Tuesday, 29 May, 2012

श्रीमठ : कल और आज




श्रीमठ की ऊपरी तीन मंजिलें


गंगा मैया की गोद में कुछ आगे बढक़र गहरे तक रचा-बसा श्रीमठ, मानो मां की गोद में अधिकार भाव से विराजमान कोई दुलारी संतान। श्रीमठ की पांचवीं मंजिल पर बालकनी में खड़े होकर जब आगे-पीछे देखता हूं, तो लगता है, बनारस ने श्रीमठ को आगे खड़ा कर दिया है कि तुम आगे रहो, ताकि हम पीछे सुरक्षित रहें। श्रीमठ को देखकर अनायास यह अनुभूति होती है और समझ में आता है कि आखिर क्या होता है, बची हुई थोड़ी-सी जगह में खुद को बचाए रखना। श्रीमठ की यह बची हुई जगह आकार में अत्यंत छोटी है, लेकिन अपने अंतस में अनंतता और अपनी भाव गुरुता को संजोए हुए, प्रेम से सराबोर, भक्ति के अनहद नाद से गुंजायमान। संसार के अत्यंत कठिन व छलिया समय में क्या होता है सन्तत्व, यह केवल श्रीमठ को देखकर ही अनुभूत किया जा सकता है। यहाँ आकर जो अनुभूतियाँ होती हैं, वो दुर्लभ हैं और निस्संदेह, इन अनुभवों का सम्पूर्ण अनुवाद असंभव है।बताते हैं जब गंगा जी का संसार में अवतरण नहीं हुआ था तब भी यह भूमि पावन थी. इस जगह को कभी श्री विष्णु ने अपना स्थाई निवास बनाया था. ग्रंथों में इस स्थान का उल्लेख धर्मनद नाम से भी हुआ है. इस तीर्थ को सतयुग में धर्मनद, त्रेता में धूतपापक, द्वापर में विन्दुतीर्थ एवं कलियुग में पंचनद नाम से जाना गया। धर्मनद तीर्थ तब भी था, जब गंगा जी नहीं थीं। धर्मनद तीर्थ पर दो पवित्र जल धाराएं मिलती थीं - धूतपापा और किरणा। यह संगम स्थल तब भी बहुत पुण्यकारी था। बाद में जब गंगा जी आईं, तो उनके साथ यमुना और सरस्वती भी थीं। बनारस की दो पावन धाराओं का मिलन तीन नई पावन धाराओं से हुआ और इस तरह से धर्मनद तीर्थ पंचनद तीर्थ कहलाने लगा।पंचनद को ही लोगों ने बाद में पंचगंगा कर दिया, भगवान विष्णु द्वारा पवित्र किये गए इसी पंचगंगा घाट पर अनेक वैष्णव संतों ने निवास किया, जगदगुरु रामानन्द जी, श्री वल्लभाचार्य जी, संत एकनाथ, समर्थगुरु रामदास, महात्मा तैलंगस्वामी इत्यादि ने यहीं डेरा डाला. गंगा जी के आने के बाद बनारस में घाट तो खूब बन गए, ज्यादातर घाटों का विकास राजाओं ने करवाया, किन्तु संतों की कृपा व प्रेरणा से जो घाट बना, वह तो केवल पंचगंगा है. ग्रंथों में यह भी आया है कि इस घाट पर स्नान सर्वाधिक पुण्यकारी है. जो लोग इस तथ्य को जानते हैं, वे यहां स्नान व सीताराम दर्शन के लिए अवश्य आते हैं।उर्जा से भरपूर कबीर को यहीं आसरा मिला, यहीं आकर गुरु की खोज पूरी हुई. पंचगंगा घाट की सीढिय़ों पर ही किसी रात लेट गए थे कबीर, और जगदगुरु रामानन्द जी सुबह-सुबह घाट की सीढियां उतर रहे थे, उनके पाँव कबीर पर पड़ गए थे, कबीर भी यही चाहते थे, जगदगुरु रामानन्द जी ने उन्हें हाथों से पकडक़र उठा लिया था, कष्ट मिटाते हुए कहा था, बच्चा राम राम कहो, तुम्हारा कल्याण होगा. उसके बाद पूरे बनारस को पता चल गया कि एक निम्न जाति के कबीर को जगदगुरु रामानन्द जी ने अपना शिष्य बना लिया है. कबीर से जुडी इसके बाद की भी रोचक कथा है, जिसे आप सब जानते हैं.पंचगंगा घाट श्रीमठ आकर रोम हर्षित हो उठते हैं, बिल्कुल यहीं रहते होंगे आचार्य जगदगुरु श्री रामानन्द जी। यहां कभी विराजती होंगी - कबीर, रैदास, पीपा, धन्ना, सेन और गोस्वामी तुलसीदास जैसी अतुलनीय विभूतियां। यहां पत्थरों के स्पर्श में भी जादू-सा है। जहां आप पांव भी रखते हैं, तो लगता है, ओह, जरा प्रेम से रखा जाए। पंचगंगा घाट के पत्थर इतिहास नहीं बताते, लेकिन यह अनुभूति अवश्य करा देते हैं कि देखो, आए हो, तो जरा ध्यान से, जरा प्यार से, भाव विभोर हो, जरा याद तो करो कि यहां क्या-क्या हुआ होगा। यहां लाखों वैष्णवों, रामानन्दियों ने खरबों बार जपा होगा - सीताराम-सीताराम। यह भूमि पवित्र हो गई, तभी तो बची हुई है।पंचगंगा घाट बनारस के प्राचीनतम पक्के घाटों में शामिल है। 16 वीं सदी में यहां जयपुर-आमेर के राजा मानसिंह ने भी घाट का निर्माण करवाया था। 18वीं सदी में जीर्णोद्धार का कुछ काम महारानी अहिल्याबाई ने भी करवाया। पहले श्रीमठ काफी विस्तृत था, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि यवनों ने इसे लगभग पूरी तरह से तोड़ दिया। यहां विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुख और रोष होता है, श्रीमठ की जगह यवनों ने अपना विशाल धर्मस्थल बना लिया, जो आज भी श्रीमठ के पीछे स्थित है। यह आक्रमण इस बात का प्रमाण है कि श्रीमठ का भारतीय संस्कृति में कैसा उच्चतम स्थान रहा होगा कि जिसे ध्वस्त करके ही शत्रु आगे बढ़ सकते थे। बनारस में गंगा घाट क्षेत्र में ऐसा विनाशकारी अधार्मिक अतिक्रमण और कहीं नहीं दिखता। उस पावन स्थली को ध्वस्त किया गया, उस महान तीर्थ को ध्वस्त किया गया, जहां से कभी भारतीय संस्कृति को सशक्त करने वाला महान नारा गूंजा था कि जाति-पांति पूछे नहि कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।रामजी की कृपा से पूजनीय है यह धर्मस्थल, जहां ब्राह्मणवाद सम्पूर्ण समाज को समर्पित हो जाता है, जहां चर्मकार रैदास के लिए भी जगह है, तो जाट किसान धन्ना के लिए भी, जहां कबीर जुलाहे को सिर आंखों पर बिठाया जाता है, जहां जात से नाई सेन भी पूजे जाते हैं और जहां राजपूत राजा पीपा को भी सन्त बना दिया जाता है। जहां वर्णभेद नहीं, लिंगभेद नहीं, वर्गभेद नहीं। जहां भगवान के द्वार सबके लिए खुले हैं, जहां पहुंचकर पद्मावती और सुरसरी सन्त हो गईं। ऐसा श्रीमठ हमले का शिकार हुआ, तो उसके पीछे का षडयंत्र प्रत्येक भारतीय को पता होना चाहिए।



श्रीमठ के मंदिर, रसोईघर और विद्यार्थियों के रहने की जगह के पीछे विशाल धार्मिक अतिक्रमण

आक्रमण व विध्वंस के उपरांत कभी बस आचार्य रामानन्द जी की पादुकाओं का स्थान ही शेष रह गया था, फिर कभी दो मंजिल की एक छोटी-सी इमारत बनी, लेकिन अब थोड़ी-सी जगह में पांच मंजिली इमारत खड़ी है, भीतर-बाहर से पवित्र, प्रेरक, उज्ज्वल। विनाश व विध्वंस के अनगिनत प्रयासों के बावजूद श्रीमठ आज हमारे समय का एक बचा हुआ अकाट्य और महान सत्य है। ऐतिहासिक भारतीय संकोच का जीता-जागता उदाहरण है। हम आक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम अतिक्रमणकारी नहीं हैं, हम हो नहीं सकते। हम छीनते नहीं, क्योंकि छीन नहीं सकते। हम खुद को बदलते-बनाते चलते हैं। हम दूसरों की लकीर छोटी नहीं करते, अपनी छोटी ही सही, लेकिन जितनी भी लकीर है, उसे बचाते-बढ़ाते चलते हैं और चल रहे हैं। ठीक ऐसे ही चल रहा है श्रीमठ।लोग कहते हैं कि मठों में बड़ा विलास और वैभव होता है, लेकिन सीधा-सादा श्रीमठ इस आधुनिक-प्रचारित तथ्य को सिरे से नकार देता है। श्रीमठ अपने भले होने की मौन गवाही देता है। अर्थात अपने होने में श्रीमठ ने उसी सज्जनता, सादगी और सीधेपन को बचाया है, जिसे आचार्य श्री रामानन्द जी ने बचाया था, जिसे कबीर ने पुष्ट किया और गोस्वामी तुलसीदास जी ने घर-घर पहुंचा दिया।यह परम सौभाग्य है कि आज श्रीमठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी भी सादगी के अतुलनीय प्रतिमान हैं। अपनी सम्पूर्ण सशक्त उपस्थिति के साथ वे इस कठिन काल में भी न्यायसिद्ध विद्वतापूर्ण सच्ची राम भक्ति के महान प्रमाण हैं। जैसे वे हैं, वैसा ही आज का श्रीमठ है, सीधा-सच्चा-सज्जन-बेलाग। आचार्य श्री में थोड़ी-सी भी असक्तता होती, तो श्री राम विरोधी विशालकाय भौतिक अभियान श्रीमठ को धकियाता-मिटाता समाप्त कर देता और बाकी बचे हुए को गंगा मैया की लहरें बहा ले जातीं। आज श्रीमठ खड़ा है, गंगा मैया को बताते हुए कि मां, मैं अब यहां से नहीं डिगने वाला। बनारस के गंगा तट पर वरुण घाट से अस्सी घाट तक इतना बेजोड़ राष्ट्र को सशक्त करने वाला दूसरा कोई मठ नहीं है।यह बात सही है कि आक्रमण के कारण बीच में काफी लंबे समय तक श्रीमठ की गद्दी एक तरह से खाली हो गई थी। कोई रखवाला नहीं था, किन्तु रामभक्त वैष्णव सन्तों के आशीर्वाद और प्रेरणा से रामानन्दाचार्य श्री भगवदाचार्य जी ने श्रीमठ के नवोद्धार की नींव रखी। उनके उपरान्त रामानन्दाचार्य शिवरामाचार्य जी महाराज ने समृद्ध परंपरा की बागडोर रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी को थमा दी। आज श्रीमठ अपनी सुप्तावस्था से काफी आगे निकल आया है, जाति से परे जाकर सन्त सेवा जारी है, यहां से एक से एक विद्वान निकल रहे हैं, समाज, संस्कृति और संस्कृत की सेवा हो रही है। श्रीमठ आज हर पल जागृत है, आज उसकी पताका चहुंओर दृश्यमान होने लगी है। अब चिंता की कोई बात नहीं। आज वह जितना सशक्त है, उतना ही शालीन है। कोई शोर-शराबा नहीं, कोई ढोल-धमाका नहीं, केवल सेवाभाव, भक्तिभाव, रामभाव और सीताराम-सीताराम-सीताराम . . . .

Friday, 11 May, 2012

आमिर खान के साथ कुछ पल

आमिर खान और पत्रिका (पत्रकारिता)
आमिर खान से मेरे दो सवाल
मेरा सवाल सुनते आमिर खान
9 मई की दोपहर आमिर खान के साथ मैंने करीब १० मिनट बिताये. इस बीच उन्हें अपना संडे जैकेट का काम दिखाया, सत्यमेव जयते का पहला एपिसोड प्रसारित होने से पहले सुबह हमने सत्य के लिए किये जा रहे संघर्ष पर एक पेज प्रकाशित किया था. आमिर के बिलकुल सामने बैठकर उन्हें बताया कि फ़िल्मी दुनिया के दूसरे बड़े स्टार क्यों और कैसे छोटे परदे से जुड़े, और उनका छोटे परदे से जुड़ना हमे क्यों अलग सा लगा. उन्हें खुशी हुई. उसके बाद मैंने आमिर खान से कुछ सवाल पूछे, रिकॉर्ड भी किया, जिनमे से दो पत्रिका में प्रकाशित हुए.सवाल जवाब के बाद मैंने पत्रकारिता से सम्बंधित चर्चा शुरू की, उनके सामने एक कागज रखा जिसमे ख़बरों के दस विषय लिखे थे, परचा देखते ही आमिर को लगा कि उस पर आटोग्राफ देना है, उन्होंने तत्काल साइन कर दिया, तो मैंने बताया कि नहीं आप इसे पढ़िए, और ख़बरों के चयन की अपनी प्राथमिकता रैंकिंग देकर दर्ज कीजिए. उन्होंने मुझ से पूछा की क्या क्या लिखा है. मैंने पढ़ कर बताया. उन्होंने समाज से जुडी खबरों को पहला स्थान दिया. पढने में दिक्कत हो रही थी, तो आमिर ने अपनी टीम के मेम्बर से पूछा कि मेरा चश्मा कहाँ है, तत्काल एक सफेद रंग का सुन्दर चश्मा आया, आमिर ने चश्मा पहनने के बाद कागज को फिर पढ़ा, और दूसरे नंबर पर राजनीतिक ख़बरों को रखते हुए बताया कि समाज और राजनीति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इन दोनों का समान महत्व है, तो कभी राजनीति की ख़बरें मुख्य बन सकती हैं तो कभी समाज की. उसके बाद उन्होंने पूछा की एजुकेशन कहाँ है, मैंने बताया तो उसे तीसरा नंबर दिया, फिर युवा व रोजगार को चौथा नंबर दिया. उनकी नजर बार बार ब्यावसायिक ख़बरों पर जाती रही, उन्होंने एकाधिक बार पूछा भी के ये क्या है. उसे उन्होंने आठ नंबर पर रखा, और सिनेमा और टीवी को सातवें नंबर पर, और अंत में दसवें नंबर पर फैशन-हाई सोसाइटी-सेलेब्रिटी को रखते हुए जोर देकर कहा कि ख़बरों में फैशन की जरूरत नहीं है, इसे तो छोड़ ही देना चाहिए.

Friday, 4 May, 2012

अतुल महेश्वरी जी को श्रद्धांजलि

जयंती विशेष (३ मई १९५६, ३ अप्रेल २०११) ज्यादातर अखबार मालिकों की पीठ पीछे बहुत बुराई होती है, लेकिन अतुल महेश्वरी एक ऐसे मालिक थे, जिनकी बुराई मैंने अमर उजाला में सात साल की नौकरी के दौरान कभी नहीं सुनी। बहुतों को यह अतिशयोक्ति लगेगी। यह सच है, मालिकों के खिलाफ पत्रकारों में असंतोष कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन अतुल जी के खिलाफ जो भी असंतोष पनपते थे, उनकी आयु ज्यादा नहीं होती थी। अतुल जी डंका पीटने वालो में नहीं थे, वे चुपचाप बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान खोजते थे। वे एक योग्य संपादक व लेखकीय समझ वाले अखबार मालिक थे। वे चाहते, तो दूसरे कई अखबार मालिकों से बेहतर व प्रभावी लिख सकते थे, लेकिन कम से कम अखबार में मैंने उनके नाम से कोई लेख या टिप्पणी नहीं पढ़ी। उन्होंने स्वयं को अपने अखबार पर कभी नहीं थोपा। सम्पादकों और पत्रकारों को ही आगे रखा और स्वयं उनके सहयोगी की तरह बड़े निर्णयों में मात्र एक सहायक बने रहे। आत्ममुग्धता और अपने कागजों पर खुद को थोपने के शौकीन दौर में यह एक बड़ी बात है। ऐसा नहीं कि वे कोई अच्छी खबर देखकर उछलते नहीं थे, लेकिन उनमें गजब का आत्मसंयम था। उन्होंने अपने सम्पादकों पर जितना भरोसा किया, वह कोई मामूली बात नहीं है। उनके संपादकों ने भले मनमानी की हो, लेकिन स्वयं अतुल जी को मनमानी करते शायद ही किसी ने देखा होगा। अमर उजाला को उन्होंने ऐसे संस्थान में तब्दील किया, जहां पत्रकार टिक कर काम कर सकते थे और देर-सबेर सबके साथ न्याय का भरोसा भी मजबूत रहता था। उनके समय में अमर उजाला ने खूब विस्तार किया। उन्हें अच्छी टीम बनाने में महारत हासिल थी। अमर उजाला की खासियत रही है कि वहां पत्रकारों की सेकंड लाइन बहुत मजबूत रही है, यह मजबूती इसलिए रही है, क्योंकि फस्र्ट लाइन ने कभी भी सेकंड लाइन को ज्यादा दबाया नहीं है, किन्तु इस फस्र्ट लाइन को श्रेय देने की बजाय मैं अतुल जी को श्रेय देना चाहूंगा। वे जमीनी आधार वाले मालिक थे, उन्हें पैर पुजवाने का शौक कभी नहीं रहा। मैंने यह भी महसूस किया है कि अतुल जी अपनी भावनाओं को बहुत तरीके से सम्भालते थे। हालांकि उन्हें मैंने रोते भी देखा है, लेकिन वह रोना भी क्षणिक था, क्योंकि रोने पर उनका नियंत्रण था। दिल्ली में निगम बोध घाट पर उनके एक परम मित्र राकेश जी का अंतिम संस्कार था, वहां वे अंदर से तो रो ही रहे थे, लेकिन बाहर रोने के संकेत नहीं दिख रहे थे। आगरा से अमर उजाला के एक अन्य मालिक अशोक अग्रवाल भी आए हुए थे, अशोक जी और अतुल जी का सामना हुआ, तो अतुल जी फूटकर रो पड़े और इतना ही कहा, .... राकेश चला गया। अशोक जी भी फूट पड़े, लेकिन यह रोना क्षणिक था। फिर दोनों तत्काल अपने काम में लग गए। वो अतुल महेश्वरी ही थे, जिन्होंने हिन्दी के पहले बिजनेस दैनिक का सपना साकार किया था, १९९६ का वह प्रयोग कमजोर मार्केटिंग की वजह से आगे न चल सका, लेकिन उदारीकरण के दौर में हिन्दी में बिजनेस अखबार की जरूरत को समझने वाले अतुल जी पहले मालिक थे। काश, मार्केटिंग पर ध्यान दिया जाता, तो अमर उजाला कारोबार आज भी चलता रहता, क्योंकि उसके बंद होने के बहुत बाद हिन्दी के अन्य बिजनेस दैनिक चालू हुए। यह वह दौर था, जब दिल्ली में अमर उजाला की मार्केटिंग कमजोर थी, मार्केटिंग टीम का पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर लगा हुआ था। आज के दौर में पत्रकारों व कर्मचारियों को अपने हाल पर छोड़ देने की परंपरा मजबूत हो चुकी है, लेकिन भले मन वाले, सुख-दुख में कर्मचारियों के साथ खड़े होने वाले अतुल जी एक विरल किस्म के मालिक थे। उनकी भलमनसाहत के अनेक किस्से हैं, वे टीम का मतलब समझते थे, पत्रकारों की मानसिकता समझते थे, तभी वे अच्छा काम ले पाते थे। उन्होंने आर्थिक लाभ के चक्कर में कभी भी मानवीय सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। अपनी अच्छाइयों को नहीं छोड़ा। अमर उजाला में कद्दावर सम्पादक राजेश रपरिया जी का दौर भी रहा, उन्हें अतुल जी का पूरा आशीर्वाद था। उसके बाद समूह सम्पादक शशि शेखर जी का दौर आया, उन्हें भी अतुल जी ने खुलकर काम करने दिया। आज शशि शेखर हिन्दी प्रिंट के सबसे महंगे सम्पादक कहे जाते हैं, तो यह वास्तव में अतुल जी के कारण ही संभव हुआ। हम कह सकते हैं कि अतुल जी ने सम्पादकों को पूरा सम्पादक बनने दिया। मुझे अच्छी तरह याद है, वर्ष १९९९ मैं एक ठंडी सुबह में अतुल जी से मिलने की गर्मी के साथ दिल्ली से मेरठ गया था। सुबह नौ बजे का समय दिया गया था, मैं समय से कुछ पहले पहुंच गया था। उनके पीए को मैं रिपोर्ट कर चुका था। उस दिन अतुल जी बहुत व्यस्त थे। जब काफी देर तक मुझे नहीं बुलाया गया, तो मुझे लगा कि अतुल जी भूल गए हैं। मैंने उनके पीए से कहा, अगर मुलाकात न होनी हो, तो मैं फिर कभी आ जाऊं, क्योंकि मुझे आज ही दिल्ली पहुंचना है। सहृदय पीए ने अतुल जी को जाकर कहा। अतुल जी को अचानक शायद ध्यान आया, उन्होंने कुछ ऊंची आवाज में कहा, इनको तो सुबह बुलाया था। पीए ने कहा, ये समय से पहले आ गए थे और यहीं इंतजार कर रहे हैं। मैं कमरे के बाहर ही खड़ा था। मैं अंदर गया। कमरे में ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिससे यह संकेत मिले कि यह अमर उजाला के एमडी का कमरा है। बिल्कुल एक पत्रकार के कमरे की तरह। कोई कारपोरेट आडंबर नहीं, कुछ पुस्तकें, फाइलें, कागज, पेपरवेट और अतुल जी। मुलाकात अच्छी रही, मुझे नौकरी मिल गई। जो बातें हुई थीं, मैं उसके विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन मैंने इस बात को महसूस कर लिया था कि अतुल जी एक पढ़े-लिखे और अत्यंत समझदार, सौम्य व्यक्ति हैं। उनकी आवाज में भी एक खास किस्म की सजग नरमी थी, जो याद रह गई। अमर उजाला के लिए यह दुर्भाग्य की बात है कि इस समूह का विभाजन हो गया, आर्थिक रूप से समूह को तगड़ा झटका लगा, लेकिन यह अतुल जी के प्रबंधन का कमाल था कि कभी यह खबर नहीं बनी कि अमर उजाला में वेतन या भुगतान की समस्या खड़ी हो गई है। यह बात अमर उजाला की उस अंदरूनी मजबूती को साबित करती है, जिसे बनाने में अतुल जी ने लगभग तीन दशक लगा दिए थे। अमर उजाला को मुकदमेबाजी से निकालने की कोशिश में लगे थे, लेकिन वक्त ने उन्हें समय नहीं दिया। यह अमर उजाला के लिए दुर्भाग्य की बात है कि उसने पहले अनिल अग्रवाल जैसा हीरा खोया था और पिछले साल अतुल महेश्वरी जैसा नेतृत्वकर्ता खो दिया. दुर्भाग्य से अतुल जी अब हमारे बीच नहीं हैं। ३ जनवरी २०११ को उनका निधन हो गया। ३ मई उनकी जन्मतिथि (वर्ष १९५६) है, उन्हें श्रद्धांजलि देने व याद करने से मैं खुद को नहीं रोक पाया हूं। वे याद रहेंगे, क्योंकि वे याद करने के सर्वथा योग्य हैं।