Tuesday, 28 February, 2012

श्री अरविन्द आश्रम, पांडिचेरी


पांडिचेरी में समुद्र के करीब अरविन्द आश्रम स्थित है। हालांकि उसके बहुत कम ही हिस्सों में आम लोग जा पाते हैं। वहां अरविन्द और मदर की समाधि है। जहां शांति बनाए रखने की इशारे लगातार किए जाते हैं। ज्यादा तामझाम नहीं है। फूलों से सजाई गई समाधि के इर्दगिर्द श्रद्धा से झुके हुए लोग, प्रार्थना प्रिय लोग मिल जाते हैं। यहां आकर पता चलता है कि उनमें लोगों की कितनी अथाह श्रद्धा है। मैंने गांधी जी की समाधि पर भी लोगों को इतना द्रवित होते कभी नहीं देखा है। फोटो इत्यादि लेने की इजाजत नहीं है। समाधि के आसपास ज्यादा जगह नहीं है। १०० से ज्यादा लोग वहां आ जाएं, तो जगह नहीं बचेगी। इसलिए आने-जाने के रास्ते अलग-अलग हैं। समाधि के दर्शन के बाद किताबों, चित्रों की प्रदर्शनी वाले कमरे हैं, जहां आप श्री अरविन्द व मदर से सम्बंधित रचनाएं व सामग्रियां खरीद सकते हैं। इन कमरों के ऊपर श्री अरविन्द की शिष्या मदर का ज्यादा समय बीता है। साल में दो बार इन ऊपर के कमरों के दर्शन आम लोगों को होते हैं। अगर आप वहां रुकना न चाहें, तो आप समाधि दर्शन करके पांच मिनट से भी कम समय में वापस सडक़ पर आ सकते हैं।
सडक़ के इर्दगिर्द आश्रम के ही निर्माण हैं। फ्रांसीसी शैली में बने भवन हैं। चौड़ी गलियां हैं। आश्रम के सामने ही गणेश जी का एक छोटा किन्तु अति संपन्न वर्नाकुलम विनायकम मंदिर है। मंदिर के अंदर भी एक मंदिर है, जिसकी छतरियां स्वर्ण की हैं। मंदिर की कुछ भीड़भाड़ के बावजूद इस पूरे इलाके में शांति रहती है, गलियों में सडक़ किनारे काजू के पेड़ हैं। कमल के फूल बिकते हैं, गजरा बिकता है। कुछ गलियां ऐसी हैं, जहां टहलते हुए लगता है, किसी यूरोपीय शहर में आ गए हों।

श्री अरविन्द और महात्मा



मुझे नहीं पता था कि अचानक पांडिचेरी जाना पड़ेगा। जब ७ फरवरी को यह फैसला लिया गया कि मुझे पीआईबी और केन्द्र सरकार द्वारा आयोजित ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस में जाना है, आने-जाने के लिए प्लेन के टिकट की व्यवस्था हुई। ९ फरवरी की दोपहर जब जयपुर में चेन्नई के लिए उड़ान भर रहे प्लेन में बैठा, तो ऑफिस की रोजमर्रा की चिंताओं से हटकर मैं सोचने लगा कि पांडिचेरी में मुझे क्या-क्या करना है। सबसे पहले मेरे दिमाग में यह सोचकर खुशी हुई कि पांडिचेरी में श्री अरविंद आश्रम जाने का मौका मिलेगा। किशोर वय का था, तो मेरे दिमाग पर महात्मा गांधी का दर्शन छाया हुआ था, लेकिन उनके बाद जिस महानविभूति ने मेरे मानस को झकझोर कर रख दिया, वे श्री अरविन्द थे। अरविन्द घोष, राजनेता अरविन्द घोष, संत अरविन्द घोष, विचारक-चिंतक अरविन्द घोष। मुझे बड़ा हर्ष हुआ। महात्मा गांधी को जानने के बाद श्री अरविन्द या श्री अरोबिन्दो को जानना अचंभित, स्तब्ध और प्रेरित करता है। जो श्री अरविन्द को पहले पढ़ेंगे, उन्हें संभवत: गांधी जी अच्छे नहीं लगेंगे।
गांधी जी ने केवल वकालत की पढ़ाई ब्रिटेन में की थी, श्री अरविन्द की तो लगभग पूरी स्कूलिंग ही ब्रिटेन में हुई थी। यह कहा जाता है, गांधी जी का दर्शन ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में ईसाइयों के बीच तैयार हुआ। उन्होंने प्रेम के साथ अहिंसा की वकालत की। एक गाल पर मार खाने के बाद दूसरे गाल को आगे कर देने की हद तक की अहिंसा का मत ईसाई दर्शन में तो पुख्ता रूप से है, लेकिन सनातन मत में मोटे तौर पर अहिंसा के लिए अहिंसा और हिंसा के लिए हिंसा की वकालत की गई है। ध्यान दीजिएगा, हमारे कोई भी देवी या देवता बिना अस्त्र या शस्त्र के नहीं हैं, गांधी जी के रास्ते पर अगर आगे चला जाए, तो संभव है, अस्त्र और शस्त्र हाथ से छूट जाएंगे, इसलिए गांधी सनातन संस्कृति की महिमा का गुणगान करने के बावजूद वैचारिक रूप से विराधाभास भी खड़े करते हैं। निस्संदेह गांधी प्रभावित करते हैं, लेकिन वे कई बार बहुत विचलित भी करते हैं।
महात्मा गांधी की विराटता से अभिभूत होने के बावजूद मैं यह बात नहीं भूल पाता हूं कि श्री अरविन्द ने राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए सर्वाधिक और शुरुआती काम किए, बहिष्कार का सिद्धांत उन्हीं का है। अंग्रेज लॉर्ड मिंटो से लेकर सर एडवर्ड बेकर तक अनेक ब्रिटिश अधिकारी यह मानते थे कि भारत में राष्ट्रद्रोही (अंग्रेजी शासन के खिलाफ) सिद्धांत फैलाने में अगर किसी एक व्यक्ति का सर्वाधिक योगदान है, तो वे अरविन्द हैं। वे क्रांतिकारियों के अपने विचारक थे, मई १९०८ से मई १९०९ तक वे जेल में रहे थे, तब गांधी जी का भारतीय राजनीति में पदार्पण भी नहीं हुआ था। वे क्रांतिकारी थे, पुलिस उनके पीछे पड़ी रहती थी, अध्यात्म व साधना में मुश्किल आती थी, इसलिए वे ब्रिटिश भारत को छोडक़र फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी में जा बसे। अध्यात्म व साहित्य में रचना प्रक्रिया व साधना लंबी चली, बताते हैं, वे चालीस साल तक पांडिचेरी से बाहर नहीं निकले। भारत और दुनिया भर से उनके पास लोग आते रहे, उनका कारवां बढ़ता चला गया और आज जब वे नहीं हैं, तब भी बढ़ता चला जा रहा है।
वे मानते थे कि राष्ट्रवाद राजनीति नहीं, बल्कि एक धर्म है, एक सिद्धांत है, एक विश्वास है। वे गांधी जी के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते, वे कहते हैं, ‘अहिंसा सुरक्षा नहीं कर सकती, उससे व्यक्ति केवल मर सकता है।’ यह संयोग है, श्री अरविन्द के इस कथन के करीब आठ साल बाद अहिंसा के पुजारी गांधी जी की भी हत्या ही हुई। बहुत बाद में कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को भगाया गया, लेकिन श्री अरविन्द ने आजादी से पहले २१ जून १९४० को ही कह दिया था, ‘कश्मीर में हिन्दुओं का पूरा एकाधिकार था। अब यदि मुस्लिम मांगों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो हिन्दुओं का सफाया कर दिया जाएगा।’
खैर १९३६ में श्री अरविन्द ने गांधी जी के विचारों के संदर्भ टिप्पणी की, ‘महात्मा ने जो दृष्टि अपनाई है, वह हिन्दू की अपेक्षा ईसाई ही है। एक ईसाई के लिए आत्मावनति, दीनता, मानवता अथवा ईश्वर की सेवा के लिए निम्न स्थिति को स्वीकार कर लेना ऐसी चीजें हैं, जो उत्कृष्ट रूप से आध्यात्मिक और आत्मा का गौरवशाली विशेषाधिकार हैं।’
श्री अरविन्द ने लगातार गांधी जी के दर्शन के सामने अपने दर्शन को सशक्त रूप से रखा और एक बड़ी जमात थी, क्रांतिकारियों के अलावा, जो उन्हें पंसद करती थी। उन्होंने गांधी जी के बारे में १९२६ में ही लिखा था, ‘उनके सारे उपदेश ईसाई धर्म से लिए गए हैं और यद्यपि बाह्य वेष भारतीय है, तो भी मूल भावना ईसाई है। वे ईसा मसीह न भी हों, तो भी वे हर हालत में उसी आवेग की परंपरा में आते हैं। वे टॉल्सटॉय, बाइबिल से बहुत अधिक प्रभावित हैं और उनकी शिक्षाओं में सुदृढ़ जैनी रंगत है, कम से कम भारतीय शास्त्रों, उपनिषदों अथवा गीता से कहीं अधिक, जिसकी व्याख्या उन्होंने अपनी धारणाओं के प्रकाश में ही की है।’
श्री अरविन्द तर्क के धनी थे और उन्होंने बहुत शालीनता से अपनी बातों को रखा और प्रमाणित किया, जबकि वे यह मानते थे कि गांधी जी तर्क संगत नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस के पतन व भ्रष्टाचार का भी घोर विरोध किया, गांधी जी ने तो इस पर बाद में बोलना शुरू किया। वे एक मुखर भारत के समर्थक थे, दब्बू भारत के निर्माण का उन्होंने सदैव विरोध किया। हम अगर गौर करेंगे, तो भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस को उनके ज्यादा करीब पाएंगे और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वे वही करना चाहते थे, जो सनातन धर्म कहता है, जो वेद कहता है, जो हमारी अपनी संस्कृति कहती है। वे पश्चिम की नकल के घोर विरोधी थे। दूसरी ओर, गांधी जी ने पश्चिम का विरोध भी किया और पश्चिम को सराहा भी।
जो लोग केवल गांधी जी को जानते हैं, उन्हें श्री अरविन्द को भी जरूर जानना चाहिए। गांधी जी मानवतावाद की बात करते हैं, जबकि श्री अरविन्द आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की पैरोकारी करते हैं। दोनों को पढऩे से भारतीयता का सम्पूर्णता में न केवल आभास होता है, बल्कि सोचने-समझने की शक्ति भी बढ़ती है। कम से कम मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ है, गांधी जी को पढ़ते हुए मैं जितना द्रवित हुआ, उससे ज्यादा भावुक मैं श्री अरविन्द को पढऩे पर हुआ। गांधी जी केवल जगाते हैं, जबकि अरविन्द झकझोर कर रख देते हैं। गांधी जी थकाते हैं, जबकि श्री अरविन्द नींद उड़ा देते हैं।
श्री अरविन्द को जब आप जानेंगे, तो संभव है, गांधी जी से आपको खीज हो। वैसे भी नेताजी सुभाष बोस और भगत सिंह के संदर्भ में गांधी जी से खीजने वालों की इस देश में कमी नहीं है। गांधी जी जब थे, तो उनके विरोधी उनके स्वयं के परिवार में भी थे। उनके दोनों बड़े बेटों, हरिलाल, मणिलाल, खासकर हरिलाल जी ने तो गांधी जी का जमकर विरोध किया। किन्तु यह सुखद संयोग है, जब अपनी खराब आदतों व अनुशासनहीनता के लिए बुरी तरह बदनाम हो चुके पिता विरोधी हरिलाल जी श्री अरविन्द के पास पांडिचेरी पहुंचे थे, तब श्री अरविन्द ने उन्हें सुधारने का प्रयास किया था और वचन लिया था कि हरिलाल आगे जीवन में सत् आचरण करेंगे। पांडिचेरी से हरिलाल जी ने अपनी मां बा को पत्र भी लिखा था, ‘मैं मरते दम तक अपनी भूलें नहीं दोहराऊंगा।’ किन्तु दुर्भाग्य, हरिलाल पांडिचेरी से निकलने के बाद ज्यादा देर तक अपना वचन नहीं निभा पाए, फिर गांधी जी के विरोध में उन्होंने हर वह काम किया, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। खैर, गांधी जी ने स्वयं माना है, वे बेटों व परिवार के प्रति निष्ठुर रहे हैं।
अफसोस, श्री अरविन्द के मामले में भी गांधी जी निष्ठुर थे। गांधी जी ने श्री अरविन्द के विचारों का कभी सम्मान नहीं किया। जब उन्होंने गांधी जी के पास अपना दूत भेजकर नाजियों व हिटलर के खिलाफ अंगे्रजों का साथ देने की अपील की, तो गांधी जी ने सलाह स्वीकार करनेे से भी इनकार करते हुए कहा, ‘अरविन्द कौन हैं? वे तो राजनीति छोड़ चुके हैं।’ यह सवाल पैदा होता है कि क्या देश के किसी आध्यात्मिक गुरु या संत या विचारक को यह अधिकार नहीं है कि वह देश के एक बड़े नेता को कोई सलाह दे सके? क्या किसी संत के विचार को केवल इसलिए खारिज कर देना चाहिए, क्योंकि वह राजनीति में नहीं है? क्या राजनीति केवल राजनीतिज्ञों की बपौती है, क्या उसमें जनभागीदारी नहीं होनी चाहिए?
यहां गांधी जी ने शायद श्री अरविन्द की ही टिप्पणी को सही साबित किया कि गांधी जी तार्किक नहीं हैं। यह बहस या यह वृतांत इतना रोचक है कि हजारों पन्ने रंगे जा सकते हैं। फिर कभी...

Monday, 27 February, 2012

बिना जमीन का आसमान


देश भर में बड़ा शोर है कि सरकार ने शिक्षा का अधिकार दे दिया है, शिक्षा मुफ्त मिलेगी। हर बच्चे को स्कूल तक खींच लाने का दावा है। ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस पुड्डुचेरी में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डी. पुरंदेश्वरी ने भी शिक्षा का अधिकार (आरटीई) का गुणगान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जो सरकार बड़े-बड़े काम करने में लगी है, वह आधारभूत कमियां छोड़ती चल रही है। क्या वाकई शिक्षा का परिदृश्य खुशनुमा है? क्या निजी स्कूल गरीब बच्चों को प्रवेश देने के लिए तैयार हो गए हैं? आधारभूत बात करें, तो प्री स्कूल एजुकेशन या प्ले स्कूल को लेकर सरकार में कोई चिंता नहीं है। मैंने राज्यमंत्री महोदया से पूछा कि क्या आपको नहीं लगता कि छोटे-छोटे बच्चों व उनके अभिभावकों का शोषण हो रहा है? कथित प्ले स्कूल हजार से लाखों रुपए तक वसूल रहे हैं, लेकिन इतनी फीस पर क्या किसी प्रकार की टैक्स रियायत देने पर केन्द्र सरकार विचार कर रही है? उन्होंने बताया, ‘आरटीई में किसी तरह के फीस की वसूली नहीं है। जहां तक प्ले स्कूल या प्री स्कूल की बात है, तो यह विषय महिला व बाल विकास मंत्रालय के तहत आता है।’ दरअसल इस मामले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय कुछ भी खास नहीं कर रहा है और महिला बाल विकास मंत्रालय को आंगनबाडिय़ों व महिला योजनाओं से फुर्सत नहीं है। गली-गली में प्ले स्कूल खुल रहे हैं। इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम में प्री-स्कूल अनौपचारिक शिक्षा का उल्लेख भर है। सरकार को पता होना चाहिए कि प्ले स्कूल अब केवल ‘प्ले’ से नहीं जुड़े हैं, वे बच्चों को बाकायदे कागज-कलम के साथ औपचारिक शिक्षा दे रहे हैं, जमकर लिखित पढ़ाई हो रही है, खूब होमवर्क दिए जा रहे हैं। कांफ्रेंस में सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे, कोई ठोस जवाब नहीं मिला। नैतिक शिक्षा को लेकर भी सवाल उठा, जवाब मिला, वेल्यू एजुकेशन की चर्चा नेशनल करिकुलम में कर दी गई है। यह हमारी शिक्षा में एक बड़ी कमी है कि नैतिक शिक्षा को लगभग भुला दिया गया है।
आसमान पर पहुंचने की जल्दी में जमीनी सच्चाइयों की उपेक्षा का यह केवल एक उदाहरण नहीं है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस) का भी यही हाल है। केन्द्रीय राज्यमंत्री के.वी. थॉमस विस्तार से बता रहे थे कि पीडीएस का कंप्यूटरीकरण व बायोमेट्रिकीकरण हो रहा है। कुछ राज्यों ने अच्छा काम किया है। किन्तु आधारभूत सवाल तो यह है कि आज कितने लोग पीडीएस से खुश हैं। प्रधानमंत्री भी जानते हैं और थॉमस भी कि पीडीएस अगर ठीक नहीं हुआ, तो खाद्य सुरक्षा अधिकार बेकार चला जाएगा। मैंने के.वी. थॉमस से पूछा, आजादी मिले ६४ साल हो गए, आप भी बचपन से सुन रहे हैं कि पीडीएस को ठीक किया जा रहा है, मैं भी बचपन से सुन रहा हूं कि पीडीएस को ठीक किया जा रहा है, यूपीए को सरकार संभालते ८ साल हो गए, बार-बार कहा जाता है, पीडीएस को ठीक किया जा रहा है, आप मुझे बताइए कि पीडीएस का काम कब तक फुल प्रूफ या पुख्ता हो जाएगा? इस आधारभूत सवाल के जवाब में थॉमस अपने अधिकारी की मदद से यह बताने लगे कि कहां कहां कितना काम हुआ है, यानी आसमान की आकांक्षा में फिर एक जमीनी जवाब का इंतजार रह गया।

published on 19-2-2012 in patrika and rajasthan patrika

ट्रिपल 'पी'


अपने देश में कुल ३९ टाइगर रिजर्व हैं। इनमें केवल एक टाइगर रिजर्व ऐसा है, जहां केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश नहीं जा सके हैं। जिस एक रिजर्व में वे नहीं जा सके हैं, वह है छत्तीसगढ़ का इंद्रावती टाइगर रिजर्व। इस इलाके में माओवादियों का वर्चस्व है, सरकार वहां नहीं पहुंच पाती है, केवल रामकृष्ण मिशन वाले वहां जा पाते हैं। रमेश के अनुसार, आज देश के ७८ जिले नक्सल प्रभावित हैं, वे इनमें से २५ से ज्यादा जिलों में जा चुके हैं। उन्हें माओ एक्सपर्ट मिनिस्टर या टाइगर मिनिस्टर कहा जा सकता है, लेकिन यह कोई मजाक का विषय नहीं है। आज माओवादी हिंसा ने देश के एक बहुत बड़े हिस्से में ग्रामीण विकास को ख्वाब बना रखा है। झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडीसा इत्यादि के अनेक जिलों में स्थिति बहुत चिंताजनक है। जयराम रमेश ने बताया कि उनके एक सहयोगी का भी नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था, जिन नक्सलियों ने अपहरण किया था, वे बामुश्किल १४ साल के थे। माओवादी हिंसा ने संस्कृति और पूरे ग्रामीण माहौल को ही बदल दिया है। जब इन इलाकों में केन्द्र सरकार या राज्य सरकार का ही कोई मतलब नहीं है, तो सरकारी योजनाओं के बारे में सोचना ही बेकार है। माओवादी ङ्क्षहसा पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कई बार अपनी चिंता का इजहार कर चुके हैं। जयराम रमेश मानते हैं कि केवल सुरक्षा बढ़ाकर माओवादी हिंसा का सामना नहीं किया जा सकता। वे माओवाद को खत्म करने के लिए ‘ट्रिपल पी’ पर ध्यान देने की वकालत करते हैं। पहला ‘पी’ : पॉलिटिक्स (राजनीति), दूसरा ‘पी’ : पीपुल्स इन्वोल्वमेंट(जनभागीदारी) और तीसरा ‘पी’ : पोलिसिंग या पैरामिलिटरी फोर्स (कानून व्यवस्था स्थापित करना व बल प्रयोग)। पहली बात यह कि माओवादी हिंसा से मुकाबले के लिए राजनीति को ईमानदार होना होगा। माओवादियों को मुख्यधारा में लाना होगा। जयराम रमेश मानते हैं कि ममता बनर्जी ने जंगलमहल में यह काम किया है, हालांकि वे इस काम का ज्यादा श्रेय युवा सांसद शुभेन्दु अधिकारी को देते हैं। दूसरी बात, सरकारी योजनाओं और कार्यों में स्थानीय लोगों को भागीदार बनाना होगा। जब देश की मुख्यधारा से आम लोगों को जोड़ा जाएगा, तो माओवाद का आधार स्वत: कमजोर पड़ जाएगा। तीसरी और अंतिम बात, पोलिसिंग। कानून का राज स्थापित करने व रखने के लिए पुलिस और अद्र्धसैनिक बलों का सहारा लेना होगा। पुड्डुचेरी ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस में पूर्वोत्तर भारत के पत्रकार-संपादकों को यह शिकायत ज्यादा थी कि उनके इलाके में केवल एक ‘पी’ है : पैरामिलिटरी फोर्स। इसका केन्द्रीय मंत्रियों के पास कोई ठोस जवाब नहीं था। वैसे केवल पूर्वोत्तर भारत में ही नहीं, भारत में जहां भी आंतरिक हिंसा हो रही है, वहां सिर्फ पोलिसिंग पर ध्यान दिया जा रहा है। राजनीति सुधारने और जनभागीदारी बढ़ाने के प्रयास नहीं के बराबर हैं। अच्छी बात है, राजनीति और सरकार की विफलता का अहसास जयराम रमेश जैसे मंत्रियों को है, लेकिन सरकार ठोस पहल क्यों नहीं कर रही है? आज जरूरत केवल अच्छी बातें करने की नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने की है। कहीं ऐसा न हो कि अच्छी-अच्छी बातें करते हुए हम तबाह हो जाएं।

published on 18-2-2012 in patrika and rajasthan patrika

ट्रिपल ‘एफ’





अपने देश में पोस्टमॉर्टम ज्यादा होता है और इलाज कम। यानी घोटालों को रोकने के उपाय कम होते हैं, लेकिन घोटाले जब हो जाते हैं, तो उनका पोस्टमॉर्टम शुरू कर दिया जाता है। सीबीआई हो या सीएजी, ऐसी तमाम संस्थाएं पोस्टमॉर्टम का ही काम करती हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश मानते हैं कि ‘ओपीडी’ को ठीक करने की जरूरत है, ताकि सही समय पर इलाज हो जाए और पोस्टमॉर्टम की नौबत ही न आए। २ लाख ५० हजार पंचायतों वाले देश में जब ग्रामीण विकास का आधा पैसा लूट का शिकार हो रहा है, अनेक पंच-सरपंच बोलेरो, पजेरो खरीदने में लगे हैं, वहां बैठकर घोटालों पर चर्चा से जरूरी है, घोटालों को रोकने के उपाय करना। ग्रामीण विकास पर केन्द्र सरकार ८८ हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। रक्षा बजट के बाद ग्रामीण बजट का ही नंबर आता है। करीब ४० हजार करोड़ रुपए तो अकेले मनरेगा में खर्च हो रहे हैं, तो फिर केन्द्र सरकार क्या कर रही है? जयराम रमेश भी राज्य सरकारों को दोषी ठहराते हैं, क्योंकि क्रियान्वयन का काम राज्य सरकारों के जिम्मे है। केन्द्र सरकार ने सोशल ऑडिट का इंतजाम किया है। ग्रामीण खर्च को सीएजी के दायरे में कर दिया गया है। गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) खुश हो सकते हैं कि जयराम रमेश उन्हें सरकारी संस्थाओं से ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। जयराम रमेश अगर कामयाब हुए, तो केन्द्र सरकार देश भर में ६०-७० ऐसे शोध संस्थान बनाएगी, जो ग्रामीण योजनाओं के कार्यों का आकलन करेंगे और हर महीने-दो महीने में रिपोर्ट देंगे।
हालांकि ऐसा नहीं है कि जयराम रमेश की दृष्टि पूरी तरह से स्पष्ट हो। जहां एक तरफ वे यह मानते हैं कि राज्य सरकारें ठीक से धन खर्च नहीं कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे राज्यों को खर्च करने की ज्यादा आजादी देना चाहते हैं। एक तरफ वे दलील दे रहे हैं कि काम हो रहा है, दूसरी ओर कहे रहे हैं कि भ्रष्टाचार हो रहा है। वे भ्रष्टाचार रोकने की कोशिश का दावा करते हैं, लेकिन रोकने की गारंटी की चर्चा नहीं करते। बारहवीं योजना के अंत तक राज्यों को यह छूट मिल जाएगी कि वे केन्द्र द्वारा प्राप्त योजना खर्च का पचास प्रतिशत राज्य की जरूरत के हिसाब से खर्च कर सकेंगे। १० प्रतिशत का एक फ्लेक्सी फंड भी होगा, जिसका उपयोग राज्य सरकार अपने हिसाब से कर सकेगी। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि जितनी तेजी से योजनाएं बढ़ रही हैं, जितनी तेजी से उन पर होने वाला खर्च बढ़ रहा है, उतनी तेजी से निगरानी व्यवस्था नहीं सुधर रही है।
केरल मूल के निवासी, कर्नाटक में जन्मे, तमिलनाडु में विवाहित और आंध्र प्रदेश का नेतृत्व करने वाले जयराम रमेश की चिंता पर किसी को शक नहीं। पुड्डुचेरी ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस में उन्होंने ट्रिपल ‘एफ’ की चर्चा की : फंड, फंक्शन और फंक्शनरी। कोष, कार्य और कार्य-कर्मी या कार्य को अंजाम देने वाले। ये तीनों सुधर जाएं, तो विकास का रथ दौडऩे लगेगा। क्या जयराम रमेश अपने मन मुताबिक काम कर सकेंगे? वे पहले वाणिज्य मंत्रालय में थे, जाना पड़ा, वन व पर्यावरण मंत्री थे, वहां से भी जाना पड़ा और अब देखना है, वे ग्रामीण विकास को किस हद तक दुरुस्त कर पाते हैं। उनसे उम्मीदें तो बहुत हैं।

published on 17-2-2012 in patrika and rajasthan patrika.

अपनी-अपनी बात


तमिल शब्द पुड्डुचेरी का मतलब है नया गांव। यह एक ऐसा केन्द्र शासित प्रदेश है, जिसके दो भूखंड या जिले पांडिचेरी और कराइकल तमिलनाडु के अंदर हैं, तो एक जिला यनम आंध्र प्रदेश में और एक जिला माहे केरल में। जैसे ये चारों टुकड़े परस्पर जुड़े नहीं हैं, ठीक इसी तरह से पुड्डुचेरी में आयोजित ऑल इंडिया एडिटर्स कांफ्रेंस से निकली ध्वनियां या व्यंजनाएं भी टुकड़ों में बंटी हुई हैं। अगर १०-११ फरवरी को आयोजित कांफ्रेंस की चार मुख्य बातों को समेटें, तो पहली बात यह निकलेगी कि केन्द्र सरकार को राज्यों से बड़ी शिकायतें हैं। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने ही नहीं, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डी. पुरंदेश्वरी, खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्री के.वी. थॉमस ने भी बार-बार कहा कि केन्द्र सरकार अच्छा काम कर रही है, लेकिन राज्य सरकारों से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल रहा है। ज्यादातर राज्य सरकारों को भी केन्द्र सरकार से यही शिकायत है। अफसोस की बात यह कि इन शिकायतों का कोई इलाज कहीं भी खोजा नहीं जा रहा है।
दूसरी बात, सभी मंत्रियों ने परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया कि सामाजिक सरोकार वाली तमाम योजनाओं में भ्रष्टाचार हो रहा है। जयराम रमेश की मानें, तो भ्रष्टाचार हो रहा है, लेकिन काम भी हो रहा है, मीडिया को काम पर ध्यान देना चाहिए। भ्रष्टाचार कब खत्म होगा और कब केवल काम होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
तीसरी बात, पुड्डुचेरी के एकमात्र लोकसभा सांसद व अच्छे-अच्छे कानूनों की बात कर रहे राज्यमंत्री नारायणसामी से जब मैंने पूछा कि लोकपाल, व्हिसिल ब्लोवर्स, फॉरेन ब्राइबरी बिल जैसे बहुत अच्छे विधेयक लंबित हैं, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय या प्रधानमंत्री राजनीतिक सहमति बनाने के लिए प्रयासरत नहीं दिखते हैं, तो ये बिल अच्छे व मजबूत स्वरूप में कैसे पास होंगे? तो उन्होंने जवाब दिया, ‘घबराओ मत, सब बिल पास होगा।’ कांफ्रेंस में मुद्दे कई उठे राजनीतिक बातें भी हुईं, कमजोर लोकपाल के लिए विपक्ष को ही दोषी ठहराया गया। सहमति बनाने की कोशिशें दूर-दूर तक नजर न आईं।
चौथी बात, समन्वय का अभाव बार-बार उजागर हुआ। थोड़ी तकलीफ के साथ यह स्वीकार करना चाहिए कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकार के बीच ही नहीं, परस्पर केन्द्रीय मंत्रालयों के बीच भी समन्वय का अभाव देश के लिए बहुत घातक है। अच्छी नीतियां और अच्छी योजनाएं समन्वय व संवाद के अभाव में लूट का शिकार हो रही हैं। यह उत्तर सम्मेलन में बहुत आम था कि यह मामला केन्द्र सरकार नहीं, राज्य सरकार से सम्बंधित है, यह मामला मेरे मंत्रालय से नहीं, दूसरे मंत्रालय से सम्बंधित है। क्षेत्राधिकार से सम्बंधित इस पुलिसिया बहाने ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है, यह हर सजग भारतीय जानता है।
आज जैसे टुकड़ों में बंटे पुड्डुचेरी के सुनियोजित विकास व भविष्य के बारे में ठीक से सोचने की जरूरत है, ठीक उसी तरह से देश के बारे में भी सोचना होगा। राज्यों व केन्द्र की अलग-अलग सरकारें शासन-प्रशासन की सुविधा के लिए गठित हैं, समस्या बढ़ाने के लिए नहीं। निस्संदेह, ऐसे सम्मेलनों को और ज्यादा संवाद प्रधान बनाने की जरूरत है। सरकार की राम कहानी अपनी जगह है, लेकिन उसे ऐसे सम्मेलनों में सुनाना कम और सुनना ज्यादा चाहिए, लेकिन अदम गोंडवी के शब्दों में अगर मंत्रियों पर टिप्पणी करें, तो शेर हाजिर है : जुड़ गई थी भीड़, जिसमें जोर था सैलाब था, जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था।

published on 15-2-2012 in patrika and rajasthan patrika

Sunday, 19 February, 2012

लाल केला लाजवाब



२००३ में पहली बार दक्षिण गया था। कन्याकुमारी में समुद्र तट के पास लाल केले के सर्वप्रथम दर्शन हुए थे, मैंने केले बेचने वाले से पूछा था कि क्या यह रंगा गया केला है? उसने जवाब दिया था कि नहीं, असली लाल केला है। मुख्य रूप से केले तीन रंग के होते हैं, पीला, हरा और लाल। हरे केले की भी एक किस्म होती है, जो पकने के बाद भी हरी ही रहती है। खैर, पुड्डुचेरी के एक आम सब्जी बाजार में विश्वास के साथ मैं घुस गया कि लाल केले के दर्शन होंगे। निराशा नहीं हुई, घुसते ही लाल केले के दर्शन हो गए। दाम पूछा, ६० रुपए किलो, जबकि पीले केले २० रुपए किलो। कुछ केले लिए, चखे व साथियों को भी चखाए। यह सामान्य पीले केले से कुछ ज्यादा मीठा और नरम होता है। इसका गुद्दा हल्का सा गुलाबी होता है। दरअसल यह कोई भारतीय उत्पाद नहीं है। भारत में तो पीले और हरे केले ही सदा से रहे हैं। लाल केले सबसे पहले वेस्ट इंडीज या अमरीका में खोजे गए थे। ऑस्ट्रेलिया में बहुत पॉपुलर हैं और अमरीका में भी। अमरीका के लगभग सभी बड़े स्टोर पर लाल केले मिलते हैं, ऑस्ट्रेलिया में इसे रेड डक्का कहा जाता है। ये केले भारत में बहुत बाद में आए। दक्षिण भारत में यह पाए जाते हैं, लेकिन इनकी उपलब्धता कम है। खास बात यह है कि उत्तर भारत में ज्यादातर लोग लाल केले के बारे में जानते भी नहीं हैं।