Friday 28 September 2012

नीतीश जी को गुस्सा क्यों आया?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुशनसीब हैं कि उन्हें हर महीने तनख्वाह मिलती है, लेकिन बिहार में ज्यादातर सरकारी कर्मचारी बदनसीब हैं कि उन्हें समय पर तनख्वाह नहीं मिलती। न जाने किस कमाई पर ज्यादा ध्यान देने वाले लालू प्रसाद यादव ने सरकारी तनख्वाह के भुगतान चक्र को पटरी से ऐसे उतारा कि आज भी बिहार में तनख्वाह समय पर नहीं बंटती है। नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहा जाता है, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में भी वे तनख्वाह की गाड़ी को पटरी पर नहीं चढ़ा पाए हैं, तनख्वाह तीन-तीन, चार-चार महीने की देरी से मिलती है, एक ही बार में दो से चार तनख्वाहों का एलॉटमेंट होता है, मतलब मासिक वेतन भुगतान के कायदे को ही खारिज कर दिया गया है। नीतीश बाबू अपने राज्य में अधिसंख्य कर्मचारियों से उधारी पर ही काम लेते हैं और चाहते हैं कि उनके राज्य में भ्रष्टाचार न हो। जो सरकार समय से अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे सकती, वह भ्रष्टाचार को कैसे रोक सकती है और ऐसी सरकार का गुणगान कैसे किया जाए? बिहार में भी पेट रोज दो-तीन बार खाना मांगते हैं, बीमारी, शादी, जिंदगी के बाकी तामझाम भी चलते ही रहते हैं, खर्चे नहीं रुकते, लेकिन तनख्वाह रुक जाती है। किसी दुकान से कोई सरकारी कर्मचारी उधारी लेता है, तो यह नहीं बता सकता कि कब तक उधारी चुका देगा। दुकान वाले का भी सब्र टूटता है, वह सरकारी कर्मचारी के दफ्तर पहुंचकर पता लगाता है कि क्या तनख्वाह नहीं आई है, तनख्वाह कब आएगी। नीतीश कुमार बताएं कि समय पर तनख्वाह नहीं मिलेगी, तो घर कैसे चलाएंगे लोग? क्या चोरी और भ्रष्टाचार के लिए मजबूर नहीं होंगे? जाहिर है, अब लोग निंदा करने लगे हैं, तो नीतीश कुमार को गुस्सा आने लगा है। लालू को भी एक समय गुस्सा आता था, लालू भी लोगों की तकलीफों के प्रति लापरवाह हो गए थे, जिसका फायदा नीतीश कुमार को मिला, क्योंकि वे विनम्र नेता माने जाते हैं, लेकिन अब अपनी विनम्रता में स्वयं नीतीश कुमार ही पलीता लगा रहे हैं। जो भी उनके खिलाफ बात करता है, उसे वह दुनिया का सबसे बुरा आदमी मान बैठते हैं। पत्रकारों पर भी खूब मुंह फुलाते हैं? उन्होंने गुस्सा दिखा-दिखाकर बिहार में ज्यादातर अखबारों को घुटनों के बल कर दिया है। क्या चापलूसों से घिर गए हैं नीतीश? उनके नामी-गिरामी सलाहकारों को भी क्या कुछ सूझ नहीं रहा है? क्या सलाहकारों ने अपना उल्लू सीधा करने के बाद अच्छी सलाह देना बंद कर दिया है? क्या बिहार में आधारभूत व्यवस्था सुधार का काम पूरा हो गया है? क्या बिहार सरकार केन्द्र से प्राप्त राशि का पूरा और ईमानदार सदुपयोग करने लगी है? क्या बिहार में मनरेगा के तहत गांव-गांव में कायाकाल्प कर दिया गया है? क्या बिहार से बाहर जाने वालों का तांता टूट चुका है? क्या सडक़ें दुरुस्त हो चुकी हैं? क्या गांव-गांव में बिजली पहुंच गई है? क्या पुलिस के कामकाज में थोड़ा भी सुधार आया है? क्या पुलिस ने लोगों से मुंहदिखाई वसूलना छोड़ दिया है? तो फिर नीतीश कुमार को इन मूलभूत कार्यों को किए बिना गुस्सा क्यों आ रहा है? परिवार में भी उसी मालिक का गुस्सा परिजन सहते हैं, जो मालिक परिजनों की जरूरतों को पूरा करता है। नीतीश कुमार भूल रहे हैं, जनता ने उन्हें गुस्सा दिखाने के लिए नहीं चुना है। जनता किसी नेता का गुस्सा बर्दाश्त नहीं कर सकती। नेता के प्रेम को लोग भले भूल जाते हों, लेकिन उसके गुस्से को लोग याद रखते हैं। नीतीश लोगों का भरोसा तोड़ रहे हैं? नीतीश जितना ज्यादा गुस्सा होंगे, लालू की वापसी के लिए उतनी ही अच्छी जमीन तैयार होगी। उनके दूसरे कार्यकाल का आधा से भी ज्यादा हिस्सा अभी बाकी है, लेकिन वे अभी से अपनी विफलताओं को ढंकने की कोशिश में लग गए हैं। इन दिनों उन्होंने विशेष राज्य दर्जे की मांग का डंका पीट रखा है, इस दर्जे को वे बिहार का अधिकार मान रहे हैं। हां, बेशक विशेष राज्य का दर्जा मिलने से बिहार को फायदा होगा। विकास के लिए ज्यादा धन उपलब्ध होगा, लेकिन यह दर्जा भी कोई जादू की छड़ी नहीं है। अभी ११ राज्यों के पास विशेष राज्य का दर्जा है, लेकिन इनमें से कोई राज्य ऐसा नहीं है, जो देश की शान बना हो। ये लगभग सभी ११ राज्य देश पर बोझ बने हुए हैं। यह सही है कि बिहार की तुलना में दस गुना ज्यादा राशि जम्मू-कश्मीर को मिलती रही है, लेकिन तब भी देश के लिए बिहार का योगदान जम्मू-कश्मीर से कहीं ज्यादा है। बिहार पूरे देश को श्रमिक उपलब्ध करा रहा है, देश के खाद्यान्न भंडार में भी अनाज पहुंचा रहा है। बिहार की यह स्थिति बिना विशेष राज्य का दर्जा मिले हुए ही है। बिहार की विकास दर ज्यादा है, यह भी विशेष राज्य का दर्जा मिले बिना ही हुआ है। आगे की राह विशेष राज्य का दर्जा मिल जाने से आसान हो जाएगी, ऐसा कदापि नहीं है। अपने देश में विकास और लूट में अंतर काफी कम हो गया है। बिहार में भी विकास के नाम पर लूट थमने का नाम नहीं ले रही है। गांवों में भले ही सडक़ न हो, लेकिन सरपंचों के पास बोलेरो, पजेरो, बस, ट्रक, अनेक मकान और प्लॉट हैं। नीतीश कुमार ईमानदार हैं, हो सकता है सुशील कुमार मोदी भी ईमानदार हों, लेकिन यही बात वे स्वयं अपने मंत्रियों के बारे में नहीं कह सकते। अपने शासन के दौरान नीतीश कुमार मंत्रियों और विधायकों की तरक्की के बारे में जानते ही होंगे? क्या मंत्रियों-विधायकों-सरपंचों की विकास दर बिहार की विकास दर से कई गुना ज्यादा नहीं है? फिर कहां है सुशासन? वह दिखता क्यों नहीं? आज भी ऐसी सडक़ें हैं कि लोग सडक़ छोडक़र बगल में खेतों से होकर चलना पसंद करते हैं। ऐसे में, उन्हें जरूर सोचना चाहिए कि उन्हें गुस्सा क्यों आया? किस पर आया? क्या यह गुस्सा अपने ही लोगों पर नहीं है? उन्हीं लोगों पर आया गुस्सा है, जो दोबारा नीतीश कुमार को सत्ता में लेकर आए हैं। कभी खगडिय़ा में लोग हमला बोल रहे हैं, तो कभी शिक्षक चप्पलें दिखा रहे हैं और नीतीश कुमार इतने आग बबूला हैं कि तुम-तड़ाक पर उतर आए हैं। माफ कीजिएगा नीतीश जी, लोग दूसरे राज्यों में हुई तरक्की को भी देख रहे हैं, उनकी आंख पर आप पट्टी नहीं बांध सकते। लोग विकास के उन आंकड़ों को भी देख रहे हैं, जो बिहार सरकार छाप या छपवा रही है। आपने लोगों को बताया है कि विकास हुआ है, तो लोग विकास में हिस्सेदारी मांग रहे हैं। कुछ इलाके विकसित हो रहे हैं, तो कुछ इलाके लालू युग में ही छोड़ दिए गए हैं। मत भूलिए कि लोगों को विकास के सपने आपने ही दिखाए थे, आप करीब सात साल से सत्ता में हैं, लेकिन ज्यादातर सपने पूरे नहीं हुए हैं। सपनों के पूरे होने का हल्ला ज्यादा है। आपके द्वारा ही मचाया गया सुशासन और विकास का हल्ला जरूरत से ज्यादा है, हल्ला इतना ज्यादा है कि यह आपकी भी नींद उड़ा देगा। बिहारी उग्र हो रहे हैं, क्योंकि सदियों से चैन से सोए नहीं हैं। हजारों गांव हैं, जहां बिजली के इंतजार में लोगों को ठीक से नींद नहीं आती, नींद आती है, तो चोर-डकैत आते हैं, और सुबह-दोपहर जब पुलिस आती है, तो क्या करती है, यह डीजीपी अभयानंद जी बेहतर जानते होंगे। अभयानंद जी की बात करें, तो उन्होंने सैकड़ों गरीबों को सुपर थर्टी कोचिंग के जरिये लखटकिया इंजीनियर बना दिया, लेकिन वे पुलिस महकमे में शायद सुपर थ्री भी नहीं पैदा कर पाए हैं। आज बिहार के मुख्यमंत्री को भी केन्द्र सरकार से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं, और लोगों को भी जरूरत से ज्यादा उम्मीदें हैं। बिहार की यही त्रासदी है कि आज ख्वाब और उम्मीदें ही समस्याएं हैं। और अंत में अगर भोजपुरी में बात करें तो नीतीश कुमार के लिए दो लाइनें यों होंगी काहे खिसियाइल बाड़ जान लेबे का हो आरे नीतीश बाबू परान लेब का हो ?

Monday 17 September 2012

के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे के. एस. सुदर्शन को श्रद्धांजलि देने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूं। वे बाद के दिनों में अपने विवादित या भ्रम पैदा करने वाले बयानों की वजह से और आखिरी दिनों में स्मृतिलोप की वजह से मीडिया के लिए हल्के महत्व के हो गए थे, लेकिन सुदर्शन जब अपने अच्छे दिनों में थे, तो दक्षिणपंथ के एक सबसे जीवंत प्रतिमान थे, उन्हें राष्ट्र की ताकत का पूरा अहसास था। वे राष्ट्र की नसों से परिचित थे, उन्होंने कई मौकों पर वामपंथियों और कांग्रेसियों को भी अचंभित किया था।
मैंने उन्हें पहली बार आमने-सामने बैठकर भोपाल में सुना था। स्वदेशी उनका एक प्रिय मुद्दा था, जिस पर वे बोल रहे थे। यह घटना संभवत: १४ साल पुरानी है। उनकी पूरी बात मुझे आज याद नहीं, लेकिन उन्होंने एक कथा सुनाई थी, जो मुझे आज भी याद है। वह मैं आप सबों को सुनाता हूं।
एक भारतीय सेठ ने जर्मनी से मैदा बनाने वाली मशीन मंगवाकर व्यवसाय शुरू किया। विदेशी मशीन का अपना जलवा था, खूबसूरत और भव्य दिखने वाली मशीन रंग-ढंग में अद्भुत थी, लेकिन जब मशीन ने काम करना शुरू किया, तो अचानक बंद हो गई। मैकेनिक ने वाशर बदला, मशीन फिर चली और फिर खराब हो गई, वाशर फिर बदला गया, फिर घिस गया। मशीन विफल सिद्ध हुई। मशीन बनाने वाली कंपनी से संपर्क साधा गया, तो पता चला जर्मनी से इंजीनियर के आने में महीने-दो महीने लग जाएंगे। सेठ बहुत परेशान हुआ, तभी उसे किसी ने बताया कि रामगढिय़ा समुदाय पास ही शहर में टिका हुआ है, क्यों नहीं आप किसी रामगढिय़ा को अपनी मशीन दिखवाते हैं। क्या पता वह ठीक कर दे?
यह सुनकर सेठ बिगड़ गया, विदेशी मशीन के बारे में देहाती-खानाबदोश रामगढिय़ा क्या जानें? मशीन सुधारने के लिए हाथ भी लगाया, तो और बिगाड़ कर रख देंगे।
उस व्यक्ति ने सेठ को समझाया, रामगढिय़ा लोगों को कम मत समझिए, यंत्र व अभियांत्रिकी के मामले में बड़े सिद्ध होते हैं। वैसे भी आपकी मशीन तो महीने भर बाद सुधरेगी, जब जर्मनी से इंजीनियर आएगा, इस बीच बैठने से अच्छा है कि किसी रामगढिय़ा को बुलाकर मशीन दिखलाई जाए और पूछा जाए।
सेठ को यह बात जंच गई। उनसे एक रामगढिय़ा को बुलवाया। बिल्कुल एक आम भारतीय की तरह ठेठ देहाती रामगढिय़ा सेठ के कारखाने पहुंचा। थोड़ी बहु़त बातचीत के बाद सेठ ने उसे मशीन का दर्शन कराया। उसने काफी देर तक मशीन को गौर से देखा, उसके बारे में मशीन चलाने वालों से चर्चा की। उसने कुछ कवरआदि को खोलकर देखा।
सेठ ने पूछा, क्या कुछ समझ में आ रहा है?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, पता लग गया है। एक जगह वाशर बार-बार टूट जा रहा है, क्योंकि थोड़ा चलते ही मशीन गर्म हो जा रही है।
सेठ ने पूछा, यह तो हमें भी पता है, हमें तो यह बताओ कि क्या तुम ठीक कर सकोगे?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, ठीक कर दूंगा।
सेठ चकित हुआ, पूछा, क्या करोगे?
जवाब मिला, कुछ देर का काम है? एक कांटी और हथौड़ी मंगवाइए।
सेठ ने डरते हुए ही अपने कर्मचारियों को कांटी और हथौड़ी देने का आदेश दिया।
रामगढिय़ा ने मशीन में एक निश्चित स्थान पर कांटी को अड़ाया और हथौड़ी मारकर छेद कर दिया और फिर वाशर बदल दिया। उसने कहा, सेठ जी अब मशीन चलवाइए।
सेठ ने पूछा, बन गई क्या? कोई और परेशानी तो नहीं हो जाएगी?
रामगढिय़ा ने आश्वस्त किया, घबराइए नहीं, अब कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए।
मशीन चलाई गई और खूब देर तक चली, बंद नहीं हुई।
सभी चकित और खुश थे। सेठ ने पूछा, तुमने क्या किया?ï क्या खराबी थी?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, वाशर को लगातार तेल नहीं मिल रहा था, इसलिए वह कट जा रहा था। उस तक तेल आने का रास्ता तो है, लेकिन घूमकर है, जब तक तेल की बूंद वाशर तक पहुंचती है, तब तक वाशर गर्म होकर कट जाता है। अब मैंने ऐसी जगह पर छेद किया है कि वाशर वाली जगह को लगातार तेल मिलता रहेगा, जिससे वह नहीं घिसेगा, मशीन चलती रहेगी।
सेठ बड़ा खुश हुआ। मैदा बनाने का काम चल निकला। सेठ ने रामगढिय़ा को खिलाया-पिलाया। बड़े प्रेम से चर्चा की। कई सवाल पूछने के सिलसिले में एक सवाल यह भी पूछ लिया, क्या तुम ऐसी ही मशीन बना सकते हो?
रामगढिय़ा ने जवाब दिया, हां, बना सकता हूं, मेरी बनाई मशीन इतनी सुंदर तो नहीं दिखेगी, लेकिन काम पूरा करेगी।
सेठ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उसने रामगढिय़ा को नई मशीन बनाने के लिए कह दिया।
लगभग महीने भर बाद जर्मनी से इंजीनियर आया, मशीन चलती हुई मिली। उसने पूछताछ की कि क्या खराबी थी, किसने ठीक की।
उसे बताया गया कि एक लोकल इंजीनियर ने मशीन ठीक कर दी है। मशीन चलाने वाले ने ही बताया कि रामगढिय़ा ने क्या किया कि मशीन चल पड़ी। जर्मन इंजीनियर के आश्चर्य का ठिकाना न था, उसने अपनी रिपोर्ट लिखी। उसके बाद बताते हैं कि उस कंपनी ने अपनी मशीन में सुधार किया। जो भी मशीन दक्षिण एशिया के गर्म देशों बेची गई, उसमें एक रामगढिय़ा इंजीनियर का आविष्कार भी शामिल था।
. . .
तो सुदर्शन जी इस कथा की सहायता से यह बता रहे थे कि भारतीयों में कोई कमी नहीं है, जो आदमी गरीब दिखता है, उपेक्षित दिखता है, उसमें भी कोई न कोई टैलेंट है। नई व्यवस्था कुशल भारतीय समुदायों के टैलेंट को भुलाकर काम कर रही है। हम स्वदेशी शक्ति को भुलाकर पश्चिम की ओर भाग रहे हैं। न जाने कितनी ऐसी ही सक्षम जातियों-उपजातियों को इस देश ने भुलाया और मिटाया है।
सुदर्शन जी हमेशा याद रहेंगे और उनकी यह कथा मेरे हृदय में हमेशा बसी रहेगी।
उनको मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान, सत्ता सुख और पूंजीवादी हवा के कारण निरंतर कमजोर होता और आदर्श गंवाता दक्षिणपंथ अपने एक सशक्त स्तंभ से वंचित हो गया है।

Sunday 9 September 2012

राजनीति बनाम लोकनीति 3


भाग - तीन
आज हमारा देश लोकनेता और लोकनीति की मांग कर रहा है, लेकिन उसे राजनेता और राजनीति की प्राप्ति हो रही है।
पिछले दिनों अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। सत्ता में बैठे घाघ नेताओं ने अन्ना पर बार-बार आरोप लगाया कि वे राजनीति कर रहे हैं, अन्ना इसका जवाब नहीं दे पाए। उन्हें यह कहना चाहिए था कि मैं लोकनीति कर रहा हूं। लोगों के पक्ष में बोल रहा हूं, लोगों को न्याय दिलाने के प्रयास में लगा हूं। मतलब यह कि राजनीति को केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि हमारे समाज के बड़े समाजसेवी भी गलत समझ रहे हैं। क्या आम आदमी राजनीति नहीं कर सकता? क्या वह कोई मांग करे, तो यह माना जाए कि वह राजनीति कर रहा है? आज के दौर के नेताओं की समझ पर तरस खाने का मन करता है। मैं तो कहूंगा कि यह राजनीति भी नहीं है, यह ‘लूटनीति’ है। इन लोगों ने किया क्या है? ‘डेमोक्रसी’ को बहुत हद तक ‘क्लेप्टोक्रसी’ में बदल दिया गया है। राजनेताओं का राज लुटेरों के राज में तब्दील हो गया है। कितने घोटाले हुए, उन्हें करने से कौन-कौन बच नहीं पाया, इसके विस्तार में जाना तो भयावह है। मुल्क को हमाम समझ लिया गया है, जहां वस्त्र है भी, तो केवल भ्रम फैलाने के लिए, दरअसल लगभग सभी निर्वस्त्र हैं। जो निर्वस्त्र नहीं है, वह निर्वस्त्रों की भीड़ में गुम हो जा रहा है। इस जगह पर हमें आज के राजनेताओं और राजनीति ने पहुंचा दिया है। विदेशी सरकारें हों या विदेशी कंपनियां यह मानकर चलती हैं कि ये लोग तो ऐसे ही हैं, इनके साथ कुछ भी किया जा सकता है। यह कौन-सी राजनीति है, जिसने भारतीयता और भारतीयों के सम्मान को क्षति पहुंचाई है? सच्ची राजनीति वह है, जो राजनेता के साथ-साथ देशवासियों और देश का सम्मान बढ़ाती है, लेकिन आज हमारे राजनेता क्या कर रहे हैं?
आम तौर पर मैं इस विषय पर बोलने से बचता हूं, यह पूजनीय रामबहादुर राय जी का प्रस्ताव था, जिसे मैं टाल नहीं सकता था। आज जरूरत लोकनीति की है, उसे कैसे मजबूत किया जाए, इस पर काम करने की जरूरत है। इस देश की सत्ता लोगों के हाथों में थी, लोगों ने सत्ता को लूटा नहीं था, हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने सत्ता लोगों को थमाई थी, लेकिन आज लोगों की सत्ता पर राजनेताओं और राजनीति का कब्जा हो गया है। नागरिक के मौलिक अधिकार, सम्मान, रोजी, रोटी, जान-माल यदि सुरक्षित हैं, तो फिर लोकनीति में आने की कोई जरूरत नहीं। यह देश सीधे-सादे लोगों का देश है, आम आदमी को अमन चैन के साथ दो वक्त की रोटी चाहिए। लेकिन राजनीति ने अगर जीवन से जुड़ी असुरक्षाओं को बढ़ा दिया है, अगर जनता के हाथ से सत्ता छिन गई है, तो फिर सत्ता पाने के लिए जनता को आगे आना ही चाहिए, इसे कोई अगर राजनीति समझता है, तो समझे। मजबूत हो चुकी सत्ता से अधिकार या सम्मान पाने का संघर्ष राजनीति ही है और राजनीति केवल राजनेताओं की बपौती नहीं है। अगर राजनेताओं ने अपने कत्र्तव्यों को निभाया होता, तो वे अपनी राजनीति में बने रह सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने कत्र्तव्यों को ढंग से नहीं निभाया है, तो उनकी राजनीति को अवश्य चुनौती मिलेगी और मिलनी ही चाहिए, ताकि अपने देश में लोकनीति बहाल हो। जय भारत . . .
समापन

राजनीति बनाम लोकनीति 2


दूसरा भाग
ऐसा क्यों हो रहा है? राजनीति का कौन-सा ककहरा हमारे राजनेताओं ने पढ़ा है? दरअसल, हमारे यहां पॉलिटिक्स नहीं, राजनीति होती है, अर्थात राज करने की नीति चलती है। जनता पर कैसे राज करना है, राजनीति का यही लक्ष्य है।
माफ कीजिएगा, मुझे इस ‘राजनीति’ शब्द पर ही आपत्ति है, इस शब्द से राजतंत्र की बू आती है। भारत को राजनीति का देश बनाने की बजाय लोकनीति का देश बनाना चाहिए था। पॉलिटिक्स शब्द लोकनीति के ज्यादा निकट है, जहां पॉलिटिक्स होती है, वहां यह बात दिखती भी है, लेकिन हमारे यहां राजनीति होती है, जहां नेता और जनता के बीच लंबी दूरी दिखती है। नेताओं और जनता के बीच शिकायतों का अंबार लगा हुआ है। शिकायतों का अंबार लगा ही इसलिए है, क्योंकि भारत में पॉलिटिक्स को समझा नहीं गया है, यहां पॉलिटिक्स नहीं, सतत राजनीति हुई है।
अगर थोड़ा विस्तार में जाएं, तो दरअसल यह राजनीति हमें अंग्रेज सिखा गए थे, हमने ‘लोकतंत्र’ को तो अपनाया, लेकिन हमने ‘राजनीति’ को कायम रखा, जबकि ‘लोकतंत्र’ में ‘लोकनीति’ चलनी चाहिए थी। राज या सत्ता को मजबूत करने के चक्कर में नीतियों का बंटाधार कर दिया गया। क्या हमारे राष्ट्रनिर्माताओं से यह भूल हुई थी? क्या राष्ट्रपति महात्मा गांधी से गलती हुई थी? गांधी जी को पढि़ए, गांधी जी कहते हैं, ‘स्वराज्य का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र रहने का निरन्तर प्रयास, फिर वह विदेशी सरकार हो या राष्ट्रीय सरकार। यदि देश के लोग जीवन की हर बात की व्यवस्था और नियमन के लिए स्वराज्य-सरकार की ओर ताकने लगें, तब तो उस सरकार का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।’
मतलब गांधी जी बिल्कुल सही सोच रहे थे। गलती उनसे नहीं हुई, गलती तो उन लोगों से हुई, जिन्होंने आजाद भारत की सत्ता का संचालन किया। सत्ता को मजबूत करने की नीति के बीज बोए गए। गांधी जी कहते थे, ‘सच्चा लोकतंत्र केन्द्र में बैठे हुए बीस व्यक्तियों द्वारा नहीं चलाया जाएगा, उसे प्रत्येक गांव के लोगों को नीचे से चलाना होगा।’ लेकिन आज राजनेता और राजनीति क्या कर रहे हैं, राजधानी में बिजली नहीं जाती, लेकिन गांवों में जब चाहे चली जाती है, पचास प्रतिशत से ज्यादा ऐसे गांव हैं, जहां बिजली आज भी वैसे नहीं पहुंची है, जैसे उसे पहुंचना चाहिए था। तो बिजली कहां पहुंची है? बिजली राजनेताओं की राजधानियों में पहुंची है। बिजली ठीक उसी तरह से राजधानियों में कैद हो चुकी है, जैसे सत्ता कैद हो चुकी है। सत्ता ने गांवों की ओर निकलना छोड़ दिया है। एकतरफा ट्रैफिक आजादी के बाद से ही चल रहा है, लोग गांवों से निकलकर शहर तो जाते हैं, लेकिन शहर से शायद ही कोई गांव लौट पाता है। राजधानियों में उजाला है और लोकधानियों यानी गांवों में अंधेरा है। गांधी जी जो करते थे, वह राजनीति नहीं, लोकनीति थी। उन्होंने कपड़ा त्याग दिया कि तभी पहनेंगे, जब सारे देशवासियों तक कपड़ा पहुंच जाएगा। रिचर्ड एटनब्रो ने १९८२ में फिल्म बनाई थी - ‘गांधी’। उसके उस दृश्य को मैं भूल नहीं पाता, जब गांधी जी किसी नदी के पुल के पास ठहरी ट्रेन से उतर कर नदी के जल से हाथ मुंह धो रहे हैं, पूरे भव्य गुजराती पहनावे में - लंबी पगड़ी से लेकर लंबी धोती तक और नदी के ही उस किनारे पर ही एक महिला कम वस्त्रों में अपनी लाज बचाने में जुटी है, गांधी जी से रहा नहीं जाता, वे अपने वस्त्र को नदी में बह जाने देते हैं, ताकि नदी की लहरें उस वस्त्र को जरूरतमंद गरीब महिला तक पहुंचा दें। ऐसा ही होता है, भावविभोर गांधी भीतर तक हिल जाते हैं कि वे इतने सारे वस्त्र ढो रहे हैं, इनकी जरूरत क्या है?
राजनेता और राजनीति गांधी जी की इस लोकनीति को आज भी नहीं समझ पाए हैं। गांधी जी अगर आज जीवित होते, तो आज भी वे पूरे वस्त्र नहीं पहन पाते, क्योंकि आज की राजनीति उन्हें पूरे वस्त्र पहनने नहीं देती। बिजली, पानी, सडक़ नहीं दे पाए, लेकिन लोकलुभावन योजनाओं का दौर सा चल रहा है। कहीं साइकिल बंटती है, कहीं अनाज, सिलाई मशीन, गैस स्टोव, रेडियो, कहीं आवास, कहीं नकद खैरात, कहीं अधूरी नौकरी, कहीं गाय-भेड़ का वितरण चल रहा है। तो कहीं शराब बंट रही है कि आदमी नशे में रहे और उसी को वोट दे, जो पिला रहा है। क्या यही राजनीति है? राज या सत्ता में बने रहने की नीति? माफ कीजिए, अगर यह राजनीति है, तो यह वाकई सफल है। आज के संदर्भ में राजनेता और राजनीति इस देश में सबसे कामयाब शब्द हैं। राजनेता वोटों के उद्योगपति हैं और राजनीति उद्योग। राजनीति की शेयरहोल्डिंग कंपनियां चल रही हैं, राजनीति के कारपोरेट घराने चल रहे हैं, राजनीति के बड़े-बड़े ऐसे सुगठित निगम चल रहे हैं, जिनका एक ही काम है, सत्ता में बने रहने की कोशिश व साजिश रचना। ऐसा नहीं है कि देश में केवल गरीब ही राजनीति का शिकार हो रहा है, अमीर भी उतने ही शिकार हैं। गरीबों को भी लूटा जा रहा है और अमीरों को भी। गरीब ज्यादा लाचार हैं, अमीर थोड़ा कम लाचार हैं। गरीब किसी को लूट नहीं सकता, लेकिन अमीर लोग राजनीति द्वारा होने वाली लूट की भरपाई करने में सक्षम हैं। नेताओं की बढ़ती आय पर जरा गौर फरमाइए, दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की जारी है। लोकनीति चलती, तो लोगों की आय तेजी से बढ़ती, राजनीति चल रही है, तो राजनेताओं की आय तेजी से बढ़ रही है।
क्रमश:

राजनीति बनाम लोकनीति


इलाहाबाद में त्रिवेणी सहाय स्मृति संस्थान द्वारा २ सितम्बर २०१२ को आयोजित सेमिनार में दिया गया मेरा उद्बोधन- विषय था : आज के संदर्भ में राजनीति और राजनेता

राजनीति बनाम लोकनीति

ज्ञानेश उपाध्याय
राजनीति शास्त्र की कोई पुरानी पोथी खोल लीजिए, तो आज की तरह के राजनेता उसमें कदापि नहीं मिलेंगे। आज के दौर में विशेष रूप से भारतीय राजनेताओं और राजनीति की परिभाषा बहुत बदल चुकी है। राजनेता किसे कहा जाए? क्या उसे जो पैसे लेकर तबादले करवाता है, नौकरी दिलवाता है, हर काम के लिए कमीशन लेता है और वोट प्राप्त करने के लिए हाथ जोडक़र खड़ा हो जाता है या उसे जो राजनेता होने का मात्र अभिनय करता है और जिसका धंधा दरअसल कुछ और है?
अंग्रेजी में राजनीति को पोलिटिक्स कहते हैं और यह शब्द ग्रीक भाषा के ‘पॉलिटिकस’ से आया है। पॉलिटिकस का मतलब है - लोगों का, लोगों के लिए, लोगों से सम्बंधित। पश्चिम में राजनीति हमारे यहां से कुछ ज्यादा ईमानदार नजर आती है, इसके अनेक उदाहरण हैं, अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन वाटरगेट कांड में फंसे थे। पार्टी के लिए फंड जुटाने के लिए वाशिंगटन स्थित वाटरगेट काम्प्लेक्स में स्थित डेमोके्रटिक नेशनल कमेटी के मुख्यालय में डाका डालने का प्रयास हुआ था, पांच लुटेरे पकड़े गए थे। एक तरह से यह साबित हुआ कि राष्ट्रपति के रूप में रिचर्ड निक्सन को पुन: निर्वाचित करवाने के लिए पैसे का जुगाड़ करने के लिए इस चोरी या डकैती की साजिश रची गई थी। निक्सन इस मामले को दबाने में जुटे रहे, झूठ बोलते रहे, वाइट हाउस के वकील जॉन डीन ने इस मामले की जांच के लिए कुछ भी नहीं किया था, लेकिन निक्सन ने विस्तृत जांच के लिए डीन को बधाई तक दे डाली। अंतत: रिचर्ड निक्सन का झूठ सामने आ ही गया। अमरीका में हल्ला हो गया कि झूठा राष्ट्रपति नहीं चलेगा। निक्सन ने ९ अगस्त १९७४ को इस्तीफा दे दिया। निक्सन अमरीका के इकलौते ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिन्हें गलत काम करने के कारण राष्ट्रपति पद से इस तरह इस्तीफा देना पड़ा। पश्चिमी देशों में जो ‘पॉलिटिक्स’ होती है, उसमें झूठ बोलकर अगर पकड़े गए, तो फिर बचना मुश्किल है, लेकिन हमारे यहां स्थिति ऐसी नहीं है।
झूठ बोलने के बाद पकड़े गए, तो इतने तरह के बहाने बनाए जाते हैं कि आम आदमी सोच भी नहीं सकता। अव्वल तो यह कोशिश होती है कि राजनेताओं और राजनीति का झूठ बाहर न आने पाए, स्वयं राजनेता पार्टी की सीमा से परे जाकर इसके लिए जीतोड़ प्रयास करते हैं। वही मामले सार्वजनिक होते हैं, जिनमें मिलीभगत का गणित फेल हो जाता है, सत्ता समन्वय की बजाय जहां दुश्मनी काम करने लगती है।
आइए अब राजनीति में चारित्रिक नैतिकता की बात कर लेते हैं। अमरीका के एक और राष्ट्रपति यौनाचार के मामले में फंसे, तो उनके खिलाफ महाभियोग चल पड़ा, उन्हें जार-जार रोना पड़ा, माफी मांगनी पड़ी, तभी देश ने माफ किया। लेकिन हमारे यहां एक बड़े नेता, चार बार मुख्यमंत्री रह चुके नेता ने यौनाचार के मामले में राज्यपाल पद से तो इस्तीफा दिया, लेकिन खुद को अवैध पिता साबित होने से बचाने के लिए मुकदमा लड़ते रहे, अंतत: हार गए, उसके बाद उनकी ओर से जो बयान आया, वह खास गौरतलब है - ‘मुझे अपने तरीके से अपना जीवन जीने का पूरा अधिकार है, मेरे निजी जीवन में झांकने का किसी को अधिकार नहीं।’
क्या यही बात यौनाचार में फंसे बिल क्लिंटन बोल सकते थे? नहीं वे नहीं बोल सकते थे, वहां सार्वजनिक जीवन में आए व्यक्ति का निजी जीवन भी बहुत हद तक जनता की जानकारी के दायरे में रहता है। जबकि हमारे यहां आठ साल से सरकार चला रहे राजनीतिक गठबंधन की मुखिया ने अमरीका में किस बीमारी का इलाज करवाया, इसे गुप्त रखा गया है। मतलब एक बड़े नेता की बीमारी भारत में जनता के मतलब का विषय नहीं है। दूसरे देशों में समय-समय पर नेताओं के हेल्थ बुलेटिन जारी होते हैं। जो पूरे देश के हेल्थ की चिंता कर रहा है, उसके अपने हेल्थ की चिंता क्या देश को नहीं होनी चाहिए? हां, भारतीय राजनीति में यही माना गया है कि नेता जितना बता दें, उसमें विश्वास कर लो, ज्यादा पूछोगे, तो इलाज के दूसरे तरीके आजमाए जाएंगे। अभी उत्तर प्रदेश में ही यह बताया जाता है कि किसी बच्चे ने पूछ लिया कि सरकार लैपटॉप कब बांटेगी, तो उसे हिरासत में ले लिया गया। मतलब यह कि आप सवाल मत पूछिए, चुपचाप सुनिए कि राजनेता या सरकार क्या बोल रही है।
हमारे यहां ऐसा क्यों हुआ? उन्मुक्त जीवन शैली वाले अमरीका में तो राजनीतिक नैतिकता का पैमाना बहुत शानदार है, लेकिन मर्यादाओं में बंधे हमारे देश में राजनीतिक नैतिकता की धज्जियां सरेराह उड़ाई जाती हैं।
क्रमश: