Sunday, 30 June, 2013

आपको हुई असुविधा के लिए खेद है

रेल विकास के बारे में पूरी ईमानदारी से कम ही सोचा जाता है. लगता है, रेल नैतिक दबावों से भी परे है, सामंतशाही चल रही है. यात्रियों की चिंता कम से कम है. बार बार हमे खेद है - हमे खेद है बोलकर रेलवे काम चला लेता है. अब रेलवे ने अपने यात्रियों से धन दोहन के लिए एक नया कदम उठाया है, टिकट रद्दीकरण के 15 साल पुराने नियम को बदल दिया गया है। रेलवे का यह निर्णय जब 1 जुलाई को लागू हो जाएगा, तब दलालों पर पता नहीं कितना अंकुश लग सकेगा, प्रतीक्षा सूची में शामिल यात्रियों को पता नहीं कितनी राहत मिल पाएगी, लेकिन आखिरी समय में यात्रा रद्द करने वाले यात्रियों को बड़ा नुकसान होगा। यात्रा से 48 घंटे पहले टिकट रद्द करवा लिया, तो ठीक, वरना 25 से 50 प्रतिशत तक किराया राशि रेलवे काट लेगा। इसके अलावा यदि ट्रेन की रवानगी के 2 घंटे बाद आप रिफंड लेने जाएंगे, तो आपको एक भी पैसा नहीं मिलेगा। बड़ी बात यह है कि रेलवे को पहले वाली व्यवस्था में भी फायदा था व अब वाली व्यवस्था में तो और भी फायदा होगा। यह बात सब जानते हैं कि रेल टिकट की दलाली की व्यवस्था धड़ल्ले से चल रही है, रेलवे जो कदम दलालों को रोकने के लिए उठाता है, उसका खमियाजा सारे यात्रियों को भुगतना पड़ता है। क्या यह न्यायपूर्ण है, यहां सजा केवल अपराघियों को नहीं मिल रही है, सजा ऎसे निर्दोष लोग भी भुगतेंगे, जो किसी न किसी मजबूरी की वजह से अपनी यात्रा रद्द करेंगे। रेलवे का क्या है, रेलवे तो लोगों की मजबूरी से भी कमाई करने वाला विभाग है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि आख़िर रेलवे को दलालों या एजेंटों की जरूरत क्यों है? आमतौर पर जिस कंपनी का माल नहीं बिकता वह एजेंट रखती है रेलवे के साथ तो ऐसा नहीं है, उसे तो खूब कमाई होती है. लोग उसकी सेवा के लिए इंतज़ार करते हैं रेलवे विभाग तो पैसे लेने के बावजूद सबको खुश नहीं कर पाता है, कभी रेलवे के पास कम काउंटर थे, लेकिन अब जब एसएमएस के जरिये भी टिकट बनने लगेगा तो एजेंटों की जरूरत क्यों रहेगी ? एजेंट सिस्टम बंद होना चाहिए ? रेलवे और यात्रियों के बीच करोड़ों रुपये इधर-उधर हो रहे हैं इसकी जरूरत क्यों है? किसको है? ई टिकट, एसएमएस टिकट के दौर में क्या यात्रियों को एजेंट चाहिए ? क्या सरकार ने इसका अध्ययन करवाया है ? प्रतीक्षा सूची वाले यात्रियों के बारे में तो रेलवे ने कभी सोचा भी नहीं है, अगर कुछ फैसला किया, तो उसे शायद ही कभी लागू किया। ऎसा कदापि नहीं है कि आखिरी समय में टिकट के रद्द होने से रेलों में सीटें खाली रह जाती हैं, प्रतीक्षा सूची में सैकड़ों लोग होते हैं, साधारण प्रतीक्षा सूची के साथ ही तत्काल की प्रतीक्षा सूची भी होती है। खराब, लेटलतीफ रेल सेवाओं की वजह से यात्रियों को कई नुकसान झेलने पड़ते हैं, लेकिन इन यात्रियों के बारे में रेलवे कितना सोचता है? यात्री हैं, उनका क्या, सैकड़ों यात्री रोज निराश होंगे, तो हजारों नए आएंगे। रेलवे तो इस देश में यात्रा करने वालों के लिए मजबूरी है। यह दुख की बात है, ऎसा किसी व्यवसाय में नहीं होता, जैसा रेलवे में होता है। आज रेलवे बिना सेवा के भी पैसे वसूल लेने वाला विभाग बन गया है। आप थोड़ा सोच कर देखिये अगर कार बेचने वाली कंपनियाँ भी यही करें तो क्या होगा, आप ने दो महीने पहले एक कार बुक कराई, कार लेने से एक दिन पहले बुकिंग रद्द करा दी, तो क्या आप चाहेंगे कि कार कंपनी आप से 25 या 50 प्रतिशत कीमत वसूल ले, यह कहकर कि आपने बुकिंग रद्द करा दी इसलिए पैसे दिजिये. एक और बात, व्यवसाय की दुनिया में जमाखोरी और कालाबाजारी प्रतिबंघित है, लेकिन रेलवे में मंजूर है! गौर कीजिए, तत्काल के तहत रेलवे कुछ टिकट जमा करके रखता है और जरूरतमंद लोगों को अंत समय में ब्लैक में बेचता है, क्या यह अनैतिक नहीं है ? एक जरूरी सेवा के साथ ऎसे मजाक और धूर्तता के निदान के बारे में यात्रियों को भी सोचना चाहिए और रेलवे को भी।

Saturday, 22 June, 2013

यात्रा भीतर यात्रा

जनसत्ता 28 अप्रैल, 2013: यात्रा कहां से शुरू होती है, शायद कोई नहीं जानता। कभी अंदर से शुरू होती है, तो कभी बाहर से। अनेक अखबारों-पत्रिकाओं में लिख कर अपने यात्रा संस्मरणों को संजोते रहे राजेश कुमार व्यास के ताजा यात्रा वृत्तांत संग्रह ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ में यह एक बड़ी खूबी है कि वे कभी यात्रा अपने अंदर से शुरू करते हैं और फिर बाहर की ओर बढ़ते हैं और कभी वे बाहर घूमते-घूमते अंदर उतरने लगते हैं। कभी गद्य में तो कभी पद्य में। वे इतने प्रेम के साथ यात्राएं करते हैं कि उनकी आंखों से देखे गए स्थल निखर आते हैं। उन्हें पाठक अपनी आंखों से देखने लगता है। हर बार एक नई जगह के भाव, दृश्य, संगीत और स्वर। वे चौंकाते भी बहुत हैं, किताब के शीर्षक ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ से लगता है कि वे पहले कश्मीर ले जाएंगे, लेकिन वे कन्याकुमारी से ही शुरू और अंत कश्मीर पर करते हैं। पुस्तक के पुरोवाक में व्यास लिखते हैं, ‘चरन् वै मधु विन्दति’, यानी जो चलता है, उसी को जीवन का अमृत-मधु प्राप्त होता है। इस पुस्तक में दर्ज उनकी चौदह यात्राएं यह अहसास निरंतर कराती हैं कि राजेश जी घुमक्कड़ी का मधु छक रहे हैं। पूरे आनंद के साथ वे यात्रा करते हैं। यह आनंद और यात्रा का प्रेम केवल देखी जा रही जगह के प्रति नहीं है, बल्कि उनके साथ जो भी है, उसे वे पूरे लगाव के साथ लिए चलते हैं। उनकी गठरी में अपनापा है, वे जहां जाते हैं, उन्हें उस जगह से प्यार हो जाता है। यही नहीं, एक बड़ी खूबसूरत बात यह है कि उनके सभी यात्रा वृत्तांत उस जगह से बिछुड़ने का दर्द भी बयान करते हैं। उन्हें वह जगह घेर कर पकड़ती है, वे पकड़े जाते हैं और फिर एक तरह से घिसटते हुए-से, वहां दिल छोड़ते हुए-से लौटते हैं, यह सोचते हुए कि फिर लौटूंगा। उनका लौटना कविता में बदल जाता है, रोहतांग दर्रे के पास से लौटते हुए वे लिखते हैं : बर्फ का रेगिस्तान धीरे-धीरे खाली हो रहा है। ठीक इसी तरह जब वे जैसलमेर से लौटते हैं, तो लिखते हैं: ‘रेत, रेत और रेत। बीच में खिला गुलाब। कल्पना नहीं हकीकत। मन में विचार आता है, आखिर कब तक?’ सिक्किम से बिछुड़ने का दर्द देखिए: ‘शहर की भागमभाग से दूर प्रकृति की गोद से बिछुड़ने का मन नहीं है, पर लौटना तो है ही।’ कोणार्क से जब वे लौटते हैं, तो साफ-साफ लिख देते हैं, ‘कोणार्क से बिछुड़ना आसान नहीं है।’ कन्याकुमारी से लौटते हुए वे लिखते हैं: ‘है न अद्भुत!... हमने भी अनुभूत किया। सुबह सूरज को निकलते देखा और अब सूरज को अस्त होते... सागर से विदा लेते भी देख लिया। सागर की लहरें सूर्य को विदा दे रही हैं... हमें भी।’ घुमक्कड़ व्यास पांडिचेरी से लौट रहे हैं: ‘सुकून और शांति का यह अहसास जाने कब फिर से यहां लाएगा... भविष्य को भला किसने पढ़ा है... पांडिचेरी अलविदा।’ और जब वे कश्मीर से लौट रहे हैं, तो लिखते हैं: ‘भगवान धरती के हमारे स्वर्ग को भी बचाए! फिर से कब बहेगी धरती के स्वर्ग में अमन और चैन की हवा! कब उगेगा कश्मीर में नया सूर्य!...’ तमाम जगहों से लौटते हुए राजेश व्यास भावुक कर देते हैं, प्रार्थना और प्रेम के भाव से भर देते हैं, किसी किशोर की तरह नॉस्टेलजिक-से हो जाते हैं। उनकी यात्राओं का अपनत्व जादुई असर छोड़ता है। उनकी यात्राएं लौकिक से अलौकिक होती चली जाती हैं। उनकी आस्था, उनके भले होने का अहसास उनके यात्रा संस्मरणों में होता है। दुनिया में ऐसे अनेक यात्रा वृत्तांत मिलते हैं, जिनमें यात्रा करने वाला अपनी बदमाशियों-चालाकियों का भी जिक्र कर डालता है, लेकिन राजेश जी अपनी इन यात्राओं में इतने प्रेम विभोर रहते हैं कि उनसे ऐसी चालाकी की उम्मीद कोई नहीं कर सकता। यात्रा वृत्तांत वही अच्छा लिख सकता है, जो अच्छा देखता हो। अच्छा देखना केवल वर्तमान को अच्छा देखना नहीं है। समग्रता में अच्छा देखने में अतीत, वर्तमान और भविष्य, तीनों को देखना शामिल है। इस लिहाज से राजेश कुमार व्यास किसी भी जगह पर जाते हैं, तो उस जगह का अतीत, वर्तमान और भविष्य भी देखने की कोशिश करते हैं। वे केवल वर्तमान में समय बर्बाद नहीं करते, वे आगे बढ़ते हैं, वे उस जगह की बेहतरी के बारे में अपने विचार रखते हैं। खासकर कश्मीर यात्रा का वृत्तांत तो सवालों से भरा हुआ है, केवल सवाल हावी नहीं हैं, सवालों के उत्तर जानने की कोशिश और आग्रह भी बार-बार उभरता है। कब उगेगा कश्मीर में नया सूर्य? यहां यात्रा वृत्तांत केवल ट्रेवल बुक की तरह नहीं है, जहां केवल सूचनाएं हों कि कहां क्या मिलेगा और कहां कैसे जाएं, कैसे रहें, यहां तो यात्रा वृत्तांत अपने देश को अपनी मिट्टी को जानने की कोशिश है। केरल, कोणार्क, सरिस्का, बदरीनाथ, चंबा, रोहतांग दर्रा, सिक्किम, रामटेक, वैशाली जैसी महत्त्वपूर्ण जगहों की यात्रा के विवरण यादगार बन पड़े हैं। व्यास के यात्रा वृत्तांत गहरी व्यापक संभावनाएं पैदा करते हैं। वे सोचने पर विवश करते हैं। वे इंतजार का भाव पैदा करते हैं। वे यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं। उनके वृत्तांतों में अनेक कहानियों और उपन्यास के प्लॉट बिखरे नजर आते हैं। वे यात्रा स्थलों की समस्याओं को भी बखूबी उठाते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने जैसलमेर के सोनार किले के दर्द को बेहतरीन बयान किया है, वे लिखते हैं: ‘मुझे किले की ढलान से नीचे उतरते जैसे किले का रुदन सुनाई देने लगा है।’ वास्तव में किले का यह रुदन लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए है कि किले की बिगड़ती अवस्था को ठीक किया जाए। इस विश्व धरोहर की रक्षा की जाए। उनकी कुछ यात्राएं तो बहुत रोमांच पैदा कर देती हैं, खासकर ‘बाघिन मुक्ति की राह पर’। एक वन से ले जाकर बाघिन को दूसरे वन में छोड़ा जाता है, राजेश व्यास भी छोड़ने वालों की टीम के साथ हैं। यह एक तरह से यात्रा भी है और कथा भी, पाठकों को बड़ा आनंद देता यह यात्रा वृत्तांत खास बन पड़ा है। एक और खास बात, हवाई यात्राओं का भी उन्होंने अच्छा ब्योरा दिया है। उड़ते हवाई जहाज की खिड़की से आकाश कैसा दिखता है, मेघ, सूर्य की किरणें क्या जादू पैदा करती हैं, यह सब खास है। मेघों से घिर कर झटके खाते विमान में होने के अनुभव का भी उन्होंने अच्छा जिक्र किया है। यह यात्रा वृत्तांत बहुत पठनीय और प्रेरक है। इसकी भाषा और शैली अत्यंत रोचक और आकर्षक है। यात्रा कैसे की जाती है, उसका संस्कार भी यह पुस्तक देती है। पर्यटकों, यायावरों के लिए ही नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी यह पुस्तक उपयोगी है। कश्मीर से कन्याकुमारी: राजेश कुमार व्यास; नेशनल बुक ट्रस्ट, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया, फेज-2, वसंत कुंज, नई दिल्ली; 90 रुपए।

Friday, 21 June, 2013

जान लेबs का हो

बिहारी राजनीति को ज्यादा महत्व देते हैं, क्या यह बात फिर साबित नहीं हुई है? बिहार को क्या अपना फायदा नहीं देखना चाहिए था? एक पिछड़ा हुआ प्रदेश, जहां बिजली, सडक़, पानी इत्यादि कोई भी मूलभूत व्यवस्था सही नहीं है, वहां के लोग जब राजनीति करते दिखते हैं, तो दुख ही होते हैं। बिहार के पुराने नेताओं ने भी यही किया, सारा प्यार दूसरे प्रदेशों पर उड़ेलते रहे। देश को पहले देखने की यही अदा बिहारियों पर भारी पड़ी, बिहारी राजनेताओं की समझ अभी भी नहीं खुली है। पंजाब, महाराष्ट्र या दक्षिण के राज्यों से बिहार ने कुछ नहीं सीखा है, इसलिए ये राज्य प्रगति करते गए हैं और बिहार वर्षों तक पिछड़ता चला गया है। बिहार तो इस देश के लिए सस्ते और मेहनती श्रमिक पैदा करने का कारखाना है। बिहार विकास के लिए रो रहा है, लेकिन यहां के नेता सिर्फ राजनीति में जुटे हैं। बिहार की माटी बार-बार आह्वान कर रही है, रहम करो, विकास करो, राजनीति छोड़ो, लेकिन बिहार के नेता तो मानों राजनीति के ठेकेदार हैं। नीतीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी को रोकने को अपना परम कत्र्तव्य बना लिया। दूसरे किसी राज्य में किसी नेता ने मोदी के खिलाफ वैसे तेवर नहीं दिखाए, जैसे नीतीश ने दिखाए। नरेन्द्र मोदी का देश के सभी राज्यों में स्वागत है, लेकिन बिहार की सरकार उनका स्वागत करने को तैयार नहीं, शिष्टाचार का भी आभास नहीं है, क्यों? क्योंकि राजनीति करनी है, राजनीति बड़ी चीज है, बिहार तो बस बिसात है, जिस पर राजनीति के मोहरे चले जाएंगे। कभी लालू के हाथ में बाजी होगी, कभी नीतीश कुमार के हाथ में, बिहार तो हर हाल में हारेगा-लुटेगा। बिहारी जब बिहार लौटकर जाते हैं, तो सुविधाओं का अभाव देखकर दिल रोता है। हिन्दू भी रोते होंगे और मुसलमान भी। न अंधेर नगरी कहीं जा रही है और न राजा चौपट होने से बच रहा है। कथित सेकुलरिटी की झूठी आफत गले पड़ी हुई है, लोग शायद अंधेरे में रहकर सेकुलरिटी को बचाना चाहते हैं। अगर व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए, अगर कानून और थाने सक्षम हों और ठीक से काम करें, तो सेकुलरिटी का प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं। विकास का लाभ मुसलमानों को भी मिलेगा और हिन्दुओं को भी। भाजपा ने कभी सेकुलरिटी का दावा नहीं किया, उसका जोर विकास पर है, कुछ राज्यों में उसने अच्छा काम किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस सबसे सेकुलर पार्टी कहलाती है, उसी के राज्य में सत्येन्द्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे, बिहार के भागलपुर में दंगा हुआ था। सैंकड़ों लोग मरे थे। कांग्रेस से लोगों ने मुंह फेर लिया, लालू को सत्ता हासिल हुई, तब नीतीश कुमार भी लालू के साथ थे, लालू-राबड़ी जब तक रहे, भागलपुर दंगा पीडि़तों को पूरा न्याय नहीं मिला। फिर भी लालू टोपी लगाकर अल्पसंख्यक हितैषी होने का ढोंग रचते हैं, लेकिन कौन मुस्लिम हैं, जो ताली बजाते हैं। लालू सबसे सेकुलर नेता थे, उन्होंने आडवाणी के रथ को बिहार में रोक दिया था, नीतीश कुमार भी सेकुलर नेता हैं, उन्होंने मोदी के रथ के राह पर निकलने से पहले ही अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं। क्यों? क्योंकि बिहार ने सेकुलरिटी का ठेका ले रखा है? उधर, देखिए, जो असम कुछ दिनों पहले सांप्रदायिक दंगे की आग में जल रहा था, वहां से राज्यसभा सांसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नीतीश कुमार को धर्मनिरपेक्ष बता रहे हैं, और नीतीश कुमार फुल के कुप्पा हो गए हैं। लेकिन क्या उनके फुल के कुप्पा होने से मुसलमानों का पेट भर जाएगा? क्या कथित उदारवादी हिन्दुओं को विकास नहीं चाहिए? हम झूठी सेकुलरिटी को कब तक बचाते रहेंगे, और क्यों बचाते रहेंगे? बिहारी अपना हित क्यों नहीं देख रहे हैं, सेकुलरिटी राजनीति के पेड़ पर लगने वाला कोई फल नहीं है, सेकुलरिटी तभी फलेगी-फुलेगी, जब विकास होगा। विकास होगा, रोजगार होगा, तो अमन-चैन अपने आप आएगा, और तब जो दंगाई होंगे, उन्हें भीड़ से छांटकर अलग करना ज्यादा आसान हो जाएगा, अपने विकास के प्रति सजग लोग हिंसा की निरर्थकता को समझेंगे। लालू और नीतीश ही क्यों, आप रामविलास पासवान को देख लीजिए, जो ओसामा बिन लादेन के हमशक्ल को साथ लेकर वोट मांगने निकलते थे, क्या यही सेकुलरिटी है? धिक्कार है ऐसे बिहारी नेताओं पर जो राजनीति का संकीर्ण आकलन करते हैं, बिहार का हित नहीं देखते। जब लालू के पास सत्ता थी, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी। जब नीतीश के पास सत्ता आई, तो केन्द्र में विरोधी पार्टी की सरकार थी, अगर मान लीजिए, केन्द्र में नरेन्द्र मोदी आ गए, तो उस बिहार के साथ क्या होगा, जहां की सरकार नरेन्द्र मोदी को अपने राज्य में घुसने से रोकना चाहती है? बिहार के मुखिया मोदी के साथ गलत कर रहे हैं, शिष्टाचार तक भुला चुके हैं, क्या उनके पास आंकड़े हैं कि गुजरात से कितने बिहारियों की रोजी-रोटी चल रही है? बिहार वही गलती कर रहा है, जो पश्चिम बंगाल और उड़ीसा कर रहे हैं, विडंबना देखिए, तीनों ही राज्य पिछड़े हैं, लेकिन शायद यहां के नेता सेकुलरिटी की गारंटी देना चाहते हैं, क्योंकि यह गारंटी आसान है। मुश्किल तो विकास की गारंटी में है, जो कोई नहीं देता।

सबका फिर आभार

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आप पाठकों और प्रिय जनों की कृपा से मेरी किताब पिछले वित्त वर्ष में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित मीडिया किताबों में सबसे ज्यादा बिकी है, इसके लिये बहुत आभार. काम की अधिकता के कारण मैं इस किताब को उतना समय नहीं दे सका, जितना मुझे देना चाहिए था. इसका मुझे बहुत अफसोस रहेगा. तीन साल बाद इस किताब को फिर लिखने का इरादा है. इस किताब के लिए मैं तीर चार प्रिय गुरुजनों को फिर याद करना चाहूँगा श्री रामशरण जोशी, श्री रामबहादुर राय, श्री शशि शेखर... इस किताब को लेकर एक दुःख यह भी है जिसे मैं छिपा नहीं पाता हूँ, मुझे लगता है कि इस किताब ने बहुतों को मेरा विरोधी भी बना दिया, इसमें से कुछ लोग किताब के लोकार्पण में भी शामिल थे, जो किताब के लोकार्पण में नहीं आ पाये थे, और जिन्होंने मेरा कभी समर्थन नहीं किया, उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं, भगवान ने मुझे इतना शक्तिशाली बनाया है कि मुझे कभी बैसाखियों की जरूरत नहीं पड़ी. कुछ मित्र रहे जिन्होंने मेरा भरपूर साथ दिया, और कुछ मुझसे सीखने वाले भी मेरी ताकत बने. मेरी किताब बार बार यही कहती है कि जो अपने दम पर खड़ा होता है. दरअसल वही टिकता है. निंदा, आलोचना, पीठ पीछे से प्रहार इत्यादि आपको सचेत और तैयार रखते हैं, अंततः मज़बूत बनाते हैं. अगर आपमें योग्यता है तो फिर डर कैसा? जोड़-तोड़ से हासिल सम्मान जूठा और झूठा होता है. अपने काम का डंका पीटना जरूरी नहीं, यह कला हर किसी में नहीं होती. ईमानदारी से काम करते जाइये, जिन्हे आपका काम नहीं दिखता, उन्हें तो बस माफ ही किया जा सकता है. जीवन दूसरों की निंदा और दूसरों को नीचा दिखाने और दूसरों की लकीर मिटाने के लिए नहीं, ख़ुद को सशक्त बनाने और अपनी लकीर लंबी करने के लिए मिला है. तो आइये वही करें.

Thursday, 6 June, 2013

भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे

भारत रत्न विद्वान डॉ. पांडुरंग वामन काणे की जितनी प्रशंसा की जाए, कम होगी। आधुनिक भारत में आप जैसे प्रकाण्ड विद्वान गिने-चुने ही हुए हैं। भारतीय ज्ञान कोश को समृद्ध करने में इनका योगदान अतुलनीय है। पांडुरंग जी के महत्व को समझने के लिए हमें आजादी के पहले के उथल-पुथल भरे व बिखरे हुए अभावग्रस्त भारत को याद कर लेना चाहिए। अनेक गांवों, शहरों, आश्रमों में ज्ञान के स्रोत व ग्रंथ बिखरे हुए थे, कुछ ही पुस्तकालय ऐसे थे, जहां गं्रथों की मौजूदगी ठीकठाक थी। भारतीय धर्मशास्त्र के समग्र अध्ययन में बहुत समस्या होती थी, यह जानना मुश्किल था कि किस धर्मशास्त्र या ग्रंथ की रचना कब हुई, किसने रचना की, क्यों रचना की और उसका प्रभाव क्या था, उसका सामाजिक संदर्भ क्या था, इन तमाम प्रश्नों के उत्तर खोजने की जैसी कोशिश डॉ. पांडुरंग ने की, वैसी कोशिश भारतीय ज्ञान जगत में दुर्लभ है। महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में ७ मई १८८० को जन्मे पांडुरंग जी ने भी नहीं सोचा था कि वे भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास लिख डालेंगे। वे तो एक दूसरे ग्रंथ व्यवहारमयूख की रचना में लगे थे और उस ग्रंथ को रचने के उपरांत उनके मन में यह ध्यान आया कि पुस्तक का एक प्राक्कथन या परिचय लिखा जाए, ताकि पाठकों को धर्मशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी हो जाए। धर्मशास्त्र की संक्षिप्त जानकारी देने के प्रयास में पांडुरंग जी एक ग्रंथ से दूसरे ग्रंथ, एक खोज से दूसरी खोज, एक सूचना से दूसरी सूचना तक बढ़ते चले गए, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते चले गए। एक नया विशाल ग्रंथ तैयार होने लगा। भारतीय ज्ञान के इतिहास में एक बड़ा काम हुआ। जब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड १९३० में प्रकाशित हुआ, केवल भारतीय ज्ञान की दुनिया में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भर में ज्ञान की नई हलचल मच गई। उनके ऐतिहासिक लेखन को हाथों हाथ लिया गया। धर्मशास्त्र का इतिहास ग्रंथ के प्राक्क्थन में पांडुरंग जी ने स्वयं लिखा है, 'व्यवहारमयूख के संस्करण के लिए सामग्री संकलित करते समय मेरे ध्यान में आया कि जिस प्रकार मैंने साहित्यदर्पण के संस्करण में प्राक्कथन के रूप में अलंकार साहित्य का इतिहास, नामक एक प्रकरण लिखा है, उसी पद्धति पर व्यवहारमयूख में भी एक प्रकरण संलग्न कर दूं, जो निश्चय ही धर्मशास्त्र के भारतीय छात्रों के लिए पूर्ण लाभप्रद होगा। इस दृष्टि से जैसे-जैसे धर्मशास्त्र का अध्ययन करता गया, मुझे ऐसा दीख पड़ा कि सामग्री अत्यंत विस्तृत एवं विशिष्ट है, उसे एक संक्षिप्त परिचय में आबद्ध करने से उसका उचित निरूपण न हो सकेगा। साथ ही उसकी प्रचुरता के समुचित परिज्ञान, सामाजिक मान्यताओं के अध्ययन, तुलनात्मक विधि शास्त्र तथा अन्य विविध शास्त्रों के लिए उसकी जो महत्ता है, उसका भी अपेक्षित प्रतिपादन न हो सकेगा। निदान, मैंने यह निश्चय किया कि स्वतंत्र रूप से धर्मशास्त्र का एक इतिहास ही लिपिबद्ध करूं।Ó आज धर्मशास्त्र का इतिहास एक ऐसी अनमोल थाती है कि जिसमें वैदिक काल से आधुनिक काल तक के न केवल धर्म ग्रंथ बल्कि तमाम विधि-विधान, सामाजिक रीति रिवाज का भी पर्याप्त विवरण है। पांडुरंग जी ने वही किया, जो एक विद्वान को करना चाहिए। जो सीखा है, जो पढ़ा है, जो अनुभव किया है, उसे दूसरों तक पहुंचाने का काम विद्वान करते हैं। वे एक युग से दूसरे युग के बीच अपने ज्ञान से सेतु का निर्माण करते हैं। वे बीती हुई पीढिय़ों का ज्ञान वर्तमान और भविष्य की पीढिय़ों तक पहुंचाने के लिए ज्ञान ग्रंथ के सेतु निर्मित करते हैं। पांडुरंग जी के बारे में निस्संदेह यह कहना चाहिए कि ज्ञान का जैसा भव्य व विशाल पुल या सेतु उन्होंने बनाया, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। आज का दौर ऐसा दौर है, जहां विद्वान अपने ज्ञान को बांटने से हिचकने लगे हैं, लेकिन पांडुरंग जी उस ऋषि परंपरा के विद्वान थे, जिन्होंने खुले मन से अपने ज्ञान के भंडार को पूरी दुनिया के लिए लुटाया। उन्होंने पहले धर्मशास्त्र का इतिहास अंग्रेजी में लिखा और उसके बाद संस्कृत व मराठी में। धर्मशास्त्र के इतिहास के एक के बाद एक पांच खंड प्रकाशित हुए, १९६२ में पांचवां खंड आया। यह काम इतना अद्भुत, उपयोगी और अतुलनीय था कि भारत सरकार भी इसकी अनदेखी नहीं कर सकी। वर्ष १९६३ में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया। बेहिचक यह कहना चाहिए कि पांडुरंग जी आज तक अकेले ऐसे भारत रत्न हैं, जो भारतीय शास्त्र व संस्कृत को समर्पित रहे। आज कई मोर्चों पर जब संस्कृत को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है, तब पांडुरंग रंग जी को याद करना और याद रखना बहुत जरूरी है। १९३० में जब वे पचास वर्ष की आयु के थे, तब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड आया था और जब अंतिम खंड आया, तब वे ८२ वर्ष केे। एक तरह से उन्होंने पूरा जीवन धर्मशास्त्र को समर्पित कर दिया। लगभग ६५०० पृष्ठों के इस ऐतिहासिक ग्रंथ के अलावा भी उनके अनेक गं्रथ प्रकाशित हुए। उन्हें केन्द्र सरकार ने राज्यसभा का सदस्य भी मनोनीत किया था। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा भी अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके नाम पर आज अनेक संस्थाएं काम कर रही हैं। उन्हें महामहोउपाध्याय होने का सम्मान मिला था, वे महान गुरुओं के बीच भी महान गुरु थे। उनकी पुस्तकों के बिना आज कोई भी पुस्तकालय पूरा नहीं हो सकता। आज उनके नाम से पुरस्कार बंटते हैं। उनके द्वारा रचा गया ज्ञान कोश अंग्रेजी, संस्कृत और मराठी भाषा में १५,००० से ज्यादा पृष्ठों पर उपलब्ध है। १९७२ में उन्होंने शरीर त्याग दिया, लेकिन जो अनमोल ज्ञान वे अपने पीछे छोड़ गए हैं, उसका महत्व कभी खत्म नहीं हो सकता। पांडुरंग जी और उनके योगदान आज भी प्रासंगिक हैं। भारतीय विद्वानों की दुनिया उन्हें भुला नहीं सकती, जब भी भारतीय संस्कृति को लेकर कोई विवाद उठता है, तो पांडुरंग जी की रचनाओं से निकालकर उद्धरण दिए जाते हैं। आज चारों तरफ आंदोलनों की गूंज है, एक तरफ भ्रष्टाचार जारी है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन। इस स्थिति की कल्पना शायद पांडुरंग जी ने पहले ही कर ली थी, उन्होंने कहा था, भारतीय संविधान भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लोगों को अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं दी गई। आज कौन उनकी इस बात से इनकार करेगा? भारत में लोगों को हर संभव अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन लोग जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं, जिसकी वजह से समाज व देश में अनेक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। आज भारत रत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे को याद करना तभी सार्थक होगा, जब हम भारत और भारतीयता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे। तभी हम अपने अधिकारों का सदुपयोग कर पाएंगे और यही पांडुरंग जी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। धन्यवाद, जयहिन्द, जय भारत। (मेरे द्वारा लिखित इस वार्ता का प्रसारण मेरी ही आवाज में रेडियो स्टेशन जयपुर से पिछले वर्ष हुआ था।)

जिया, कैसे जीया?

पंखे से लटकने से पहले वह क्या सोच रही होगी? उसने यह क्यों मान लिया कि उसके लिए जिंदगी को खत्म कर लेना ही एकमात्र उपाय है? उसने अपने बाद आते और आगे बढ़ते अनेक अभिनेत्रियों को देखा। दुनिया शुरू से ऐसी ही है, कुछ लोग पीछे रह जाते हैं, कुछ लोग जहां के तहां और कुछ लोग आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन पीछे छूट जाने का मतलब यह कतई नहीं कि अपने आप को समाप्त कर लिया जाए। यह कौन-सी युवा पीढ़ी है, जो पीछे छूट जाने का मतलब मौत समझ बैठी है। युवा और बढ़ते वय में अगर मौत को गले लगाने को मन चाहे, तो फिर कहीं न कहीं समाज में कुछ गड़बड़ चल रही है, पड़ताल होनी चाहिए? गहरी पड़ताल, कि ऐसा क्यों हो रहा है, दिव्या भारती १९ की थी, कुलजीत रंधावा भी ज्यादा की नहीं थी, जिया खान २५ की थी? यानी जीवन के शुरुआत की उम्र। दिव्या भारती वाली पीढ़ी तो नशे के भी गिरफ्त में थी, लेकिन अब नई पीढ़ी पर नशा उस तरह से हावी नहीं है। नशा जितना होना चाहिए, उतना है, वो युवा मूर्खों में गिने जाएंगे, जो बेहिसाब नशा करते होंगे। आज की पीढ़ी तो जागरूक है, अंतरराष्ट्रीय पीढ़ी है। जिया खान भी अंतरराष्ट्रीय पीढ़ी की ही कलाकार थी, फिर ऐसा क्या हो गया कि उसने मौत को गले लगा लिया? बेशक, समाज में निराशा बढ़ी है, क्योंकि जीवन का संघर्ष निरंतर कड़ा होता जा रहा है। पल में आशा और पल में निराशा का ऐसा तांडव हर जगह नजर आता है कि हर कोई ना सही, लेकिन ज्यादातर लोग हताश हैं। अवसाद घेरने लगा है और यह भावना भी प्रबल हो रही है कि हमें क्या मिला? हमें तो बहुत कुछ मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं मिला, शायद नहीं मिल सकेगा, इसलिए निराशा भरे कल का इंतजार क्यों किया जाए, अभी ही दुनिया से निकल लेते हैं? मतलब, इंतजार करने का संयम भी नहीं है। क्या मूर्ख हैं वो वैज्ञानिक जो बार-बार विफल होने के बावजूद लगे रहते हैं किसी आविष्कार में... कितना आसान है न, ऐसे सोचना, लेकिन मरना उतना ही मुश्किल है। बहुत मुश्किल से मरी होगी जिया खान, शायद पंखे से लटकने के बाद जीने की इच्छा हुई होगी, लेकिन मौका हाथ से निकल चुका होगा। कितनी अभिनेत्रियां हैं हमारे बॉलीवुड में, जिन्होंने अमिताभ बच्चन, आमिर खान और अक्षय कुमार जैसे स्टारों के साथ काम किया है? कई लड़कियों के लिए ये तीन फिल्में और ये तीन स्टारों के साथ काम ही उम्र भर के लिए जरूरत से ज्यादा होगा। ये तीनों ही कलाकार भारतीय सिने इतिहास का हिस्सा हैं, इनके साथ १०-१५ मिनट रुपहला पर्दा साझा करने वाला कोई भी कलाकार खुद को धन्य ही मानेगा। लेकिन लगता है जिया खान ने खुद को ध्यन्य नहीं माना? क्योंकि और ज्यादा, बहुत ज्यादा पाने की चाहत थी। और बड़ा स्टार बनने की चाहत, दुनिया से और ज्यादा लेने की चाहत? दोस्तों से और ज्यादा प्यार पाने की चाहत? ये जो पाने की चाहत है, यह खतरनाक होती जा रही है। पाने की चाहत अपने आप में अच्छी बात है, लेकिन न पाने की आशंका भी तो हमेशा रहती है, जिंदगी केवल अच्छी संभावनाओं का ही नाम नहीं है, यह बुरी आशंकाओं का भी डेरा है। पहले की पीढ़ी दूसरों को देकर अपनी जिंदगी को आसान बनाती थी, अपनी जिंदगी को रंगीन बनाती थी, लेकिन अब जो पीढ़ी है, वह केवल लेने में विश्वास करने लगी है। पहले की पीढ़ी के लोग यह सपने देखते थे कि मां के लिए यह करूंगा, पिता के लिए यह करूंगा, दोस्तों के लिए यह करूंगा और देश के लिए यह करूंगा, लेकिन अब सोच बदल चुकी है। अब पिता से यह पूछा जाता है कि आपने हमारे लिए क्या किया? पैदा कर दिया और छोड़ दिया, हमारे लिए कितने प्लॉट आपने खरीदे, कितना बैंक बैलेंस छोड़ा, मां से पूछा जाता है, पाला-पोसा, तो क्या नई बात कर दी, ये तो पैदा किया, तो करना ही था। दोस्तों से भी यही उम्मीद रहती है कि सामने वाला महंगे से महंगा गिफ्ट दे, देश से यह उम्मीद रहती है कि देश सब कुछ नकद दे और बदले में कुछ न ले। यह एक खतरनाक सोच है। आज की पीढ़ी को यह सोचना चाहिए कि उसने दोस्तों को, माता-पिता को और समाज-देश को क्या दिया है? कोई युवा देश को बदलने के प्रयास में लगा है और कोई युवा अपनी जिंदगी को बदलने में विफल होने के बाद मौत को गले लगा ले रहा है? संभव है, देश की निराशाजनक भ्रष्ट व्यवस्था को बदलने में किसी युवा की जान चली जाए, ऐसे जान जाना ज्यादा बेहतर है, बजाय इसके कि कोई पंखे से अपने खुद के दुख के कारण लटक जाए। युवा पीढ़ी, जो आत्महत्या के अवगुण के करीब जा रही है, सुसाइडल सिंड्रोम की शिकार हो रही है, उसे यह सोचना चाहिए कि उसने दुनिया में आकर किसी को दिया क्या है? आशिकी और जिंदगी केवल लेने से नहीं बढ़ती, देने से भी बढ़ती है, जिया खान शायद यह भूल गई थी.. . लेकिन यह बात हम तो याद रखें।