के पास ऐसे लेखक कम दिखे, जो आदर्श पेश करने की क्षमता रखते हों। - कुछ लेखकों ने आईटी, फेसबुक, डिजिटल दुनिया का लाभ उठाने की बड़ी-बड़ी बातें कहीं, कहा गया कि मीडिया भले जगह नहीं दे, हम प्रलेस की बातों को फेसबुक के जरिये दूर-दूर तक पहुंचा देंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। किसने क्या कहा, प्रलेस में क्या बातें हुईं, इस पर चर्चा की बात दूर, फेसबुक पर मित्रों के साथ वाली फोटो अपलोड का सिलसिला चला। ऐसा लगा कि प्रलेस का अधिवेशन नहीं, बल्कि फोटो शूट था। - वहां एक अधिकारी महोदय दिखे, जो मुझसे कन्नी काटकर दूर जा बैठे, जिन्होंने दस मिनट पहले ही फोन पर मुझसे कहा था कि वे अधिवेशन में नहीं जा रहे हैं। - समय और व्यक्ति का आदर कम हो रहा है। दस बजे बुलाया गया था, लेकिन कार्यक्रम साढ़े ११ बजे के करीब शुरू हो सका। पता नहीं, खुश हों या दुखी कि लेखक भी नेता की तरह होने लगे हैं। अगर दो सत्रों को लगातार सुनने के बाद भी आप अगर पौने तीन बजे वहां से लौट रहे हों, तो वहां कोई रोकने वाला नहीं था कि लंच जरूर लीजिएगा। अपनी संस्कृति को गरियाते-गरियाते मूलभूत संस्कार भी कहीं दूर जा चुके हैं। - कुल मिलाकर प्रलेस का यह अधिवेशन बहुत अच्छा था। इस दौर में यह बहुत जरूरी है कि बात हो, खुलकर बात हो, आगे बढक़र बात हो। धन्यवाद।

Friday, 28 September, 2012

नीतीश जी को गुस्सा क्यों आया?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुशनसीब हैं कि उन्हें हर महीने तनख्वाह मिलती है, लेकिन बिहार में ज्यादातर सरकारी कर्मचारी बदनसीब हैं कि उन्हें समय पर तनख्वाह नहीं मिलती। न जाने किस कमाई पर ज्यादा ध्यान देने वाले लालू प्रसाद यादव ने सरकारी तनख्वाह के भुगतान चक्र को पटरी से ऐसे उतारा कि आज भी बिहार में तनख्वाह समय पर नहीं बंटती है। नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में भी वे तनख्वाह की गाड़ी को पटरी पर नहीं चढ़ा पाए हैं, तनख्वाह तीन-तीन, चार-चार महीने की देरी से मिलती है, एक ही बार में दो से चार तनख्वाहों का एलॉटमेंट होता है, मतलब मासिक वेतन भुगतान के कायदे को ही खारिज कर दिया गया है। नीतीश बाबू अपने राज्य में अधिसंख्य कर्मचारियों से उधारी पर ही काम लेते हैं और चाहते हैं कि उनके राज्य में भ्रष्टाचार न हो। जो सरकार समय से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकती, वह भ्रष्टाचार को कैसे रोक सकती है और ऐसी सरकार का गुणगान कैसे किया जाए? बिहार में भी पेट रोज दो-तीन बार खाना मांगते हैं, बीमारी, शादी, जिंदगी के बाकी तामझाम भी चलते ही रहते हैं, खर्चे नहीं रुकते, लेकिन तनख्वाह रुक जाती है। किसी दुकान से कोई सरकारी कर्मचारी उधारी लेता है, तो यह नहीं बता सकता कि कब तक उधारी चुका देगा। दुकान वाले का भी सब्र टूटता है, वह सरकारी कर्मचारी के दफ्तर पहुंचकर पता लगाता है कि क्या तनख्वाह नहीं आई है, तनख्वाह कब आएगी। नीतीश कुमार बताएं कि समय पर तनख्वाह नहीं मिलेगी, तो घर कैसे चलाएंगे लोग? क्या चोरी और भ्रष्टाचार के लिए मजबूर नहीं होंगे? जाहिर है, अब लोग निंदा करने लगे हैं, तो नीतीश कुमार को गुस्सा आने लगा है। लालू को भी एक समय गुस्सा आता था, लालू भी लोगों की तकलीफों के प्रति लापरवाह हो गए थे, जिसका फायदा नीतीश कुमार को मिला, क्योंकि वे विनम्र नेता माने जाते हैं, लेकिन अब अपनी विनम्रता में स्वयं नीतीश कुमार ही पलीता लगा रहे हैं। जो भी उनके खिलाफ बात करता है, उसे वह दुनिया का सबसे बुरा आदमी मान बैठते हैं। पत्रकारों पर भी खूब मुंह फुलाते हैं? उन्होंने गुस्सा दिखा-दिखाकर बिहार में ज्यादातर अखबारों को घुटनों के बल कर दिया है। क्या चापलूसों से घिर गए हैं नीतीश? उनके नामी-गिरामी सलाहकारों को भी क्या कुछ सूझ नहीं रहा है? क्या सलाहकारों ने अपना उल्लू सीधा करने के बाद अच्छी सलाह देना बंद कर दिया है? क्या बिहार में आधारभूत व्यवस्था सुधार का काम पूरा हो गया है? क्या बिहार सरकार केन्द्र से प्राप्त राशि का पूरा और ईमानदार सदुपयोग करने लगी है? क्या बिहार में मनरेगा के तहत गांव-गांव में कायाकाल्प कर दिया गया है? क्या बिहार से बाहर जाने वालों का तांता टूट चुका है? क्या सडक़ें दुरुस्त हो चुकी हैं? क्या गांव-गांव में बिजली पहुंच गई है? क्या पुलिस के कामकाज में थोड़ा भी सुधार आया है? क्या पुलिस ने लोगों से मुंहदिखाई वसूलना छोड़ दिया है? तो फिर नीतीश कुमार को इन मूलभूत कार्यों को किए बिना गुस्सा क्यों आ रहा है? परिवार में भी उसी मालिक का गुस्सा परिजन सहते हैं, जो मालिक परिजनों की जरूरतों को पूरा करता है। नीतीश कुमार भूल रहे हैं, जनता ने उन्हें गुस्सा दिखाने के लिए नहीं चुना है। जनता किसी नेता का गुस्सा बर्दाश्त नहीं कर सकती। नेता के प्रेम को लोग भले भूल जाते हों, लेकिन उसके गुस्से को लोग याद रखते हैं। नीतीश लोगों का भरोसा तोड़ रहे हैं? नीतीश जितना ज्यादा गुस्सा होंगे, लालू की वापसी के लिए उतनी ही अच्छी जमीन तैयार होगी। उनके दूसरे कार्यकाल का आधा से भी ज्यादा हिस्सा अभी बाकी है, लेकिन वे अभी से अपनी विफलताओं को ढंकने की कोशिश में लग गए हैं। इन दिनों उन्होंने विशेष राज्य दर्जे की मांग का डंका पीट रखा है, इस दर्जे को वे बिहार का अधिकार मान रहे हैं। हां, बेशक विशेष राज्य का दर्जा मिलने से बिहार को फायदा होगा। विकास के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होगा, लेकिन यह दर्जा भी कोई जादू की छड़ी नहीं है। अभी ११ राज्यों के पास विशेष राज्य का दर्जा है, लेकिन इनमें से कोई राज्य ऐसा नहीं है, जो देश की शान बना हो। ये लगभग सभी ११ राज्य देश पर बोझ बने हुए हैं। यह सही है कि बिहार की तुलना में दस गुना ज्यादा राशि जम्मू-कश्मीर को मिलती रही है, लेकिन तब भी देश के लिए बिहार का योगदान जम्मू-कश्मीर से कहीं ज्यादा है। बिहार पूरे देश को श्रमिक उपलब्ध करा रहा है, देश के खाद्यान्न भंडार में भी अनाज पहुंचा रहा है। बिहार की यह स्थिति बिना विशेष राज्य का दर्जा मिले हुए ही है। बिहार की विकास दर ज्यादा है, यह भी विशेष राज्य का दर्जा मिले बिना ही हुआ है। आगे की राह विशेष राज्य का दर्जा मिल जाने से आसान हो जाएगी, ऐसा कदापि नहीं है। अपने देश में विकास और लूट में अंतर काफी कम हो गया है। बिहार में भी विकास के नाम पर लूट थमने का नाम नहीं ले रही है। गांवों में भले ही सडक़ न हो, लेकिन सरपंचों के पास बोलेरो, पजेरो, बस, ट्रक, अनेक मकान और प्लॉट हैं। नीतीश कुमार ईमानदार हैं, हो सकता है सुशील कुमार मोदी भी ईमानदार हों, लेकिन यही बात वे स्वयं अपने मंत्रियों के बारे में नहीं कह सकते। अपने शासन के दौरान नीतीश कुमार मंत्रियों और विधायकों की तरक्की के बारे में जानते ही होंगे? क्या मंत्रियों-विधायकों-सरपंचों की विकास दर बिहार की विकास दर से कई गुना ज्यादा नहीं है? फिर कहां है सुशासन? वह दिखता क्यों नहीं? आज भी ऐसी सडक़ें हैं कि लोग सडक़ छोडक़र बगल में खेतों से होकर चलना पसंद करते हैं। ऐसे में, उन्हें जरूर सोचना चाहिए कि उन्हें गुस्सा क्यों आया? किस पर आया? क्या यह गुस्सा अपने ही लोगों पर नहीं है? उन्हीं लोगों पर आया गुस्सा है, जो दोबारा नीतीश कुमार को सत्ता में लेकर आए हैं। कभी खगडिय़ा में लोग हमला बोल रहे हैं, तो कभी शिक्षक चप्पलें दिखा रहे हैं और नीतीश कुमार इतने आग बबूला हैं कि तुम-तड़ाक पर उतर आए हैं। माफ कीजिएगा नीतीश जी, लोग दूसरे राज्यों में हुई तरक्की को भी देख रहे हैं, उनकी आंख पर आप पट्टी नहीं बांध सकते। लोग विकास के उन आंकड़ों को भी देख रहे हैं, जो बिहार सरकार छाप या छपवा रही है। आपने लोगों को बताया है कि विकास हुआ है, तो लोग विकास में हिस्सेदारी मांग रहे हैं। कुछ इलाके विकसित हो रहे हैं, तो कुछ इलाके लालू युग में ही छोड़ दिए गए हैं। मत भूलिए कि लोगों को विकास के सपने आपने ही दिखाए थे, आप करीब सात साल से सत्ता में हैं, लेकिन ज्यादातर सपने पूरे नहीं हुए हैं। सपनों के पूरे होने का हल्ला ज्यादा है। आपके द्वारा ही मचाया गया सुशासन और विकास का हल्ला जरूरत से ज्यादा है, हल्ला इतना ज्यादा है कि यह आपकी भी नींद उड़ा देगा। बिहारी उग्र हो रहे हैं, क्योंकि सदियों से चैन से सोए नहीं हैं। हजारों गांव हैं, जहां बिजली के इंतजार में लोगों को ठीक से नींद नहीं आती, नींद आती है, तो चोर-डकैत आते हैं, और सुबह-दोपहर जब पुलिस आती है, तो क्या करती है, यह डीजीपी अभयानंद जी बेहतर जानते होंगे। अभयानंद जी की बात करें, तो उन्होंने सैकड़ों गरीबों को सुपर थर्टी कोचिंग के जरिये लखटकिया इंजीनियर बना दिया, लेकिन वे पुलिस महकमे में शायद सुपर थ्री भी नहीं पैदा कर पाए हैं। आज बिहार के मुख्यमंत्री को भी केन्द्र सरकार से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं, और लोगों को भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं। बिहार की यही त्रासदी है कि आज ख्वाब और उम्मीदें ही समस्याएं हैं। और अंत में अगर भोजपुरी में बात करें तो नीतीश कुमार के लिए दो लाइनें यों होंगी काहे खिसियाइल बाड़ जान लेबे का हो आरे नीतीश बाबू परान लेब का हो ?

Monday, 17 September, 2012

के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि देने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूं। वे बाद के दिनों में अपने विवादित या भ्रम पैदा करने वाले बयानों की वजह से और आखिरी दिनों में स्मृतिलोप की वजह से मीडिया के लिए हल्के महत्व के हो गए थे, लेकिन सुदर्शन जब अपने अच्छे दिनों में थे, तो दक्षिणपंथ के एक सबसे जीवंत प्रतिमान थे, उन्हें राष्ट्र की ताकत का पूरा अहसास था। वे राष्ट्र की नसों से परिचित थे, उन्होंने कई मौकों पर वामपंथियों और कांग्रेसियों को भी अचंभित किया था।
मैंने उन्हें पहली बार आमने-सामने बैठकर भोपाल में सुना था। स्वदेशी उनका एक प्रिय मुद्दा था, जिस पर वे बोल रहे थे। यह घटना संभवत: १४ साल पुरानी है। उनकी पूरी बात मुझे आज याद नहीं, लेकिन उन्होंने एक कथा सुनाई थी, जो मुझे आज भी याद है। वह मैं आप सबों को सुनाता हूं।
एक भारतीय सेठ ने जर्मनी से मैदा बनाने वाली मशीन मंगवाकर व्यवसाय शुरू किया। विदेशी मशीन का अपना जलवा था, खूबसूरत और भव्य दिखने वाली मशीन रंग-ढंग में अद्भुत थी, लेकिन जब मशीन ने काम करना शुरू किया, तो अचानक बंद हो गई। मैकेनिक ने वाशर बदला, मशीन फिर चली और फिर खराब हो गई, वाशर फिर बदला गया, फिर घिस गया। मशीन विफल सिद्ध हुई। मशीन बनाने वाली कंपनी से संपर्क साधा गया, तो पता चला जर्मनी से इंजीनियर के आने में महीने-दो महीने लग जाएंगे। सेठ बहुत परेशान हुआ, तभी उसे किसी ने बताया कि रामगढिय़ा समुदाय पास ही शहर में टिका हुआ है, क्यों नहीं आप किसी रामगढिय़ा को अपनी मशीन दिखवाते हैं। क्या पता वह ठीक कर दे?
यह सुनकर सेठ बिगड़ गया, विदेशी मशीन के बारे में देहाती-खानाबदोश रामगढिय़ा क्या जानें? मशीन सुधारने के लिए हाथ भी लगाया, तो और बिगाड़ कर रख देंगे।
उस व्यक्ति ने सेठ को समझाया, रामगढिय़ा लोगों को कम मत समझिए, यंत्र व अभियांत्रिकी के मामले में बड़े सिद्ध होते हैं। वैसे भी आपकी मशीन तो महीने भर बाद सुधरेगी, जब जर्मनी से इंजीनियर आएगा, इस बीच बैठने से अच्छा है कि किसी रामगढिय़ा को बुलाकर मशीन दिखलाई जाए और पूछा जाए।
सेठ को यह बात जंच गई। उनसे एक रामगढिय़ा को बुलवाया। बिल्कुल एक आम भारतीय की तरह ठेठ देहाती रामगढिय़ा सेठ के कारखाने पहुंचा। थोड़ी बहु़त बातचीत के बाद सेठ ने उसे मशीन का दर्शन कराया। उसने काफी देर तक मशीन को गौर से देखा, उसके बारे में मशीन चलाने वालों से चर्चा की। उसने कुछ कवरआदि को खोलकर देखा।
सेठ ने पूछा, क्या कुछ समझ में आ रहा है?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, पता लग गया है। एक जगह वाशर बार-बार टूट जा रहा है, क्योंकि थोड़ा चलते ही मशीन गर्म हो जा रही है।
सेठ ने पूछा, यह तो हमें भी पता है, हमें तो यह बताओ कि क्या तुम ठीक कर सकोगे?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, ठीक कर दूंगा।
सेठ चकित हुआ, पूछा, क्या करोगे?
जवाब मिला, कुछ देर का काम है? एक कांटी और हथौड़ी मंगवाइए।
सेठ ने डरते हुए ही अपने कर्मचारियों को कांटी और हथौड़ी देने का आदेश दिया।
रामगढिय़ा ने मशीन में एक निश्चित स्थान पर कांटी को अड़ाया और हथौड़ी मारकर छेद कर दिया और फिर वाशर बदल दिया। उसने कहा, सेठ जी अब मशीन चलवाइए।
सेठ ने पूछा, बन गई क्या? कोई और परेशानी तो नहीं हो जाएगी?
रामगढिय़ा ने आश्वस्त किया, घबराइए नहीं, अब कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।
मशीन चलाई गई और खूब देर तक चली, बंद नहीं हुई।
सभी चकित और खुश थे। सेठ ने पूछा, तुमने क्या किया?ï क्या खराबी थी?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, वाशर को लगातार तेल नहीं मिल रहा था, इसलिए वह कट जा रहा था। उस तक तेल आने का रास्ता तो है, लेकिन घूमकर है, जब तक तेल की बूंद वाशर तक पहुंचती है, तब तक वाशर गर्म होकर कट जाता है। अब मैंने ऐसी जगह पर छेद किया है कि वाशर वाली जगह को लगातार तेल मिलता रहेगा, जिससे वह नहीं घिसेगा, मशीन चलती रहेगी।
सेठ बड़ा खुश हुआ। मैदा बनाने का काम चल निकला। सेठ ने रामगढिय़ा को खिलाया-पिलाया। बड़े प्रेम से चर्चा की। कई सवाल पूछने के सिलसिले में एक सवाल यह भी पूछ लिया, क्या तुम ऐसी ही मशीन बना सकते हो?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, बना सकता हूं, मेरी बनाई मशीन इतनी सुंदर तो नहीं दिखेगी, लेकिन काम पूरा करेगी।
सेठ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उसने रामगढिय़ा को नई मशीन बनाने के लिए कह दिया।
लगभग महीने भर बाद जर्मनी से इंजीनियर आया, मशीन चलती हुई मिली। उसने पूछताछ की कि क्या खराबी थी, किसने ठीक की।
उसे बताया गया कि एक लोकल इंजीनियर ने मशीन ठीक कर दी है। मशीन चलाने वाले ने ही बताया कि रामगढिय़ा ने क्या किया कि मशीन चल पड़ी। जर्मन इंजीनियर के आश्चर्य का ठिकाना न था, उसने अपनी रिपोर्ट लिखी। उसके बाद बताते हैं कि उस कंपनी ने अपनी मशीन में सुधार किया। जो भी मशीन दक्षिण एशिया के गर्म देशों बेची गई, उसमें एक रामगढिय़ा इंजीनियर का आविष्कार भी शामिल था।
. . .
तो सुदर्शन जी इस कथा की सहायता से यह बता रहे थे कि भारतीयों में कोई कमी नहीं है, जो आदमी गरीब दिखता है, उपेक्षित दिखता है, उसमें भी कोई न कोई टैलेंट है। नई व्यवस्था कुशल भारतीय समुदायों के टैलेंट को भुलाकर काम कर रही है। हम स्वदेशी शक्ति को भुलाकर पश्चिम की ओर भाग रहे हैं। न जाने कितनी ऐसी ही सक्षम जातियों-उपजातियों को इस देश ने भुलाया और मिटाया है।
सुदर्शन जी हमेशा याद रहेंगे और उनकी यह कथा मेरे हृदय में हमेशा बसी रहेगी।
उनको मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान, सत्ता सुख और पूंजीवादी हवा के कारण निरंतर कमजोर होता और आदर्श गंवाता दक्षिणपंथ अपने एक सशक्त स्तंभ से वंचित हो गया है।

Sunday, 9 September, 2012

राजनीति बनाम लोकनीति 3


भाग - तीन
आज हमारा देश लोकनेता और लोकनीति की मांग कर रहा है, लेकिन उसे राजनेता और राजनीति की प्राप्ति हो रही है।
पिछले दिनों अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। सत्ता में बैठे घाघ नेताओं ने अन्ना पर बार-बार आरोप लगाया कि वे राजनीति कर रहे हैं, अन्ना इसका जवाब नहीं दे पाए। उन्हें यह कहना चाहिए था कि मैं लोकनीति कर रहा हूं। लोगों के पक्ष में बोल रहा हूं, लोगों को न्याय दिलाने के प्रयास में लगा हूं। मतलब यह कि राजनीति को केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि हमारे समाज के बड़े समाजसेवी भी गलत समझ रहे हैं। क्या आम आदमी राजनीति नहीं कर सकता? क्या वह कोई मांग करे, तो यह माना जाए कि वह राजनीति कर रहा है? आज के दौर के नेताओं की समझ पर तरस खाने का मन करता है। मैं तो कहूंगा कि यह राजनीति भी नहीं है, यह ‘लूटनीति’ है। इन लोगों ने किया क्या है? ‘डेमोक्रसी’ को बहुत हद तक ‘क्लेप्टोक्रसी’ में बदल दिया गया है। राजनेताओं का राज लुटेरों के राज में तब्दील हो गया है। कितने घोटाले हुए, उन्हें करने से कौन-कौन बच नहीं पाया, इसके विस्तार में जाना तो भयावह है। मुल्क को हमाम समझ लिया गया है, जहां वस्त्र है भी, तो केवल भ्रम फैलाने के लिए, दरअसल लगभग सभी निर्वस्त्र हैं। जो निर्वस्त्र नहीं है, वह निर्वस्त्रों की भीड़ में गुम हो जा रहा है। इस जगह पर हमें आज के राजनेताओं और राजनीति ने पहुंचा दिया है। विदेशी सरकारें हों या विदेशी कंपनियां यह मानकर चलती हैं कि ये लोग तो ऐसे ही हैं, इनके साथ कुछ भी किया जा सकता है। यह कौन-सी राजनीति है, जिसने भारतीयता और भारतीयों के सम्मान को क्षति पहुंचाई है? सच्ची राजनीति वह है, जो राजनेता के साथ-साथ देशवासियों और देश का सम्मान बढ़ाती है, लेकिन आज हमारे राजनेता क्या कर रहे हैं?
आम तौर पर मैं इस विषय पर बोलने से बचता हूं, यह पूजनीय रामबहादुर राय जी का प्रस्ताव था, जिसे मैं टाल नहीं सकता था। आज जरूरत लोकनीति की है, उसे कैसे मजबूत किया जाए, इस पर काम करने की जरूरत है। इस देश की सत्ता लोगों के हाथों में थी, लोगों ने सत्ता को लूटा नहीं था, हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने सत्ता लोगों को थमाई थी, लेकिन आज लोगों की सत्ता पर राजनेताओं और राजनीति का कब्जा हो गया है। नागरिक के मौलिक अधिकार, सम्मान, रोजी, रोटी, जान-माल यदि सुरक्षित हैं, तो फिर लोकनीति में आने की कोई जरूरत नहीं। यह देश सीधे-सादे लोगों का देश है, आम आदमी को अमन चैन के साथ दो वक्त की रोटी चाहिए। लेकिन राजनीति ने अगर जीवन से जुड़ी असुरक्षाओं को बढ़ा दिया है, अगर जनता के हाथ से सत्ता छिन गई है, तो फिर सत्ता पाने के लिए जनता को आगे आना ही चाहिए, इसे कोई अगर राजनीति समझता है, तो समझे। मजबूत हो चुकी सत्ता से अधिकार या सम्मान पाने का संघर्ष राजनीति ही है और राजनीति केवल राजनेताओं की बपौती नहीं है। अगर राजनेताओं ने अपने कत्र्तव्यों को निभाया होता, तो वे अपनी राजनीति में बने रह सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने कत्र्तव्यों को ढंग से नहीं निभाया है, तो उनकी राजनीति को अवश्य चुनौती मिलेगी और मिलनी ही चाहिए, ताकि अपने देश में लोकनीति बहाल हो। जय भारत . . .
समापन

राजनीति बनाम लोकनीति 2


दूसरा भाग
ऐसा क्यों हो रहा है? राजनीति का कौन-सा ककहरा हमारे राजनेताओं ने पढ़ा है? दरअसल, हमारे यहां पॉलिटिक्स नहीं, राजनीति होती है, अर्थात राज करने की नीति चलती है। जनता पर कैसे राज करना है, राजनीति का यही लक्ष्य है।
माफ कीजिएगा, मुझे इस ‘राजनीति’ शब्द पर ही आपत्ति है, इस शब्द से राजतंत्र की बू आती है। भारत को राजनीति का देश बनाने की बजाय लोकनीति का देश बनाना चाहिए था। पॉलिटिक्स शब्द लोकनीति के ज्यादा निकट है, जहां पॉलिटिक्स होती है, वहां यह बात दिखती भी है, लेकिन हमारे यहां राजनीति होती है, जहां नेता और जनता के बीच लंबी दूरी दिखती है। नेताओं और जनता के बीच शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। शिकायतों का अंबार लगा ही इसलिए है, क्योंकि भारत में पॉलिटिक्स को समझा नहीं गया है, यहां पॉलिटिक्स नहीं, सतत राजनीति हुई है।
अगर थोड़ा विस्तार में जाएं, तो दरअसल यह राजनीति हमें अंग्रेज सिखा गए थे, हमने ‘लोकतंत्र’ को तो अपनाया, लेकिन हमने ‘राजनीति’ को कायम रखा, जबकि ‘लोकतंत्र’ में ‘लोकनीति’ चलनी चाहिए थी। राज या सत्ता को मजबूत करने के चक्कर में नीतियों का बंटाधार कर दिया गया। क्या हमारे राष्ट्रनिर्माताओं से यह भूल हुई थी? क्या राष्ट्रपति महात्मा गांधी से गलती हुई थी? गांधी जी को पढि़ए, गांधी जी कहते हैं, ‘स्वराज्य का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र रहने का निरन्तर प्रयास, फिर वह विदेशी सरकार हो या राष्ट्रीय सरकार। यदि देश के लोग जीवन की हर बात की व्यवस्था और नियमन के लिए स्वराज्य-सरकार की ओर ताकने लगें, तब तो उस सरकार का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।’
मतलब गांधी जी बिल्कुल सही सोच रहे थे। गलती उनसे नहीं हुई, गलती तो उन लोगों से हुई, जिन्होंने आजाद भारत की सत्ता का संचालन किया। सत्ता को मजबूत करने की नीति के बीज बोए गए। गांधी जी कहते थे, ‘सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए बीस व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जाएगा, उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा।’ लेकिन आज राजनेता और राजनीति क्या कर रहे हैं, राजधानी में बिजली नहीं जाती, लेकिन गांवों में जब चाहे चली जाती है, पचास प्रतिशत से ज्यादा ऐसे गांव हैं, जहां बिजली आज भी वैसे नहीं पहुंची है, जैसे उसे पहुंचना चाहिए था। तो बिजली कहां पहुंची है? बिजली राजनेताओं की राजधानियों में पहुंची है। बिजली ठीक उसी तरह से राजधानियों में कैद हो चुकी है, जैसे सत्ता कैद हो चुकी है। सत्ता ने गांवों की ओर निकलना छोड़ दिया है। एकतरफा ट्रैफिक आजादी के बाद से ही चल रहा है, लोग गांवों से निकलकर शहर तो जाते हैं, लेकिन शहर से शायद ही कोई गांव लौट पाता है। राजधानियों में उजाला है और लोकधानियों यानी गांवों में अंधेरा है। गांधी जी जो करते थे, वह राजनीति नहीं, लोकनीति थी। उन्होंने कपड़ा त्याग दिया कि तभी पहनेंगे, जब सारे देशवासियों तक कपड़ा पहुंच जाएगा। रिचर्ड एटनब्रो ने १९८२ में फिल्म बनाई थी - ‘गांधी’। उसके उस दृश्य को मैं भूल नहीं पाता, जब गांधी जी किसी नदी के पुल के पास ठहरी ट्रेन से उतर कर नदी के जल से हाथ मुंह धो रहे हैं, पूरे भव्य गुजराती पहनावे में - लंबी पगड़ी से लेकर लंबी धोती तक और नदी के ही उस किनारे पर ही एक महिला कम वस्त्रों में अपनी लाज बचाने में जुटी है, गांधी जी से रहा नहीं जाता, वे अपने वस्त्र को नदी में बह जाने देते हैं, ताकि नदी की लहरें उस वस्त्र को जरूरतमंद गरीब महिला तक पहुंचा दें। ऐसा ही होता है, भावविभोर गांधी भीतर तक हिल जाते हैं कि वे इतने सारे वस्त्र ढो रहे हैं, इनकी जरूरत क्या है?
राजनेता और राजनीति गांधी जी की इस लोकनीति को आज भी नहीं समझ पाए हैं। गांधी जी अगर आज जीवित होते, तो आज भी वे पूरे वस्त्र नहीं पहन पाते, क्योंकि आज की राजनीति उन्हें पूरे वस्त्र पहनने नहीं देती। बिजली, पानी, सडक़ नहीं दे पाए, लेकिन लोकलुभावन योजनाओं का दौर सा चल रहा है। कहीं साइकिल बंटती है, कहीं अनाज, सिलाई मशीन, गैस स्टोव, रेडियो, कहीं आवास, कहीं नकद खैरात, कहीं अधूरी नौकरी, कहीं गाय-भेड़ का वितरण चल रहा है। तो कहीं शराब बंट रही है कि आदमी नशे में रहे और उसी को वोट दे, जो पिला रहा है। क्या यही राजनीति है? राज या सत्ता में बने रहने की नीति? माफ कीजिए, अगर यह राजनीति है, तो यह वाकई सफल है। आज के संदर्भ में राजनेता और राजनीति इस देश में सबसे कामयाब शब्द हैं। राजनेता वोटों के उद्योगपति हैं और राजनीति उद्योग। राजनीति की शेयरहोल्डिंग कंपनियां चल रही हैं, राजनीति के कारपोरेट घराने चल रहे हैं, राजनीति के बड़े-बड़े ऐसे सुगठित निगम चल रहे हैं, जिनका एक ही काम है, सत्ता में बने रहने की कोशिश व साजिश रचना। ऐसा नहीं है कि देश में केवल गरीब ही राजनीति का शिकार हो रहा है, अमीर भी उतने ही शिकार हैं। गरीबों को भी लूटा जा रहा है और अमीरों को भी। गरीब ज्यादा लाचार हैं, अमीर थोड़ा कम लाचार हैं। गरीब किसी को लूट नहीं सकता, लेकिन अमीर लोग राजनीति द्वारा होने वाली लूट की भरपाई करने में सक्षम हैं। नेताओं की बढ़ती आय पर जरा गौर फरमाइए, दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की जारी है। लोकनीति चलती, तो लोगों की आय तेजी से बढ़ती, राजनीति चल रही है, तो राजनेताओं की आय तेजी से बढ़ रही है।
क्रमश:

राजनीति बनाम लोकनीति


इलाहाबाद में त्रिवेणी सहाय स्मृति संस्थान द्वारा २ सितम्बर २०१२ को आयोजित सेमिनार में दिया गया मेरा उद्बोधन- विषय था : आज के संदर्भ में राजनीति और राजनेता

राजनीति बनाम लोकनीति

ज्ञानेश उपाध्याय
राजनीति शास्त्र की कोई पुरानी पोथी खोल लीजिए, तो आज की तरह के राजनेता उसमें कदापि नहीं मिलेंगे। आज के दौर में विशेष रूप से भारतीय राजनेताओं और राजनीति की परिभाषा बहुत बदल चुकी है। राजनेता किसे कहा जाए? क्या उसे जो पैसे लेकर तबादले करवाता है, नौकरी दिलवाता है, हर काम के लिए कमीशन लेता है और वोट प्राप्त करने के लिए हाथ जोडक़र खड़ा हो जाता है या उसे जो राजनेता होने का मात्र अभिनय करता है और जिसका धंधा दरअसल कुछ और है?
अंग्रेजी में राजनीति को पोलिटिक्स कहते हैं और यह शब्द ग्रीक भाषा के ‘पॉलिटिकस’ से आया है। पॉलिटिकस का मतलब है - लोगों का, लोगों के लिए, लोगों से सम्बंधित। पश्चिम में राजनीति हमारे यहां से कुछ ज्यादा ईमानदार नजर आती है, इसके अनेक उदाहरण हैं, अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन वाटरगेट कांड में फंसे थे। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए वाशिंगटन स्थित वाटरगेट काम्प्लेक्स में स्थित डेमोके्रटिक नेशनल कमेटी के मुख्यालय में डाका डालने का प्रयास हुआ था, पांच लुटेरे पकड़े गए थे। एक तरह से यह साबित हुआ कि राष्ट्रपति के रूप में रिचर्ड निक्सन को पुन: निर्वाचित करवाने के लिए पैसे का जुगाड़ करने के लिए इस चोरी या डकैती की साजिश रची गई थी। निक्सन इस मामले को दबाने में जुटे रहे, झूठ बोलते रहे, वाइट हाउस के वकील जॉन डीन ने इस मामले की जांच के लिए कुछ भी नहीं किया था, लेकिन निक्सन ने विस्तृत जांच के लिए डीन को बधाई तक दे डाली। अंतत: रिचर्ड निक्सन का झूठ सामने आ ही गया। अमरीका में हल्ला हो गया कि झूठा राष्ट्रपति नहीं चलेगा। निक्सन ने ९ अगस्त १९७४ को इस्तीफा दे दिया। निक्सन अमरीका के इकलौते ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिन्हें गलत काम करने के कारण राष्ट्रपति पद से इस तरह इस्तीफा देना पड़ा। पश्चिमी देशों में जो ‘पॉलिटिक्स’ होती है, उसमें झूठ बोलकर अगर पकड़े गए, तो फिर बचना मुश्किल है, लेकिन हमारे यहां स्थिति ऐसी नहीं है।
झूठ बोलने के बाद पकड़े गए, तो इतने तरह के बहाने बनाए जाते हैं कि आम आदमी सोच भी नहीं सकता। अव्वल तो यह कोशिश होती है कि राजनेताओं और राजनीति का झूठ बाहर न आने पाए, स्वयं राजनेता पार्टी की सीमा से परे जाकर इसके लिए जीतोड़ प्रयास करते हैं। वही मामले सार्वजनिक होते हैं, जिनमें मिलीभगत का गणित फेल हो जाता है, सत्ता समन्वय की बजाय जहां दुश्मनी काम करने लगती है।
आइए अब राजनीति में चारित्रिक नैतिकता की बात कर लेते हैं। अमरीका के एक और राष्ट्रपति यौनाचार के मामले में फंसे, तो उनके खिलाफ महाभियोग चल पड़ा, उन्हें जार-जार रोना पड़ा, माफी मांगनी पड़ी, तभी देश ने माफ किया। लेकिन हमारे यहां एक बड़े नेता, चार बार मुख्यमंत्री रह चुके नेता ने यौनाचार के मामले में राज्यपाल पद से तो इस्तीफा दिया, लेकिन खुद को अवैध पिता साबित होने से बचाने के लिए मुकदमा लड़ते रहे, अंतत: हार गए, उसके बाद उनकी ओर से जो बयान आया, वह खास गौरतलब है - ‘मुझे अपने तरीके से अपना जीवन जीने का पूरा अधिकार है, मेरे निजी जीवन में झांकने का किसी को अधिकार नहीं।’
क्या यही बात यौनाचार में फंसे बिल क्लिंटन बोल सकते थे? नहीं वे नहीं बोल सकते थे, वहां सार्वजनिक जीवन में आए व्यक्ति का निजी जीवन भी बहुत हद तक जनता की जानकारी के दायरे में रहता है। जबकि हमारे यहां आठ साल से सरकार चला रहे राजनीतिक गठबंधन की मुखिया ने अमरीका में किस बीमारी का इलाज करवाया, इसे गुप्त रखा गया है। मतलब एक बड़े नेता की बीमारी भारत में जनता के मतलब का विषय नहीं है। दूसरे देशों में समय-समय पर नेताओं के हेल्थ बुलेटिन जारी होते हैं। जो पूरे देश के हेल्थ की चिंता कर रहा है, उसके अपने हेल्थ की चिंता क्या देश को नहीं होनी चाहिए? हां, भारतीय राजनीति में यही माना गया है कि नेता जितना बता दें, उसमें विश्वास कर लो, ज्यादा पूछोगे, तो इलाज के दूसरे तरीके आजमाए जाएंगे। अभी उत्तर प्रदेश में ही यह बताया जाता है कि किसी बच्चे ने पूछ लिया कि सरकार लैपटॉप कब बांटेगी, तो उसे हिरासत में ले लिया गया। मतलब यह कि आप सवाल मत पूछिए, चुपचाप सुनिए कि राजनेता या सरकार क्या बोल रही है।
हमारे यहां ऐसा क्यों हुआ? उन्मुक्त जीवन शैली वाले अमरीका में तो राजनीतिक नैतिकता का पैमाना बहुत शानदार है, लेकिन मर्यादाओं में बंधे हमारे देश में राजनीतिक नैतिकता की धज्जियां सरेराह उड़ाई जाती हैं।
क्रमश:

Thursday, 26 July, 2012

बिहार के लिए एक बातचीत



बिहार की कला संस्कृति और युवा विभाग की मंत्री-बक्सर से विधायक डा.सुखदा पांडेय से यह वार्ता ई मेल के जजिये हुई थी, इसका समाचार पत्र में कहीं एक जगह प्रयोग नहीं कर पाया, अतः यहाँ पेश है-

प्र. - राजस्थान और बिहार के पर्यटन आपको क्या फर्क नजर आता है, राजस्थान तो इस मामले में बिहार से बहुत आगे है?
उ.—राजस्थान की खूबसूरती और इसकी बहुरंगी संस्कृति हमेशा से ही दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करती रही है। यही के किलों का स्थापत्य, मंदिरों की सुंदरता,यहां के लोकजीवन में इतने रंग हैं कि शायद ही कोई राजस्थान से मुंह फेर सकता है। जाहिर है, राजस्थान के लोगों ने अपनी विशेषताओं को सहेज कर सुरक्षित रखा है, इसीलिए भारत में पर्यटकों के लिए आज राजस्थान सबसे बडा आकर्षण है। यह सच है कि बिहार के पास एतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थानों की कमी नहीं, खास कर भगवान महावीर और महात्मा बुद्ध से जुडी स्मृतियां तो बिहार के कोने कोने में हैं, लेकिन यह भी सच है कि बिहार के कृषि आधारित समाज में इन स्थानों को कभी पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की कोशिश नहीं हो सकी। हमारी सरकार ने इस जरूरत को महसूस किया और पिछले छः वर्षों में पर्यटन के विकास की दिशा में कई कदम उठाए, जिसमें एक बिहार महोत्सव है, हम आपके घर आकर आपको आमंत्रित कर रहे हैं। खजुराहो महोत्सव की तरह हमने भी राजगीर, वैशाली, कुण्डलपुर, पटना साहिब जैसे स्थानों पर राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों की शुरुआत की है। पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाओं की व्यवस्था की गई है।

प्र. - आज भी युवा बिहार छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं, उन्हें बिहार में ही रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
उ.—हमारे लिए बिहार की युवा आबादी गर्व की बात है। आज यदि पूरी दुनिया में बिहार की छवि बदल रही है, तो इसमें युवाओं की बडी भूमिका है। बिहार के युवाओं ने तमाम राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में ही सफलता हासिल नहीं की, बल्कि सिनेमा, टेलीविजन और नाटक जैसे क्षेत्रों में अपनी उल्लेखनीय पहचान दर्ज कर रहे हैं। रही बात बिहार में नौकरी की, तो आपको आश्चर्य होगा कि विदेशों में सफलता हासिल कर चुके युवा भी आज गर्व के साथ बिहार लौट रहे हैं। इसके साथ यह भी सच है कि बिहार के युवा देश भर में नौकरियां कर रहे हैं, लेकिन इसमें शर्म की क्या बात है। देश में विभिन्न कारणों से एक दूसरे राज्य में आने जाने की परंपरा तो पुरानी है,कोई व्यवसाय के लिए जाते हैं, तो कोई रोजगार के लिए। बिहार में कई उद्योगों की शुरुआत होने वाली है, हम चाहेंगे कि देश भर से लोग हमारे यहां भी नोकरियां करने आएं। राष्ट्रीय एकता की दिशा में यह जरूरी भी है।

प्र.— बिहार जैसे पिछड़े राज्य को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के लिए क्या किया जा रहा है?

उ.—बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग हमारी सरकार लगातार करती रही है। जहां भी अवसर मिला मुख्यमंत्री जी ने स्वयं इस मुद्दे को पूरी तार्किकता से उठाया। पटना मे आयोजित बिहार ग्लोबल समिट में आए मोंटेक सिंह आहलूवालिया समेत सभी अर्थशास्त्रियों की इस पर मोटामोटी सहमती भी देखी गयी, इसके बावजूद यदि केन्द्र सरकार इस मामले पर टालमटोल कर रही है, तो यह सिवा असंवेदनशीलता के क्या कहा जा सकता है। यूं भी मंहगाई हो या राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला केन्द्र सरकार की असंवेदनशालता कोई नई बात नहीं है।

भीड़ को किसने ठेका दिया

एक तरफ, स्त्रियों का यौन शोषण-छेड़छाड़-प्रताडऩा, तो दूसरी ओर, यौन मुक्ति की पराकाष्ठा। दोनों ही खबरें असम से आईं, दोनों ने ही भारतीय समाज को विचलित किया। पहले आई एक विधायक की खबर, जिन्होंने डेढ़-दो साल की बच्ची और पति को छोडक़र बिना तलाक लिए अपने फेसबुक फ्रेंड से विवाह रचा लिया। कहा गया कि उन्हें ऐसा करने का अधिकार था, उन्होंने ऐसा किया, तो क्या गलत किया। तलाक न लेने की बात भूल जाइए, छोटी बच्ची को पीछे छोड़ आने की बात भूल जाइए, देखिए कि स्त्री उसी स्वच्छंदता और यौन मुक्ति का आनंद ले रही है, जो पुरुष लेते आए हैं। प्रशंसा न ऐसे पुरुष की हुई है, न ऐसी स्त्री की होगी, तो दोनों ही निंदा के पात्र रहेंगे। लेकिन निंदा से तो शायद अब सरोकार ही खत्म होता जा रहा है, अपने सुख के आगे बाकी सारी नैतिकताएं-मर्यादाएं फालतू की बातें होती जा रही हैं।
बराबरी का सिद्धांत महिलाएं लागू करना चाहती हैं, वे पुरुषों की नकल करना चाहती हैं, लेकिन उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि इसी समाज में अच्छे पुरुष भी रहते हैं, केवल वो बुरे पुरुष ही नहीं, जो अधिसंख्य महिलाओं को आकर्षित कर रहे हैं। आजादी का मतलब कदापि यह नहीं है कि बुरे पुरुषों का अनुगमन किया जाए। बुराई हर युग में हर हाल में बुराई थी और बुराई ही रहेगी।
उस महिला विधायक ने जो किया, वह गलत था, उनके माता-पिता ने भी अपनी बेटी का विरोध किया, लेकिन उनके खिलाफ भीड़ ने जो किया, वह तो और भी गलत था। यह भीड़ कौन है? उसके नाम से नैतिकता का ठेका किसने छोड़ा है?
ऐसी ही एक भीड़ उसी गुवाहाटी में सडक़ों पर जुटी थी, लेकिन उसने नैतिकता का ठेका नहीं उठाया। इस बार भीड़ के पास एक नाबालिग लडक़ी के साथ छेड़छाड़ करने और उसके कपड़े फाडऩे, उसे घसीटने, दबोचने का ठेका था? जिसे मिला, उसी ने हाथ साफ कर लिया? शायद भीड़ ने सोचा होगा कि लडक़ी बार से निकलकर आ रही है, इसलिए उसके साथ छूट ली जा सकती है? क्या रात को कोई लडक़ी घर से निकले, तो उसका आशय यही निकाला जाए कि वह दबोचे जाने के लिए ही निकल रही है? यह कैसा समाज है, जो दो तरह की भीड़ लगाने लगा है। एक भीड़ है, जिसके पास नैतिकता का ठेका है और दूसरी भीड़ जिसने नैतिकता की धज्जियां उड़ाने का ठेका ले रखा है।
यह एक बहुत बड़ा खतरा है, हम भीड़ को हलके से ले रहे हैं, जबकि यह हमारे समाज के लिए बहुत बड़ी चिंता की बात है। कोई हत्या या अपराध केवल इसलिए छोटा नहीं हो जाता कि उसे भीड़ ने अंजाम दिया है। भीड़ को तो ज्यादा कड़ा दंड मिलना चाहिए। भीड़ अकसर गलती ही करती है या शायद अब ज्यादा करने लगी है। भले और सज्जन लोग भीड़ में जाने से बचने लगे हैं। लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का यह खतरा ऐसा है कि जिस पर सरकारों को गौर करना चाहिए। किसी को सजा देना या किसी का शोषण करना भीड़ का काम नहीं है, लेकिन अगर वह ऐसा कर रही है, तो यह हमारी व्यवस्था की विफलता है, यह भीड़ नहीं, समाज के टूटने का एक प्रतीक है। समाज टूट रहा है और इस टूट के गुस्से, झेंप, निराशा को वह सामूहिक रूप से निकाल रहा है। किन्तु वास्तव में यह क्षणिक आवेश है, जो समाज को और तोड़ेगा। दो लोग अगर किसी को पीट रहे हैं और हाव-भाव से अगर लग जाए कि पिटने वाला कमजोर है या पिट सकता है, तो दूसरे लोग भी हाथ साफ करने उतर आते हैं।
ऐसा फिल्मों में होता है, गुंडों की टोली जब आती है, तो मजबूर होकर एक आदमी दरवाजा खोलकर निकलता है, फिर दूसरा, तीसरा, चौथा, धीरे-धीरे सब निकल आते हैं और मुट्ठी भर गुंडे भाग खड़े होते हैं या फिर मारे जाते हैं, लेकिन यह असली जिंदगी में ठीक नहीं है। यह सोचना पड़ेगा कि थोड़ी ही देर में सडक़ पर चलते-चलते यह फैसला कोई नहीं कर सकता कि कौन भला है और कौन बुरा। फिर क्यों लोग गाड़ी रोककर पिटने वाले पर हाथ साफ करते हुए चल निकलते हैं? मानो चोरी का आरोप पर्याप्त हो जांच पड़ताल की कोई जरूरत न हो। कुछ लोगों के हाथों में तो खुजली होती है, किसी के भी फटे में टांग अड़ा देते हैं और भीड़तंत्र को मजबूत कर देते हैं। सजा देने का काम पुलिस का है। नैतिकता सिखाने का काम समाज और बड़े-बुजुर्गों का है, अगर वे यह काम पूरी सभ्यता व शालीनता के साथ नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें धिक्कार है। भीड़तंत्र को खत्म करने के उपाय करने ही चाहिए, वरना संभव है आज उनकी तो कल हमारी बारी होगी। हम बताना चाहेंगे कि हम निर्दोष हैं, लेकिन लोग तो अपने हाथ साफ करके ही मानेंगे, भले हमारा कुछ भी हो जाए, हम रहें न रहें।

Tuesday, 24 July, 2012

चुन-चुन शिष्य बनाया : आदि शंकराचार्य




जगदगुरु आदि शंकराचार्य बहुत कम आयु में ही ऐसे संत-विद्वान-गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे कि उनकी कीर्ति पताका आज तक फहरा रही है। उनके मठ-शिक्षा केन्द्र आज भी विराजमान हैं और ज्ञान-धन से समृद्ध हैं। उनके हजारों शिष्य थे, जिनमें से चार शिष्यों को उन्होंने जगदगुरु शंकराचार्य बनाया। उनके एक परम प्रिय शिष्य थे सनन्दन, जो गुरु के ज्ञान में आकंठ डूबे रहते थे। सनन्दन को गुरु पर अटूट विश्वास था। एक बार सनन्दन किसी काम से अलकनन्दा के पार गए हुए थे। आदि शंकराचार्य अपने दूसरे शिष्यों को यह दिखाना चाहते थे कि सनन्दन उन्हें क्यों ज्यादा प्रिय हैं। उन्होंने तत्काल सनन्दन को पुकारा, सनन्दन शीघ्र आओ, शीघ्र आओ। अलकनन्दा के उस पर आवाज सनन्दन तक पहुंची, उन्होंने समझा गुरुजी संकट में हैं, इसलिए उन्होंने शीघ्र आने को कहा है। वे भाव विह्वल हो गए। नदी का पुल दूर था, पुल से जाने में समय लगता। गुरु पर अटूट विश्वास था, उन्होंने गुरु का नाम लिया और तत्क्षण जल पर चल पड़े। नदी पार कर गए। आदि शंकराचार्य ने प्रभावित होकर उनका नाम रखा - पद्मपाद। पद्मपाद बाद में गोवद्र्धन मठ पुरी के पहले शंकराचार्य बने।
उनके दूसरे परम शिष्य मंडन मिश्र उत्तर भारत के प्रकाण्ड विद्वान थे, जिनको शास्त्रार्थ में आदि शंकराचार्य ने पराजित किया था। मंडन मिश्र की पत्नी उभयभारती से आदि शंकराचार्य का शास्त्रार्थ जगत प्रसिद्ध है। यहां सिद्ध हुआ कि अध्ययन और मनन ही नहीं, बल्कि अनुभव भी अनिवार्य है। अनुभव से ही सच्चा ज्ञान होता है। मंडन मिश्र को उन्होंने सुरेश्वराचार्य नाम दिया और दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ का पहला शंकराचार्य बनाया।
एक गांव में प्रभाकर नामक प्रतिष्ठित सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उन्हें केवल एक ही बात का दुख था कि उनका एक ही पुत्र पृथ्वीधर जड़ और गूंगा था। लोग उसे पागल भी समझ लेते थे, बच्चे उसकी पिटाई करते थे, लेकिन वह कुछ न कहता था। परेशान माता-पिता पृथ्वीधर को आदि शंकराचार्य के पास ले गए और बालक को स्वस्थ करने की प्रार्थना की। आदि शंकराचार्य ने कुछ सोचकर उस बालक से संस्कृत में कुछ सवाल किए। चमत्कार हुआ, बालक भी संभवत: ऐसे प्रश्न की प्रतीक्षा में था, उसने संस्कृत में ही बेजोड़ जवाब दिए। गुरु ने एक जड़ से दिखने वाले बच्चे में भी विद्वता को पहचान लिया था, उन्होंने उस बालक को शिष्य बनाते हुए नया नाम दिया - 'हस्तामलक। हस्तामलक ही बाद में भारत के पश्चिम में स्थित शारदा पीठ-द्वारकाधाम के प्रथम शंकराचार्य बने।
शृंगेरी में निवास करते समय आदि शंकराचार्य को गिरि नामक एक शिष्य मिला। वह विशेष पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन आज्ञाकारिता, कर्मठता, सत्यवादिता और अल्पभाषण में उसका कोई मुकाबला न था। वह गुरु का अनन्य भक्त था। एक दिन वह गुरुजी के कपड़े धोने गया, उधर आश्रम में कक्षा का समय हो गया, बाकी शिष्य आदि शंकराचार्य से अध्ययन प्रारम्भ करने को कहने लगे, जबकि गुरुजी गिरि की प्रतीक्षा करना चाहते थे। कुछ शिष्यों ने गिरि के ज्ञान और उसके अध्ययन की उपयोगिता पर प्रश्न खड़े किए, तो आदि शंकराचार्य को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने गिरि को तत्क्षण व्यापक ज्ञान उपलब्ध कराकर असीम कृपा की और यह प्रमाणित कर दिया कि अनन्य गुरु भक्ति से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। गिरि को उन्होंने तोटकाचार्य नाम दिया और बाद में उत्तर में स्थापित ज्योतिर्पीठ का प्रथम शंकराचार्य बनवाया।


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Monday, 23 July, 2012

जात-पात से परे एक जगदगुरु : स्वामी रामानन्द




बनारस के एक अत्यंत पवित्र-ज्ञानी जुलाहे कबीर को गुरु की तलाश थी। उन्हें पता लगा कि गुरु के बिना सफलता नहीं मिलेगी। उनके मन में महान संत स्वामी रामानन्द जी को गुरु बनाने की इच्छा जागी। उस दौर में स्वामी रामानन्द बनारस ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के एक महान संत थे, उनके हजारों शिष्य थे, उनका आध्यात्मिक-सामाजिक दायरा बहुत विशाल और जात-पात से परे था। कबीर जानते थे कि उनका शिष्य बनना सहज नहीं है, अत: उन्होंने एक उपाय किया। सुबह मुंह अंधेरे रामानन्द जी स्नान करने के लिए श्रीमठ, पंचगंगा घाट की सीढिय़ां उतरते थे। एक रात कबीर उन्हीं सीढिय़ों पर उस जगह लेट गए, जहां से होकर रामानन्द जी गुजरते थे। स्नान के लिए गुरु जी पंचगंगा घाट की सीढिय़ां उतरते आए और उनका पांव कबीर पर पड़ गया। स्वाभाविक ही बहुत अफसोस और अपराधबोध के साथ अंधेरे में ही झुककर रामानन्द जी ने कबीर को उठा लिया और कहा, 'राम-राम कहो, कष्ट दूर होगा।Ó
फिर क्या था, कबीर को राम मंत्र मिल गया, गुरु मिल गए। पूरे बनारस में यह बात आग की तरह फैल गई कि जुलाहे कबीर को रामानन्द जी जैसे संत ने अपना शिष्य बना लिया। बात रामानन्द जी तक पहुंची, तो उन्हें ध्यान नहीं आया कि उन्होंने कबीर नाम के किसी व्यक्ति को शिष्य बनाया है। अब लोग कबीर के पास पहुंचे, घेर-घारकर श्रीमठ लेकर आए, ताकि रामानन्द जी से सामना कराया जा सके, ताकि शिष्य होने का सच सामने आए। जब कबीर को लेकर कई लोग श्रीमठ पहुंचे, तब श्रीमठ की अपनी गुफा में रामानन्द जी रामजी की पूजा में लगे थे। सब बाहर बैठकर प्रतीक्षा करने लगे। कबीर भी बैठ गए और ध्यान लगाया कि गुरु जी क्या कर रहे हैं। गुरु जी तब परेशान थे कि माला छोटी पड़ रही थी, छोटी माला रामजी को कैसे पहनाई जाए। कबीर से रहा न गया, उन्होंने मन ही मन कहा, 'मलवा तुर के गलवा में पहिराय दीं।Ó(माला तोड़कर गले में पहना दीजिए)। योगबल का प्रभाव था, यह आवाज गुरु जी तक पहुंच गई, उन्होंने तत्काल माला की डोर तोड़ी और रामजी के गले में डालकर पुन: बांध दी। उनके मन में यह प्रश्न आश्चर्य के साथ उठ रहा था कि समस्या का समाधान बताने वाली यह आवाज कहां से आई। वे तत्काल अपनी गुफा से बाहर निकले और पूछा कि यह आवाज किसकी थी, मलवा तुर के गलवा में पहिराय दीं। सब चुप थे, कबीर ने कहा, गुरुजी यह मैंने सोचा था।
गुरु तत्काल जान गए कि यह शिष्य मामूली नहीं है। छोटी जात का जुलाहा है, तो क्या हुआ। उन्होंने कबीर को शिष्य स्वीकार कर लिया। रामानन्द जी अद्भुत गुरु थे, कई खेमों में बंटे भारतीय समाज में उन्होंने उद्घोष किया था, जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे से हरि का होई। उनके परम शिष्यों में वस्त्र बुनने वाले कबीर ही नहीं थे, उनके परम शिष्यों में चर्मकार रैदास या रविदास भी शामिल थे, जो चमड़े का काम करते थे। उनके परम शिष्यों में धन्ना जाट भी थे और संत सेन भी, जो लोगों के बाल बनाते थे। रामानन्द जी एक ऐसे गुरु थे, जिन्होंने भारतीय समाज को एकजुट करके एक ऐसी राह दिखाई, जिस पर देश आज भी चल रहा है। ऊंच-नीच को न मानने वाला भारतीय संविधान तो बाद में बना, लेकिन मध्यकाल में यह नींव रामानन्द जी ने रख दी थी। वे एक ऐसे गुरु थे, जिनका श्रीमठ आज भी कायम है और उनके शिष्यों के भी पंथ चल रहे हैं।
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Monday, 18 June, 2012

पिता के लिए

फिर गांव छूट गए पिता
या दूर शहर में छूट गया मैं
या छोड़ गए वे मुझे
अनेक बकाया कामों के जंगल में।
दुष्कर किनारों के बीच टंगे अंधेरों में झूलते
तरह-तरह की आवाजों में पुकारते काम
किन्हीं अबूझ जीवों की तरह
डरवाने और घने काम।

मैं सोचता हूं,
छोड़ दूं
पिता कर लेंगे,
लेकिन छूट जाता है
काम जैसे छूट गया हूं मैं।

शायद पिता के जाने से
नाराज हैं काम
मुझसे किए नहीं मानते,
अनगिनत छोटे-बड़े
ढूढ़ते हैं पिता को
जैसे ढूढ़ते थे पिता उन्हें
पूरे दिन व दिल
कारीगर की तरह,
वो भाग-भाग कर पकड़ते थे,
मानो छोड़ दिया तो भाग जाएंगे काम।
लेकिन अब नहीं भागते काम
निठल्ले ढेर-ढहे रहते हैं
बिस्तर से दरवाजे तक
रसोई से रोशनदान तक
पिता की जगह को ताकते
कि इधर से ही निकलेंगे पिता
कि ठीक यहां से पलटकर देखेंगे
कि कुछ ठहरकर याद करेंगे पिता
और झट से हठ ठान कर
उठा लेंगे कोई काम।

बेताब हैं कुछ काम
कि उन्हें उठा ले कोई,
जिसे सुधरा गए थे पिता
वह नल फिर टपक रहा है,
उसकी आवाज चुनौती पहुंचा रही है
पिता की जगह तक
आओ पिता आओ,
इस निकम्मे बेटे पर न छोड़ो
जो कभी छोड़ आता है,
तो कभी खुद छूट जाता है,
छोडऩे-छूटने की आदत नहीं छोड़ता।
आओ पिता आओ।

रिस रहा है मेरी आंखों से
टप-टप और
भीग रही है
मेरे दिल में
पिता की जगह।

यह भी एक काम है
आंसू पोंछने का
जो छूट जाएगा
पिता के लिए।

मां के लिए

कोई एक हो, तो पूछूं
दर्द कैसा है मां।
हर बार समेटकर छिपा लेती है मां
लेकिन बड़े दर्द कूदकर झांकते हैं
सामने खड़े हो जाते हैं
शायद जैसे हम खड़े हैं!

कोई एक हो, तो पूछूं
दवा ले ली क्या मां?
पोटली में छिपा लेती है मां
अपनी दवाइयां तरह-तरह की
जो बढ़ती गई लगातार
झुर्रियों की तरह।
मैंने मां में होते देखी है,
दर्द और दवा की लड़ाई।
रात हारकर, सुबह जीतते देखा है।
अफसोस, मां
मैं मां न हो सकूंगा।

मैं या मां या दर्द या दवा
बड़ा होने में सबकी हार है।
बड़े होकर सब बिखर जाते हैं,
समेटते भी रहते हैं
ताकि फिर बिखेर सकें।

पर मां अब सिर्फ समेटती है
अपने काम
और अपना समय
पर हमारे बिखरे को
वह समेटती नहीं,
सजाती है।

कोई एक हो
तो याद करूं
मां के साथ समय
अनगिनत
चल रहे हैं
पिता के पीछे-पीछे।

Friday, 15 June, 2012

जाकर लौटती आवाजें



कुछ लोग हुए हैं, जिन्होंने यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वे भारत के नहीं हैं। उन्हीं में से एक मेहदी हसन हैं, गजल के शहंशाह। वैसे तो ईमानदारी तो यह है कि मेहदी हसन से पहले गुलाम अली की आवाज मेरे कानों तक पहुंच गई थी, बचपन में खोज-खोजकर सुना करते थे, कहीं गाना बजता तो खड़े हो जाते थे - चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है। जब यहां-वहां गुलाम अली को सुनने लगे, तो जगजीत सिंह हाथ लगे, वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी...और थोड़ी रुचि बढ़ी, तो पता चला कि एक गजल गायक मेहदी हसन भी हैं, सुना तो पता चला कि गजल यहीं से शुरू होती है। अमिताभ बच्चन का कालिया में एक प्रसिद्ध संवाद है, मैं जहां खड़ा हो जाता हूं, लाइन वहीं से शुरू होती है। यह दावा मेहदी हसन कर सकते थे, क्योंकि जब वे १९७० के दशक में भारत आए थे, तो गजल का संक्रामक वायरस छोड़ गए थे। जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पंकज उधास, तलत अजीज, अनूप जलोटा, रूप कुमार राठौर, रिज्वी और भी कई नाम हैं। शायर, अग्रज व मित्र दिनेश ठाकुर जी ने भी यही कहा और मशहूर शायर शीन काफ निजाम ने भी इसकी तस्दीक की। दिनेश जी ने बड़ी खूबसूरती से बयान किया कि मेहदी हसन गजल गायकी के भागीरथ थे, जो गंगा लेकर आए। दिनेश जी और निजाम साहब ने मेहदी हसन को याद करते हुए मुझे भी भावुक कर दिया। दिनेश जी भी उनसे मिले थे और निजाम साहब भी। निजाम साहब ने बड़ी खूबसूरती से फरमाया कि लिखने वाला अहसास को अल्फाज में बदल देता है और अच्छा गाने वाला अल्फाज को फिर अहसास बना देता है। मेहदी हसन ऐसे ही गायक थे, जब तक गाते रहे अल्फाज को अहसास बनाया। दिनेश जी बताते हैं कि अपनी भारी आवाज को उन्होंने बखूबी साधा, जवानी में की गई पहलवानी काम आई, गाने में भी कभी दम न फूला, और आरोह-अवरोह में खूब जमे। मशीनों के जरिये भी उनकी गायकी में झोल खोजना मुश्किल है। वाकई।
१३ जून को मेहदी हसन चले गए। मैंने अपने अखबार में इंट्रो लिखा - शहशांह -ए-गजल भारत में जन्मे। पाकिस्तान चले गए, लेकिन बसे, तो सिर्फ दिलों में और जब गए हैं, तो सब बुला रहे हैं - रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ।
लेकिन अब वे नहीं आएंगे। अब मेहदी हसन नहीं हैं, तो लगता है, एक आवाज ही नहीं, एक कड़ी, एक रिश्ता चला गया।
यह मैंने काफी बाद में जाना कि मेहदी हसन पाकिस्तान के नागरिक थे, और कभी उनके ग्रुप में तबलची रहे गुलाम अली भी पाकिस्तानी। और जब यह जाना कि गजल गायिका फरीदा खानम भी पाकिस्तान की हैं, तो अजीब अहसास हुआ। मेहदी हसन गा रहे हैं, आ फिर से मुझे छोडक़े जाने के लिए आ, तो फरीदा खानम गा रही हैं, आज जाने की जिद ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो और गुलाम अली ने आवाज को घुमा-घुमाकर अपनी छेड़ रखी है कि हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर कभी, खो गया है दिल हमारा, ये कहानी फिर कभी...। उधर रेशमा की आवाज दूर तक पीछा करती थी, मौत न आई तेरी याद क्यों आई, बड़ी लंबी जुदाई... देखिए, रेशमा भी पाकिस्तानी है।

यह एक ऐसे सिरा है, पाकिस्तान का यह एक ऐसा हिस्सा है, जिस पर बरबस प्यार आता है। फर्क इतना ही है कि भारतीयों ने इन आवाजों से खुलकर प्यार किया है, जबकि पाकिस्तान में भारतीय आवाजों और फिल्मों को आज भी पिछले दरवाजे से घुसकर सुना-देखा जाता है। जिन्होंने पाकिस्तान को केवल संगीनें भेजते देखा है, शायद उन्हें यह विश्वास करने या सराहने में परेशानी आएगी कि सीमा पार से काफी संगीत भी आया है, जो संगीनों पर भारी पड़ता है।
राजस्थान के लिए यह एक बड़ा नुकसान है।
अभी पिछले ही साल जगजीत सिंह गए और अब मेहदी हसन। मेहदी हसन को राजस्थान ने कभी पराया नहीं माना और मेहदी हसन भी जब अपने गांव लूणा, राजस्थान आए, तो जमीन पर लोटने लगे थे, रोने लगे थे। अपनी मिट्टी तो अपनी ही होती है, जहां जिंदगी के २० साल बिताए हों, वह जगह कोई भूलता है क्या? अब रेशमा बची हैं, और उनकी भी जन्म भूमि रतनगढ़, राजस्थान ही है। अभी रेशमा का ही एक आलाप याद आ रहा है।
बिछड़े अभी तो हम बस कल परसो
जीऊंगी मैं कैसे इस हाल में बरसों।
लंबी जुदाई.. बड़ी लंबी जुदाई।

Tuesday, 29 May, 2012

श्रीमठ : कल और आज




श्रीमठ की ऊपरी तीन मंजिलें


गंगा मैया की गोद में कुछ आगे बढक़र गहरे तक रचा-बसा श्रीमठ, मानो मां की गोद में अधिकार भाव से विराजमान कोई दुलारी संतान। श्रीमठ की पांचवीं मंजिल पर बालकनी में खड़े होकर जब आगे-पीछे देखता हूं, तो लगता है, बनारस ने श्रीमठ को आगे खड़ा कर दिया है कि तुम आगे रहो, ताकि हम पीछे सुरक्षित रहें। श्रीमठ को देखकर अनायास यह अनुभूति होती है और समझ में आता है कि आखिर क्या होता है, बची हुई थोड़ी-सी जगह में खुद को बचाए रखना। श्रीमठ की यह बची हुई जगह आकार में अत्यंत छोटी है, लेकिन अपने अंतस में अनंतता और अपनी भाव गुरुता को संजोए हुए, प्रेम से सराबोर, भक्ति के अनहद नाद से गुंजायमान। संसार के अत्यंत कठिन व छलिया समय में क्या होता है सन्तत्व, यह केवल श्रीमठ को देखकर ही अनुभूत किया जा सकता है। यहाँ आकर जो अनुभूतियाँ होती हैं, वो दुर्लभ हैं और निस्संदेह, इन अनुभवों का सम्पूर्ण अनुवाद असंभव है।बताते हैं जब गंगा जी का संसार में अवतरण नहीं हुआ था तब भी यह भूमि पावन थी. इस जगह को कभी श्री विष्णु ने अपना स्थाई निवास बनाया था. ग्रंथों में इस स्थान का उल्लेख धर्मनद नाम से भी हुआ है. इस तीर्थ को सतयुग में धर्मनद, त्रेता में धूतपापक, द्वापर में विन्दुतीर्थ एवं कलियुग में पंचनद नाम से जाना गया। धर्मनद तीर्थ तब भी था, जब गंगा जी नहीं थीं। धर्मनद तीर्थ पर दो पवित्र जल धाराएं मिलती थीं - धूतपापा और किरणा। यह संगम स्थल तब भी बहुत पुण्यकारी था। बाद में जब गंगा जी आईं, तो उनके साथ यमुना और सरस्वती भी थीं। बनारस की दो पावन धाराओं का मिलन तीन नई पावन धाराओं से हुआ और इस तरह से धर्मनद तीर्थ पंचनद तीर्थ कहलाने लगा।पंचनद को ही लोगों ने बाद में पंचगंगा कर दिया, भगवान विष्णु द्वारा पवित्र किये गए इसी पंचगंगा घाट पर अनेक वैष्णव संतों ने निवास किया, जगदगुरु रामानन्द जी, श्री वल्लभाचार्य जी, संत एकनाथ, समर्थगुरु रामदास, महात्मा तैलंगस्वामी इत्यादि ने यहीं डेरा डाला. गंगा जी के आने के बाद बनारस में घाट तो खूब बन गए, ज्यादातर घाटों का विकास राजाओं ने करवाया, किन्तु संतों की कृपा व प्रेरणा से जो घाट बना, वह तो केवल पंचगंगा है. ग्रंथों में यह भी आया है कि इस घाट पर स्नान सर्वाधिक पुण्यकारी है. जो लोग इस तथ्य को जानते हैं, वे यहां स्नान व सीताराम दर्शन के लिए अवश्य आते हैं।उर्जा से भरपूर कबीर को यहीं आसरा मिला, यहीं आकर गुरु की खोज पूरी हुई. पंचगंगा घाट की सीढिय़ों पर ही किसी रात लेट गए थे कबीर, और जगदगुरु रामानन्द जी सुबह-सुबह घाट की सीढियां उतर रहे थे, उनके पाँव कबीर पर पड़ गए थे, कबीर भी यही चाहते थे, जगदगुरु रामानन्द जी ने उन्हें हाथों से पकडक़र उठा लिया था, कष्ट मिटाते हुए कहा था, बच्चा राम राम कहो, तुम्हारा कल्याण होगा. उसके बाद पूरे बनारस को पता चल गया कि एक निम्न जाति के कबीर को जगदगुरु रामानन्द जी ने अपना शिष्य बना लिया है. कबीर से जुडी इसके बाद की भी रोचक कथा है, जिसे आप सब जानते हैं.पंचगंगा घाट श्रीमठ आकर रोम हर्षित हो उठते हैं, बिल्कुल यहीं रहते होंगे आचार्य जगदगुरु श्री रामानन्द जी। यहां कभी विराजती होंगी - कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना, सेन और गोस्वामी तुलसीदास जैसी अतुलनीय विभूतियां। यहां पत्थरों के स्पर्श में भी जादू-सा है। जहां आप पांव भी रखते हैं, तो लगता है, ओह, जरा प्रेम से रखा जाए। पंचगंगा घाट के पत्थर इतिहास नहीं बताते, लेकिन यह अनुभूति अवश्य करा देते हैं कि देखो, आए हो, तो जरा ध्यान से, जरा प्यार से, भाव विभोर हो, जरा याद तो करो कि यहां क्या-क्या हुआ होगा। यहां लाखों वैष्णवों, रामानन्दियों ने खरबों बार जपा होगा - सीताराम-सीताराम। यह भूमि पवित्र हो गई, तभी तो बची हुई है।पंचगंगा घाट बनारस के प्राचीनतम पक्के घाटों में शामिल है। 16 वीं सदी में यहां जयपुर-आमेर के राजा मानसिंह ने भी घाट का निर्माण करवाया था। 18वीं सदी में जीर्णोद्धार का कुछ काम महारानी अहिल्याबाई ने भी करवाया। पहले श्रीमठ काफी विस्तृत था, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि यवनों ने इसे लगभग पूरी तरह से तोड़ दिया। यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुख और रोष होता है, श्रीमठ की जगह यवनों ने अपना विशाल धर्मस्थल बना लिया, जो आज भी श्रीमठ के पीछे स्थित है। यह आक्रमण इस बात का प्रमाण है कि श्रीमठ का भारतीय संस्कृति में कैसा उच्चतम स्थान रहा होगा कि जिसे ध्वस्त करके ही शत्रु आगे बढ़ सकते थे। बनारस में गंगा घाट क्षेत्र में ऐसा विनाशकारी अधार्मिक अतिक्रमण और कहीं नहीं दिखता। उस पावन स्थली को ध्वस्त किया गया, उस महान तीर्थ को ध्वस्त किया गया, जहां से कभी भारतीय संस्कृति को सशक्त करने वाला महान नारा गूंजा था कि जाति-पांति पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।रामजी की कृपा से पूजनीय है यह धर्मस्थल, जहां ब्राह्मणवाद सम्पूर्ण समाज को समर्पित हो जाता है, जहां चर्मकार रैदास के लिए भी जगह है, तो जाट किसान धन्ना के लिए भी, जहां कबीर जुलाहे को सिर आंखों पर बिठाया जाता है, जहां जात से नाई सेन भी पूजे जाते हैं और जहां राजपूत राजा पीपा को भी सन्त बना दिया जाता है। जहां वर्णभेद नहीं, लिंगभेद नहीं, वर्गभेद नहीं। जहां भगवान के द्वार सबके लिए खुले हैं, जहां पहुंचकर पद्मावती और सुरसरी सन्त हो गईं। ऐसा श्रीमठ हमले का शिकार हुआ, तो उसके पीछे का षडयंत्र प्रत्येक भारतीय को पता होना चाहिए।



श्रीमठ के मंदिर, रसोईघर और विद्यार्थियों के रहने की जगह के पीछे विशाल धार्मिक अतिक्रमण

आक्रमण व विध्वंस के उपरांत कभी बस आचार्य रामानन्द जी की पादुकाओं का स्थान ही शेष रह गया था, फिर कभी दो मंजिल की एक छोटी-सी इमारत बनी, लेकिन अब थोड़ी-सी जगह में पांच मंजिली इमारत खड़ी है, भीतर-बाहर से पवित्र, प्रेरक, उज्ज्वल। विनाश व विध्वंस के अनगिनत प्रयासों के बावजूद श्रीमठ आज हमारे समय का एक बचा हुआ अकाट्य और महान सत्य है। ऐतिहासिक भारतीय संकोच का जीता-जागता उदाहरण है। हम आक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम अतिक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम छीनते नहीं, क्योंकि छीन नहीं सकते। हम खुद को बदलते-बनाते चलते हैं। हम दूसरों की लकीर छोटी नहीं करते, अपनी छोटी ही सही, लेकिन जितनी भी लकीर है, उसे बचाते-बढ़ाते चलते हैं और चल रहे हैं। ठीक ऐसे ही चल रहा है श्रीमठ।लोग कहते हैं कि मठों में बड़ा विलास और वैभव होता है, लेकिन सीधा-सादा श्रीमठ इस आधुनिक-प्रचारित तथ्य को सिरे से नकार देता है। श्रीमठ अपने भले होने की मौन गवाही देता है। अर्थात अपने होने में श्रीमठ ने उसी सज्जनता, सादगी और सीधेपन को बचाया है, जिसे आचार्य श्री रामानन्द जी ने बचाया था, जिसे कबीर ने पुष्ट किया और गोस्वामी तुलसीदास जी ने घर-घर पहुंचा दिया।यह परम सौभाग्य है कि आज श्रीमठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी भी सादगी के अतुलनीय प्रतिमान हैं। अपनी सम्पूर्ण सशक्त उपस्थिति के साथ वे इस कठिन काल में भी न्यायसिद्ध विद्वतापूर्ण सच्ची राम भक्ति के महान प्रमाण हैं। जैसे वे हैं, वैसा ही आज का श्रीमठ है, सीधा-सच्चा-सज्जन-बेलाग। आचार्य श्री में थोड़ी-सी भी असक्तता होती, तो श्री राम विरोधी विशालकाय भौतिक अभियान श्रीमठ को धकियाता-मिटाता समाप्त कर देता और बाकी बचे हुए को गंगा मैया की लहरें बहा ले जातीं। आज श्रीमठ खड़ा है, गंगा मैया को बताते हुए कि मां, मैं अब यहां से नहीं डिगने वाला। बनारस के गंगा तट पर वरुण घाट से अस्सी घाट तक इतना बेजोड़ राष्ट्र को सशक्त करने वाला दूसरा कोई मठ नहीं है।यह बात सही है कि आक्रमण के कारण बीच में काफी लंबे समय तक श्रीमठ की गद्दी एक तरह से खाली हो गई थी। कोई रखवाला नहीं था, किन्तु रामभक्त वैष्णव सन्तों के आशीर्वाद और प्रेरणा से रामानन्दाचार्य श्री भगवदाचार्य जी ने श्रीमठ के नवोद्धार की नींव रखी। उनके उपरान्त रामानन्दाचार्य शिवरामाचार्य जी महाराज ने समृद्ध परंपरा की बागडोर रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी को थमा दी। आज श्रीमठ अपनी सुप्तावस्था से काफी आगे निकल आया है, जाति से परे जाकर सन्त सेवा जारी है, यहां से एक से एक विद्वान निकल रहे हैं, समाज, संस्कृति और संस्कृत की सेवा हो रही है। श्रीमठ आज हर पल जागृत है, आज उसकी पताका चहुंओर दृश्यमान होने लगी है। अब चिंता की कोई बात नहीं। आज वह जितना सशक्त है, उतना ही शालीन है। कोई शोर-शराबा नहीं, कोई ढोल-धमाका नहीं, केवल सेवाभाव, भक्तिभाव, रामभाव और सीताराम-सीताराम-सीताराम . . . .

Friday, 11 May, 2012

आमिर खान के साथ कुछ पल

आमिर खान और पत्रिका (पत्रकारिता)
आमिर खान से मेरे दो सवाल
मेरा सवाल सुनते आमिर खान
9 मई की दोपहर आमिर खान के साथ मैंने करीब १० मिनट बिताये. इस बीच उन्हें अपना संडे जैकेट का काम दिखाया, सत्यमेव जयते का पहला एपिसोड प्रसारित होने से पहले सुबह हमने सत्य के लिए किये जा रहे संघर्ष पर एक पेज प्रकाशित किया था. आमिर के बिलकुल सामने बैठकर उन्हें बताया कि फ़िल्मी दुनिया के दूसरे बड़े स्टार क्यों और कैसे छोटे परदे से जुड़े, और उनका छोटे परदे से जुड़ना हमे क्यों अलग सा लगा. उन्हें खुशी हुई. उसके बाद मैंने आमिर खान से कुछ सवाल पूछे, रिकॉर्ड भी किया, जिनमे से दो पत्रिका में प्रकाशित हुए.सवाल जवाब के बाद मैंने पत्रकारिता से सम्बंधित चर्चा शुरू की, उनके सामने एक कागज रखा जिसमे ख़बरों के दस विषय लिखे थे, परचा देखते ही आमिर को लगा कि उस पर आटोग्राफ देना है, उन्होंने तत्काल साइन कर दिया, तो मैंने बताया कि नहीं आप इसे पढ़िए, और ख़बरों के चयन की अपनी प्राथमिकता रैंकिंग देकर दर्ज कीजिए. उन्होंने मुझ से पूछा की क्या क्या लिखा है. मैंने पढ़ कर बताया. उन्होंने समाज से जुडी खबरों को पहला स्थान दिया. पढने में दिक्कत हो रही थी, तो आमिर ने अपनी टीम के मेम्बर से पूछा कि मेरा चश्मा कहाँ है, तत्काल एक सफेद रंग का सुन्दर चश्मा आया, आमिर ने चश्मा पहनने के बाद कागज को फिर पढ़ा, और दूसरे नंबर पर राजनीतिक ख़बरों को रखते हुए बताया कि समाज और राजनीति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इन दोनों का समान महत्व है, तो कभी राजनीति की ख़बरें मुख्य बन सकती हैं तो कभी समाज की. उसके बाद उन्होंने पूछा की एजुकेशन कहाँ है, मैंने बताया तो उसे तीसरा नंबर दिया, फिर युवा व रोजगार को चौथा नंबर दिया. उनकी नजर बार बार ब्यावसायिक ख़बरों पर जाती रही, उन्होंने एकाधिक बार पूछा भी के ये क्या है. उसे उन्होंने आठ नंबर पर रखा, और सिनेमा और टीवी को सातवें नंबर पर, और अंत में दसवें नंबर पर फैशन-हाई सोसाइटी-सेलेब्रिटी को रखते हुए जोर देकर कहा कि ख़बरों में फैशन की जरूरत नहीं है, इसे तो छोड़ ही देना चाहिए.

Friday, 4 May, 2012

अतुल महेश्वरी जी को श्रद्धांजलि

जयंती विशेष (३ मई १९५६, ३ अप्रेल २०११) ज्यादातर अखबार मालिकों की पीठ पीछे बहुत बुराई होती है, लेकिन अतुल महेश्वरी एक ऐसे मालिक थे, जिनकी बुराई मैंने अमर उजाला में सात साल की नौकरी के दौरान कभी नहीं सुनी। बहुतों को यह अतिशयोक्ति लगेगी। यह सच है, मालिकों के खिलाफ पत्रकारों में असंतोष कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन अतुल जी के खिलाफ जो भी असंतोष पनपते थे, उनकी आयु ज्यादा नहीं होती थी। अतुल जी डंका पीटने वालो में नहीं थे, वे चुपचाप बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान खोजते थे। वे एक योग्य संपादक व लेखकीय समझ वाले अखबार मालिक थे। वे चाहते, तो दूसरे कई अखबार मालिकों से बेहतर व प्रभावी लिख सकते थे, लेकिन कम से कम अखबार में मैंने उनके नाम से कोई लेख या टिप्पणी नहीं पढ़ी। उन्होंने स्वयं को अपने अखबार पर कभी नहीं थोपा। सम्पादकों और पत्रकारों को ही आगे रखा और स्वयं उनके सहयोगी की तरह बड़े निर्णयों में मात्र एक सहायक बने रहे। आत्ममुग्धता और अपने कागजों पर खुद को थोपने के शौकीन दौर में यह एक बड़ी बात है। ऐसा नहीं कि वे कोई अच्छी खबर देखकर उछलते नहीं थे, लेकिन उनमें गजब का आत्मसंयम था। उन्होंने अपने सम्पादकों पर जितना भरोसा किया, वह कोई मामूली बात नहीं है। उनके संपादकों ने भले मनमानी की हो, लेकिन स्वयं अतुल जी को मनमानी करते शायद ही किसी ने देखा होगा। अमर उजाला को उन्होंने ऐसे संस्थान में तब्दील किया, जहां पत्रकार टिक कर काम कर सकते थे और देर-सबेर सबके साथ न्याय का भरोसा भी मजबूत रहता था। उनके समय में अमर उजाला ने खूब विस्तार किया। उन्हें अच्छी टीम बनाने में महारत हासिल थी। अमर उजाला की खासियत रही है कि वहां पत्रकारों की सेकंड लाइन बहुत मजबूत रही है, यह मजबूती इसलिए रही है, क्योंकि फस्र्ट लाइन ने कभी भी सेकंड लाइन को ज्यादा दबाया नहीं है, किन्तु इस फस्र्ट लाइन को श्रेय देने की बजाय मैं अतुल जी को श्रेय देना चाहूंगा। वे जमीनी आधार वाले मालिक थे, उन्हें पैर पुजवाने का शौक कभी नहीं रहा। मैंने यह भी महसूस किया है कि अतुल जी अपनी भावनाओं को बहुत तरीके से सम्भालते थे। हालांकि उन्हें मैंने रोते भी देखा है, लेकिन वह रोना भी क्षणिक था, क्योंकि रोने पर उनका नियंत्रण था। दिल्ली में निगम बोध घाट पर उनके एक परम मित्र राकेश जी का अंतिम संस्कार था, वहां वे अंदर से तो रो ही रहे थे, लेकिन बाहर रोने के संकेत नहीं दिख रहे थे। आगरा से अमर उजाला के एक अन्य मालिक अशोक अग्रवाल भी आए हुए थे, अशोक जी और अतुल जी का सामना हुआ, तो अतुल जी फूटकर रो पड़े और इतना ही कहा, .... राकेश चला गया। अशोक जी भी फूट पड़े, लेकिन यह रोना क्षणिक था। फिर दोनों तत्काल अपने काम में लग गए। वो अतुल महेश्वरी ही थे, जिन्होंने हिन्दी के पहले बिजनेस दैनिक का सपना साकार किया था, १९९६ का वह प्रयोग कमजोर मार्केटिंग की वजह से आगे न चल सका, लेकिन उदारीकरण के दौर में हिन्दी में बिजनेस अखबार की जरूरत को समझने वाले अतुल जी पहले मालिक थे। काश, मार्केटिंग पर ध्यान दिया जाता, तो अमर उजाला कारोबार आज भी चलता रहता, क्योंकि उसके बंद होने के बहुत बाद हिन्दी के अन्य बिजनेस दैनिक चालू हुए। यह वह दौर था, जब दिल्ली में अमर उजाला की मार्केटिंग कमजोर थी, मार्केटिंग टीम का पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगा हुआ था। आज के दौर में पत्रकारों व कर्मचारियों को अपने हाल पर छोड़ देने की परंपरा मजबूत हो चुकी है, लेकिन भले मन वाले, सुख-दुख में कर्मचारियों के साथ खड़े होने वाले अतुल जी एक विरल किस्म के मालिक थे। उनकी भलमनसाहत के अनेक किस्से हैं, वे टीम का मतलब समझते थे, पत्रकारों की मानसिकता समझते थे, तभी वे अच्छा काम ले पाते थे। उन्होंने आर्थिक लाभ के चक्कर में कभी भी मानवीय सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। अपनी अच्छाइयों को नहीं छोड़ा। अमर उजाला में कद्दावर सम्पादक राजेश रपरिया जी का दौर भी रहा, उन्हें अतुल जी का पूरा आशीर्वाद था। उसके बाद समूह सम्पादक शशि शेखर जी का दौर आया, उन्हें भी अतुल जी ने खुलकर काम करने दिया। आज शशि शेखर हिन्दी प्रिंट के सबसे महंगे सम्पादक कहे जाते हैं, तो यह वास्तव में अतुल जी के कारण ही संभव हुआ। हम कह सकते हैं कि अतुल जी ने सम्पादकों को पूरा सम्पादक बनने दिया। मुझे अच्छी तरह याद है, वर्ष १९९९ मैं एक ठंडी सुबह में अतुल जी से मिलने की गर्मी के साथ दिल्ली से मेरठ गया था। सुबह नौ बजे का समय दिया गया था, मैं समय से कुछ पहले पहुंच गया था। उनके पीए को मैं रिपोर्ट कर चुका था। उस दिन अतुल जी बहुत व्यस्त थे। जब काफी देर तक मुझे नहीं बुलाया गया, तो मुझे लगा कि अतुल जी भूल गए हैं। मैंने उनके पीए से कहा, अगर मुलाकात न होनी हो, तो मैं फिर कभी आ जाऊं, क्योंकि मुझे आज ही दिल्ली पहुंचना है। सहृदय पीए ने अतुल जी को जाकर कहा। अतुल जी को अचानक शायद ध्यान आया, उन्होंने कुछ ऊंची आवाज में कहा, इनको तो सुबह बुलाया था। पीए ने कहा, ये समय से पहले आ गए थे और यहीं इंतजार कर रहे हैं। मैं कमरे के बाहर ही खड़ा था। मैं अंदर गया। कमरे में ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिससे यह संकेत मिले कि यह अमर उजाला के एमडी का कमरा है। बिल्कुल एक पत्रकार के कमरे की तरह। कोई कारपोरेट आडंबर नहीं, कुछ पुस्तकें, फाइलें, कागज, पेपरवेट और अतुल जी। मुलाकात अच्छी रही, मुझे नौकरी मिल गई। जो बातें हुई थीं, मैं उसके विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन मैंने इस बात को महसूस कर लिया था कि अतुल जी एक पढ़े-लिखे और अत्यंत समझदार, सौम्य व्यक्ति हैं। उनकी आवाज में भी एक खास किस्म की सजग नरमी थी, जो याद रह गई। अमर उजाला के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि इस समूह का विभाजन हो गया, आर्थिक रूप से समूह को तगड़ा झटका लगा, लेकिन यह अतुल जी के प्रबंधन का कमाल था कि कभी यह खबर नहीं बनी कि अमर उजाला में वेतन या भुगतान की समस्या खड़ी हो गई है। यह बात अमर उजाला की उस अंदरूनी मजबूती को साबित करती है, जिसे बनाने में अतुल जी ने लगभग तीन दशक लगा दिए थे। अमर उजाला को मुकदमेबाजी से निकालने की कोशिश में लगे थे, लेकिन वक्त ने उन्हें समय नहीं दिया। यह अमर उजाला के लिए दुर्भाग्य की बात है कि उसने पहले अनिल अग्रवाल जैसा हीरा खोया था और पिछले साल अतुल महेश्वरी जैसा नेतृत्वकर्ता खो दिया. दुर्भाग्य से अतुल जी अब हमारे बीच नहीं हैं। ३ जनवरी २०११ को उनका निधन हो गया। ३ मई उनकी जन्मतिथि (वर्ष १९५६) है, उन्हें श्रद्धांजलि देने व याद करने से मैं खुद को नहीं रोक पाया हूं। वे याद रहेंगे, क्योंकि वे याद करने के सर्वथा योग्य हैं।

Sunday, 8 April, 2012

जयपुर में बिहार



जयपुर के जवाहर कला केन्द्र के शिल्पग्राम में खुले मंच पर एक तरफ प्रसिद्ध भोजपुरी गायिका शारदा सिन्हा गा रही थीं, ‘कोयल बिनु बगिया ना सोभे राजा,’ और दूसरी ओर, लिट्टी वाले स्टॉल के पीछे वह प्रेसर कूकर सीटी दे रहा था, जिसमें चोखा के लिए आलू उबल रहा था। इधर, एक-एक कर गीत आ रहे थे, जा रहे थे, और उधर, कभी लिट्टी खतम हो रही थी, तो कभी चोखा। बिहारियों की अच्छी-खासी जमात इकट्ठी हो गई थी, जयपुर वाले भी कम नहीं थे कि जरा देखें तो बिहारियों का गीत-संगीत, खान-पान-सामान। पूरे राजस्थानी शिल्पग्राम में बिहारियों के स्टॉल सजे हुए थे, बिना दिखावा, बिना लाग-लपेट, ठेठ देसी।
लिट्टी सेंक रहे बिहारी भाई से मैंने कहा, लिट्टी खिआईं ना!
जवाब मिला, अभी चोखा नइखे, चोखा आवे दीं।
और उधर शारदा सिन्हा गा रही थीं, बताव चांद केकरा से कहां मिले जाल...
यह गीत ही ऐसा है कि दुनिया का कोई भी कोना हो, चांदनी रात में बिहारियों को यह अकसर याद आ जाता है, और साथ में गांव की याद बोनस के रूप में आती है। चांद जो स्वयं ही बहत सुन्दर है, वह भला किससे मिलने चला जाता है? बिहारी पूरी दुनिया में बिखर गए हैं, लेकिन चांद एक ही है। बिहार भी एक ही है, जिसे इन दिनों एक ठीकठाक सरकार चला रही है। बिहार महोत्सव भी इसी सरकार का एक आयोजन है, लोगों को बिहार की ओर आकर्षित करने का एक आयोजन। मैं कुछ देर सोचता रहा कि ऐसे आयोजन पहले क्यों नहीं होते थे?
एक गीत खत्म हो चुका था, भीड़ में से एक महिला ने फरमाइश की, ‘पटना से वैदा बुलाई द।’
शरीर में झुरझुरी हुई, यकीन करने में मुश्किल आ रही थी कि क्या वाकई यह जयपुर है। पटना वाले वैद की डिमांड तो जयपुर में पहले भी रही होगी, लेकिन आज वह डिमांड पूरी होने वाली थी। वहां मौजूद बिहारी धन्य होने वाले थे। काश! सारे बिहारी यहां होते, सब पटना वाले वैद से पकिया इलाज करवाते। आज कितने बीमार हो गए हैं बिहारी? परदेस में रहते इतने घाव खाते हैं कि कोई गिनती नहीं है। कड़ा परिश्रम करने वाले किसी भी जातीय वर्ग को अपने ही देश में इतनी गालियां नहीं मिली होंगी, जितनी बिहारियों को मिली हैं। मेहनत भी करते हैं और मार भी खाते हैं, प्रतिवाद करते हैं, तो अपराधी कहलाते हैं।
शारदा सिन्हा ने कहा कि जहां जाती हूं, खूब फरमाइश होती है, सुनाऊंगी जरूर, लेकिन पहले एक पूरबी सुना दूं। उन्होंने पूरबी शुरू किया, कोठवा अटारी चढ़ी चितवे ली धनिया, कि नाहीं अइले ना, आहो राम नाहिं अइले ना परदेसिया रे बलमवा...
बिहार में न जाने कितनी धनियाएं छत और अटारी पर चढक़र अपने पति का इंतजार करती रहती हैं, जयपुर में भी कई बलम होंगे, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद, दिल्ली,कोलकाता में ही क्यों, शायद कोई ऐसा शहर नहीं होगा, जहां ऐसे बिहारी न होंगे, जिनका इंतजार बिहार में न हो रहा होगा। बिहार में लाखों धनियाओं की जिंदगी बीत जाती है इंतजार करते। अब तो थोड़ा ठीक हो गया है मोबाइल के आने से, वरना पहले चिट्ठियों को पहुंचने में कई-कई दिन लग जाते थे। चिट्ठी न आती, तो दर्द विलंबित हो जाता था, कई चिट्ठियां दर्द बढ़ा देती थीं, तो कइयों से कुछ आराम मिलता था। अब मोबाइल आने से इतना लाभ जरूर हो गया है कि छत और अटारी पर चढक़र धनियाएं अपने बलम से बात कर लेती हैं। फिर भी सशरीर बलम का जो इंतजार है, वह तो अपनी जगह कायम है।
शारदा सिन्हा ने अगला गीत शुरू किया था, अमवा महुअवा के झूमे डलिया, तनी ताक न बलमवा हमार ओरिया...
यह गीत बचपन से सुन रहा हूं। शारदा सिन्हा १९८० के दशक के शुरू में ही प्रसिद्ध हो गई थीं, १९८९ में सलमान खान की पहली हिट फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ में उन्होंने एक गीत गाया था, कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया, पग-पग लिए जाऊं तोहरी बलइयां। ... बदरिया सी बरसूं घटा बनके छाऊं, जिया तो ये चाहे, तोहे अंग लगाऊं, लाज निगोड़ी मोरी रोके है पइयां।
तब मैं स्कूल में था, दिनों तक यह गीत कानों में गूंजता रहा था। कैबल टीवी नहीं आया था, वीडियो का जमाना था, वीसीपी और वीसीआर, पर देखी गई इस फिल्म का यह गाना और शारदा सिन्हा की आवाज मानो सदा के लिए साथ रह गई। इस गीत का एक अर्थ मैं वर्षों से यह भी लगाता आया हूं कि मानो बिहार की माटी पुकार रही हो। बिहार पुकार रहा हो कि तनी ताक न हमार ओरिया। जरा मेरी ओर तो देखो कि मुझे क्या हुआ है। मैं कुछ इस तरह से गाना चाहूंगा कि तनी ताक न भारत जी बिहार ओरिया।
वाकई भारत ने बिहार की ओर देखना छोड़ दिया है, गालियां मिलती हैं, ऐ बिहारी, ओ बिहारी, कहां से आ जाते हैं बिहारी, कहकर चिढ़ाने की कोशिशें होती हैं, लेकिन बिहार का दिल कोई नहीं देखता कि दिल कितना बड़ा है। एक समय ऐसा आया था, जब बिहारी भी अपने बिहारी होने को छिपाने लगे थे, लेकिन शारदा सिन्हा को देखिए, उनके पास जयपुर में मंच था, वह केवल भोजपुरी गीत गा सकती थीं, लेकिन वे राजस्थानी गीत गा रही थीं, ‘म्हारा छैल भवर का अलगोजा खेता मा बाजे...
सबको साथ लेकर सबको खुश रखकर राष्ट्र को मजबूत करने का काम बिहार ने किया है, बिहार ने पूरे देश को देखा है, लेकिन देश बिहार को कितना देख रहा है? बिहार को मजदूर पैदा करने के बाड़े में बदल दिया गया है, अच्छे कुशल श्रमिक, पेशेवर, विद्वान भी बिहार देता है, लेकिन मजदूर ही ज्यादा दे रहा है, यह उसकी मजबूरी है। जहां बिजली ही पर्याप्त न हो, वहां आप विकास के किस कार्य की उम्मीद कर सकते हैं? बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, विशेष रियायत मिलनी चाहिए, लेकिन हाल ही में केन्द्र सरकार के एक सलाहकार सैम पित्रोदा पटना में बोल आए हैं कि कोई विशेष पैकेज नहीं मिलेगा, बिहार को अपने ही दम पर विकास करना होगा। यानी देश को सस्ते मजदूरों की आपूर्ति जारी रहेगी?
शारदा सिन्हा अगला गीत गा रही थीं, पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह पिया, ले ले अइह हो, पिया सिन्दूर बंगाल से...
आज जरूर यह देखा जाना चाहिए कि बिहारी क्या लेकर बिहार लौट रहे हैं? बिहारी भाई बिहार को क्या दे रहे हैं? बिहार की माटी मांग रही है, माटी का कर्ज चुकाना होगा। जिससे जितना बन पड़े चुकाए, लेकिन कुछ न कुछ चुकाए जरूर।
इधर, मेले में चोखा फिर बनकर आ गया था, लिट्टी फिर बिक रही थी। लिट्टी का भाव बढ़ता चला जा रहा था। दो ठो लिट्टी, चोखा के साथ पहले २० रुपए में बिकी, फिर २५ में और बाद में ३० में बिकने लगी। वैसे बता दें कि जयपुर के इस शिल्पग्राम में जो भी मिला लगता है, उसमें सबकुछ महंगा बिकता है, पचास-पचास रुपए के छोले-भटूरे और पाव भाजी बिकते रहे हैं। एक जयपुर के साथी पत्रकार ने मुझसे कहा, आज पता लग गया कि बिहार में कितनी भुखमरी है।
मैंने पूछा, ‘क्यों कैसे पता लग गया?’
उन्होंने कहा, ‘बिहारी बीस रुपये में लिट्टी-चोखा बेच रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं कि वह उससे बहुत ज्यादा कीमत में बिक सकता है?’
मैंने जवाब दिया, ‘आप गलत बोल रहे हैं, इसका सीधा-सा मतलब है कि बिहारियों को व्यापार करना नहीं आता। वे दूसरों की तरह ऐसा धोखेबाज होने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं कि दस रुपए का सामान ५० या १०० रुपए में बेच सकें। और यह आकलन तो बिल्कुल ही गलत है कि बिहार में भुखमरी है, बिहारी की धरती इतनी उपजाऊ है कि भूख से किसी के मरने की नौबत नहीं आती। बिहार अभाव का इलाका रहा है, लेकिन भूख से मौत वाली खबरों का इलाका कभी नहीं रहा। क्या आपने कभी सुना है कि कर्ज से परेशान बिहारी किसान ने आत्महत्या कर ली?’
पता नहीं, साथी पत्रकार कितना समझ पाए। लेकिन यह सच है कि बिहारी ठग या धूर्त नहीं हैं। जयपुर में ही एक बिहारी युवा हैं, बापूनगर इलाके में, ठेले पर डोसा बेचते हैं, पचीस रुपए में मसाला डोसा। बहुत बढिय़ा डोसा बनाते हैं, स्वाद के मामले में दक्षिण के अन्ना भाई लोगों को भी फेल कर देते हैं। उन्हें कई लोग सलाह देते हैं कि दाम दुगने भी कर दोगे, तो लोग खाएंगे। उस युवक का जवाब होता है, देखिए, आपसे क्या छिपा है, एक डोसे पर १२-१३ रुपए की लागत आती है, जिसे में पहले ही २५ रुपए में बेच रहा हूं, अब इससे ज्यादा और क्या?
बिजनेस का ऐसा खुला भेद एक बिहारी ही खोल सकता है। बिहारी सरलता की तारीफ महात्मा गांधी ने भी की थी, लेकिन जब लोग बिहारियों को गाली देते हैं, तो लगता है, उन्हें पटना वाले वैद से इलाज करवाना चाहिए।
देर रात हो चुकी थी और शारदा सिन्हा मंच पर गा रही थीं, पटना से वैदा बुलाय द हो नजरा गइनी गुइयां। बारे बलम गइले पूरबी वतनीया, कोई संनेशा भिजवाइद... हो नजरा गइनी गुइयां ...
१०० साल के हो रहे आधुनिक बिहार का महोत्सव खूब जमा, जयपुर में तीन दिन देर रात बिहार प्रेमी लोग ऐसे घर लौटे मानो बिहार से लौट रहे हों. बिहार की डिमांड बढ़ रही है. महोत्सव समापन के दिन लिट्टी चोखा की कीमत ५० रूपये तक पहुँच गयी थी. इतना ही नहीं, दो साइज़ की लिट्टियाँ बिक रही थीं. मनेर का लड्डू तो दस रूपये का एक बिका. वाकई बिहार और बिहारी बदल रहे हैं, बदलना ही होगा. अब बदले बिना खैर नहीं।

Thursday, 8 March, 2012

राहुल पर नहीं फूटने देंगे हार का ठीकरा!

उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे आने के पहले 6 मार्च को पत्रिका में प्रकाशित टिप्पणी


एक्जिट पोल में ही नहीं, सट्टा बाजार में भी कांग्रेस के भाव कम लगाए गए। वो सपने शायद साकार नहीं होंगे, जो कांग्रेस ने देख रखे हैं। कांग्रेस विगत लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद से उत्तर प्रदेश से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगाए बैठी है। मतदान के खत्म होते ही कांग्रेसियों के माथे पर शिकन उभर आई है। कांग्रेस के महास्टार प्रचारक राहुल गांधी ने जिस कांग्रेस को बचाने के लिए अपना काफी कुछ दांव पर लगा दिया, वही कांग्रेस हार के आसार देखकर राहुल गांधी के बचाव में खुलकर उतर आई है। जो पार्टी को बचाने निकला था, अब उसी को बचाने की कवायद में पार्टी नेता अभी से जुट गए हैं। अभी भी 125 सीटों पर जीत का दावा कर रहे कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह घोषित हार से पहले ही हार की जिम्मेदारी लेने को तैयार बैठे हैं।

पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भी आगे बढ़कर हार का ठीकरा अपने सिर फुड़वाना चाहती हैं। कम से कम चार साल की कड़ी मेहनत, 200 से ज्यादा रैलियां, भारी-भरकम कागजी और जमीनी तैयारियां, वोटरों को लुभाने की तरह-तरह की योजनाएं, कार्यक्रम, प्रदर्शन, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, वादे और सपने! इतना सब करने के बावजूद ऎसा लग रहा है कि जिस तरह से बिहार में कांग्रेस को पिछड़ जाना पड़ा, उसी तरह से उत्तर प्रदेश में भी तीसरे या चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ेगा। राहुल के प्रयासों में कोई कमी नहीं है। केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा भी उत्तर प्रदेश में राहुल की मेहनत की सराहना करते नहीं थक रहे हैं। शायद अभी भी कांग्रेस यह महसूस नहीं करेगी कि यदि यूपी में मुख्यमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का नाम पेश कर दिया जाता, तो कांग्रेस के आंकड़े रिकॉर्ड तोड़ देते। कांग्रेस बाईस सीटों से बढ़कर 200 से भी ज्यादा तक पहुंच जाती, लेकिन अब लगता है, कांग्रेस बाईस से बयासी तक पहुंच जाए, तो गनीमत है। मतलब साफ है, कांग्रेस राहुल गांधी और उनकी पूरी ऊर्जा को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए बचाना चाहती है और उसे लग रहा है कि राहुल बचेंगे, तो पार्टी बचेगी।

हालांकि हमेशा की तरह उनकी प्रशंसा भी जारी है। बेनी प्रसाद वर्मा मानते हैं कि उत्तर प्रदेश मे आज तक किसी भी नेता ने राहुल गांधी जितने प्रयास नहीं किए। कांग्रेस नेता हरीश रावत भी राहुल गांधी का पूरा पक्ष ले रहे हैं। मतलब, यूपी में नतीजे चाहे जो हों, कांग्रेस में राहुल की पूछ-परख कतई कम न होगी। दिलचस्प बात यह है कि अगर कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया, तो जीत का श्रेय तत्काल राहुल की झोली में डाला दिया जाएगा और सामूहिक जिम्मेदारी के स्वर कम सुनाए पड़ेंगे। यही कांग्रेस की निष्ठावान संस्कृति है और कांग्रेस की ताकत भी। एक और बात, कांग्रेस का पिछड़ना राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बुरा संकेत है, क्योंकि राहुल ने क्षेत्रीय पार्टियों की सरकारों को राज्य के पिछड़ेपन के लिए खुलकर जिम्मेदार ठहराया था। अगर लोग क्षेत्रीय पार्टियों पर भरोसा बरकरार रखते हैं, तो राहुल गांधी व कांग्रेस को अपनी पूरी रणनीति पर फिर विचार करना चाहिए।
- ज्ञानेश उपाध्याय

Tuesday, 28 February, 2012

श्री अरविन्द आश्रम, पांडिचेरी


पांडिचेरी में समुद्र के करीब अरविन्द आश्रम स्थित है। हालांकि उसके बहुत कम ही हिस्सों में आम लोग जा पाते हैं। वहां अरविन्द और मदर की समाधि है। जहां शांति बनाए रखने की इशारे लगातार किए जाते हैं। ज्यादा तामझाम नहीं है। फूलों से सजाई गई समाधि के इर्दगिर्द श्रद्धा से झुके हुए लोग, प्रार्थना प्रिय लोग मिल जाते हैं। यहां आकर पता चलता है कि उनमें लोगों की कितनी अथाह श्रद्धा है। मैंने गांधी जी की समाधि पर भी लोगों को इतना द्रवित होते कभी नहीं देखा है। फोटो इत्यादि लेने की इजाजत नहीं है। समाधि के आसपास ज्यादा जगह नहीं है। १०० से ज्यादा लोग वहां आ जाएं, तो जगह नहीं बचेगी। इसलिए आने-जाने के रास्ते अलग-अलग हैं। समाधि के दर्शन के बाद किताबों, चित्रों की प्रदर्शनी वाले कमरे हैं, जहां आप श्री अरविन्द व मदर से सम्बंधित रचनाएं व सामग्रियां खरीद सकते हैं। इन कमरों के ऊपर श्री अरविन्द की शिष्या मदर का ज्यादा समय बीता है। साल में दो बार इन ऊपर के कमरों के दर्शन आम लोगों को होते हैं। अगर आप वहां रुकना न चाहें, तो आप समाधि दर्शन करके पांच मिनट से भी कम समय में वापस सडक़ पर आ सकते हैं।
सडक़ के इर्दगिर्द आश्रम के ही निर्माण हैं। फ्रांसीसी शैली में बने भवन हैं। चौड़ी गलियां हैं। आश्रम के सामने ही गणेश जी का एक छोटा किन्तु अति संपन्न वर्नाकुलम विनायकम मंदिर है। मंदिर के अंदर भी एक मंदिर है, जिसकी छतरियां स्वर्ण की हैं। मंदिर की कुछ भीड़भाड़ के बावजूद इस पूरे इलाके में शांति रहती है, गलियों में सडक़ किनारे काजू के पेड़ हैं। कमल के फूल बिकते हैं, गजरा बिकता है। कुछ गलियां ऐसी हैं, जहां टहलते हुए लगता है, किसी यूरोपीय शहर में आ गए हों।

श्री अरविन्द और महात्मा



मुझे नहीं पता था कि अचानक पांडिचेरी जाना पड़ेगा। जब ७ फरवरी को यह फैसला लिया गया कि मुझे पीआईबी और केन्द्र सरकार द्वारा आयोजित ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस में जाना है, आने-जाने के लिए प्लेन के टिकट की व्यवस्था हुई। ९ फरवरी की दोपहर जब जयपुर में चेन्नई के लिए उड़ान भर रहे प्लेन में बैठा, तो ऑफिस की रोजमर्रा की चिंताओं से हटकर मैं सोचने लगा कि पांडिचेरी में मुझे क्या-क्या करना है। सबसे पहले मेरे दिमाग में यह सोचकर खुशी हुई कि पांडिचेरी में श्री अरविंद आश्रम जाने का मौका मिलेगा। किशोर वय का था, तो मेरे दिमाग पर महात्मा गांधी का दर्शन छाया हुआ था, लेकिन उनके बाद जिस महानविभूति ने मेरे मानस को झकझोर कर रख दिया, वे श्री अरविन्द थे। अरविन्द घोष, राजनेता अरविन्द घोष, संत अरविन्द घोष, विचारक-चिंतक अरविन्द घोष। मुझे बड़ा हर्ष हुआ। महात्मा गांधी को जानने के बाद श्री अरविन्द या श्री अरोबिन्दो को जानना अचंभित, स्तब्ध और प्रेरित करता है। जो श्री अरविन्द को पहले पढ़ेंगे, उन्हें संभवत: गांधी जी अच्छे नहीं लगेंगे।
गांधी जी ने केवल वकालत की पढ़ाई ब्रिटेन में की थी, श्री अरविन्द की तो लगभग पूरी स्कूलिंग ही ब्रिटेन में हुई थी। यह कहा जाता है, गांधी जी का दर्शन ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में ईसाइयों के बीच तैयार हुआ। उन्होंने प्रेम के साथ अहिंसा की वकालत की। एक गाल पर मार खाने के बाद दूसरे गाल को आगे कर देने की हद तक की अहिंसा का मत ईसाई दर्शन में तो पुख्ता रूप से है, लेकिन सनातन मत में मोटे तौर पर अहिंसा के लिए अहिंसा और हिंसा के लिए हिंसा की वकालत की गई है। ध्यान दीजिएगा, हमारे कोई भी देवी या देवता बिना अस्त्र या शस्त्र के नहीं हैं, गांधी जी के रास्ते पर अगर आगे चला जाए, तो संभव है, अस्त्र और शस्त्र हाथ से छूट जाएंगे, इसलिए गांधी सनातन संस्कृति की महिमा का गुणगान करने के बावजूद वैचारिक रूप से विराधाभास भी खड़े करते हैं। निस्संदेह गांधी प्रभावित करते हैं, लेकिन वे कई बार बहुत विचलित भी करते हैं।
महात्मा गांधी की विराटता से अभिभूत होने के बावजूद मैं यह बात नहीं भूल पाता हूं कि श्री अरविन्द ने राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए सर्वाधिक और शुरुआती काम किए, बहिष्कार का सिद्धांत उन्हीं का है। अंग्रेज लॉर्ड मिंटो से लेकर सर एडवर्ड बेकर तक अनेक ब्रिटिश अधिकारी यह मानते थे कि भारत में राष्ट्रद्रोही (अंग्रेजी शासन के खिलाफ) सिद्धांत फैलाने में अगर किसी एक व्यक्ति का सर्वाधिक योगदान है, तो वे अरविन्द हैं। वे क्रांतिकारियों के अपने विचारक थे, मई १९०८ से मई १९०९ तक वे जेल में रहे थे, तब गांधी जी का भारतीय राजनीति में पदार्पण भी नहीं हुआ था। वे क्रांतिकारी थे, पुलिस उनके पीछे पड़ी रहती थी, अध्यात्म व साधना में मुश्किल आती थी, इसलिए वे ब्रिटिश भारत को छोडक़र फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी में जा बसे। अध्यात्म व साहित्य में रचना प्रक्रिया व साधना लंबी चली, बताते हैं, वे चालीस साल तक पांडिचेरी से बाहर नहीं निकले। भारत और दुनिया भर से उनके पास लोग आते रहे, उनका कारवां बढ़ता चला गया और आज जब वे नहीं हैं, तब भी बढ़ता चला जा रहा है।
वे मानते थे कि राष्ट्रवाद राजनीति नहीं, बल्कि एक धर्म है, एक सिद्धांत है, एक विश्वास है। वे गांधी जी के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते, वे कहते हैं, ‘अहिंसा सुरक्षा नहीं कर सकती, उससे व्यक्ति केवल मर सकता है।’ यह संयोग है, श्री अरविन्द के इस कथन के करीब आठ साल बाद अहिंसा के पुजारी गांधी जी की भी हत्या ही हुई। बहुत बाद में कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को भगाया गया, लेकिन श्री अरविन्द ने आजादी से पहले २१ जून १९४० को ही कह दिया था, ‘कश्मीर में हिन्दुओं का पूरा एकाधिकार था। अब यदि मुस्लिम मांगों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो हिन्दुओं का सफाया कर दिया जाएगा।’
खैर १९३६ में श्री अरविन्द ने गांधी जी के विचारों के संदर्भ टिप्पणी की, ‘महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं।’
श्री अरविन्द ने लगातार गांधी जी के दर्शन के सामने अपने दर्शन को सशक्त रूप से रखा और एक बड़ी जमात थी, क्रांतिकारियों के अलावा, जो उन्हें पंसद करती थी। उन्होंने गांधी जी के बारे में १९२६ में ही लिखा था, ‘उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है।’
श्री अरविन्द तर्क के धनी थे और उन्होंने बहुत शालीनता से अपनी बातों को रखा और प्रमाणित किया, जबकि वे यह मानते थे कि गांधी जी तर्क संगत नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस के पतन व भ्रष्टाचार का भी घोर विरोध किया, गांधी जी ने तो इस पर बाद में बोलना शुरू किया। वे एक मुखर भारत के समर्थक थे, दब्बू भारत के निर्माण का उन्होंने सदैव विरोध किया। हम अगर गौर करेंगे, तो भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस को उनके ज्यादा करीब पाएंगे और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वे वही करना चाहते थे, जो सनातन धर्म कहता है, जो वेद कहता है, जो हमारी अपनी संस्कृति कहती है। वे पश्चिम की नकल के घोर विरोधी थे। दूसरी ओर, गांधी जी ने पश्चिम का विरोध भी किया और पश्चिम को सराहा भी।
जो लोग केवल गांधी जी को जानते हैं, उन्हें श्री अरविन्द को भी जरूर जानना चाहिए। गांधी जी मानवतावाद की बात करते हैं, जबकि श्री अरविन्द आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी करते हैं। दोनों को पढऩे से भारतीयता का सम्पूर्णता में न केवल आभास होता है, बल्कि सोचने-समझने की शक्ति भी बढ़ती है। कम से कम मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ है, गांधी जी को पढ़ते हुए मैं जितना द्रवित हुआ, उससे ज्यादा भावुक मैं श्री अरविन्द को पढऩे पर हुआ। गांधी जी केवल जगाते हैं, जबकि अरविन्द झकझोर कर रख देते हैं। गांधी जी थकाते हैं, जबकि श्री अरविन्द नींद उड़ा देते हैं।
श्री अरविन्द को जब आप जानेंगे, तो संभव है, गांधी जी से आपको खीज हो। वैसे भी नेताजी सुभाष बोस और भगत सिंह के संदर्भ में गांधी जी से खीजने वालों की इस देश में कमी नहीं है। गांधी जी जब थे, तो उनके विरोधी उनके स्वयं के परिवार में भी थे। उनके दोनों बड़े बेटों, हरिलाल, मणिलाल, खासकर हरिलाल जी ने तो गांधी जी का जमकर विरोध किया। किन्तु यह सुखद संयोग है, जब अपनी खराब आदतों व अनुशासनहीनता के लिए बुरी तरह बदनाम हो चुके पिता विरोधी हरिलाल जी श्री अरविन्द के पास पांडिचेरी पहुंचे थे, तब श्री अरविन्द ने उन्हें सुधारने का प्रयास किया था और वचन लिया था कि हरिलाल आगे जीवन में सत् आचरण करेंगे। पांडिचेरी से हरिलाल जी ने अपनी मां बा को पत्र भी लिखा था, ‘मैं मरते दम तक अपनी भूलें नहीं दोहराऊंगा।’ किन्तु दुर्भाग्य, हरिलाल पांडिचेरी से निकलने के बाद ज्यादा देर तक अपना वचन नहीं निभा पाए, फिर गांधी जी के विरोध में उन्होंने हर वह काम किया, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। खैर, गांधी जी ने स्वयं माना है, वे बेटों व परिवार के प्रति निष्ठुर रहे हैं।
अफसोस, श्री अरविन्द के मामले में भी गांधी जी निष्ठुर थे। गांधी जी ने श्री अरविन्द के विचारों का कभी सम्मान नहीं किया। जब उन्होंने गांधी जी के पास अपना दूत भेजकर नाजियों व हिटलर के खिलाफ अंगे्रजों का साथ देने की अपील की, तो गांधी जी ने सलाह स्वीकार करनेे से भी इनकार करते हुए कहा, ‘अरविन्द कौन हैं? वे तो राजनीति छोड़ चुके हैं।’ यह सवाल पैदा होता है कि क्या देश के किसी आध्यात्मिक गुरु या संत या विचारक को यह अधिकार नहीं है कि वह देश के एक बड़े नेता को कोई सलाह दे सके? क्या किसी संत के विचार को केवल इसलिए खारिज कर देना चाहिए, क्योंकि वह राजनीति में नहीं है? क्या राजनीति केवल राजनीतिज्ञों की बपौती है, क्या उसमें जनभागीदारी नहीं होनी चाहिए?
यहां गांधी जी ने शायद श्री अरविन्द की ही टिप्पणी को सही साबित किया कि गांधी जी तार्किक नहीं हैं। यह बहस या यह वृतांत इतना रोचक है कि हजारों पन्ने रंगे जा सकते हैं। फिर कभी...