Friday, 13 December, 2013

दिलीप कुमार और भारत-पाकिस्तान मैत्री

(अपने प्रिय और भारत के सबसे ख्यात पद्धतिबद्ध अभिनेता दिलीप कुमार पर लिखे गए एक लम्बे लेख का अंश, उनके 92 जन्मदिन पर. )

दिलीप कुमार पाकिस्तान में भी बहुत लोकप्रिय हैं, पाकिस्तान के दर्शक भी उन्हें अपना कलाकार मानते हैं। पाकिस्तान की धरती और वहां के लोगों के प्रति दिलीप कुमार ने हमेशा प्रेम दर्शाया है। वे कभी भूल नहीं पाए कि वे भी पाकिस्तानी जमीन - पेशावर से भारत आए थे और पूरे होशो-हवाश में आए थे। पाकिस्तान की यादें उनके दिमाग में हमेशा बसी रहीं, उनके दिल ने कभी पाकिस्तान को पराया नहीं माना। अगर हम गौर करें, तो दिलीप कुमार ही नहीं, उनके दौर के बहुत से लोग न कभी कट्टर पाकिस्तानी हो पाए और न कभी कट्टर हिन्दुस्तानी, ये लोग भारत वर्ष में ही छूट गए। वे हमेशा उस अविभाजित भारत के ही नागरिक बने रहे, जिसे सियासत ने साजिश करके मजहब के आधार पर बांट दिया। विभाजन के समय ढेर सारे मुस्लिम पाकिस्तान लौट गए, कलाकारों की दुनिया में भी बंटवारा हुआ, लेकिन दिलीप कुमार ने यह जान लिया था कि कला की बड़ी दुनिया भारत वर्ष की इस विशाल भूमि पर विकसित होगी। उनका आकलन सही साबित हुआ, उन्हें कभी भी भारतीय दर्शकों ने धर्म के आधार पर नहीं आंका। उनकी फिल्मों को उतना ही प्यार मिला, जितना राज कपूर और देव आनंद की फिल्मों को मिला। 
पाकिस्तान और भारत की दोस्ती के बारे में वे हमेशा सोचते रहे और इसमें जहां तक हो सका, उन्होंने अपना सहयोग दिया। भारत और पाकिस्तान की मैत्री के सतत प्रयास करने वाला उनके जैसा कोई दूसरा अभिनेता न तो सीमा के इस पार हुआ और न उस पार। जब दुश्मनी की बयार चलती थी, तब भी दिलीप कुमार दोस्ती की धुन में मस्त रहते थे, वे दोस्ती के प्रति कभी निराश नहीं हुए। वर्ष १९९९ में जब कारगिल संघर्ष के बाद देश में पाकिस्तान के खिलाफ माहौल था, शिव सेना इत्यादि पार्टियों ने साफ-साफ कहा कि दिलीप कुमार पाकिस्तान द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मान 'निशान-ए-इम्तियाज' लौटा दें, लेकिन दिलीप कुमार ने तब भी भारत-पाकिस्तान की मैत्री की ही बात की और साफ कर दिया कि बांटने की राजनीति उन्हें बदल नहीं सकती।
वैसे यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि पाकिस्तान ने दिलीप कुमार के काम, योगदान, बयान से कुछ भी नहीं सीखा। पाकिस्तान के लोग बस इसी बात में मस्त रहे कि ये उनके धर्मभाई यूसुफ खान हैं, जो भारतीय फिल्म दुनिया पर राज कर रहे हैं। उनकी यह धारणा है कि यह महानायक पाकिस्तान की जमीन पर जन्मा है, तो पाकिस्तान का ही है। जबकि वास्तव में दिलीप कुमार पाकिस्तान की जमीन पर नहीं, अविभाजित भारत की जमीन पर जन्मे थे। किसी को भी इस बात पर आश्चर्य होगा कि दिलीप कुमार ने करीब ६१ फिल्मों में काम किया, जिसमें से केवल तीन ही फिल्मों में उन्होंने हिन्दू का किरदार नहीं निभाया। वर्ष १९६० में बनी 'मुगल-ए-आजम' में शहजादा सलीम के उनके किरदार से सभी परिचित है, लेकिन उनके द्वारा निभाया गया कोई अन्य मुस्लिम चरित्र लोगों को याद नहीं होगा। फिल्म दुनिया में आने के ११ साल बाद १९५५ में उन्होंने पहली बार किसी मुस्लिम का किरदार निभाया। इस वर्ष फिल्म 'आजाद' में अब्दुल रहीम खान की भूमिका निभाई, हालांकि इस फिल्म में वे एक हिन्दू किरदार में भी रहे। १९५८ में आई 'यहूदी' में वे शहजादा मार्कस के किरदार में रहे।
बहुतों को आश्चर्य होगा कि भारतीय यूसुफ खान ने जगदीश (फिल्म - ज्वार भाटा - वर्ष १९४४) के किरदार से फिल्मों में शुरुआत की थी और जगन्नाथ (फिल्म - किला - १९९८) के किरदार के साथ विदा हुए। दिलीप कुमार को मजहबी नजरिये से देखने वाले आश्चर्य करेंगे कि राम, रमेश, गंगाराम, श्याम, मोहन और शंकर जैसे नाम उन पर खूब जमते थे। वे कम से कम तीन बार राम बने और तीन बार शंकर।
इन तथ्यों की रोशनी में अगर हम दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर चर्चा करें, तो भारत में धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में उनके सामने कोई नहीं टिकता। यदि पाकिस्तान के लोग भारतीय दिलीप कुमार के सामाजिक योगदान पर थोड़ी भी निगाह डालेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि भारत वास्तव में किस चीज का बना है और धर्मनिरपेक्षता किसको कहते हैं। दिलीप कुमार एक प्रतीक हैं, जिन पर भारतीयता गर्व कर सकती है। भारत में प्रगतिशील सामाजिकता के निर्माण में उनका योगदान सर्वाधिक है, वे सांप्रदायिक घृणा की दीवारों को गिरा देते हैं। उनके बारे में कोई भी यह नहीं कह सकता कि राम, श्याम, शंकर इत्यादि नाम से किरदार निभाने में उनका क्या योगदान है। हमें यह पता होना चाहिए कि निर्माताओं और निर्देशकों से बहुत विचार-विमर्श के बाद ही दिलीप कुमार किसी फिल्म में अभिनय के लिए तैयार होते थे। वे न केवल अपने किरदार में बदलाव करते थे, बल्कि वे कहानी में भी बदलाव करते थे, अपनी फिल्म की पूरी योजना में वे शामिल रहते थे। इसलिए जो नाम उन्होंने अपने किरदारों के लिए चुने, उसके लिए उन्हें पूरा श्रेय देना चाहिए। दरअसल, उन्हें पता था कि कौन-सा नाम किस किरदार के ज्यादा मुफीद रहेगा और किन नामों की पहुंच लोगों तक सबसे ज्यादा होगी। वे चाहते, तो ऐसे नाम भी चुन सकते थे, जिनमें किसी हिन्दू ईश्वर के नाम का स्पर्श नहीं होता, लेकिन फिल्मों के प्रभाव के बारे में उनकी समझ बेमिसाल थी। उनके किरदारों के नाम भले राम, रमेश, शंकर, श्याम रहे, लेकिन उन्हें भारतीय मुस्लिम समाज ने भी दिलोजान से पसंद किया। उन्हें यह बात कभी नहीं चुभी की कोई यूसुफ खान राम, रमेश, शंकर, श्याम की भूमिका क्यों निभा रहा है। यही भारतीय समाज की ताकत है। भारतीय समाज को अपना सकारात्मक संदेश देने में दिलीप कुमार एक विचारवान अभिनेता के रूप में बहुत सफल रहे।
निश्चित रूप से भारतीय समाज में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। सामाजिक समरसता ही नहीं, राष्ट्रीय एकता और राष्ट्र प्रेम के मामले में भी उनका योगदान अतुलनीय है। आप क्रांति (१९८१) देखिए या कर्मा (१९८६) दिलीप कुमार अपने अनुपम अभिनय से देश प्रेम को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा देते हैं कि हर दिल उनके साथ गा उठता है :
हम जीयेंगे और मरेंगे,
ऐ वतन तेरे लिए,
दिल दिया है, जां भी देंगे,
ऐ वतन तेरे लिए।
दिलीप कुमार का जो वतन है, उसमें पाकिस्तान अनायास शामिल है। वे पाकिस्तान को अलग रखकर सोच ही नहीं सकते, पाकिस्तान को अलग रखकर सोचना उनके लिए अपने आप को बांटकर सोचने जैसा है। उनके लिए मजहब के खांचे में सोचना मुश्किल है, इस गीत को दिलीप कुमार आगे बढ़ाते हैं -
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम वतन हम नाम हैं,
जो करे इनको जुदा
मजहब नहीं इल्जाम है।
हम जीयेंगे और मरेंगे,
ऐ वतन तेरे लिए...
कट्टरता बहुत टुच्ची चीज होती है, उदारता - सहिष्णुता सदैव महान होती है। बहुत सारे लोग यह सपना देखते थे कि पाकिस्तान और भारत में दोस्ती हो जाएगी, कई लोगों का यह सपना समय के साथ टूटता गया। एक युद्ध, दो युद्ध, छद्म युद्ध और फिर सतत आतंकवाद ने पूरी दुनिया को पाकिस्तान के बारे में फिर से सोचने पर विवश कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार ने कभी यह आभास नहीं होने दिया कि वे अपनी सोच बदलने पर काम कर रहे हैं। दिलीप कुमार जैसों के बारे में वे लोग कभी ईमानदारी से नहीं सोच पाएंगे, जो १९४७ के बाद पैदा हुए हैं। हालांकि १९४७ से पहले ही अपना विचार पुख्ता करने वाले ऐसे लोग ज्यादा रहे हैं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान के अलग-अलग खांचों पर रहकर सोचना शुरू कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार वाली जमात भी रही, जो चाहकर भी अलग-अलग खांचों में नहीं सोच पाई। उनकी मानसिकता में वह विशाल देश ठहर-सा गया, जो वाकई सदियों से महान था। वह ऐसा महान देश था, जिसमें कभी घृणा के बीज जड़ें नहीं जमा पाए, घृणा के थपेड़ों को पछाड़ कर वह महान देश आगे बढ़ता गया। दुर्भाग्य से बाद में वह बंटा, नतीजतन कुछ लोग टूट गए, लेकिन कुछ लोग नहीं टूटे, उनमें से एक नाम दिलीप कुमार हैं। दौर कोई भी हो, प्रेम का स्थान घृणा से सदैव ऊपर रहेगा, दोस्ती का स्थान दुश्मनी से सदैव ऊपर रहेगा।
बेशक, यह अच्छा हुआ कि दिलीप कुमार पाकिस्तानी जमीन पर नहीं गए, वहां चले जाते, तो वे इतने बड़े कलाकार कभी नहीं हो पाते, यह वास्तव में पाकिस्तान के लिए भी लाभकारी रहा। पाकिस्तान के लोग जब भी पलटकर दिलीप कुमार का ईमानदार अध्ययन करेंगे, तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने क्या खो दिया और उनके बड़े पड़ोस ने क्या खूब पा लिया। आज हिन्दुओं के बीच एक यूसुफ खान है, जो बताता है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कैसा होना चाहिए।
हालांकि वे कभी नहीं चाहेंगे कि उन्हें मजहब के चश्मे से देखा जाए। वे यही मानेंगे कि कलाकार के लिए समाज सापेक्ष कला सबसे बड़ी चीज है। मजहब यहां खास मायने नहीं रखता। यहां इंसानियत और कलाकारी ही मायने रखती है। उन्होंने फिल्मों के जरिये भी कभी घृणा का व्यवसाय नहीं किया। वे हमेशा ही 'गाये जा गीत मिलन के...' वाले मूड में रहे। यह गौर करने की बात है कि यह 'मेला' फिल्म १९४८ में बनी थी, जब देश का विभाजन हो चुका था और उसका दर्द हावी था। बाद में दोनों ओर के माहौल के कारण जिस जगह वे घिरे रहे, उसका भी अफसोस हम पढ़ सकते हैं, 'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल...' (आरजू - १९५०), तो कभी 'ऐ मेरे दिल कहीं और चल', (दाग - १९५२)। कहीं न कहीं उनके अंदर बेचैनी थी, जो मुखर हो रही थी। शायद अनायास ही हो, लेकिन उनकी तड़प में अकेलापन, विरह या भटक जाने का भाव शामिल था। पाकिस्तान वास्तव में भारत से केवल अलग ही नहीं हुआ, बल्कि अलग-थलग हो गया। बहुत सारे लोग मजहब के आधार पर पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन दिलीप कुमार नहीं गए। वे संभवत: पाकिस्तान न जाकर भारत को चुनने वाले सबसे बड़े मुस्लिम अभिनेता थे। उनके अलावा निर्देशकों में सबसे बड़े महबूब खान, संगीत निर्देशकों में सबसे बड़े नौसाद और फिल्मी लेखकों में सबसे बड़े ख्वाजा अहमद अब्बास पाकिस्तान नहीं गए। यह सेकुलर भारत की एक बड़ी सफलता थी और मजहबी पाकिस्तान की एक बड़ी विफलता। वैसे यहां यह भी जोडऩा उचित होगा कि पाकिस्तान के निर्माता स्वयं मोहम्मद अली जिन्ना की इकलौती बेटी डिना वाडिया भी पाकिस्तान नहीं गईं। उनका मायका भी भारत था और ससुराल भी भारत रहा। 
खैर, अगर हम ध्यान दें, तो कहीं न कहीं भारत को चुनने वाले फिल्मी कलाकारों का काम पाकिस्तान को सम्बोधित लगता है। अगर भावना प्रधान होकर देखा जाए, अगर सिनेमा के जरिये भारत-पाकिस्तान के रिश्ते को देखा जाए, तो विशेष रूप से दिलीप कुमार पाकिस्तान को कुछ ज्यादा ही सम्बोधित करते लगते हैं। उनके कई गीत फिल्मी परदे से बाहर आकर एक अलग ही व्यापक अहसास पैदा कर देते हैं। जैसे १९५८ में आई उनकी एक फिल्म 'यहूदी' का एक गीत है, जिसे शैलेन्द्र ने लिखा है और शंकर-जयकिशन ने संगीत दिया है, मुकेश ने गाया है : ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सुरूर. . .
क्या उस दौर में भारत को रहने के लिए चुनना किसी दीवानेपन से कम था, इस माटी से मोहब्बत का सुरूर भी तो था। गीत इस तरह से शुरू होता है :-
दिल से तुझको बेदिली है, मुझको है दिल का गुरूर
तू ये माने के ना माने, लोग मानेंगे जरूर।
पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क हो गया, जिसे अपने दिल से ही बेदिली हो गई, दिल का कद्र न हुआ और भारत ऐसा है कि जिसे बड़े दिल वाला होने का घमंड हो गया। पाकिस्तान भले इस बात को न माने, लेकिन दुनिया यही मानती है। क्या ऐसा नहीं लगता कि 'यहूदी' फिल्म का नायक उलाहना दे रहा है, यह उलाहना नायिका के लिए है, लेकिन अगर नायिका की जगह पाकिस्तान को रखकर देखें, तो क्या होगा? नायक बोल रहा है :-
ये मेरा दीवानापन है, या मोहब्बत का सुरूर
तू न पहचाने तो है ये, तेरी नजरों का कुसूर
क्या यह बात भारतीयों के मन में नहीं आती है कि भारत की मोहब्बत को पाकिस्तान पहचान न सका, पाकिस्तान की नजरों का कुसूर था, जो उसने भारत में अपने सबसे बड़े दुश्मन को देखा। लेकिन देखिए फिर भी ज्यादातर भारतीय या दिलीप कुमार जैसे महान लोग यही उम्मीद करते हैं :-
दिल को तेरी ही तमन्ना दिल को है तुझसे ही प्यार
चाहे तू आए ना आए, हम करेंगे इंतजार।
बेशक, मिलन का चाह रखने वालों को निराशा हाथ लगती है। खत्म होते जा रहे हैं वो लोग, जो उन इलाकों में जन्मे थे, जो पाकिस्तान के नाम से जाना जाता है, एक दिन शायद खत्म हो जाएगी दिलीप कुमार की वह पीढ़ी, जो सेकुलर होने और मिलकर रहने का संदेश देती है। लगातार बंदूकें चल रही हैं, दहशतगर्द अमन-चैन को नाजुक मौका देखकर आग लगाने के लिए चप्पे-चप्पे पर फैल गए हैं, सिर काटे जा रहे हैं, दुश्मनी का वीराना-सा तैयार होता जा रहा है :-
ऐसे वीराने में एक दिन घुट के मर जाएंगे हम।
जितना जी चाहे पुकारो, फिर नहीं आएंगे हम।
ये मेरा दीवानापन है. . .। 
दिलीप कुमार का दिल जानता होगा कि हमने कितना कुछ खो दिया है। वे पाकिस्तान के बारे में जब बात करते हैं, तब कितना प्रेम झलकता है, मानो किसी अपने दिल के टुकड़े से बात कर रहे हों। पाकिस्तान ने क्या खो दिया है। लगातार हमले के बावजूद अपनी सेकुलरिटी बचाए रखने की कोशिश के साथ भारत कुछ खुश हो सकता है, लेकिन अंतत: खोया तो उसी अखंड भारत ने है, जिसमें दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ खान जन्मे थे। यह बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान के लोग दिलीप कुमार होने का मतलब समझें, तो वे भारत या हिन्दुस्तान का भी मतलब समझ पाएंगे।

Wednesday, 27 November, 2013

बदलता देश, दशक और फिल्मी नायक

(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका बहुवचन के सिनेमा विशेषांक में प्रकाशित मेरा एक शोध लेख - जो सिनेमा के १०० साल पर एक दृष्टि डालने का प्रयास कि कैसे देश बदला है, कैसे दशक और कैसे फिल्म नायक)

- ज्ञानेश उपाध्याय -
हम मनुष्य जब गर्भ में रहते हैं, तब भी हमारे पास दिल होता है धडक़ता हुआ। तब हमारे पास दिमाग भी होता है, लेकिन सुप्त-सा। छोटी-सी बंद और दबी-दबी-सी, गीली और रिसती हुई-सी जगह पर हम सब नौ महीने बिताते हैं। उन नौ महीनों की बातें किसी को याद नहीं रहतीं। ये नौ महीने तो ऐसे रहते हैं कि हमारी जिंदगी में जोडऩे लायक भी नहीं समझे जाते, लेकिन हम जब गर्भ से निकलकर खुले में आते हैं, तब हमारे दिन जुडऩे लगते हैं, हमारा इतिहास शुरू हो जाता है, लेकिन किसी को भी अपना शुरुआती इतिहास याद नहीं रहता। क्या यह संयोग नहीं है कि शुरुआती दौर की बहुत कम फिल्में हमें याद हैं। बताया जाता है कि मूक दौर में १२८८ फिल्में बनी थीं, लेकिन उनमें से मात्र १३ फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलती हैं। बाकी को हम भूल गए या भुला दिया। कहा जाता है कि गर्भकाल और शिशुकाल बहुत परतंत्र और कष्टमय होता है, इसलिए यह बेहतर है कि उसे भुला दिया जाए। प्रकृति ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि हम स्वत: अपने बीज और शिशु दौर को भूल जाते हैं। वैसे उन दिनों में जो फिल्में आईं, उनके नाम और परिचय तो हमें मिलते ही हैं और उनके दम पर भी हिन्दी फिल्मों का इतिहास बनता है।
कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फीचर फिल्म का जन्म १९१२ में ही 'पुंडलिक' नामक फिल्म से हो गया था, लेकिन सर्वस्वीकार्य रूप से भारतीय फीचर फिल्मों का जन्म १९१३ में माना गया है। यह वही वर्ष था, जब महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला था। उसके बाद साहित्य भले ही खूब रचा गया, लेकिन किसी भी भारतीय साहित्यकार को नोबेल नहीं मिला, दूसरी ओर, सिनेमा ने भी बहुत विकास किया, लेकिन कोई भी सम्पूर्ण भारतीय फिल्म सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान - ऑस्कर नहीं जीत सकी। अब इस पर बहस हो सकती है कि भारतीय सिनेमा और भारतीय साहित्य कितना परिपक्व हुआ है। इसी के साथ हम एक बहस यह भी जोड़ लेते हैं कि भारतीय नायक कितना परिपक्व हुआ है। यह तो दुनिया के परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि हो गई, लेकिन वास्तव में अगर मुख्य धारा की भारतीय फिल्मों की बात करें, तो उनमें अभी भी काफी बचपना है। सौ की उम्र पार करने के बाद भी फिल्मों में कमी खोजी जा सकती है, बचपना खोजा जा सकता है। सिनेमा, साहित्य और नायक, तीनों में यह बचपना बरकरार है। ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सिनेमा, साहित्य या नायक एकदम परिपक्व हो गए हैं या उनमें बचपना नजर नहीं आता, लेकिन वहां तुलनात्मक रूप से परिपक्वता और तार्किकता ज्यादा है और तभी वह सिनेमा पूरी दुनिया को अपील करता है, जबकि मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा की अपनी एक सीमा है। जैसे भारत, भारतीय समाज और भारतीय आधुनिक मन की एक सीमा है।
देश बदलता रहा है और उसके साथ-साथ फिल्में भी कुछ-कुछ बदलती रही हैं और साथ में उनके नायक भी बदलते रहे हैं। आज के देश, सिनेमा और नायक में हर दौर का कुछ न कुछ शामिल है। एक ही साथ अलग-अलग समय के दृश्य, प्रतीक, गुण और दोष चल रहे हैं। थोड़ा बचपन, थोड़ा किशोरपन, थोड़ी जवानी, थोड़ी प्रौढ़ता और थोड़ा बुढ़ापा, मानो मिलजुलकर कभी थोड़ा-तो कभी ज्यादा साथ-साथ चल रहे हैं। वैसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा जब जवानों की तरह बात करता है, तो उसे अपवाद स्वरूप लिया जाता है, ठीक वैसे ही जवानी में बचपन के लक्षण को अपवाद स्वरूप ही लिया जाता है। बचपन वास्तव में बचपन है और जवानी वास्तव में जवानी। इस बात को ध्यान में रखते हुए मोटे तौर पर समय और उसके प्रभावों को लेकर हम एक रोचक अध्ययन यह कर सकते हैं कि बदलते देश में बदलते दशक के साथ फिल्मी नायक कैसे बदलता चला गया।
दशक वार अगर हम देखें, तो नायक कुछ यों नजर आते हैं।
बीज नायक : 1910 का दशक
शिशु नायक : 1920 का दशक
किशोर नायक : 1930 का दशक
वयस्क नायक : 1940 का दशक
आदर्श नायक : 1950 का दशक
प्रेमी नायक : 1960 का दशक
असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
यथार्थवादी नायक : 1980 का दशक
प्रवासी नायक : 1990 का दशक
विलासी नायक : 2000 का दशक
भ्रमित नायक : 2010 का दशक
भारतीय फिल्मों के शुरुआती दो दशक बीज नायक और शिशु नायक को समर्पित रहे। हम जीना और चलना सीख रहे थे। हमें ठोकर लग रही थी, हम गिर रहे थे, फिर उठकर चल रहे थे। फिल्मों ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां सुनकर-सुनाकर बचपन बिताया। हमें यह अहसास नहीं था कि हम समाज से भी नायक उठा सकते हैं, तो हमने लगभग सभी नायक अपने पुराणों और इतिहास से उठाए। भारतीय सिनेमा ने पौराणिक कथाओं के साथ ही शुरुआत की और यह कहा जाता है कि शुरुआती वैचारिक बुनियाद तो बचपन में ही बनती है, हमें बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, उनसे ही हमारा मानस बनता है। तो कोई आश्चर्य नहीं, आज भी भारतीय फिल्मों की ज्यादातर कहानियां पौराणिक कथाओं-महाभारत-रामायण के कथा-ढांचे से बाहर नहीं आ पाई हैं। दर्शकों को नायक और खलनायक के संघर्ष में आज भी बहुत आनंद आता है। ज्यादातर आधुनिक भारतीय फिल्मों ने भी यह आनंद लेना और देना नहीं छोड़ा है। अच्छे-अच्छे निर्देशक यह ढांचा तोडऩे की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर को फिर पारंपरिक ढांचे में आकर काम करना पड़ता है। यानी भारतीय फिल्मों के बीज और शिशु नायक ने आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा है।
यह वही दौर था, जब भारत की आजादी के नायक सिर उठा रहे थे, उनके सब्र का बांध टूटने लगा था, उन्हें समझ में आने लगा था कि देश की मुक्ति के लिए खड़ा होना पड़ेगा। यह कहा जाता है कि बिना मांगे कुछ नहीं मिलता और बिना रोए मां दूध नहीं पिलाती, तो यह वह दौर था, जब फिल्मों ने रोना और मांगना शुरू किया।  
क्रमश:

एक बंगला बने न्यारा

किशोर नायक : 1930 का दशक 
भाग - 2
१९३० वह वर्ष था, जब गांधी जी दांडी मार्च पर निकले थे। उन्होंने फैसला कर लिया था कि अंग्रेजों द्वारा थोपे गए उन तमाम कानूनों को तोड़ेंगे, जो अन्याय के प्रतीक हैं। इसी वर्ष गांधी जी को अन्य भारतीय नेताओं के साथ प्रथम गोलमेज बैठक के लिए लंदन बुलाया गया था। देश की आवाज सुने जाने की बुनियाद तैयार हो चुकी थी और संयोग है कि १९३१ में भारतीय फिल्मों ने भी बोलना शुरू कर दिया। फिल्मकार अर्देशर ईरानी की 'आलम आरा' रिलीज हुई। विश्व पटल पर भारत की आवाज को साफ होने में वक्त लगा, ठीक उसी तरह से १९३० के दशक में फिल्मों में आवाज को साफ होने में वक्त लगा। कई फिल्में तो १९३४ तक मूक ही बनती रहीं। जैसे एक शिशु धीरे-धीरे बोलना शुरू करता है और धीरे-धीरे ही उसकी आवाज साफ होती जाती है, ठीक उसी तरह से १९३० का दशक भारतीय फिल्मों की आवाज साफ होने का दौर है। कहा जाता है कि छोटे बच्चे खूब बोलते-गाते हैं, तो १९३२ में बनी फिल्म इंद्रसभा में ६९ गीत थे, क्या यह चौंकने वाली बात है?
इस दौर में भारत में संघर्ष के अनेक स्रोत तैयार हो रहे थे, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी निर्माण के स्तर पर संघर्ष के अनेक स्रोत सामने आ रहे थे। अंग्रेजी राज का फिल्मों पर साफ असर था, अंग्रेज चाहते थे कि फिल्मों में खुलापन तो हो, लेकिन आजादी या संघर्ष की गूंज न हो। ऐसे में इस दशक में भी लगभग दो तिहाई फिल्में धार्मिक चरित्रों व पौराणिक आख्यानों को आधार मानकर बनीं। पौराणिक आख्यानों पर फिल्म बनाना फिल्मकारों के लिए भी लाभ का सौदा था, क्योंकि तब तक ऐसे आख्यानों को लोगों ने किताबों में ही पढ़ा था। बोलती-भागती तस्वीरों का आनंद बढऩे लगा था, ऐसे में, लोग पर्दे पर किसी सुनी-पढ़ी कहानी को देखकर भावविभोर हो जाते थे।
वैसे इसी दशक में समकालीन सामाजिक कथाओं पर फिल्म बनाने की शुरुआत हो गई थी, जैसे मुंशी प्रेमचंद ने फिल्मकार मोहन भवनानी के लिए फिल्म लिखी थी 'द मिल', जो १९३४ में रिलीज हुई थी। बताया जाता है कि इस फिल्म का मजदूर समाज पर गहरा असर हुआ था, फिल्म देखकर मजदूर भडक़ जाते थे। प्रदर्शन के बाद दंगे जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी, लाहौर, पंजाब, दिल्ली इत्यादि शहरों में इसे प्रतिबंधित भी किया गया था। लोगों को उद्वेलित-उत्तेजित करने वाली फिल्मों में 'द मिलÓ को भारत की पहली फिल्म माना जाता है।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९३५ में वी. शांताराम की 'अमृत मंथन' रिलीज हुई थी और आगे के दशकों में एक मास्टर फिल्मकार के रूप में स्थापित हुए महबूब खान की 'जजमेंट ऑफ अल्लाह'। बताते हैं कि 'अमृत मंथन' में जूम शॉट्स की शुरुआत हुई थी, यानी चीजों पर करीब से फोकस करने की शुरुआत। १९३० के दशक में फिल्मों के बारे में यह अहसास होने लगा था कि इन्हें हंसी में नहीं उड़ाया जा सकता। देश का मानस बनाने में फिल्मों का बहुत योगदान न था, लेकिन फिल्में उस दिशा में बढऩे लगी थीं। समाज और फिल्मों के बीच सम्बंध बनने लगा था। समाज फिल्मों को समझ रहा था और फिल्में समाज को समझ रही थीं। १९३० के दशक में ही भारतीय सिनेमा की कुछ अच्छी हस्तियों की फिल्मी मानसिकता तैयार हुई। फिल्में नौटंकी, रामलीला और पारसी थियेटर से बढक़र भी कुछ हो सकती हैं, इसका अहसास होने लगा। अच्छे घरों के युवक-युवतियां भी फिल्मों में आने के बारे में सोचने लगे थे। जो लोग फिल्मों को बुरा माध्यम समझते थे, वे भी फिल्मों की उपेक्षा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि ईश्वरीय चरित्रों, संतों, ऐतिहासिक चरित्रों इत्यादि पर ढेरों फिल्में बन रही थीं। लोग विज्ञान का जादू और धार्मिक कथा के आकर्षण में खिंचे चले आते थे। कुल मिलाकर १९३० के दशक में यह लगने लगा था कि फिल्में कुछ खास करने वाली हैं। इस दौर में के.एल.सहगल सबसे बड़े स्टार थे, वे अभिनेता से ज्यादा गायक थे। उनका अभिनय सादा और सतही-सा होता था, मानो किशोर दौर का शिशु स्तरीय अभिनय। वे ढंग से नाटकीय भी नहीं हो पाते थे। दूसरे शब्दों में कहें, तो सहगल के अभिनय में भी अलग तरह का भोलापन था, जैसे इस देश के लोग भोले थे, ठीक उसी तरह से। के.एल.सहगल न गायकी में प्रशिक्षित थे, न अभिनय में, वे अभिव्यक्ति एवं प्रदर्शन के लिए संघर्षरत थे, जैसे यह देश संघर्षरत था। जैसे देश के लिए किया जा रहा संघर्ष सबको प्रेरित कर रहा था, ठीक उसी तरह से सहगल द्वारा किया गया संघर्ष भी बहुतों को प्रभावित कर रहा था। उस दौर में अभिनेता और आम लोग सहगल की तरह गीत गाने और अभिनय करने में आनंद की अनुभूति करते थे और लगता था कि सबकुछ ऐसे ही चलेगा। १९३५ में ही पी.सी. बरुआ ने सहगल को मुख्य भूमिका में लेकर 'देवदास' का निर्माण किया था। आज अगर इस 'देवदास' को कोई देखे, तो सबकुछ बड़ा बचकाना लगेगा, लेकिन हंसने वाली कोई बात ही नहीं है, क्योंकि वाकई यह फिल्मों के लिए किशोर दौर था। फिल्में ठीक से बढऩा, बोलना और दौडऩा सीख रही थीं।
फिल्में तो अपने बचपन व किशोरवय को छोडक़र आगे बढ़ गईं, लेकिन वास्तव में देश १९३० के दौर की बहुत-सी चीजों को आज भी ढो रहा है। जैसे इसी दौर में सांप्रदायिकता और जातिवादी राजनीति भी उभरने लगी थी। १९३५ में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास हो चुका था और देश में विभिन्न स्तरों पर संघर्ष के अनेक बचकाने प्रयोग हो रहे थे, कुछ ऐसे प्रयोग आगे चलकर युवा या अधेड़ हुए, लेकिन कई प्रयोग आज भी बचकाने ही लगते हैं और वैसे ही बने हुए हैं। १९३० के दशक का अध्ययन अगर किया जाए, तो हम पाएंगे कि इस दशक में अंग्रेज देश को बांट रहे थे, भारत को ११ प्रांतों में बांट दिया गया था, बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया था। कांग्रेस में फूट पड़ गई थी। सुभाष चंद्र बोस ने अपना अलग रास्ता चुन लिया था। वैसे संयोग व दुर्भाग्य से नेताजी का यह प्रयोग भी अगले दशक में बहुत हद तक बचकाना-सा ही सिद्ध हुआ।
दूसरी ओर, यह सुखद संयोग है कि इस दशक में भारतीय राजनीति और समाज में पुख्ता रूप से कुछ हस्तियां उभरीं, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी के.एल. सहगल, सोहराब मोदी, मोतीलाल, अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर जैसे अच्छे अभिनेता उभरे, जिन्होंने बाद की पीढिय़ों को अपने अच्छे काम से बहुत प्रभावित किया।
क्रमश:

अंखिया लड़ाके... चले नहीं जाना

वयस्क नायक : १९४० का दशक
भाग - 3
इस दशक में फिल्मी माहौल कुछ गंभीर होने लगा था, लडक़पन तो काफी हद तक पीछे छूट गया था। पौराणिकता के प्रति आकर्षण कम होने लगा था और फिल्में समकालीन समाज को सम्बोधित करने लगी थीं। इस दौर में फिल्मी नायक को एक पुख्ता रूप देने में जिन गंभीर फिल्मकारों का नाम लिया जा सकता है, उनमें देविका रानी, महबूब खान, नितिन बोस, वी. शांताराम, अमिय चक्रवर्ती, के.ए.अब्बास, केदार शर्मा, कमाल अमरोही और राज कपूर इत्यादि प्रमुख हैं। इनमें से कुछ फिल्मकार कहीं न कहीं इटली में उभरे फिल्मी नवयथार्थवाद से प्रभावित थे। नवयथार्थवादी फिल्में समय की मांग थीं। विश्व युद्ध से पीडि़त दुनिया, जिसमें बहुत गरीबी, बेरोजगारी और असमानता थी, वर्ग संघर्ष बढ़ गया था, आजादी की मांग बढ़ गई थी, विज्ञान भी तेज तरक्की कर रहा था, ऐसे में फिल्मों को ज्यादा समय तक समकालीन चेतना से बचाया नहीं जा सकता था। जैसे दुनिया में नवयथार्थवादी सिनेमा सशक्त होकर उभरा, वैसे ही भारत में भी ऐसे फिल्मकार होने लगे, जिनकी नजर केवल बाजार या टिकट खिडक़ी पर नहीं थी, जो समाज के बारे में भी निरंतर सोच रहे थे। हालांकि लोगों में भी मुक्ति की चाहत थी। भारत की अगर बात करें, तो आजादी की चाहत इस दशक में शिखर पर थी, समस्याओं से स्वतंत्र होने और राहत पाने की इच्छा थी। यह दुनिया में अंग्रेजों की हार का दशक था, भारतीय युवा विजेता के रूप में खड़ा हो चुका था और भारतीय फिल्मी नायक भी विजेता के रूप में पहचान बनाने लगा था। फिल्में राह दिखाने की मुद्रा में आने लगी थीं। जहां मनोरंजन करना उनका ध्येय होता था, वहीं उनमें यह प्रगतिशीलता भी गहरे बसने लगी थी कि लोगों और समाज का भी कुछ भला करना है, कोई न कोई अच्छा संदेश देना है। गांधीवादी, माक्र्सवादी या समाजवादी प्रभाव फिल्मों में स्पष्ट दिखने लगा था।
यह वही दशक है, जिसमें संगीत भी खुलकर रंग जमाने लगा। यह महज संयोग नहीं है कि संगीत का आनंद और संगीत की मनमोहक लय तभी बनी, जब देश आजाद हुआ। आजाद हवा में गीत गाने और सुनने का आनंद बढ़ गया। देश १९४७ में आजाद हुआ, तो मानो फिल्मी संगीत को कोठों और नाटकीयता के करीब पहुंच रही शास्त्रीयता से आजादी मिली। दो फिल्मों ने भारत में संगीत के व्याकरण को काफी हद तक बदल दिया और संगीत को सुगम-सुलभ-सरस बना दिया। १९४९ में ही राज कपूर की 'बरसात' फिल्म रिलीज हुई थी, जिसमें शंकर-जयकिशन ने कमाल कर दिया था। इसी वर्ष दूसरी संगीत प्रभावी फिल्म थी, कमाल अमरोही की 'महल', जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने भी संगीत को सुगम बनाने में योगदान दिया। लता मंगेशकर के नेतृत्व में देश के ज्यादातर गायकों की आवाज भी आजाद हुई और नकल या नाक के प्रभाव से अपनी-अपनी मौलिक आवाज की ओर गायक बढ़ चले। वाकई मौलिकता ही शानदार निर्माण में कारगर होती है। देश में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे और फिल्मी दुनिया में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे। फिल्में पूरी तरह से देश का साथ देने लगी थीं। पंडित नेहरू की नीति समाजवाद की निकट थी, तो ज्यादातर फिल्में भी समाजवादी प्रभाव में थीं।
इस दशक में हम अगर कोई एक प्रतीक नायक खोजने की कोशिश करें, तो थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन दिलीप कुमार को हम इस दशक का प्रतिनिधि नायक मान सकते हैं। वर्ष १९४५-४६ में नितिन बोस के निर्देशन में दिलीप कुमार की भूमिका वाली फिल्म 'मिलन' आई थी। बाम्बे टॉकीज की यह फिल्म दिलीप कुमार की पहली हिट थी। इसके पहले दिलीप कुमार 'ज्वार भाटा' और 'प्रतिमा' फिल्म में काम कर चुके थे, लेकिन जब 'मिलन' आई, तो उनकी मैथड एक्टिंग या पद्धतिबद्ध अभिनय को देखकर स्पष्ट हो गया कि न केवल भारतीय फिल्मों को एक वयस्क नायक मिल गया है, बल्कि अभिनय में भी वयस्कता आ गई है। 'मिलन' के बाद दिलीप कुमार की इसी दशक में नौ और फिल्में आईं और वे प्रेमी, समर्पित नायक के रूप में हर दिल अजीज हो गए।
क्रमश:

मैंने दिल तुझको दिया


आदर्श नायक : १९५० का दशक
भाग - 4
१९५० का दशक आदर्श दौर है। इस दौर में फिल्मकारों के दिमाग में भी देश और समाज के प्रति चिंतन हावी था। यह महबूब खान, दिलीप कुमार, राज कपूर, बिमल राय, के.ए.अब्बास, गुरुदत्त, चेतन आनंद, देव आनंद का चरम दौर है। इसी दशक में सत्यजीत राय ने भी अपनी सजग चेतना से पूरे भारतीय चिंतन को प्रभावित किया। इस दौर की शुरुआत में 'आवारा' जैसी बेहतरीन फिल्म आई, 'मदर इंडिया और 'जागते रहो, जैसी फिल्म भी इसी दौर में बनी। १९५५ में राज कपूर की फिल्म 'श्री ४२० आई। इस फिल्म में नायक अमीर होने के लिए गलत राह पर चल पड़ता है, लेकिन अभिनेत्री अपने आदर्श से जरा भी नहीं डिगती और अंतत: नायक भी आदर्श की ओर लौट आता है। इस दौर की फिल्मों में आदर्श की जीत बहुत आम परिघटना थी। गलत से गलत व्यक्ति भी आदर्श की ओर लौट आता था या जो नहीं लौटता था, वह मारा जाता था। इसी दौर में शंभु मित्रा की 'जागते रहो' जैसी शानदार फिल्म आई, जिसमें यह दिखाया गया कि अमीर होने के लिए लोग क्या-क्या करते हैं और एक ईमानदार गरीब आदमी पानी के लिए भी तरस जाता है, वह पानी भी पीता है, तो उसे चोर कहा जाता है। इस फिल्म का गरीब नायक खड़े होकर पूरे समाज को आईना दिखा देता है।
वास्तव में १९५० का दशक भारतीय फिल्मों में नायकत्व के सशक्त होने का समय है। भारतीय समाज सदा से नायक की तलाश में रहा है, कोई ऐसा नायक, जो सबके लिए बात करे, सबके लिए लड़े, सबको सम्बोधित करे। इस दशक में सरकार के अंदर ही अनेक नायक थे, जो आजादी की लड़ाई से होकर उभरे थे। महात्मा गांधी का दौर बीत चुका था, पंडित जवाहरलाल नेहरू का दौर चल रहा था। नेहरू फिल्म प्रेमी व्यक्ति थे। वे फिल्म वालों की लोकप्रियता से प्रभावित रहते थे। उनके समय सरकार ने फिल्मों के विकास के लिए कई तरह से प्रयास शुरू किए, इससे भी फिल्मों में नायकत्व को बल मिला। पहले के दशकों की अपेक्षा इस दशक में फिल्में ज्यादा बेहतर ढंग से सुलझने लगीं, साफ-साफ अपनी बात रखने लगीं। गरीबी, अभाव, तरह-तरह के भेदभाव, जातिवाद, सांप्रदायिकता, फासीवाद, हिंसा इत्यादि देश की बड़ी समस्याओं को फिल्मों ने बहुत तरीके से भरपूर मनोरंजन करते हुए भी प्रस्तुत किया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता का अगर चुनाव किया जाए, तो दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर के बीच में हमें राज कपूर को चुनना चाहिए, क्योंकि वे एक ही साथ कई तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे थे। निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, संपादक इत्यादि की भूमिका में वे अपने समकालीन स्टारों से आगे थे। हां, इसी दौर में एक और प्रतिनिधि नायक-अभिनेता को भी श्रेय देना चाहिए, बलराज साहनी। इनके बिना यह दशक आदर्श नहीं बनता, बिमल राय के निर्देशन में 'दो बीघा जमीन' फिल्म बलराज साहनी के लिए ही नहीं, बल्कि इस दशक में नया सिनेमा के लिए भी उत्कर्ष है।
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक आदर्शों और समाजवादी मूल्यों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थक था, लेकिन उसे ठीक से प्यार करना नहीं आता था। प्यार की अनुभूति मजबूत आकार नहीं ले सकी थी। 'अरेंज्ड मैरेज' का समाज था, जैसी समाज और परिवार की इच्छा होती थी, युवा वैसा ही करते थे। अपने प्यार की बलि चढ़ा देते थे या समझ ही नहीं पाते थे कि प्यार में क्या किया जाए। ध्यान दीजिए, इसी दौर में बिमल राय ने 'देवदास' का निर्माण किया। एक ऐसा नायक जो न ठीक से प्यार कर सका, न ठीक से प्यार पा सका। गुरुदत्त की 'प्यासा' में भी यही हुआ। देवदास अगर चाहता, तो बहुत आसानी से पारो से विवाह करके सुखी हो जाता, पारो उसे बहुत चाहती थी, लेकिन फिर वही जमींदारी, लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। फिर उसे चंद्रमुखी से प्यार हुआ, लेकिन वह भी मुकाम पर नहीं पहुंच सका, फिर वही लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। शायद यह एक तरह से प्रगतिशीलता का आह्वान था कि देखो, व्यक्तिगत प्यार की कोई औकात नहीं, देश को देखो, समाज को देखो और तब फैसला लो। एक तरह से इस दशक में नायक यह तो बोल सका कि मैंने दिल तुझको दिया, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ा सका, क्योंकि उसमें साहस का अभाव था। प्रेम की पुकार की तुलना में देश, समाज और परिवार की पुकार बड़ी थी।
फिर भी १९५० के दशक का फिल्मी नायक सम्पूर्ण हिन्दी सिनेमा का सबसे प्रभावी नायक है, इसकी नकल आज भी हो रही है। हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि १९५० के दशक का नायक ही भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर ले गया था। राज कपूर दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय थे, ठीक वैसे ही जैसे विश्व पटल पर नेहरू राजनीतिक दुनिया में चर्चित थे। पंडित नेहरू समाजवादी थे और उस दौर के राज कपूर भी समाजवादी। यह एक अलग तरह के आश्चर्य का समय था, सरकार भी नैतिकता के साथ समता और संपन्नता के सपने देख रही थी और फिल्मों ने भी यही किया। उस दौर की सरकार भी सेकुलर होने के प्रयास में थी और फिल्में भी ठीक ऐसा ही कर रही थीं। कोई शक नहीं, जब भी भारतीय फिल्मी नायक का विश्वास डिगेगा, उसे १९५० के दशक के पूर्वज नायक से सीखना पड़ेगा और देश को तो अपनी बेहतरी के लिए उस दशक के अनुभवों से हमेशा सीखना चाहिए। इस दशक में बहुत कुछ है सीखने के लिए। 
क्रमश:

पीया तो से नैना लागे रे

प्रेमी नायक : 1960 का दशक
भाग - ५
यह दशक प्रेमियों का दशक था। इस प्रेम का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था, तो उसकी मस्ती भी देखने लायक थी, ताजा खिले फूल की तरह। राज कपूर ने ही एक तरह से प्रेम का ट्रेंड सेट किया, १९६२ में उनकी फिल्म आई 'जिस देश में गंगा बहती है', उसमें एक गाना है, 'प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा।' यह एक तरह से नारा था कि प्यार की ओर बढ़ा जाए, क्योंकि प्यार नहीं, तो कुछ भी नहीं। इसी दशक में 'मुगले आजम' का गीत - जब प्यार किया तो डरना क्या... खूब गूंज रहा था। प्यार की मांग बढ़ गई थी। दरअसल, १९६२ में भारत को युद्ध में पराजय मिली, लोग निराश थे, नेहरू और उनके युग की विदाई हुई। १९६५ में भारत को फिर युद्ध लडऩा पड़ा, ऐसे में, गीत-संगीत और प्रेम ने टूटे व घायल दिलों पर मरहम लगाने का काम किया। फिल्में राहत की तरह थीं।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९६५ में शानदार गीतों से सजी 'गाइड' रिलीज हुई। प्रेम ही फिल्म का केन्द्र था। एक गाना मानो पूरी कहानी कह रहा है - कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन, गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल...। १९६४-६५ में ही राज कपूर की फिल्म 'संगम' की धूम थी। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं...
नायक की इस मनोकामना ने इस दशक में अपना चरम देखा। प्रेम का दौर था, फिल्में सौभाग्य से रंगीन हो गई थीं। सपनों को चार चांद लग गए थे। 'संगम' में राज कपूर अपना कैमरा लेकर दुनिया घूमने निकल गए। यह रंगीन होने का ही नतीजा था कि फिल्मी नायक विदेश घूमने निकल गया। देश की राजनीति में भी तरह-तरह के बदलाव और प्रयोग चल रहे थे, सत्ता बदल रही थी, सत्ता का स्वभाव बदल रहा था, तनाव बढ़ रहा था, ऐसे में, फिल्मकारों ने महसूस किया कि उनका काम है लोगों को अच्छा अनुभव कराना, क्योंकि लोग पैसे खर्च करके सिनेमा देखने आते हैं। वे अच्छा देखें, अच्छा सुनें, फिल्मकारों का यही लक्ष्य बनने लगा। यह वही दशक है, जब मेकअप का काम बढ़ गया, बनावट पर जोर दिया जाने लगा। वास्तविकता पाश्र्व में जाने लगी। राजू गाइड (गाइड) से हीरामन गाड़ीवान (तीसरी कसम) तक, सारे नायक प्रेम के पीछे भाग रहे थे। दिल का मामला नाजुक हो रहा था। यह गाना भी खूब चला कि आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. . .। लोग भी बहुत खुश थे, इस दौर में प्रेम शायद इसलिए भी ज्यादा चल गया, क्योंकि गीतों के शब्द शानदार थे और संगीत भी। 
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक और नायिका, दोनों के ही 'सेक्स अपील' में इजाफा हुआ। यह अपील कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि इस अपील में उस दौर में बहुत साफगोई थी। प्यार था, सुन्दरता थी, लेकिन अनुशासन भी था। किसी के लिए मर मिटने का इरादा था, सुन्दर दिखने की चाहत थी, साफ-सुथरा रहने का प्रयास था। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा असर पड़ा। एक अच्छा और साफ-सुथरा मध्य वर्ग और मध्यवर्गीय मानसिकता को तैयार करने में इस दौर के नायक ने काफी मदद की। शहरों में सुधार आया, कॉलेजों के माहौल में सुधार आया, कुछ खुलापन आया, परस्पर सामाजिकता बढ़ी, प्रेम की स्वीकारोक्ति बढ़ी, प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी। इस दौर की पारिवारिक फिल्मों ने भी समाज और देश को काफी कुछ सिखाया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता अगर हम चुनें, तो शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना सबसे आगे नजर आएंगे। विशेष रूप से, आज भी न देव आनंद जैसा कोई नायक मिला है और न राजेश खन्ना जैसा। दोनों ही नायकों का अलग-अलग स्नेहिल प्रभाव था, दोनों ही नायक ऐसे थे, जिनके लिए जान देने को लोग तैयार थे। कहा जाता है कि लोग इन नायकों को खून से खत लिखते थे। दोनों ही रोमांटिक और सुदर्शन अभिनेता थे। यह भी एक खास बात है कि इस दौर में अच्छा दिखने वाले अभिनेताओं की भारी मांग थी। इसी दशक में फिल्मी नायक या अभिनेता बनना कठिन हो गया। फिल्म बनाने का खर्च बहुत बढ़ गया था। स्टार छवि की मांग बढ़ गई थी। फिल्म निर्माण की चुनौती बढ़ गई थी। इस दशक के आखिर तक श्वेत-श्याम फिल्मों ने पूरी तरह से विदाई ले ली। रंगीन रुपहले पर्दे पर मजबूती से टिकना आसान नहीं रहा। वैसे प्रेम की डगर पर टिकना भी आसान नहीं होता। हम नहीं भुला सकते कि फिल्मी नायकों ने इस दशक में फिल्मों में जितना आदर्श प्यार किया, उतना अन्य किसी दशक में देखने में नहीं आया।
(क्रमश:)

देना पड़ेगा मोहब्बत का इम्तेहान

असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
भाग - 6
जब यह दशक शुरू हुआ, तो लोगों में असंतोष की भावना आ चुकी थी। यह असंतोष संगीतमय ढंग से भी उभरने लगा था। १९७१ में कमाल अमरोही की फिल्म 'पाकिजा' के एक गाने की देश में बड़ी गूंज थी - इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...  हमरी न मानो सिपहिया से पूछो, जिसने... भरी बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा...। इस दौर का नायक व्यवस्था से निराश होने लगा था। सरकारी नीतियों और सरकारी लोगों का शिकंजा कसने लगा था। देश में लोगों और नायकनुमा तमाम लोगों को यह अहसास हो गया था कि देश की समस्याओं का समाधान उतना आसान नहीं है, जितना कि १९५० के दशक में सोचा गया था। राजनीति कोरे वादों से अपना काम चला रही थी। तत्कालीन राजनीतिक नायक सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराने लगे थे। साहित्य में भी सरकार के प्रति निराशा और रोष का भाव आने लगा था। नायक विचलित होने लगे थे। ऐसे में, जब यह गाना बजा कि इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा, तो मानो यह अहसास हुआ कि देश की धरती गुहार लगा रही है, शिकायत कर रही है कि उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। 

इस दशक में नायक का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ा, 'जंजीर' आई, तब भी ठीक था, क्योंकि नायक सरकार के दायरे में ही था, वह सरकार का अंग बनकर समाधान तलाश रहा था, लेकिन उसके बाद दशक के ठीक बीच में १९७५ में 'शोले' आई, जिसमें नायक सरकार से बाहर आ चुका था, क्योंकि सरकार में रहते हुए उसे न्याय नहीं मिला था, 'शोले' का ठाकुर पहले पुलिस अधिकारी था, लेकिन जब पुलिस की नौकरी करते हुए उसका परिवार मार दिया गया, उसके हाथ काट दिए गए, तब निराश होकर उसे व्यवस्था से बाहर आना पड़ा और तब उसके सहयोगी बने दो अपराधी। सरकार की व्यवस्था से इतर एक व्यवस्था बनी, जिसने डकैतों से लोगों को मुक्ति दिलाई। एक तरफ पीडि़त पक्ष था, दूसरी तरफ खलनायक था, जिसका व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं था, तो तीसरी तरफ दो अपराधी थे, जो पैसे के लिए ही खलनायक को मारने के लिए तैयार हुए थे। देश की व्यवस्था ऐसे बिगड़ रही थी कि एक भ्रम खड़ा हो गया कि इसमें नायक कौन है। कुछ लोगों ने पीडि़त पक्ष - ठाकुर - को नायक माना, तो किसी ने अपराधी जय-वीरू को नायक माना, तो ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने खलनायक गब्बर सिंह को ही नायक मान लिया। यह कहा जाता है कि असंतोष से क्रोध होता है और क्रोध के माहौल में आदमी अंधा हो जाता है। हम यह देखते हैं कि यह भ्रम समाज में बाद के दशकों में बढ़ता चला गया, एक दौर ऐसा भी आया, जब गब्बर सिंह ही नायक मान लिया गया, 'शोले' के जय (अमिताभ बच्चन) ने गब्बर सिंह जैसा किरदार बहुत शौक से -दूसरों से छीनकर- निभाया। इसमें कोई शक नहीं कि १९७० का दशक असंतुष्ट नायकों का दौर है। तत्कालीन राजनीति पर अगर गौर करें, जहां एक ओर, प्रतिपक्ष (जयप्रकाश नारायण) में असंतोष का भाव था, वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष (इंदिरा गांधी) में देश में फैले असंतोष के प्रति रोष का भाव था। संघर्ष की स्थिति बनी, तो पीडि़त पक्ष को एक हद तक खुशी मिली, लेकिन वह वास्तविक जीत से वंचित रह गया। दोनों पक्ष के नायकों ने उसे निराश किया। सम्पूर्ण क्रांति का उत्थान और उसकी विफलता इसी दशक की घटनाएं हैं। यह असंतोष और विरोधाभास का दशक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता पक्ष ने सेंसरशिप का प्रयोग किया था, आपातकाल लगा था। अखबारों ही नहीं, फिल्मों पर भी नजर रखी जाती थी। एक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' में सत्ता के प्रति विरोध का भाव था, तो इस फिल्म की मूल कॉपी को सत्ता पक्ष के महाबलियों ने नष्ट कर दिया था। कला से राजनीति तक चहुंओर असंतोष का भाव था।
हम यह कह सकते हैं कि इस दशक में भी निराशा, असंतोष या दुख का टोन राज कपूर ने सेट किया था। वर्ष १९७०-७१ में चर्चित रही 'मेरा नाम जोकर' फिल्म की ब्यंजना बहुत गहरी है। गरीबी और प्रेम में जब निरंतर निराशा हाथ लगती है, तब नायक जोकर बन जाता है। हम गरीब जनता ने सरकारों को चुना, बनाया, लेकिन सरकारें कहीं और समर्पित रहीं। इस फिल्म का जोकर भी तो यही करता है, अपने भोलेपन से अपने बड़े होने तक, एक के बाद एक नायिकाओं को चुनता है, चाहता है, आगे बढ़ाता है और नायिकाएं किसी और को समर्पित हो जाती हैं, तो यह अकेला, निराश आम आदमी जोकर ही तो है! वह समस्याओं से भरपूर सर्कस में खड़ा है और उसके हिस्से की तमाम खुशियां-नायिकाएं दूर चली गई हैं। वास्तव में सरकार की उपेक्षा ने आम आदमी को जोकर बनाकर रख दिया। 'मेरा नाम जोकर' को ऐसे भी देखना चाहिए। वैसी बड़े दिल वाली फिल्म बनाने का साहस फिर किसी ने नहीं किया, क्योंकि जनता जोकर दिखना नहीं चाहती। उसे तो उन सबसे बदला लेना है, जिन्होंने उसे ठगा है, लूटा है, तरह-तरह से उत्पीडि़त किया है। इस दशक में यह सिद्ध हो गया कि भारतीय नायक जोकर नहीं बनेगा, वह लड़ेगा, दुश्मनों को चुन-चुनकर मारेगा। पर्दे पर गुंडे जब पिटते थे, तब लोगों की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते थे, आज भी आ जाते हैं। गुस्से को हिंसा से रिलीज करने का शौक भारतीय नायकों को १९७० के दशक में ही हुआ है और वे आज भी अपना यह शौक पूरा करते हैं और जनता तालियां बजाती है। १९६० के दशक का प्रेमी फॉर्मूला और १९७० के दशक की मारधाड़ - एक्शन का फॉर्मूला आज भी आजमाया जाता है और हिट होता है। सफल फिल्मी व्याकरण इस दशक में ज्यादा स्पष्ट हुआ। प्रेम, संगीत, ड्रामा, हास्य और मारधाड़, ये पांच विधाएं ऐसी थीं, जिन्होंने भारतीय फिल्मों में खुद को मजबूत कर लिया। इन विधाओं का अच्छा सम्मिश्रण आज भी हिट और सुपर हिट होता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दशक के प्रतिनिधि नायक अमिताभ बच्चन हैं। इस दशक का मध्य वर्ष १९७५ बहुत महत्वपूर्ण है, अमिताभ की 'दीवार', 'शोले' और 'फरार' इसी वर्ष की फिल्में हैं, जिनमें वे एंग्री यंगमैन की भूमिका में बेहतरीन तरीके से उभरे। वैसे इस दशक में रोष को जाहिर करने वाले अभिनेताओं में धर्मेन्द्र को नहीं भुलाया जा सकता। कुत्ते, मैं तेरा खून पी जाऊंगा. . . जैसा सिनेमाई संवाद धर्मेन्द्र के अलावा और किसी पर नहीं जमा। अमिताभ समय के साथ खुद को बदलते रहे, लेकिन १९७० के दशक में गुस्से वाले आदमी के रूप में धर्मेन्द्र की जो छवि बनी, उसने उनका पीछा नहीं छोड़ा और इसका प्रभाव उनके बेटे सनी देओल की छवि पर भी पड़ा। ठीक इसी तरह से १९७० के दशक में जो हिंसक मानसिकता पैदा हुई, वह आगे की पीढिय़ों को मिलती चली गई। देश में मुखर रोष के प्रतिनिधि इस दशक ने देश और फिल्मी नायक को भी हमेशा के लिए बदल दिया। 
(क्रमश:)

पापियों के पाप धोते-धोते

यथार्थवादी नायक : 1980  का दशक
भाग - 7
दशक की शुरुआत में ही देश ने समझौता कर लिया। राजनीति में जिन नायकों को देश ने पिछले दशक में सत्ता से बाहर कर दिया था, उन्हीं लोगों को देश फिर सत्ता में ले आया यह सोचकर कि तुलनात्मक रूप से यही बेहतर नायक हैं। यानी देश ने यथार्थ या वस्तुस्थिति को स्वीकार कर लिया। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस दौर में यथार्थवादी फिल्मों की बाढ़-सी आ गई। नायक का नजरिया जमीनी हकीकत की ओर मुड़ा। आदर्शवाद हो, प्रेम हो, असंतोष हो, हर जगह यथार्थ दिखाने की कोशिश होने लगी। समानांतर सिनेमा का आंदोलन इसी दौर में सशक्त होकर उभरा। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अनुपम खेर इस दौर के चर्चित यथार्थवादी नायक-नायिका थे। यह उम्मीद एक तरह से टूट चुकी थी कि फिल्मी नायक कोई क्रांति करेंगे, फिल्मी नायक तो उसी कथा को दर्शकों के सामने परोस रहे थे, जो कथा खुद दर्शकों के बीच बिखरी हुई थी। एक होड़-सी थी कि समाज की गंदगी या कमी को कौन बेहतर ढंग से सिनेमा में पेश करेगा, भ्रष्टाचार को कौन सबसे वीभत्स रूप में पेश करेगा। 
इसी दशक के बिल्कुल मध्य में १९८५ में राज कपूर ने 'राम तेरी गंगा मैली' का निर्माण किया। यह फिल्म सुपर हिट हुई। बात खुल चुकी थी, तो स्त्री शरीर बोलिए या स्त्री का सौंदर्य बोलिए, यह भी यथार्थ ही था। इस फिल्म पर अश्लील होने का आरोप लगा, तो फिर लोग क्यों इसे देखने गए? क्या यह एक यथार्थ नहीं है कि लोग अश्लीलता देखना चाहते थे, यह बात अलग है राज कपूर सौंदर्य दिखाना चाहते थे। यह बात ठीक उसी तरह से थी, मानो आपने समाज, शासन, प्रशासन का यथार्थ देख लिया, तो आप शरीर का भी यथार्थ देख लीजिए। भ्रष्टाचार, अन्याय हर किसी के साथ था, तो शरीर भी तो हर किसी के साथ था, फिर भी लोग देखना चाहते थे। पुरुष भी यथार्थ देखना चाहते थे और स्त्रियां भी। 'राम तेरी गंगा मैली' स्त्रियों के बीच भी बहुत चर्चित हुई। एक नदी या गंगा का प्रदूषण भी तो यथार्थ ही था, ...राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते...। नदी का प्रदूषण आज भी व्यावसायिक सिनेमा का विषय नहीं बन पाया है, लेकिन १९८० का दशक ही कुछ ऐसा था कि इस दौर का सबसे बेहतरीन व्यावसायिक सिनेमा भी यथार्थवादी हथियार से लैस था।
इस दशक की प्रतिनिधि फिल्म के रूप में हम 'मशाल' फिल्म को भी देख सकते हैं। दिलीप कुमार और अनिल कपूर की भूमिका वाली इस शानदार फिल्म में बदलते और निष्ठुर होते समाज को बहुत अच्छी तरह से उकेरा गया था। समाज में लोग एक दूसरे की मदद करने से पीछे हटने लगे थे, लोग मतलबी होने लगे थे। लोग घी निकालने के लिए अपनी उंगली टेढ़ी करने लगे थे, इन सब सच्चाइयों को 'मशाल' फिल्म में बखूबी दर्शाया गया। 

इस दशक में टूटते परिवारों की सच्चाई को भी बेहतरीन तरीके से पेश किया गया। फिल्मी नायक ने पारिवारिक परेशानियों से जूझने में काफी वक्त लगाया। प्रेम भी था और हिंसा भी। इस दशक में यथार्थवाद की ऐसी लहर थी कि लगता था कि फिल्में फिर कभी सपनों की ओर नहीं लौटेंगी। व्यावसायिक फिल्में परिवार और मनुष्य सम्बंधों पर केन्द्रित होकर यथार्थ दिखा रही थीं, वहीं दूसरी ओर, समानांतर फिल्में समाज का ठोस यथार्थ दिखा रही थीं। इलाज दोनों में से किसी के पास नहीं था, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि फिल्में एक तरह से पलायन की शिक्षा दे रही थीं। नायकत्व दाव पर लग गया था, क्योंकि नायक सताए जा रहे थे, दूसरे चरित्रों द्वारा संचालित होने लगे थे।
 देश की राजनीति में भी ठीक ऐसा ही हो रहा था, देश की राजनीति के नायक भी दूसरों के हाथों की कठपुतलियों-से बन गए थे। उन्हें तरह-तरह की चौकडिय़ां घेरने लगी थीं। नेताओं को मजबूर किया जा रहा था कि वे भ्रष्टाचार, गरीबी, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता जैसी सच्चाइयों को स्वीकार कर लें। इस दशक में नायक सांप्रदायिकता की ओर मुड़े, बड़े घोटाले हुए, उच्च स्तरीय धोखेबाजी हुई। असंतोष का इलाज न हुआ, तो आतंकवाद की भी जमीन तैयार हुई। इस दशक में देश का यथार्थ खुलकर सामने आ गया, हम भारतीय भले ही गंगा की पूजा करते हों, लेकिन हम स्वयं अपने हाथों से गंगा का गला घोंट रहे हैं। हम यह कह सकते हैं कि यह भारतीय नायकत्व के ढहने का दशक था। कोई भी नायक नैतिकता के पैमाने पर ज्यादा टिक नहीं पा रहा था, समझौते करने पड़ रहे थे। फिल्मी नायकों ने भी खूब समझौते किए। समाज को समझौतावादी और पलायनवादी बनाने में इस दशक के नायकों का सर्वाधिक योगदान है।
कोरा सच बहुत कम लोगों को अच्छा लगता है, इसलिए जो फिल्में ज्यादा यथार्थवादी थीं, उनको खरीदने वाला कोई न था। विडंबना है कि नायकत्व की हत्या करके स्वयं नायक के रूप में उभरने वाला समानांतर सिनेमा रोजी-रोटी के लिए तरसने लगा था। इस दशक में समाजवादी और कलावादी, दोनों ही तरह के नायक उभरे, इन दोनों को ही व्यावसायिकता पसंद नहीं थी। हालांकि यह भी बड़ा सच है कि दोनों ही तरह के नायक अपने सिद्धांतों पर मुस्तैदी से टिक नहीं सके, दोनों ने ही कम या ज्यादा, देर या सबेर व्यावसायिकता का लाभ लिया। 
इस दशक के अनेक प्रतिनिधि नायक-अभिनेता हैं - अनिल कपूर, ऋषि कपूर, जैकी श्रॉफ, सनी देओल, संजय दत्त, नसीरुद्दीन शाह इत्यादि। अनिल कपूर विशेष रूप से टपोरी वाला अंदाज लेकर आए। टपोरीपना भी अपने समय का एक सच था, जो बाद के दशकों में भी साथ-साथ चलता रहा।
(क्रमश:)

अब यहां से कहां जाएं हम

प्रवासी नायक : १९९० का दशक
(भाग - 8}
आदर्श भी देखे, प्रेम भी, असंतोष भी, यथार्थ भी, तो उसके बाद स्वाभाविक सवाल था ... अब यहां से कहां जाएं हम...। फिल्मी समाज ने समझ लिया कि खुद को बदलना होगा। ज्यादा यथार्थवादी हुए, तो संगीत-गीत की अहमियत घटती जाएगी, फिल्में सपना दिखाने का काम छोड़ देंगी, फिल्म का व्यवसाय मुश्किल हो जाएगा। तो फिल्मों ने यथार्थवाद की ओर से ध्यान हटाना शुरू किया। देशी नायक तो भ्रष्ट हो चुके थे, इतने यथार्थवादी हो चुके थे कि उनके सहारे सपने गढऩे का काम असंभव हो गया था। पिछले दशक में व्यावसायिक सिनेमा का नायक भीड़ में शामिल होकर बौना हो चुका था, नायिका सास या समाज के हाथों बुरी तरह से सताई गई थी, तो दूसरी ओर, खांटी समानांतर सिनेमा का नायक (नसीरुद्दीन शाह) 'पार' के बेघर मजदूर की तरह था या इसी फिल्म की नायिका (शबाना आजमी) की स्थिति एक गर्भवती सुअरी से भी बदतर हो चुकी थी। ऐसे नायक और नायिका सपनों की सौदागरी या कालाबाजारी में सहायक नहीं हो सकते थे, अत: १९९० के दशक में फिल्मों ने नायक-नायिका का विदेश से आयात किया। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेज नायक-नायिका आयात हुए, आयात तो वही नायक-नायिका हुए, जिनके पूर्वज या पिता विदेश जाकर बस गए थे।
हम देखते हैं कि इसी दौर में देश ने आर्थिक उदारीकरण (वर्ष १९९१) को स्वीकार किया, विदेशियों, विदेश में बसे भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों की अहमियत बढ़ी। प्रवासी भारतीयों के लिए स्वर्ण युग शुरू हुआ। जैसे भारत सरकार ने विदेश में देश का भविष्य देखा, वैसे ही फिल्मों को भी अपना भविष्य विदेश में नजर आया। 

इस दशक के ठीक मध्य में फिल्म आई 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे। यह फिल्म ब्रिटेन-यूरोप से शुरू होती है और भारत आकर संपन्न होती है। प्रेम अंतरराष्ट्रीय हो चुका है और भारत एक मिलन स्थल या विवाह स्थल है। यह फिल्म न केवल सवाल उठाती है कि यहां से कहां जाएं हम, बल्कि उत्तर भी देती है कि तेरी बांहों में मर जाएं हम। यानी सपना फिर हावी हो गया, बांहों में मर जाने का सपना कितना यथार्थवादी है, यह सब जानते हैं, लेकिन लोग फिर भी सपनों की ओर मुड़े, क्योंकि वे कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी के यथार्थ को भूल जाना चाहते थे। अपनी गंदी समस्याग्रस्त गलियों से दूर कहीं किसी मनोरम देश में लोग खुद को महसूस करना चाहते थे। कोई आश्चर्य नहीं, मानव सदा से ऐसा ही रहा है। वह जहां है, वहां से काफी दूर जाकर सोचना चाहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा भी अकसर कहते थे कि 'एक अच्छी रचना पाठकों को दूसरे संसार में ले जाती है।' फिल्में भी तो यही करती हैं, हॉलीवुड की फिल्म हों या बॉलीवुड की।
सुभाष घई की 'परदेश' हो या करण जौहर की 'कुछ कुछ होता है', प्रवासी भारतीय चरित्रों को लेकर ऐसी अनेक फिल्में बनीं, जिन्होंने दुनिया भर में बसे भारतवंशियों को लुभाया, बुलाया। यह फिल्मी नायक के रूप में शाहरुख खान का चरम दौर था। वे ताजा हवा के झोंके की तरह दीवाना बनकर आए थे, यथार्थ का बोझ उनके साथ नहीं था। प्रेम की चाहत थी, जिसके लिए वे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच सकते थे। पूंजी उनके पास बहुत थी। तलाश थी, तो सिर्फ प्रेम की। इसमें कोई शक नहीं कि यही वह दशक था, जब भारतीय समाज का प्रवासी नायकों के प्रति मोह अत्यधिक बढ़ गया। भारतीय बाप अपनी बेटियों के लिए प्रवासी दूल्हे खोजने लगे थे, मानो देश के अंदर पूंजीवाले दूल्हों का अभाव हो गया हो। सपनों को फिर पंख लग गए थे। भारतीय युवाओं को भी लगने लगा था कि उनकी कीमत तभी है, जब वे भी प्रवासी हो जाएं या फॉरेन रिटर्न हो जाएं। विदेश में पढ़ाई, नौकरी करने से नायकत्व हासिल होने लगा। लोग कबूतरबाजों के हाथों में फंसकर कबूतर बनकर विदेश जाने को लालायित थे, क्योंकि नायक होने का रास्ता विदेश में ही खुलने लगा था। यही वह दशक था, जिसमें विदेश में भारतीयों की संख्या बढ़ी और फिल्मकारों को प्रवासी दर्शकों के बारे में भी सोचना पड़ा। जैसे विदेशी पूंजी भारतीय लाभांश की ओर आकर्षित हुई, ठीक उसी तरह से विदेश में बसे अनेक प्रवासी व विदेशी कलाकार रुपहले पर्दे पर हिस्सेदारी के लिए भारत आने के सपने देखने लगे।
(क्रमश:)

इश्क दी गल्ली बिच...

विलासी नायक : २००० का दशक
(भाग - ९)
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भारत ने नई सदी में प्रवेश किया था। तकनीक, इंटरनेट से उपजी सूचना क्रांति ने देश के मिजाज को बदल दिया था। मल्टीप्लेक्स, मॉल, विदेशी उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की भरमार, विदेशी गाडिय़ों का चलन बढ़ गया था। युवा भारत की विकास गति सुधर गई थी। ऐसा लगने लगा था कि भारत अब तरक्की करता चला जाएगा, पीछे मुडक़र देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खूब पैसा आया, ऋण लेकर घी पीना आसान हो गया। मध्य वर्ग के जो सपने पिछले दशकों में साकार नहीं हुए थे, वो इस दशक में साकार होने लगे। ऋण लेकर घर बनाना, पढ़ाई करना, विदेश जाना आसान हो गया। मस्ती की पाठशालाएं सज गईं। भारतीय समाज के एक हिस्से में कुछ संपन्नता आई। प्रभु वर्ग की तनख्वाहें बढ़ गईं। सरकारी योजनाओं में गांव के स्तर तक वितरण और लूट की संभावना बढ़ी। समाज में पैसा बढ़ा। तो सिनेमाई नायक विलासी हो गया। महंगी गाड़ी, महंगे ब्रांडेड कपड़े, महंगे विदेश दौरे, महंगे होटल, महंगी गर्लफ्रेंड, महंगे गिफ्ट का दौर आ गया। मुख्यधारा में जो फिल्में बन रही थीं, उनमें पैसा कोई मुद्दा नहीं रहा। नायक के पास ज्यादा काम नहीं था, समाज इत्यादि की ज्यादा चिंता नहीं थी, उसके पास पूरा समय था कि वह जिम जाकर 'सिक्स पैक' बना सके। सिक्स पैक बना लेने से दुश्मनों से लडऩे, शर्ट खोलने, नाचने-गाने, नायिका का दिल जीतने, खलनायकों को डराने और दर्शकों को लुभाने में सुविधा होने लगी। गरीबी से लडऩे वाले, समाज की समस्याओं से पीडि़त होने वाले सिंगल पैक बॉडी वाले नायक पीछे छूट गए, उनकी जगह सिक्स पैक वाली समृद्ध जमात आ गई। एक समय दारा सिंह और धर्मेन्द्र इत्यादि को अच्छी बॉडी का मालिक माना जाता था, ये भारतीय फिल्मों के ऐसे पहलवान थे, जिन्हें दुश्मनों से लडऩे के लिए मांसपेशियों की जरूरत नहीं पड़ी थी। अमिताभ बच्चन भी अपने चरम दौर में सिंगल पैक वाले नायक थे। २००० के दशक में पूरा मिजाज ही बदल गया। जिन फिल्मों को कभी खेतों में काम करने वाले मेहनती गठीले नायकों की जरूरत नहीं पड़ी थी, वे सिक्स पैक वाले नायक मांगने लगीं। इस दशक में यह पूरी तरह से स्थापित हो गया कि अंग प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहेगा, नायक को भी ऐसा शरीर बनाना पड़ेगा कि वह भी अंग प्रदर्शन में नायिकाओं से मुकाबला कर सके। इस दशक में विलास का फायदा यह हुआ कि नायक अच्छे शरीर धारी होने लगे, लेकिन चरित्र का पतन भी प्रबल हुआ। 

२००० के दशक के मध्य वर्ष २००५ में एक फिल्म सुपर हिट हुई, 'नो एंट्री। यथार्थ के स्तर पर बेतुकी कॉमेडी फिल्म, लेकिन दर्शकों को खूब पसंद आई। फिल्म के केन्द्रीय नायक थे सलमान खान। अच्छे शरीरधारी नायकों में अग्रणी। वास्तविक जीवन में अविवाहित, लेकिन सिलसिलेवार प्रेम सम्बंधों वाले सबसे चर्चित और प्रशंसित फिल्मी नायक। 'नो एंट्री' में उनका किरदार पूरे इस दशक का प्रतिनिधि किरदार बनकर उभरता है। वे एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी समर्पित पत्नी को छोडक़र दूसरी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनके संपर्क आधुनिक गणिकाओं से भी हैं, बल्कि वे उनका अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं। आधुनिक गणिका भी फिल्म की मुख्यधारा में अहम किरदार है, तो इसका श्रेय उस विलासी नायक को ही देना चाहिए, जिसके लिए मौज-मस्ती ही सबकुछ है, उसके सामने चरित्र चर्चा बेकार है। नायक दोगला भी है, वह अपनी पत्नी और प्रेमिका से तो पूरी ईमानदारी की मांग कर रहा है, लेकिन खुद अव्वल दर्जे का बेईमान है।  इस विलासी नायक के दौर में ही हम देखते हैं कि समाज में परिवार, सम्बंध, निष्ठा, बंधुत्व या मित्रता का पतन, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन इत्यादि चिंता के विषय नहीं रह गए। फिल्मों ने ईमानदारी को क्षणिक तत्व या एक क्षणिक अवस्था मान लिया। इस दशक में विलास के प्रति आकर्षण ऐसे बढ़ा कि बेईमानी भी स्वीकार्य-सी हो गई। अच्छाई या अच्छी बातों का रोमांच खत्म-सा हो गया। पैसे का डंका बज उठा।
इसी दौर में 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्म भी आई, जिसमें नायक बहुत क्षमतावान था, कुशल था, लेकिन छात्र जीवन में ही वह शराब का सेवन करने लगा था। रेंचो नाम का यह नायक सफल रहा, फिल्म भी सफल रही, लेकिन सच्ची बात तो यह थी कि इस नायक ने एक झूठे नाम और परायी पूंजी के दम पर पढ़ाई की थी। उसकी पढ़ाई और उसके नायकत्व के आधार में झूठ था। नायक ने पराई पूंजी का सदुपयोग कर ढंग से पढ़ाई की, इसे तो लोगों ने देखा, लेकिन लोगों ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि नायक ने शराब पीकर और दोस्तों को पिलाकर इस पराई पूंजी का दुरुपयोग भी किया। अनजानी शादी में भोजन करने पहुंच गया, पिं्रसिपल के घर उत्पात में शामिल हुआ और प्रश्न पत्रों की चोरी भी की। इस फिल्म ने यह प्रमाणित कर दिया कि गरीबों के लिए भी नैतिकता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रही, केवल विलास महत्वपूर्ण हो गया। गरीबों को भी यही शिक्षा दी गई, पूंजी कहीं से भी ले लो, मस्त जीवन जीयो, अपना मतलब साधो और आगे निकल जाओ। इस दौर में नायकों के विलास की भी कोई सीमा नहीं रही, सारे बंधन टूट गए। ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें अधेड़ उम्र के नायकों को नई नवेली नायिकाओं से प्रेम हो गया। पिछली सदी के महानायक घोषित हो चुके अमिताभ बच्चन ने भी ऐसी भूमिकाओं को दो बार (चीनी कम और नि:शब्द) निभाया। विवाहेत्तर सम्बंधों वाले इस विलासी दौर में गरीब और देहाती नायक दुर्लभ हो गए। अमिताभ अपने चौथे फिल्मी दशक में विराजमान थे, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बदलते वक्त का साथ दिया, कभी बैंक में डाका डालने वाले बने, तो कभी डॉन, तो कभी केवल पैसे के पीछे भागने वाले चरित्र। चरित्र की बात करें, तो अमिताभ बच्चन ने 'कभी अलविदा ना कहना में 'सेक्सी सैम जैसे विलासी चरित्र को निभाकर अच्छे चरित्र की अहमियत को गौण कर दिया।
विलास के पीछे भागने और विलास में जीने वाले फिल्मी नायकों की भीड़ लग गई, लेकिन इस दशक के एक प्रतिनिधि अभिनेता-नायक को अगर चुनें, तो बेशक वह नाम सलमान खान का होगा। जो अपनी वास्तविक जिंदगी में भी युवाओं के मॉडल रहे, विश्व सुन्दरी से प्यार, नशा करके महंगी गाड़ी में सवारी, वन्य जीव का शिकार इत्यादि। समय बदल चुका था, कोई आश्चर्य नहीं, वे आदर्श बने और लोगों द्वार खूब पसंद किए गए।
(क्रमश:)

Tuesday, 26 November, 2013

तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

- भ्रमित नायक : २०१० का दशक-
(समापन भाग)
इस दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी से गुजरना पड़ा। पैसा वापस जाने लगा, नए पैसे ने आना कम कर दिया। विदेशी-प्रवासी-विलासी दूल्हे धोखेबाज निकलने लगे। कई सपने टूटे, नायक आसमान से जमीन पर गिरने लगे, लेकिन जमीन बदल चुकी थी। देश वैसा नहीं था, जैसा पहले सोचा गया था। सरकार और सरकार के नायक भ्रमित थे कि किधर जाएं। फिल्मों में तो प्यार हुक्का बार हो गया था। सुन्दर कन्या भ्रमित हो गई थी - गा रही थी कि मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैंया फेविकॉल से। ऐसा नहीं है कि यह बेतुका गाना फ्लॉप हो गया हो, इसे लोगों ने खूब पसंद किया। लोग अलग तरह की आवाज और धुन सुनकर मस्त थे, उन्हें अर्थ से ज्यादा मतलब नहीं रहा। दिखावा पूरी तरह से हावी हो गया। समलैंगिक समूह रैली निकालने का साहस करने लगे। फिल्मों के लिए समलैंगिकता एक प्रिय विषय बन गई। कुछ लोगों को अपने लिंग को लेकर भी भ्रम होने लगा। इस दशक में फिल्मों ने इस विकल्प को और मजबूत करना शुरू कर दिया कि जरूरी नहीं कि नायक किसी नायिका की ही तलाश करे, वह किसी सह-नायक को भी अपनी नायिका मान सकता है, उसके साथ जिंदगी बिता सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल फिल्में ही भ्रम का शिकार हों, देश में भी नाना प्रकार के भ्रम चलन में हैं। नेता कितने विश्वसनीय हैं, इसे लेकर भ्रम है। घोटाले हुए हैं, तो कितना नुकसान हुआ है, इसे लेकर भी भ्रम है। हमारे देश का पैसा हमारा है या नहीं, इसे लेकर भी भ्रम है। पैसा जेब में कब तक रहेगा, इसे लेकर भ्रम है। बीवी या प्रेमिका निष्ठावान है या नहीं, इसे लेकर भ्रम है। केवल देश में ही नहीं, उसकी फिल्मों में भी विचारों की मंदी का दौर है। विचार और नैतिकता का ऐसा अकाल पड़ा कि अब पोर्न उद्योग से भी कलाकार लेने में संकोच नहीं रहा। अच्छाई और बुराई के बीच भ्रम को मानो स्वीकार कर लिया गया है। पिछले दशक में एक प्रवासी से विवाह करके विदेश चली गई स्टार अभिनेत्री माधुरी दीक्षित वापस लौट आई। भ्रम खड़ा हो गया कि लौटना था, तो गए क्यों थे? संशय बरकरार है कि यह लौटना सफल होगा या नहीं। हो सकता है, माधुरी एक अपवाद मात्र हों, क्योंकि फिलहाल ज्यादातर लोग देश से भाग जाना चाहते हैं। जो भी सक्षम है, भाग रहा है कि अब इस देश में रखा क्या है? देश के सच से भागते विदेशी निवेशकों, कंपनियों, सरकारों, नेताओं के लिए यह गाना मुफीद है ...कल मिले ये हमको भूल गए आज रे, तोरे नैना बड़े दगाबाज रे... 
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-  ज्ञानेश उपाध्याय 
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संदर्भ ग्रंथ : 1 : हीरो - पहला और दूसरा खंड - लेखक अशोक राज 
2 : वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002 
3 : बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, लेखक : मिहिर बोस 
4 : आइडोलॉजी ऑफ हिन्दी फिल्म , लेखक : एम. माधव प्रसाद

Wednesday, 25 September, 2013


एक साल भर पुराना चित्र मित्र अनुज कोसलेंद्र जी के साथ

आधार निराधार?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आधार कार्ड की अनिवार्यता को खत्म करके जहां करोड़ों "आधार-हीन" लोगों को राहत का अहसास कराया है, वहीं आधार कार्ड निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना पर प्रश्नचिन्ह भी लगा दिया है। सरकार की कई एजेंसियां, विशेष रूप से बैंक और रसोई गैस एजेंसियो ने मिलकर ऎसा माहौल बना दिया है, मानो यदि आधार कार्ड नहीं होगा, तो भारतीय नागरिक होने के बावजूद कोई सब्सिडी या सरकारी सुविधा नहीं मिलेगी। मानो कार्ड नहीं, तो फिर आप भारतीय नागरिक भी नहीं! विगत लोकसभा चुनाव से पहले जल्दबाजी में केन्द्र सरकार ने फरवरी 2009 में आधार कार्ड योजना की शुरूआत की थी। आधार को जो जरूरी कानूनी व प्रामाणिक आधार चाहिए था, वह संसद के जरिये नहीं मिल सका। परिणाम यह हुआ कि भारत में रह रहे अवैध लोगों ने भी पहली फुर्सत में आधार कार्ड बनवा लिए। आधार कार्ड तो तभी बनना चाहिए था, जब किसी की राष्ट्रीयता पूरी तरह से पुख्ता होती। आधार में सबसे बड़ी कमी यह रही कि जिसके पास भी भारतीय होने का कोई पहचानपत्र है, जिसके पास भी कोई पता-ठिकाना होने का प्रमाण है, उसका आधार बन गया। आधार कार्ड बनाने से पहले कोई पुख्ता जांच-पड़ताल नहीं की गई। आधार कार्ड के निर्माण की प्रक्रिया इतनी लचीली रही कि अवैध लोग भी कार्ड बनवाने में सफल हो गए। कार्ड बन गया, तो मानो भारत की नागरिकता मिल गई, नागरिकता मिल गई, तो हर चीज व सरकारी सेवा में सब्सिडी लेने का दावा भी मजबूत हो गया। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से देश में जो भ्रम की स्थिति बढ़ी है, उसे केन्द्र सरकार ही दूर कर सकती है, लेकिन अफसोस की बात है - सरकार और सरकार की एजेंसियां ही लोगों को आधार के मामले में लगातार भ्रमित कर रही हैं। स्वयं केन्द्र सरकार ने ही संसद में कहा था कि उसने अपनी किसी भी योजना का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य नहीं बनाया है। तो फिर ये बैंक और गैस एजेंसियां कौन हैं, जो आधार नंबर मांग रही हैं? किसके कहने पर मांग रही हैं? वह कौन है, जो आधार कार्ड के लिए अखबारों में भ्रामक विज्ञापन छपवा रहा है? आधार कार्ड के लिए 55 हजार करोड़ रूपए फूंक देने के बावजूद यदि ऎसी शर्मनाक भ्रामक स्थिति है, तो यह निस्संदेह, केन्द्र सरकार की विफलता है। आज जरूरी है - सरकार आधार के लिए मूलभूत वैध आधार बनाए, यदि वह ऎसा नहीं करेगी, तो लोग यही मानने लगेंगे कि यह योजना हजारों करोड़ रूपए की बंदरबांट के लिए ही बनी है।

Friday, 5 July, 2013

संस्कृत और उसका पड़ोस

एक रिपोर्ट १५-१६ जून को जयपुर में आयाजित दो दिवसीय संगोष्ठी : संस्कृत और उसके पड़ोस का वैभव
नाट्य शास्त्र के रचयिता भरत मुनि के वाक्य - न हि समादृते कश्चिदर्थ: प्रवर्तते (भावार्थ - जिसमें रस नहीं, उसका कोई अर्थ नहीं) का ध्येय जयपुर में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अनेक बार चरितार्थ हुआ। 'संस्कृत और उसका पड़ोसÓ संगोष्ठी में शामिल १०० से ज्यादा संस्कृत विद्वानों, मीडियाकर्मियों, शिक्षाविदों, नाट्यकारों, कलाकारों, उत्तर व दक्षिण भारत के आचार्यों और शिक्षकों ने समग्रता में यही आभास कराया कि संस्कृत में रस भरपूर हैं और इन रसों का प्रचार-प्रसार होना चाहिए। संस्कृत अपनी पड़ोस का मुआयना करे और पड़ोस भी संस्कृत की ओर निहारे, ताकि देश में बढ़ती समस्याओं के समाधान की ओर हमारा समाज बढ़ सके। संगोष्ठी के प्रथम सत्र - उपक्रम सत्र में कर्मकाण्डी संस्कृत बनाम शास्त्रीय संस्कृत विषय पर बोलते हुए ख्यात विद्वान देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने कहा, 'संस्कृत में जो बातें हैं, वो कहीं नहीं हैं।... पूरा भारत ही संस्कृत है, भारत से जो बाहर है, वह पड़ोस है।Ó उन्होंने यह भी कहा कि कर्मकाण्ड की सेवा में लगे लोग यदि कर्मकाण्ड का औचित्य शास्त्र द्वारा जान लें, तो चमत्कार हो जाएगा। भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी व संस्कृत निष्ठ विद्वान राजेश्वर सिंह ने कर्मकाण्ड को सरलीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया, उन्होंने यह भी कहा कि बिना संस्कृत के भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित विद्वान दयानन्द भार्गव के अनुसार, 'कर्मकाण्ड और शास्त्रीय ज्ञान को अलग नहीं किया जाए, ये आत्मा और शरीर हैं।Ó वरिष्ठ पत्रकार आनन्द जोशी ने कहा, 'इस देश में असंख्य लोगों ने कर्मकाण्ड के जरिये ही संस्कृत के शब्द सुने हैं, लेकिन हमें कर्मकाण्ड के मर्म को भी समझना होगा।Ó दूरदर्शन केन्द्र जयपुर की निदेशक-समाचार प्रज्ञा पालीवाल गौड़ ने बताया, 'संस्कृत को आधुनिक प्रौद्योगिकी से जोडऩा होगा और यह सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को कितनी संस्कृत दे रहे हैं।Ó इस सत्र में पहला व्याख्यान देते हुए युवा संस्कृत कवि-विद्वान उमेश नेपाल ने कहा, 'कर्मकाण्ड ने ही अखंड भारत को बांध रखा है, नेपाल, भूटान, बांगलादेश और श्रीलंका के कर्मकाण्डी पंडित भी पूजा में अपने यहां गंगा, कावेरी, सिन्धु का ही आह्वान करते हैं।...कर्मकाण्ड विश्वास पर आधारित है और शास्त्रीय संस्कृत विचार पर।Ó संगोष्ठी के द्वितीय सत्र - मध्य सत्र में संस्कृत बनाम हिन्दी के सभाध्यक्ष राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के कुलपति प्रो. राजावल्लभ त्रिपाठी ने एक रूपक गढ़ा, 'उत्तर भारत में संस्कृत एक विशाल प्रासाद में एक ऐसी पवित्र बुढिय़ा की तरह है, जो जब भी अपने प्रासाद से बाहर निकलती है, अपनी बेटी हिन्दी के कंधे पर हाथ रखकर ही चलती है।Ó ख्यात पत्रकार ओम थानवी ने हिन्दी में संस्कृत से सम्बंधित स्थापनाओं पर जाते हुए पत्रकारिता में शब्दों की मिलावट से उत्पन्न विकृतियों को उदाहरण सहित प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वयं को शुद्धिकरण या पवित्रीकरण का नहीं, हिन्दी के सहजीकरण का समर्थक बताया। राजनीति शास्त्र के विद्वान व शिक्षाविद नरेश दाधीच ने दावा किया, 'हिन्दी कभी भी संस्कृत के विरोध में खड़ी नहीं होगी।Ó इस सत्र में प्रोफेसर सरोज कौशल और डॉ. प्रवीण पण्डया ने भी व्याख्यान दिए। संगोष्ठी के दूसरे दिन भारतीय अर्थव्यवस्था : ऋण बनाम दान विषय पर आयोजित उपक्रम सत्र के सभाध्यक्ष विद्वान राजनेता-विधायक राजपाल सिंह शेखावत ने कहा, 'शास्त्र में दान का जो विधान है, उसका क्रियान्वयन यदि हो जाए, तो समाज का कायाकल्प हो जाएगा। जरूरी है कि दान की उदात्तता को समाज स्वीकार करे।Ó जगदगुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामानुज देवनाथन ने कहा कि भारतीय समाज में दान की महिमा का क्षरण दुखद है, पहले गरीबों को जाकर दान दिया जाता था, उसके बाद बुलाकर दिया जाने लगा, उसके बाद मांगने पर दिया जाने लगा और अब जब कोई गरीब दिखता है, तो लोग मुंह तक फेर लेते हैं। ऋण की तुलना में भारतीय व्यवस्था में दान को ही बढ़ावा दिया गया है और यही उचित है। पत्रकार ज्ञानेश उपाध्याय ने कहा, भारतीय व्यवस्था में शास्त्र के अनुसार दान दिया जाता, तो ऋण की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऋण लेकर दुनिया में करोड़ लोग मरे हैं, किन्तु दान लेकर या देकर किसी के मरने की कोई सूचना नहीं मिलती। वद्र्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय के कुलपति व कंप्यूटर विज्ञान के विशेषज्ञ विनय पाठक ने कहा, सूचना प्रौद्योगिकी, बाजार और आज के युवाओं के संदर्भ में ऋण और दान के महत्व को समझने की जरूरत है। इंटरनेट के जरिये भी अब ऋण और दान हो रहा है। दर्शन शास्त्र के विद्वान डॉ. वीरनारायण पाण्डुरंगी ने ऋण और दान, दोनों की आवश्यकता को प्रतिपादित किया। अर्थशास्त्री सुरजीत सिंह के अनुसार, विकास के लिए ऋण का उत्पादक होना आवश्यक है, तो जोधपुर से पधारे दर्शन शास्त्र के विद्वान डॉ. चन्द्रशेखर ने दान पर जोर देने के साथ ही आग्रह किया कि हम संस्कृत के शिक्षकों-प्रोफेसरों को भी सोचना चाहिए कि हम कितने उत्पादक हैं, हम समाज को क्या दे रहे हैं। संगोष्ठी के समापन सत्र-उत्तर सत्र में संस्कृत में मनोरंजन : नीरस बनाम सरस पर चर्चा हुई। सभाध्यक्ष ख्यात संस्कृत समाचार वाचक-विद्वान बलदेवान्द सागर ने संस्कृत चिंतकों के बढ़ते दायित्व की चर्चा की, उनका निवदेन था कि हम निंदा-स्तुति से परे जाकर भावी पीढ़ी को संस्कृत की सरसता का आस्वाद कराएं। राजस्थान विश्वविद्यालय में नाट्य शास्त्र विभाग की अध्यक्ष प्रो. अर्चना श्रीवास्तव ने नाट्यकला में संस्कृत की महिमा का गुणगान करते हुए बताया कि दुनिया स्टेनिसलेवेस्की को अभिनय का गुरु मानती है, किन्तु वास्तव में अभिनय के सबसे महान आदि गुरु तो भरत मुनि हैं, जो इसी भारत वर्ष में जन्मे थे, हम जो लोग भरत मुनि, कालिदास, भवभूति, भास, दंडी आदि को भूल गए हैं, हमें यह जरूर देखना चाहिए कि हम आज कहां खड़े हैं। नाट्यकला को सम्पूर्णता में समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है, इसके बिना कलाओं के मूल मर्म को नहीं समझा जा सकता। कलाविद् डॉ. राजेश कुमार व्यास ने उद्बोधन दिया कि भारतीय संस्कृति में मनोरंजन को संस्कृत ने ही आधार प्रदान किया। तमाम कलाएं भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से ही निकलती रहीं और आधुनिकता की ओर बढ़ी हैं। संस्कृत ने कलाओं को भौंडेपन की बजाय सरसता प्रदान की है। आज भी नृत्य, नृत्य नाटिकाओं और चित्रकला का आधार संस्कृत ही है। संस्कृति-निष्ठ छायाकार हिमांशु व्यास ने सूक्ष्मता में जाने पर बल देेते हुए बताया कि हमें रस व मनोरंजन के अर्थ व महत्व को समझना होगा। संस्कृत विद्वान डॉ. उमाकांत चतुर्वेदी ने संस्कृत की सरसता पर विस्तार से प्रकाश डाला, तो संस्कृत विद्वान डॉ. ओमप्रकाश पारीक ने आग्रह किया कि हमें संस्कृत की पढ़ाई को सरस बनाना चाहिए, ताकि इसका आकर्षण बढ़े।
श्रीरामानन्द आध्यात्मिक सेवा समिति ने राजस्थान संस्कृत अकादमी की सहायता से वानिकी प्रशिक्षण संस्थान के परिसर में इस सफल संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी के समन्वयक संस्कृत विद्वान शास्त्री कोसलेन्द्रदास ने संगोष्ठी केसत्रों में विषय प्रस्तावना के साथ ही सफल संचालन भी किया। इस आयोजन में भारतीय परंंपराओं के साथ-साथ आधुनिकता का भी भरपूर समावेश था। संगोष्ठी में नृत्य नाटिका के साथ ही संस्कृत फिल्म का भी प्रदर्शन हुआ, जिसे बहुत सराहना मिली। चारों सत्रों में श्रोताओं की अत्यधिक उपस्थिति स्वयं संस्कृत समाज को भी अचंभित और उत्साहित करती रही। यह संगोष्ठी भारतीय भाषाओं और उसके विद्वानों के लगाव और नई रोशनी में उन्नति के लिए परस्पर मिलन की बेचैनी का भी निरंतर आभास कराती रही।

पहली बार ऐसा अवसर आया जब मेरे पिता श्री बंशीधर उपाध्याय मेरी सेमिनार में शामिल होने आए, उन्होने मेरा व्याख्यान सुना, मैंने मुख्य अतिथियों के साथ-साथ पिता को भी प्रणाम करते हुए, आभार जताते हुए बोलना शुरू किया, पिता दिन भर सेमिनार में रहे. यह संयोग ही था कि इस दिन 16 जून को फादर्स डे भी था. इस चित्र में बीच में मेरे पिता विराजमान हैं. पिता के बायी ओर मैं और कुलपति श्री रामानुज देवनाथन जी दिख रहें है और दायी ओर अनुज-मित्र शास्त्री कोसलेंद्रदास जी.

Sunday, 30 June, 2013

आपको हुई असुविधा के लिए खेद है

रेल विकास के बारे में पूरी ईमानदारी से कम ही सोचा जाता है. लगता है, रेल नैतिक दबावों से भी परे है, सामंतशाही चल रही है. यात्रियों की चिंता कम से कम है. बार बार हमे खेद है - हमे खेद है बोलकर रेलवे काम चला लेता है. अब रेलवे ने अपने यात्रियों से धन दोहन के लिए एक नया कदम उठाया है, टिकट रद्दीकरण के 15 साल पुराने नियम को बदल दिया गया है। रेलवे का यह निर्णय जब 1 जुलाई को लागू हो जाएगा, तब दलालों पर पता नहीं कितना अंकुश लग सकेगा, प्रतीक्षा सूची में शामिल यात्रियों को पता नहीं कितनी राहत मिल पाएगी, लेकिन आखिरी समय में यात्रा रद्द करने वाले यात्रियों को बड़ा नुकसान होगा। यात्रा से 48 घंटे पहले टिकट रद्द करवा लिया, तो ठीक, वरना 25 से 50 प्रतिशत तक किराया राशि रेलवे काट लेगा। इसके अलावा यदि ट्रेन की रवानगी के 2 घंटे बाद आप रिफंड लेने जाएंगे, तो आपको एक भी पैसा नहीं मिलेगा। बड़ी बात यह है कि रेलवे को पहले वाली व्यवस्था में भी फायदा था व अब वाली व्यवस्था में तो और भी फायदा होगा। यह बात सब जानते हैं कि रेल टिकट की दलाली की व्यवस्था धड़ल्ले से चल रही है, रेलवे जो कदम दलालों को रोकने के लिए उठाता है, उसका खमियाजा सारे यात्रियों को भुगतना पड़ता है। क्या यह न्यायपूर्ण है, यहां सजा केवल अपराघियों को नहीं मिल रही है, सजा ऎसे निर्दोष लोग भी भुगतेंगे, जो किसी न किसी मजबूरी की वजह से अपनी यात्रा रद्द करेंगे। रेलवे का क्या है, रेलवे तो लोगों की मजबूरी से भी कमाई करने वाला विभाग है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि आख़िर रेलवे को दलालों या एजेंटों की जरूरत क्यों है? आमतौर पर जिस कंपनी का माल नहीं बिकता वह एजेंट रखती है रेलवे के साथ तो ऐसा नहीं है, उसे तो खूब कमाई होती है. लोग उसकी सेवा के लिए इंतज़ार करते हैं रेलवे विभाग तो पैसे लेने के बावजूद सबको खुश नहीं कर पाता है, कभी रेलवे के पास कम काउंटर थे, लेकिन अब जब एसएमएस के जरिये भी टिकट बनने लगेगा तो एजेंटों की जरूरत क्यों रहेगी ? एजेंट सिस्टम बंद होना चाहिए ? रेलवे और यात्रियों के बीच करोड़ों रुपये इधर-उधर हो रहे हैं इसकी जरूरत क्यों है? किसको है? ई टिकट, एसएमएस टिकट के दौर में क्या यात्रियों को एजेंट चाहिए ? क्या सरकार ने इसका अध्ययन करवाया है ? प्रतीक्षा सूची वाले यात्रियों के बारे में तो रेलवे ने कभी सोचा भी नहीं है, अगर कुछ फैसला किया, तो उसे शायद ही कभी लागू किया। ऎसा कदापि नहीं है कि आखिरी समय में टिकट के रद्द होने से रेलों में सीटें खाली रह जाती हैं, प्रतीक्षा सूची में सैकड़ों लोग होते हैं, साधारण प्रतीक्षा सूची के साथ ही तत्काल की प्रतीक्षा सूची भी होती है। खराब, लेटलतीफ रेल सेवाओं की वजह से यात्रियों को कई नुकसान झेलने पड़ते हैं, लेकिन इन यात्रियों के बारे में रेलवे कितना सोचता है? यात्री हैं, उनका क्या, सैकड़ों यात्री रोज निराश होंगे, तो हजारों नए आएंगे। रेलवे तो इस देश में यात्रा करने वालों के लिए मजबूरी है। यह दुख की बात है, ऎसा किसी व्यवसाय में नहीं होता, जैसा रेलवे में होता है। आज रेलवे बिना सेवा के भी पैसे वसूल लेने वाला विभाग बन गया है। आप थोड़ा सोच कर देखिये अगर कार बेचने वाली कंपनियाँ भी यही करें तो क्या होगा, आप ने दो महीने पहले एक कार बुक कराई, कार लेने से एक दिन पहले बुकिंग रद्द करा दी, तो क्या आप चाहेंगे कि कार कंपनी आप से 25 या 50 प्रतिशत कीमत वसूल ले, यह कहकर कि आपने बुकिंग रद्द करा दी इसलिए पैसे दिजिये. एक और बात, व्यवसाय की दुनिया में जमाखोरी और कालाबाजारी प्रतिबंघित है, लेकिन रेलवे में मंजूर है! गौर कीजिए, तत्काल के तहत रेलवे कुछ टिकट जमा करके रखता है और जरूरतमंद लोगों को अंत समय में ब्लैक में बेचता है, क्या यह अनैतिक नहीं है ? एक जरूरी सेवा के साथ ऎसे मजाक और धूर्तता के निदान के बारे में यात्रियों को भी सोचना चाहिए और रेलवे को भी।

Saturday, 22 June, 2013

यात्रा भीतर यात्रा

जनसत्ता 28 अप्रैल, 2013: यात्रा कहां से शुरू होती है, शायद कोई नहीं जानता। कभी अंदर से शुरू होती है, तो कभी बाहर से। अनेक अखबारों-पत्रिकाओं में लिख कर अपने यात्रा संस्मरणों को संजोते रहे राजेश कुमार व्यास के ताजा यात्रा वृत्तांत संग्रह ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ में यह एक बड़ी खूबी है कि वे कभी यात्रा अपने अंदर से शुरू करते हैं और फिर बाहर की ओर बढ़ते हैं और कभी वे बाहर घूमते-घूमते अंदर उतरने लगते हैं। कभी गद्य में तो कभी पद्य में। वे इतने प्रेम के साथ यात्राएं करते हैं कि उनकी आंखों से देखे गए स्थल निखर आते हैं। उन्हें पाठक अपनी आंखों से देखने लगता है। हर बार एक नई जगह के भाव, दृश्य, संगीत और स्वर। वे चौंकाते भी बहुत हैं, किताब के शीर्षक ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ से लगता है कि वे पहले कश्मीर ले जाएंगे, लेकिन वे कन्याकुमारी से ही शुरू और अंत कश्मीर पर करते हैं। पुस्तक के पुरोवाक में व्यास लिखते हैं, ‘चरन् वै मधु विन्दति’, यानी जो चलता है, उसी को जीवन का अमृत-मधु प्राप्त होता है। इस पुस्तक में दर्ज उनकी चौदह यात्राएं यह अहसास निरंतर कराती हैं कि राजेश जी घुमक्कड़ी का मधु छक रहे हैं। पूरे आनंद के साथ वे यात्रा करते हैं। यह आनंद और यात्रा का प्रेम केवल देखी जा रही जगह के प्रति नहीं है, बल्कि उनके साथ जो भी है, उसे वे पूरे लगाव के साथ लिए चलते हैं। उनकी गठरी में अपनापा है, वे जहां जाते हैं, उन्हें उस जगह से प्यार हो जाता है। यही नहीं, एक बड़ी खूबसूरत बात यह है कि उनके सभी यात्रा वृत्तांत उस जगह से बिछुड़ने का दर्द भी बयान करते हैं। उन्हें वह जगह घेर कर पकड़ती है, वे पकड़े जाते हैं और फिर एक तरह से घिसटते हुए-से, वहां दिल छोड़ते हुए-से लौटते हैं, यह सोचते हुए कि फिर लौटूंगा। उनका लौटना कविता में बदल जाता है, रोहतांग दर्रे के पास से लौटते हुए वे लिखते हैं : बर्फ का रेगिस्तान धीरे-धीरे खाली हो रहा है। ठीक इसी तरह जब वे जैसलमेर से लौटते हैं, तो लिखते हैं: ‘रेत, रेत और रेत। बीच में खिला गुलाब। कल्पना नहीं हकीकत। मन में विचार आता है, आखिर कब तक?’ सिक्किम से बिछुड़ने का दर्द देखिए: ‘शहर की भागमभाग से दूर प्रकृति की गोद से बिछुड़ने का मन नहीं है, पर लौटना तो है ही।’ कोणार्क से जब वे लौटते हैं, तो साफ-साफ लिख देते हैं, ‘कोणार्क से बिछुड़ना आसान नहीं है।’ कन्याकुमारी से लौटते हुए वे लिखते हैं: ‘है न अद्भुत!... हमने भी अनुभूत किया। सुबह सूरज को निकलते देखा और अब सूरज को अस्त होते... सागर से विदा लेते भी देख लिया। सागर की लहरें सूर्य को विदा दे रही हैं... हमें भी।’ घुमक्कड़ व्यास पांडिचेरी से लौट रहे हैं: ‘सुकून और शांति का यह अहसास जाने कब फिर से यहां लाएगा... भविष्य को भला किसने पढ़ा है... पांडिचेरी अलविदा।’ और जब वे कश्मीर से लौट रहे हैं, तो लिखते हैं: ‘भगवान धरती के हमारे स्वर्ग को भी बचाए! फिर से कब बहेगी धरती के स्वर्ग में अमन और चैन की हवा! कब उगेगा कश्मीर में नया सूर्य!...’ तमाम जगहों से लौटते हुए राजेश व्यास भावुक कर देते हैं, प्रार्थना और प्रेम के भाव से भर देते हैं, किसी किशोर की तरह नॉस्टेलजिक-से हो जाते हैं। उनकी यात्राओं का अपनत्व जादुई असर छोड़ता है। उनकी यात्राएं लौकिक से अलौकिक होती चली जाती हैं। उनकी आस्था, उनके भले होने का अहसास उनके यात्रा संस्मरणों में होता है। दुनिया में ऐसे अनेक यात्रा वृत्तांत मिलते हैं, जिनमें यात्रा करने वाला अपनी बदमाशियों-चालाकियों का भी जिक्र कर डालता है, लेकिन राजेश जी अपनी इन यात्राओं में इतने प्रेम विभोर रहते हैं कि उनसे ऐसी चालाकी की उम्मीद कोई नहीं कर सकता। यात्रा वृत्तांत वही अच्छा लिख सकता है, जो अच्छा देखता हो। अच्छा देखना केवल वर्तमान को अच्छा देखना नहीं है। समग्रता में अच्छा देखने में अतीत, वर्तमान और भविष्य, तीनों को देखना शामिल है। इस लिहाज से राजेश कुमार व्यास किसी भी जगह पर जाते हैं, तो उस जगह का अतीत, वर्तमान और भविष्य भी देखने की कोशिश करते हैं। वे केवल वर्तमान में समय बर्बाद नहीं करते, वे आगे बढ़ते हैं, वे उस जगह की बेहतरी के बारे में अपने विचार रखते हैं। खासकर कश्मीर यात्रा का वृत्तांत तो सवालों से भरा हुआ है, केवल सवाल हावी नहीं हैं, सवालों के उत्तर जानने की कोशिश और आग्रह भी बार-बार उभरता है। कब उगेगा कश्मीर में नया सूर्य? यहां यात्रा वृत्तांत केवल ट्रेवल बुक की तरह नहीं है, जहां केवल सूचनाएं हों कि कहां क्या मिलेगा और कहां कैसे जाएं, कैसे रहें, यहां तो यात्रा वृत्तांत अपने देश को अपनी मिट्टी को जानने की कोशिश है। केरल, कोणार्क, सरिस्का, बदरीनाथ, चंबा, रोहतांग दर्रा, सिक्किम, रामटेक, वैशाली जैसी महत्त्वपूर्ण जगहों की यात्रा के विवरण यादगार बन पड़े हैं। व्यास के यात्रा वृत्तांत गहरी व्यापक संभावनाएं पैदा करते हैं। वे सोचने पर विवश करते हैं। वे इंतजार का भाव पैदा करते हैं। वे यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं। उनके वृत्तांतों में अनेक कहानियों और उपन्यास के प्लॉट बिखरे नजर आते हैं। वे यात्रा स्थलों की समस्याओं को भी बखूबी उठाते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने जैसलमेर के सोनार किले के दर्द को बेहतरीन बयान किया है, वे लिखते हैं: ‘मुझे किले की ढलान से नीचे उतरते जैसे किले का रुदन सुनाई देने लगा है।’ वास्तव में किले का यह रुदन लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए है कि किले की बिगड़ती अवस्था को ठीक किया जाए। इस विश्व धरोहर की रक्षा की जाए। उनकी कुछ यात्राएं तो बहुत रोमांच पैदा कर देती हैं, खासकर ‘बाघिन मुक्ति की राह पर’। एक वन से ले जाकर बाघिन को दूसरे वन में छोड़ा जाता है, राजेश व्यास भी छोड़ने वालों की टीम के साथ हैं। यह एक तरह से यात्रा भी है और कथा भी, पाठकों को बड़ा आनंद देता यह यात्रा वृत्तांत खास बन पड़ा है। एक और खास बात, हवाई यात्राओं का भी उन्होंने अच्छा ब्योरा दिया है। उड़ते हवाई जहाज की खिड़की से आकाश कैसा दिखता है, मेघ, सूर्य की किरणें क्या जादू पैदा करती हैं, यह सब खास है। मेघों से घिर कर झटके खाते विमान में होने के अनुभव का भी उन्होंने अच्छा जिक्र किया है। यह यात्रा वृत्तांत बहुत पठनीय और प्रेरक है। इसकी भाषा और शैली अत्यंत रोचक और आकर्षक है। यात्रा कैसे की जाती है, उसका संस्कार भी यह पुस्तक देती है। पर्यटकों, यायावरों के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी यह पुस्तक उपयोगी है। कश्मीर से कन्याकुमारी: राजेश कुमार व्यास; नेशनल बुक ट्रस्ट, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली; 90 रुपए।

Friday, 21 June, 2013

जान लेबs का हो

बिहारी राजनीति को ज्यादा महत्व देते हैं, क्या यह बात फिर साबित नहीं हुई है? बिहार को क्या अपना फायदा नहीं देखना चाहिए था? एक पिछड़ा हुआ प्रदेश, जहां बिजली, सडक़, पानी इत्यादि कोई भी मूलभूत व्यवस्था सही नहीं है, वहां के लोग जब राजनीति करते दिखते हैं, तो दुख ही होते हैं। बिहार के पुराने नेताओं ने भी यही किया, सारा प्यार दूसरे प्रदेशों पर उड़ेलते रहे। देश को पहले देखने की यही अदा बिहारियों पर भारी पड़ी, बिहारी राजनेताओं की समझ अभी भी नहीं खुली है। पंजाब, महाराष्ट्र या दक्षिण के राज्यों से बिहार ने कुछ नहीं सीखा है, इसलिए ये राज्य प्रगति करते गए हैं और बिहार वर्षों तक पिछड़ता चला गया है। बिहार तो इस देश के लिए सस्ते और मेहनती श्रमिक पैदा करने का कारखाना है। बिहार विकास के लिए रो रहा है, लेकिन यहां के नेता सिर्फ राजनीति में जुटे हैं। बिहार की माटी बार-बार आह्वान कर रही है, रहम करो, विकास करो, राजनीति छोड़ो, लेकिन बिहार के नेता तो मानों राजनीति के ठेकेदार हैं। नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को रोकने को अपना परम कत्र्तव्य बना लिया। दूसरे किसी राज्य में किसी नेता ने मोदी के खिलाफ वैसे तेवर नहीं दिखाए, जैसे नीतीश ने दिखाए। नरेन्द्र मोदी का देश के सभी राज्यों में स्वागत है, लेकिन बिहार की सरकार उनका स्वागत करने को तैयार नहीं, शिष्टाचार का भी आभास नहीं है, क्यों? क्योंकि राजनीति करनी है, राजनीति बड़ी चीज है, बिहार तो बस बिसात है, जिस पर राजनीति के मोहरे चले जाएंगे। कभी लालू के हाथ में बाजी होगी, कभी नीतीश कुमार के हाथ में, बिहार तो हर हाल में हारेगा-लुटेगा। बिहारी जब बिहार लौटकर जाते हैं, तो सुविधाओं का अभाव देखकर दिल रोता है। हिन्दू भी रोते होंगे और मुसलमान भी। न अंधेर नगरी कहीं जा रही है और न राजा चौपट होने से बच रहा है। कथित सेकुलरिटी की झूठी आफत गले पड़ी हुई है, लोग शायद अंधेरे में रहकर सेकुलरिटी को बचाना चाहते हैं। अगर व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए, अगर कानून और थाने सक्षम हों और ठीक से काम करें, तो सेकुलरिटी का प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं। विकास का लाभ मुसलमानों को भी मिलेगा और हिन्दुओं को भी। भाजपा ने कभी सेकुलरिटी का दावा नहीं किया, उसका जोर विकास पर है, कुछ राज्यों में उसने अच्छा काम किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस सबसे सेकुलर पार्टी कहलाती है, उसी के राज्य में सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे, बिहार के भागलपुर में दंगा हुआ था। सैंकड़ों लोग मरे थे। कांग्रेस से लोगों ने मुंह फेर लिया, लालू को सत्ता हासिल हुई, तब नीतीश कुमार भी लालू के साथ थे, लालू-राबड़ी जब तक रहे, भागलपुर दंगा पीडि़तों को पूरा न्याय नहीं मिला। फिर भी लालू टोपी लगाकर अल्पसंख्यक हितैषी होने का ढोंग रचते हैं, लेकिन कौन मुस्लिम हैं, जो ताली बजाते हैं। लालू सबसे सेकुलर नेता थे, उन्होंने आडवाणी के रथ को बिहार में रोक दिया था, नीतीश कुमार भी सेकुलर नेता हैं, उन्होंने मोदी के रथ के राह पर निकलने से पहले ही अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। क्यों? क्योंकि बिहार ने सेकुलरिटी का ठेका ले रखा है? उधर, देखिए, जो असम कुछ दिनों पहले सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था, वहां से राज्यसभा सांसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्ष बता रहे हैं, और नीतीश कुमार फुल के कुप्पा हो गए हैं। लेकिन क्या उनके फुल के कुप्पा होने से मुसलमानों का पेट भर जाएगा? क्या कथित उदारवादी हिन्दुओं को विकास नहीं चाहिए? हम झूठी सेकुलरिटी को कब तक बचाते रहेंगे, और क्यों बचाते रहेंगे? बिहारी अपना हित क्यों नहीं देख रहे हैं, सेकुलरिटी राजनीति के पेड़ पर लगने वाला कोई फल नहीं है, सेकुलरिटी तभी फलेगी-फुलेगी, जब विकास होगा। विकास होगा, रोजगार होगा, तो अमन-चैन अपने आप आएगा, और तब जो दंगाई होंगे, उन्हें भीड़ से छांटकर अलग करना ज्यादा आसान हो जाएगा, अपने विकास के प्रति सजग लोग हिंसा की निरर्थकता को समझेंगे। लालू और नीतीश ही क्यों, आप रामविलास पासवान को देख लीजिए, जो ओसामा बिन लादेन के हमशक्ल को साथ लेकर वोट मांगने निकलते थे, क्या यही सेकुलरिटी है? धिक्कार है ऐसे बिहारी नेताओं पर जो राजनीति का संकीर्ण आकलन करते हैं, बिहार का हित नहीं देखते। जब लालू के पास सत्ता थी, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी। जब नीतीश के पास सत्ता आई, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी, अगर मान लीजिए, केन्द्र में नरेन्द्र मोदी आ गए, तो उस बिहार के साथ क्या होगा, जहां की सरकार नरेन्द्र मोदी को अपने राज्य में घुसने से रोकना चाहती है? बिहार के मुखिया मोदी के साथ गलत कर रहे हैं, शिष्टाचार तक भुला चुके हैं, क्या उनके पास आंकड़े हैं कि गुजरात से कितने बिहारियों की रोजी-रोटी चल रही है? बिहार वही गलती कर रहा है, जो पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कर रहे हैं, विडंबना देखिए, तीनों ही राज्य पिछड़े हैं, लेकिन शायद यहां के नेता सेकुलरिटी की गारंटी देना चाहते हैं, क्योंकि यह गारंटी आसान है। मुश्किल तो विकास की गारंटी में है, जो कोई नहीं देता।

सबका फिर आभार

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आप पाठकों और प्रिय जनों की कृपा से मेरी किताब पिछले वित्त वर्ष में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित मीडिया किताबों में सबसे ज्यादा बिकी है, इसके लिये बहुत आभार. काम की अधिकता के कारण मैं इस किताब को उतना समय नहीं दे सका, जितना मुझे देना चाहिए था. इसका मुझे बहुत अफसोस रहेगा. तीन साल बाद इस किताब को फिर लिखने का इरादा है. इस किताब के लिए मैं तीर चार प्रिय गुरुजनों को फिर याद करना चाहूँगा श्री रामशरण जोशी, श्री रामबहादुर राय, श्री शशि शेखर... इस किताब को लेकर एक दुःख यह भी है जिसे मैं छिपा नहीं पाता हूँ, मुझे लगता है कि इस किताब ने बहुतों को मेरा विरोधी भी बना दिया, इसमें से कुछ लोग किताब के लोकार्पण में भी शामिल थे, जो किताब के लोकार्पण में नहीं आ पाये थे, और जिन्होंने मेरा कभी समर्थन नहीं किया, उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं, भगवान ने मुझे इतना शक्तिशाली बनाया है कि मुझे कभी बैसाखियों की जरूरत नहीं पड़ी. कुछ मित्र रहे जिन्होंने मेरा भरपूर साथ दिया, और कुछ मुझसे सीखने वाले भी मेरी ताकत बने. मेरी किताब बार बार यही कहती है कि जो अपने दम पर खड़ा होता है. दरअसल वही टिकता है. निंदा, आलोचना, पीठ पीछे से प्रहार इत्यादि आपको सचेत और तैयार रखते हैं, अंततः मज़बूत बनाते हैं. अगर आपमें योग्यता है तो फिर डर कैसा? जोड़-तोड़ से हासिल सम्मान जूठा और झूठा होता है. अपने काम का डंका पीटना जरूरी नहीं, यह कला हर किसी में नहीं होती. ईमानदारी से काम करते जाइये, जिन्हे आपका काम नहीं दिखता, उन्हें तो बस माफ ही किया जा सकता है. जीवन दूसरों की निंदा और दूसरों को नीचा दिखाने और दूसरों की लकीर मिटाने के लिए नहीं, ख़ुद को सशक्त बनाने और अपनी लकीर लंबी करने के लिए मिला है. तो आइये वही करें.

Thursday, 6 June, 2013

भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे

भारत रत्न विद्वान डॉ. पांडुरंग वामन काणे की जितनी प्रशंसा की जाए, कम होगी। आधुनिक भारत में आप जैसे प्रकाण्ड विद्वान गिने-चुने ही हुए हैं। भारतीय ज्ञान कोश को समृद्ध करने में इनका योगदान अतुलनीय है। पांडुरंग जी के महत्व को समझने के लिए हमें आजादी के पहले के उथल-पुथल भरे व बिखरे हुए अभावग्रस्त भारत को याद कर लेना चाहिए। अनेक गांवों, शहरों, आश्रमों में ज्ञान के स्रोत व ग्रंथ बिखरे हुए थे, कुछ ही पुस्तकालय ऐसे थे, जहां गं्रथों की मौजूदगी ठीकठाक थी। भारतीय धर्मशास्त्र के समग्र अध्ययन में बहुत समस्या होती थी, यह जानना मुश्किल था कि किस धर्मशास्त्र या ग्रंथ की रचना कब हुई, किसने रचना की, क्यों रचना की और उसका प्रभाव क्या था, उसका सामाजिक संदर्भ क्या था, इन तमाम प्रश्नों के उत्तर खोजने की जैसी कोशिश डॉ. पांडुरंग ने की, वैसी कोशिश भारतीय ज्ञान जगत में दुर्लभ है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में ७ मई १८८० को जन्मे पांडुरंग जी ने भी नहीं सोचा था कि वे भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास लिख डालेंगे। वे तो एक दूसरे ग्रंथ व्यवहारमयूख की रचना में लगे थे और उस ग्रंथ को रचने के उपरांत उनके मन में यह ध्यान आया कि पुस्तक का एक प्राक्कथन या परिचय लिखा जाए, ताकि पाठकों को धर्मशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी हो जाए। धर्मशास्त्र की संक्षिप्त जानकारी देने के प्रयास में पांडुरंग जी एक ग्रंथ से दूसरे ग्रंथ, एक खोज से दूसरी खोज, एक सूचना से दूसरी सूचना तक बढ़ते चले गए, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते चले गए। एक नया विशाल ग्रंथ तैयार होने लगा। भारतीय ज्ञान के इतिहास में एक बड़ा काम हुआ। जब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड १९३० में प्रकाशित हुआ, केवल भारतीय ज्ञान की दुनिया में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भर में ज्ञान की नई हलचल मच गई। उनके ऐतिहासिक लेखन को हाथों हाथ लिया गया। धर्मशास्त्र का इतिहास ग्रंथ के प्राक्क्थन में पांडुरंग जी ने स्वयं लिखा है, 'व्यवहारमयूख के संस्करण के लिए सामग्री संकलित करते समय मेरे ध्यान में आया कि जिस प्रकार मैंने साहित्यदर्पण के संस्करण में प्राक्कथन के रूप में अलंकार साहित्य का इतिहास, नामक एक प्रकरण लिखा है, उसी पद्धति पर व्यवहारमयूख में भी एक प्रकरण संलग्न कर दूं, जो निश्चय ही धर्मशास्त्र के भारतीय छात्रों के लिए पूर्ण लाभप्रद होगा। इस दृष्टि से जैसे-जैसे धर्मशास्त्र का अध्ययन करता गया, मुझे ऐसा दीख पड़ा कि सामग्री अत्यंत विस्तृत एवं विशिष्ट है, उसे एक संक्षिप्त परिचय में आबद्ध करने से उसका उचित निरूपण न हो सकेगा। साथ ही उसकी प्रचुरता के समुचित परिज्ञान, सामाजिक मान्यताओं के अध्ययन, तुलनात्मक विधि शास्त्र तथा अन्य विविध शास्त्रों के लिए उसकी जो महत्ता है, उसका भी अपेक्षित प्रतिपादन न हो सकेगा। निदान, मैंने यह निश्चय किया कि स्वतंत्र रूप से धर्मशास्त्र का एक इतिहास ही लिपिबद्ध करूं।Ó आज धर्मशास्त्र का इतिहास एक ऐसी अनमोल थाती है कि जिसमें वैदिक काल से आधुनिक काल तक के न केवल धर्म ग्रंथ बल्कि तमाम विधि-विधान, सामाजिक रीति रिवाज का भी पर्याप्त विवरण है। पांडुरंग जी ने वही किया, जो एक विद्वान को करना चाहिए। जो सीखा है, जो पढ़ा है, जो अनुभव किया है, उसे दूसरों तक पहुंचाने का काम विद्वान करते हैं। वे एक युग से दूसरे युग के बीच अपने ज्ञान से सेतु का निर्माण करते हैं। वे बीती हुई पीढिय़ों का ज्ञान वर्तमान और भविष्य की पीढिय़ों तक पहुंचाने के लिए ज्ञान ग्रंथ के सेतु निर्मित करते हैं। पांडुरंग जी के बारे में निस्संदेह यह कहना चाहिए कि ज्ञान का जैसा भव्य व विशाल पुल या सेतु उन्होंने बनाया, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। आज का दौर ऐसा दौर है, जहां विद्वान अपने ज्ञान को बांटने से हिचकने लगे हैं, लेकिन पांडुरंग जी उस ऋषि परंपरा के विद्वान थे, जिन्होंने खुले मन से अपने ज्ञान के भंडार को पूरी दुनिया के लिए लुटाया। उन्होंने पहले धर्मशास्त्र का इतिहास अंग्रेजी में लिखा और उसके बाद संस्कृत व मराठी में। धर्मशास्त्र के इतिहास के एक के बाद एक पांच खंड प्रकाशित हुए, १९६२ में पांचवां खंड आया। यह काम इतना अद्भुत, उपयोगी और अतुलनीय था कि भारत सरकार भी इसकी अनदेखी नहीं कर सकी। वर्ष १९६३ में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया। बेहिचक यह कहना चाहिए कि पांडुरंग जी आज तक अकेले ऐसे भारत रत्न हैं, जो भारतीय शास्त्र व संस्कृत को समर्पित रहे। आज कई मोर्चों पर जब संस्कृत को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है, तब पांडुरंग रंग जी को याद करना और याद रखना बहुत जरूरी है। १९३० में जब वे पचास वर्ष की आयु के थे, तब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड आया था और जब अंतिम खंड आया, तब वे ८२ वर्ष केे। एक तरह से उन्होंने पूरा जीवन धर्मशास्त्र को समर्पित कर दिया। लगभग ६५०० पृष्ठों के इस ऐतिहासिक ग्रंथ के अलावा भी उनके अनेक गं्रथ प्रकाशित हुए। उन्हें केन्द्र सरकार ने राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया था। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा भी अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके नाम पर आज अनेक संस्थाएं काम कर रही हैं। उन्हें महामहोउपाध्याय होने का सम्मान मिला था, वे महान गुरुओं के बीच भी महान गुरु थे। उनकी पुस्तकों के बिना आज कोई भी पुस्तकालय पूरा नहीं हो सकता। आज उनके नाम से पुरस्कार बंटते हैं। उनके द्वारा रचा गया ज्ञान कोश अंग्रेजी, संस्कृत और मराठी भाषा में १५,००० से ज्यादा पृष्ठों पर उपलब्ध है। १९७२ में उन्होंने शरीर त्याग दिया, लेकिन जो अनमोल ज्ञान वे अपने पीछे छोड़ गए हैं, उसका महत्व कभी खत्म नहीं हो सकता। पांडुरंग जी और उनके योगदान आज भी प्रासंगिक हैं। भारतीय विद्वानों की दुनिया उन्हें भुला नहीं सकती, जब भी भारतीय संस्कृति को लेकर कोई विवाद उठता है, तो पांडुरंग जी की रचनाओं से निकालकर उद्धरण दिए जाते हैं। आज चारों तरफ आंदोलनों की गूंज है, एक तरफ भ्रष्टाचार जारी है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन। इस स्थिति की कल्पना शायद पांडुरंग जी ने पहले ही कर ली थी, उन्होंने कहा था, भारतीय संविधान भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लोगों को अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं दी गई। आज कौन उनकी इस बात से इनकार करेगा? भारत में लोगों को हर संभव अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन लोग जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं, जिसकी वजह से समाज व देश में अनेक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। आज भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे को याद करना तभी सार्थक होगा, जब हम भारत और भारतीयता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे। तभी हम अपने अधिकारों का सदुपयोग कर पाएंगे और यही पांडुरंग जी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। धन्यवाद, जयहिन्द, जय भारत। (मेरे द्वारा लिखित इस वार्ता का प्रसारण मेरी ही आवाज में रेडियो स्टेशन जयपुर से पिछले वर्ष हुआ था।)

जिया, कैसे जीया?

पंखे से लटकने से पहले वह क्या सोच रही होगी? उसने यह क्यों मान लिया कि उसके लिए जिंदगी को खत्म कर लेना ही एकमात्र उपाय है? उसने अपने बाद आते और आगे बढ़ते अनेक अभिनेत्रियों को देखा। दुनिया शुरू से ऐसी ही है, कुछ लोग पीछे रह जाते हैं, कुछ लोग जहां के तहां और कुछ लोग आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन पीछे छूट जाने का मतलब यह कतई नहीं कि अपने आप को समाप्त कर लिया जाए। यह कौन-सी युवा पीढ़ी है, जो पीछे छूट जाने का मतलब मौत समझ बैठी है। युवा और बढ़ते वय में अगर मौत को गले लगाने को मन चाहे, तो फिर कहीं न कहीं समाज में कुछ गड़बड़ चल रही है, पड़ताल होनी चाहिए? गहरी पड़ताल, कि ऐसा क्यों हो रहा है, दिव्या भारती १९ की थी, कुलजीत रंधावा भी ज्यादा की नहीं थी, जिया खान २५ की थी? यानी जीवन के शुरुआत की उम्र। दिव्या भारती वाली पीढ़ी तो नशे के भी गिरफ्त में थी, लेकिन अब नई पीढ़ी पर नशा उस तरह से हावी नहीं है। नशा जितना होना चाहिए, उतना है, वो युवा मूर्खों में गिने जाएंगे, जो बेहिसाब नशा करते होंगे। आज की पीढ़ी तो जागरूक है, अंतरराष्ट्रीय पीढ़ी है। जिया खान भी अंतरराष्ट्रीय पीढ़ी की ही कलाकार थी, फिर ऐसा क्या हो गया कि उसने मौत को गले लगा लिया? बेशक, समाज में निराशा बढ़ी है, क्योंकि जीवन का संघर्ष निरंतर कड़ा होता जा रहा है। पल में आशा और पल में निराशा का ऐसा तांडव हर जगह नजर आता है कि हर कोई ना सही, लेकिन ज्यादातर लोग हताश हैं। अवसाद घेरने लगा है और यह भावना भी प्रबल हो रही है कि हमें क्या मिला? हमें तो बहुत कुछ मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं मिला, शायद नहीं मिल सकेगा, इसलिए निराशा भरे कल का इंतजार क्यों किया जाए, अभी ही दुनिया से निकल लेते हैं? मतलब, इंतजार करने का संयम भी नहीं है। क्या मूर्ख हैं वो वैज्ञानिक जो बार-बार विफल होने के बावजूद लगे रहते हैं किसी आविष्कार में... कितना आसान है न, ऐसे सोचना, लेकिन मरना उतना ही मुश्किल है। बहुत मुश्किल से मरी होगी जिया खान, शायद पंखे से लटकने के बाद जीने की इच्छा हुई होगी, लेकिन मौका हाथ से निकल चुका होगा। कितनी अभिनेत्रियां हैं हमारे बॉलीवुड में, जिन्होंने अमिताभ बच्चन, आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे स्टारों के साथ काम किया है? कई लड़कियों के लिए ये तीन फिल्में और ये तीन स्टारों के साथ काम ही उम्र भर के लिए जरूरत से ज्यादा होगा। ये तीनों ही कलाकार भारतीय सिने इतिहास का हिस्सा हैं, इनके साथ १०-१५ मिनट रुपहला पर्दा साझा करने वाला कोई भी कलाकार खुद को धन्य ही मानेगा। लेकिन लगता है जिया खान ने खुद को ध्यन्य नहीं माना? क्योंकि और ज्यादा, बहुत ज्यादा पाने की चाहत थी। और बड़ा स्टार बनने की चाहत, दुनिया से और ज्यादा लेने की चाहत? दोस्तों से और ज्यादा प्यार पाने की चाहत? ये जो पाने की चाहत है, यह खतरनाक होती जा रही है। पाने की चाहत अपने आप में अच्छी बात है, लेकिन न पाने की आशंका भी तो हमेशा रहती है, जिंदगी केवल अच्छी संभावनाओं का ही नाम नहीं है, यह बुरी आशंकाओं का भी डेरा है। पहले की पीढ़ी दूसरों को देकर अपनी जिंदगी को आसान बनाती थी, अपनी जिंदगी को रंगीन बनाती थी, लेकिन अब जो पीढ़ी है, वह केवल लेने में विश्वास करने लगी है। पहले की पीढ़ी के लोग यह सपने देखते थे कि मां के लिए यह करूंगा, पिता के लिए यह करूंगा, दोस्तों के लिए यह करूंगा और देश के लिए यह करूंगा, लेकिन अब सोच बदल चुकी है। अब पिता से यह पूछा जाता है कि आपने हमारे लिए क्या किया? पैदा कर दिया और छोड़ दिया, हमारे लिए कितने प्लॉट आपने खरीदे, कितना बैंक बैलेंस छोड़ा, मां से पूछा जाता है, पाला-पोसा, तो क्या नई बात कर दी, ये तो पैदा किया, तो करना ही था। दोस्तों से भी यही उम्मीद रहती है कि सामने वाला महंगे से महंगा गिफ्ट दे, देश से यह उम्मीद रहती है कि देश सब कुछ नकद दे और बदले में कुछ न ले। यह एक खतरनाक सोच है। आज की पीढ़ी को यह सोचना चाहिए कि उसने दोस्तों को, माता-पिता को और समाज-देश को क्या दिया है? कोई युवा देश को बदलने के प्रयास में लगा है और कोई युवा अपनी जिंदगी को बदलने में विफल होने के बाद मौत को गले लगा ले रहा है? संभव है, देश की निराशाजनक भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने में किसी युवा की जान चली जाए, ऐसे जान जाना ज्यादा बेहतर है, बजाय इसके कि कोई पंखे से अपने खुद के दुख के कारण लटक जाए। युवा पीढ़ी, जो आत्महत्या के अवगुण के करीब जा रही है, सुसाइडल सिंड्रोम की शिकार हो रही है, उसे यह सोचना चाहिए कि उसने दुनिया में आकर किसी को दिया क्या है? आशिकी और जिंदगी केवल लेने से नहीं बढ़ती, देने से भी बढ़ती है, जिया खान शायद यह भूल गई थी.. . लेकिन यह बात हम तो याद रखें।

Tuesday, 19 February, 2013

दुखद बहस

प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का फिर एक बार गलत कारण से चर्चा में आना दुखद और अफसोसजनक है। जस्टिस काटजू को पत्रकारों और पत्रकारिता की भलाई के लिए जिम्मेदार बनाया गया है, लेकिन यदि वे राजनीति को प्रभावित करते दिख रहे हैं, तो जाहिर है, उनसे नाराज होने वालों की संख्या भी बढ़ेगी। लोकतंत्र तभी ढंग से काम करता है, जब हर आदमी अपनी जिम्मेदारी को ढंग से निभाता है। प्रेस परिषद का अध्यक्ष पद काफी गरिमामय और महत्वपूर्ण है, यहां से अगर कोई आवाज उठती है, तो उसे लोग गंभीरता से लेते हैं और इस आवाज को लोग प्रेस या मीडिया से जोड़कर भी देखते हैं। आज प्रेस के क्षेत्र में ऎसी कई समस्याएं हैं, प्रेस रिपोर्टिग को बाघित किया जा रहा है, प्रेस पर हमले हो रहे हैं, अखबारों को बंटने से रोकने तक की घटनाएं हुई हैं, पत्रकारों को विधानसभा कवरेज से भी रोका गया है। क्या प्रेस परिषद के अध्यक्ष को प्रेस से जुड़ी बड़ी समस्याओं तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए? यह एक बड़ा सवाल है। यह भी एक बहस का विषय है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना प्रेस परिषद के अध्यक्ष का विषय है या नहीं। यह भी एक विषय है कि प्रेस परिषद के अध्यक्ष को क्या यह शोभा देता है कि वे देश के 99 प्रतिशत लोगों को मूर्ख ठहराएं? प्रेस परिषद के अध्यक्ष को क्या यह शोभा देता है कि वे एक पोर्न स्टार का पक्ष लें? अगर गौर किया जाए, तो काटजू ने ऎसा काफी कुछ कहा है, जो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। वे चर्चा में रहना चाहते हैं, तो रहें, लेकिन अच्छी वजहों से रहें, विवादों की वजह से नहीं। कोई गलती करे, तो वे मुखर होकर डांट दें, उसके पूरे ज्ञान को चुनौती दे डालें, पर उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि उनका सम्मान न केवल न्यायपालिका, बल्कि प्रेस के सम्मान से भी जुड़ा है। उन्हें अक्खड़ता व अभद्रता का संकेत देने से भी बचना चाहिए। आज राजनीति कैसी है, राजनेता कैसे हैं, सब जानते हैं। उनसे जनता को शालीनता की हमेशा उम्मीद नहीं रहती है, राजनीति में तो मानो सब चलता है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने जिस तरह से काटजू पर हमला बोला, भाजपा जिस तरह से गुस्से में है, उसकी भी तारीफ कोई नहीं करेगा। किसी के द्वारा नरेन्द्र मोदी की आलोचना पर ऎसे बिफरना पार्टी को ही मुश्किल में डालेगा। पार्टी को नरमी से जवाब देना चाहिए, गुस्सा कोई जवाब नहीं है। किन्तु ज्यादा संयम काटजू को दिखाना चाहिए, वे तू-तू मैं-मैं में जितना ज्यादा फंसेंगे, स्वयं को उतना ही ज्यादा हास्यास्पद बनाएंगे। (For patrika edit)