Wednesday 27 November 2013

बदलता देश, दशक और फिल्मी नायक

(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका बहुवचन के सिनेमा विशेषांक में प्रकाशित मेरा एक शोध लेख - जो सिनेमा के १०० साल पर एक दृष्टि डालने का प्रयास कि कैसे देश बदला है, कैसे दशक और कैसे फिल्म नायक)

- ज्ञानेश उपाध्याय -
हम मनुष्य जब गर्भ में रहते हैं, तब भी हमारे पास दिल होता है धडक़ता हुआ। तब हमारे पास दिमाग भी होता है, लेकिन सुप्त-सा। छोटी-सी बंद और दबी-दबी-सी, गीली और रिसती हुई-सी जगह पर हम सब नौ महीने बिताते हैं। उन नौ महीनों की बातें किसी को याद नहीं रहतीं। ये नौ महीने तो ऐसे रहते हैं कि हमारी जिंदगी में जोडऩे लायक भी नहीं समझे जाते, लेकिन हम जब गर्भ से निकलकर खुले में आते हैं, तब हमारे दिन जुडऩे लगते हैं, हमारा इतिहास शुरू हो जाता है, लेकिन किसी को भी अपना शुरुआती इतिहास याद नहीं रहता। क्या यह संयोग नहीं है कि शुरुआती दौर की बहुत कम फिल्में हमें याद हैं। बताया जाता है कि मूक दौर में १२८८ फिल्में बनी थीं, लेकिन उनमें से मात्र १३ फिल्में ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलती हैं। बाकी को हम भूल गए या भुला दिया। कहा जाता है कि गर्भकाल और शिशुकाल बहुत परतंत्र और कष्टमय होता है, इसलिए यह बेहतर है कि उसे भुला दिया जाए। प्रकृति ने कुछ ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि हम स्वत: अपने बीज और शिशु दौर को भूल जाते हैं। वैसे उन दिनों में जो फिल्में आईं, उनके नाम और परिचय तो हमें मिलते ही हैं और उनके दम पर भी हिन्दी फिल्मों का इतिहास बनता है।
कुछ लोग मानते हैं कि भारत में फीचर फिल्म का जन्म १९१२ में ही 'पुंडलिक' नामक फिल्म से हो गया था, लेकिन सर्वस्वीकार्य रूप से भारतीय फीचर फिल्मों का जन्म १९१३ में माना गया है। यह वही वर्ष था, जब महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला था। उसके बाद साहित्य भले ही खूब रचा गया, लेकिन किसी भी भारतीय साहित्यकार को नोबेल नहीं मिला, दूसरी ओर, सिनेमा ने भी बहुत विकास किया, लेकिन कोई भी सम्पूर्ण भारतीय फिल्म सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान - ऑस्कर नहीं जीत सकी। अब इस पर बहस हो सकती है कि भारतीय सिनेमा और भारतीय साहित्य कितना परिपक्व हुआ है। इसी के साथ हम एक बहस यह भी जोड़ लेते हैं कि भारतीय नायक कितना परिपक्व हुआ है। यह तो दुनिया के परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टि हो गई, लेकिन वास्तव में अगर मुख्य धारा की भारतीय फिल्मों की बात करें, तो उनमें अभी भी काफी बचपना है। सौ की उम्र पार करने के बाद भी फिल्मों में कमी खोजी जा सकती है, बचपना खोजा जा सकता है। सिनेमा, साहित्य और नायक, तीनों में यह बचपना बरकरार है। ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सिनेमा, साहित्य या नायक एकदम परिपक्व हो गए हैं या उनमें बचपना नजर नहीं आता, लेकिन वहां तुलनात्मक रूप से परिपक्वता और तार्किकता ज्यादा है और तभी वह सिनेमा पूरी दुनिया को अपील करता है, जबकि मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा की अपनी एक सीमा है। जैसे भारत, भारतीय समाज और भारतीय आधुनिक मन की एक सीमा है।
देश बदलता रहा है और उसके साथ-साथ फिल्में भी कुछ-कुछ बदलती रही हैं और साथ में उनके नायक भी बदलते रहे हैं। आज के देश, सिनेमा और नायक में हर दौर का कुछ न कुछ शामिल है। एक ही साथ अलग-अलग समय के दृश्य, प्रतीक, गुण और दोष चल रहे हैं। थोड़ा बचपन, थोड़ा किशोरपन, थोड़ी जवानी, थोड़ी प्रौढ़ता और थोड़ा बुढ़ापा, मानो मिलजुलकर कभी थोड़ा-तो कभी ज्यादा साथ-साथ चल रहे हैं। वैसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा जब जवानों की तरह बात करता है, तो उसे अपवाद स्वरूप लिया जाता है, ठीक वैसे ही जवानी में बचपन के लक्षण को अपवाद स्वरूप ही लिया जाता है। बचपन वास्तव में बचपन है और जवानी वास्तव में जवानी। इस बात को ध्यान में रखते हुए मोटे तौर पर समय और उसके प्रभावों को लेकर हम एक रोचक अध्ययन यह कर सकते हैं कि बदलते देश में बदलते दशक के साथ फिल्मी नायक कैसे बदलता चला गया।
दशक वार अगर हम देखें, तो नायक कुछ यों नजर आते हैं।
बीज नायक : 1910 का दशक
शिशु नायक : 1920 का दशक
किशोर नायक : 1930 का दशक
वयस्क नायक : 1940 का दशक
आदर्श नायक : 1950 का दशक
प्रेमी नायक : 1960 का दशक
असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
यथार्थवादी नायक : 1980 का दशक
प्रवासी नायक : 1990 का दशक
विलासी नायक : 2000 का दशक
भ्रमित नायक : 2010 का दशक
भारतीय फिल्मों के शुरुआती दो दशक बीज नायक और शिशु नायक को समर्पित रहे। हम जीना और चलना सीख रहे थे। हमें ठोकर लग रही थी, हम गिर रहे थे, फिर उठकर चल रहे थे। फिल्मों ने भी पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियां सुनकर-सुनाकर बचपन बिताया। हमें यह अहसास नहीं था कि हम समाज से भी नायक उठा सकते हैं, तो हमने लगभग सभी नायक अपने पुराणों और इतिहास से उठाए। भारतीय सिनेमा ने पौराणिक कथाओं के साथ ही शुरुआत की और यह कहा जाता है कि शुरुआती वैचारिक बुनियाद तो बचपन में ही बनती है, हमें बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, उनसे ही हमारा मानस बनता है। तो कोई आश्चर्य नहीं, आज भी भारतीय फिल्मों की ज्यादातर कहानियां पौराणिक कथाओं-महाभारत-रामायण के कथा-ढांचे से बाहर नहीं आ पाई हैं। दर्शकों को नायक और खलनायक के संघर्ष में आज भी बहुत आनंद आता है। ज्यादातर आधुनिक भारतीय फिल्मों ने भी यह आनंद लेना और देना नहीं छोड़ा है। अच्छे-अच्छे निर्देशक यह ढांचा तोडऩे की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर को फिर पारंपरिक ढांचे में आकर काम करना पड़ता है। यानी भारतीय फिल्मों के बीज और शिशु नायक ने आज भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा है।
यह वही दौर था, जब भारत की आजादी के नायक सिर उठा रहे थे, उनके सब्र का बांध टूटने लगा था, उन्हें समझ में आने लगा था कि देश की मुक्ति के लिए खड़ा होना पड़ेगा। यह कहा जाता है कि बिना मांगे कुछ नहीं मिलता और बिना रोए मां दूध नहीं पिलाती, तो यह वह दौर था, जब फिल्मों ने रोना और मांगना शुरू किया।  
क्रमश:

एक बंगला बने न्यारा

किशोर नायक : 1930 का दशक 
भाग - 2
१९३० वह वर्ष था, जब गांधी जी दांडी मार्च पर निकले थे। उन्होंने फैसला कर लिया था कि अंग्रेजों द्वारा थोपे गए उन तमाम कानूनों को तोड़ेंगे, जो अन्याय के प्रतीक हैं। इसी वर्ष गांधी जी को अन्य भारतीय नेताओं के साथ प्रथम गोलमेज बैठक के लिए लंदन बुलाया गया था। देश की आवाज सुने जाने की बुनियाद तैयार हो चुकी थी और संयोग है कि १९३१ में भारतीय फिल्मों ने भी बोलना शुरू कर दिया। फिल्मकार अर्देशर ईरानी की 'आलम आरा' रिलीज हुई। विश्व पटल पर भारत की आवाज को साफ होने में वक्त लगा, ठीक उसी तरह से १९३० के दशक में फिल्मों में आवाज को साफ होने में वक्त लगा। कई फिल्में तो १९३४ तक मूक ही बनती रहीं। जैसे एक शिशु धीरे-धीरे बोलना शुरू करता है और धीरे-धीरे ही उसकी आवाज साफ होती जाती है, ठीक उसी तरह से १९३० का दशक भारतीय फिल्मों की आवाज साफ होने का दौर है। कहा जाता है कि छोटे बच्चे खूब बोलते-गाते हैं, तो १९३२ में बनी फिल्म इंद्रसभा में ६९ गीत थे, क्या यह चौंकने वाली बात है?
इस दौर में भारत में संघर्ष के अनेक स्रोत तैयार हो रहे थे, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी निर्माण के स्तर पर संघर्ष के अनेक स्रोत सामने आ रहे थे। अंग्रेजी राज का फिल्मों पर साफ असर था, अंग्रेज चाहते थे कि फिल्मों में खुलापन तो हो, लेकिन आजादी या संघर्ष की गूंज न हो। ऐसे में इस दशक में भी लगभग दो तिहाई फिल्में धार्मिक चरित्रों व पौराणिक आख्यानों को आधार मानकर बनीं। पौराणिक आख्यानों पर फिल्म बनाना फिल्मकारों के लिए भी लाभ का सौदा था, क्योंकि तब तक ऐसे आख्यानों को लोगों ने किताबों में ही पढ़ा था। बोलती-भागती तस्वीरों का आनंद बढऩे लगा था, ऐसे में, लोग पर्दे पर किसी सुनी-पढ़ी कहानी को देखकर भावविभोर हो जाते थे।
वैसे इसी दशक में समकालीन सामाजिक कथाओं पर फिल्म बनाने की शुरुआत हो गई थी, जैसे मुंशी प्रेमचंद ने फिल्मकार मोहन भवनानी के लिए फिल्म लिखी थी 'द मिल', जो १९३४ में रिलीज हुई थी। बताया जाता है कि इस फिल्म का मजदूर समाज पर गहरा असर हुआ था, फिल्म देखकर मजदूर भडक़ जाते थे। प्रदर्शन के बाद दंगे जैसी स्थिति पैदा हो जाती थी, लाहौर, पंजाब, दिल्ली इत्यादि शहरों में इसे प्रतिबंधित भी किया गया था। लोगों को उद्वेलित-उत्तेजित करने वाली फिल्मों में 'द मिलÓ को भारत की पहली फिल्म माना जाता है।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९३५ में वी. शांताराम की 'अमृत मंथन' रिलीज हुई थी और आगे के दशकों में एक मास्टर फिल्मकार के रूप में स्थापित हुए महबूब खान की 'जजमेंट ऑफ अल्लाह'। बताते हैं कि 'अमृत मंथन' में जूम शॉट्स की शुरुआत हुई थी, यानी चीजों पर करीब से फोकस करने की शुरुआत। १९३० के दशक में फिल्मों के बारे में यह अहसास होने लगा था कि इन्हें हंसी में नहीं उड़ाया जा सकता। देश का मानस बनाने में फिल्मों का बहुत योगदान न था, लेकिन फिल्में उस दिशा में बढऩे लगी थीं। समाज और फिल्मों के बीच सम्बंध बनने लगा था। समाज फिल्मों को समझ रहा था और फिल्में समाज को समझ रही थीं। १९३० के दशक में ही भारतीय सिनेमा की कुछ अच्छी हस्तियों की फिल्मी मानसिकता तैयार हुई। फिल्में नौटंकी, रामलीला और पारसी थियेटर से बढक़र भी कुछ हो सकती हैं, इसका अहसास होने लगा। अच्छे घरों के युवक-युवतियां भी फिल्मों में आने के बारे में सोचने लगे थे। जो लोग फिल्मों को बुरा माध्यम समझते थे, वे भी फिल्मों की उपेक्षा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि ईश्वरीय चरित्रों, संतों, ऐतिहासिक चरित्रों इत्यादि पर ढेरों फिल्में बन रही थीं। लोग विज्ञान का जादू और धार्मिक कथा के आकर्षण में खिंचे चले आते थे। कुल मिलाकर १९३० के दशक में यह लगने लगा था कि फिल्में कुछ खास करने वाली हैं। इस दौर में के.एल.सहगल सबसे बड़े स्टार थे, वे अभिनेता से ज्यादा गायक थे। उनका अभिनय सादा और सतही-सा होता था, मानो किशोर दौर का शिशु स्तरीय अभिनय। वे ढंग से नाटकीय भी नहीं हो पाते थे। दूसरे शब्दों में कहें, तो सहगल के अभिनय में भी अलग तरह का भोलापन था, जैसे इस देश के लोग भोले थे, ठीक उसी तरह से। के.एल.सहगल न गायकी में प्रशिक्षित थे, न अभिनय में, वे अभिव्यक्ति एवं प्रदर्शन के लिए संघर्षरत थे, जैसे यह देश संघर्षरत था। जैसे देश के लिए किया जा रहा संघर्ष सबको प्रेरित कर रहा था, ठीक उसी तरह से सहगल द्वारा किया गया संघर्ष भी बहुतों को प्रभावित कर रहा था। उस दौर में अभिनेता और आम लोग सहगल की तरह गीत गाने और अभिनय करने में आनंद की अनुभूति करते थे और लगता था कि सबकुछ ऐसे ही चलेगा। १९३५ में ही पी.सी. बरुआ ने सहगल को मुख्य भूमिका में लेकर 'देवदास' का निर्माण किया था। आज अगर इस 'देवदास' को कोई देखे, तो सबकुछ बड़ा बचकाना लगेगा, लेकिन हंसने वाली कोई बात ही नहीं है, क्योंकि वाकई यह फिल्मों के लिए किशोर दौर था। फिल्में ठीक से बढऩा, बोलना और दौडऩा सीख रही थीं।
फिल्में तो अपने बचपन व किशोरवय को छोडक़र आगे बढ़ गईं, लेकिन वास्तव में देश १९३० के दौर की बहुत-सी चीजों को आज भी ढो रहा है। जैसे इसी दौर में सांप्रदायिकता और जातिवादी राजनीति भी उभरने लगी थी। १९३५ में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास हो चुका था और देश में विभिन्न स्तरों पर संघर्ष के अनेक बचकाने प्रयोग हो रहे थे, कुछ ऐसे प्रयोग आगे चलकर युवा या अधेड़ हुए, लेकिन कई प्रयोग आज भी बचकाने ही लगते हैं और वैसे ही बने हुए हैं। १९३० के दशक का अध्ययन अगर किया जाए, तो हम पाएंगे कि इस दशक में अंग्रेज देश को बांट रहे थे, भारत को ११ प्रांतों में बांट दिया गया था, बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया था। कांग्रेस में फूट पड़ गई थी। सुभाष चंद्र बोस ने अपना अलग रास्ता चुन लिया था। वैसे संयोग व दुर्भाग्य से नेताजी का यह प्रयोग भी अगले दशक में बहुत हद तक बचकाना-सा ही सिद्ध हुआ।
दूसरी ओर, यह सुखद संयोग है कि इस दशक में भारतीय राजनीति और समाज में पुख्ता रूप से कुछ हस्तियां उभरीं, ठीक उसी तरह से फिल्मों में भी के.एल. सहगल, सोहराब मोदी, मोतीलाल, अशोक कुमार, पृथ्वीराज कपूर जैसे अच्छे अभिनेता उभरे, जिन्होंने बाद की पीढिय़ों को अपने अच्छे काम से बहुत प्रभावित किया।
क्रमश:

अंखिया लड़ाके... चले नहीं जाना

वयस्क नायक : १९४० का दशक
भाग - 3
इस दशक में फिल्मी माहौल कुछ गंभीर होने लगा था, लडक़पन तो काफी हद तक पीछे छूट गया था। पौराणिकता के प्रति आकर्षण कम होने लगा था और फिल्में समकालीन समाज को सम्बोधित करने लगी थीं। इस दौर में फिल्मी नायक को एक पुख्ता रूप देने में जिन गंभीर फिल्मकारों का नाम लिया जा सकता है, उनमें देविका रानी, महबूब खान, नितिन बोस, वी. शांताराम, अमिय चक्रवर्ती, के.ए.अब्बास, केदार शर्मा, कमाल अमरोही और राज कपूर इत्यादि प्रमुख हैं। इनमें से कुछ फिल्मकार कहीं न कहीं इटली में उभरे फिल्मी नवयथार्थवाद से प्रभावित थे। नवयथार्थवादी फिल्में समय की मांग थीं। विश्व युद्ध से पीडि़त दुनिया, जिसमें बहुत गरीबी, बेरोजगारी और असमानता थी, वर्ग संघर्ष बढ़ गया था, आजादी की मांग बढ़ गई थी, विज्ञान भी तेज तरक्की कर रहा था, ऐसे में फिल्मों को ज्यादा समय तक समकालीन चेतना से बचाया नहीं जा सकता था। जैसे दुनिया में नवयथार्थवादी सिनेमा सशक्त होकर उभरा, वैसे ही भारत में भी ऐसे फिल्मकार होने लगे, जिनकी नजर केवल बाजार या टिकट खिडक़ी पर नहीं थी, जो समाज के बारे में भी निरंतर सोच रहे थे। हालांकि लोगों में भी मुक्ति की चाहत थी। भारत की अगर बात करें, तो आजादी की चाहत इस दशक में शिखर पर थी, समस्याओं से स्वतंत्र होने और राहत पाने की इच्छा थी। यह दुनिया में अंग्रेजों की हार का दशक था, भारतीय युवा विजेता के रूप में खड़ा हो चुका था और भारतीय फिल्मी नायक भी विजेता के रूप में पहचान बनाने लगा था। फिल्में राह दिखाने की मुद्रा में आने लगी थीं। जहां मनोरंजन करना उनका ध्येय होता था, वहीं उनमें यह प्रगतिशीलता भी गहरे बसने लगी थी कि लोगों और समाज का भी कुछ भला करना है, कोई न कोई अच्छा संदेश देना है। गांधीवादी, माक्र्सवादी या समाजवादी प्रभाव फिल्मों में स्पष्ट दिखने लगा था।
यह वही दशक है, जिसमें संगीत भी खुलकर रंग जमाने लगा। यह महज संयोग नहीं है कि संगीत का आनंद और संगीत की मनमोहक लय तभी बनी, जब देश आजाद हुआ। आजाद हवा में गीत गाने और सुनने का आनंद बढ़ गया। देश १९४७ में आजाद हुआ, तो मानो फिल्मी संगीत को कोठों और नाटकीयता के करीब पहुंच रही शास्त्रीयता से आजादी मिली। दो फिल्मों ने भारत में संगीत के व्याकरण को काफी हद तक बदल दिया और संगीत को सुगम-सुलभ-सरस बना दिया। १९४९ में ही राज कपूर की 'बरसात' फिल्म रिलीज हुई थी, जिसमें शंकर-जयकिशन ने कमाल कर दिया था। इसी वर्ष दूसरी संगीत प्रभावी फिल्म थी, कमाल अमरोही की 'महल', जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने भी संगीत को सुगम बनाने में योगदान दिया। लता मंगेशकर के नेतृत्व में देश के ज्यादातर गायकों की आवाज भी आजाद हुई और नकल या नाक के प्रभाव से अपनी-अपनी मौलिक आवाज की ओर गायक बढ़ चले। वाकई मौलिकता ही शानदार निर्माण में कारगर होती है। देश में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे और फिल्मी दुनिया में भी अनेक मौलिक कार्य हो रहे थे। फिल्में पूरी तरह से देश का साथ देने लगी थीं। पंडित नेहरू की नीति समाजवाद की निकट थी, तो ज्यादातर फिल्में भी समाजवादी प्रभाव में थीं।
इस दशक में हम अगर कोई एक प्रतीक नायक खोजने की कोशिश करें, तो थोड़ी मुश्किल होती है, लेकिन दिलीप कुमार को हम इस दशक का प्रतिनिधि नायक मान सकते हैं। वर्ष १९४५-४६ में नितिन बोस के निर्देशन में दिलीप कुमार की भूमिका वाली फिल्म 'मिलन' आई थी। बाम्बे टॉकीज की यह फिल्म दिलीप कुमार की पहली हिट थी। इसके पहले दिलीप कुमार 'ज्वार भाटा' और 'प्रतिमा' फिल्म में काम कर चुके थे, लेकिन जब 'मिलन' आई, तो उनकी मैथड एक्टिंग या पद्धतिबद्ध अभिनय को देखकर स्पष्ट हो गया कि न केवल भारतीय फिल्मों को एक वयस्क नायक मिल गया है, बल्कि अभिनय में भी वयस्कता आ गई है। 'मिलन' के बाद दिलीप कुमार की इसी दशक में नौ और फिल्में आईं और वे प्रेमी, समर्पित नायक के रूप में हर दिल अजीज हो गए।
क्रमश:

मैंने दिल तुझको दिया


आदर्श नायक : १९५० का दशक
भाग - 4
१९५० का दशक आदर्श दौर है। इस दौर में फिल्मकारों के दिमाग में भी देश और समाज के प्रति चिंतन हावी था। यह महबूब खान, दिलीप कुमार, राज कपूर, बिमल राय, के.ए.अब्बास, गुरुदत्त, चेतन आनंद, देव आनंद का चरम दौर है। इसी दशक में सत्यजीत राय ने भी अपनी सजग चेतना से पूरे भारतीय चिंतन को प्रभावित किया। इस दौर की शुरुआत में 'आवारा' जैसी बेहतरीन फिल्म आई, 'मदर इंडिया और 'जागते रहो, जैसी फिल्म भी इसी दौर में बनी। १९५५ में राज कपूर की फिल्म 'श्री ४२० आई। इस फिल्म में नायक अमीर होने के लिए गलत राह पर चल पड़ता है, लेकिन अभिनेत्री अपने आदर्श से जरा भी नहीं डिगती और अंतत: नायक भी आदर्श की ओर लौट आता है। इस दौर की फिल्मों में आदर्श की जीत बहुत आम परिघटना थी। गलत से गलत व्यक्ति भी आदर्श की ओर लौट आता था या जो नहीं लौटता था, वह मारा जाता था। इसी दौर में शंभु मित्रा की 'जागते रहो' जैसी शानदार फिल्म आई, जिसमें यह दिखाया गया कि अमीर होने के लिए लोग क्या-क्या करते हैं और एक ईमानदार गरीब आदमी पानी के लिए भी तरस जाता है, वह पानी भी पीता है, तो उसे चोर कहा जाता है। इस फिल्म का गरीब नायक खड़े होकर पूरे समाज को आईना दिखा देता है।
वास्तव में १९५० का दशक भारतीय फिल्मों में नायकत्व के सशक्त होने का समय है। भारतीय समाज सदा से नायक की तलाश में रहा है, कोई ऐसा नायक, जो सबके लिए बात करे, सबके लिए लड़े, सबको सम्बोधित करे। इस दशक में सरकार के अंदर ही अनेक नायक थे, जो आजादी की लड़ाई से होकर उभरे थे। महात्मा गांधी का दौर बीत चुका था, पंडित जवाहरलाल नेहरू का दौर चल रहा था। नेहरू फिल्म प्रेमी व्यक्ति थे। वे फिल्म वालों की लोकप्रियता से प्रभावित रहते थे। उनके समय सरकार ने फिल्मों के विकास के लिए कई तरह से प्रयास शुरू किए, इससे भी फिल्मों में नायकत्व को बल मिला। पहले के दशकों की अपेक्षा इस दशक में फिल्में ज्यादा बेहतर ढंग से सुलझने लगीं, साफ-साफ अपनी बात रखने लगीं। गरीबी, अभाव, तरह-तरह के भेदभाव, जातिवाद, सांप्रदायिकता, फासीवाद, हिंसा इत्यादि देश की बड़ी समस्याओं को फिल्मों ने बहुत तरीके से भरपूर मनोरंजन करते हुए भी प्रस्तुत किया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता का अगर चुनाव किया जाए, तो दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर के बीच में हमें राज कपूर को चुनना चाहिए, क्योंकि वे एक ही साथ कई तरह की प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे थे। निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, संपादक इत्यादि की भूमिका में वे अपने समकालीन स्टारों से आगे थे। हां, इसी दौर में एक और प्रतिनिधि नायक-अभिनेता को भी श्रेय देना चाहिए, बलराज साहनी। इनके बिना यह दशक आदर्श नहीं बनता, बिमल राय के निर्देशन में 'दो बीघा जमीन' फिल्म बलराज साहनी के लिए ही नहीं, बल्कि इस दशक में नया सिनेमा के लिए भी उत्कर्ष है।
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक आदर्शों और समाजवादी मूल्यों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थक था, लेकिन उसे ठीक से प्यार करना नहीं आता था। प्यार की अनुभूति मजबूत आकार नहीं ले सकी थी। 'अरेंज्ड मैरेज' का समाज था, जैसी समाज और परिवार की इच्छा होती थी, युवा वैसा ही करते थे। अपने प्यार की बलि चढ़ा देते थे या समझ ही नहीं पाते थे कि प्यार में क्या किया जाए। ध्यान दीजिए, इसी दौर में बिमल राय ने 'देवदास' का निर्माण किया। एक ऐसा नायक जो न ठीक से प्यार कर सका, न ठीक से प्यार पा सका। गुरुदत्त की 'प्यासा' में भी यही हुआ। देवदास अगर चाहता, तो बहुत आसानी से पारो से विवाह करके सुखी हो जाता, पारो उसे बहुत चाहती थी, लेकिन फिर वही जमींदारी, लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। फिर उसे चंद्रमुखी से प्यार हुआ, लेकिन वह भी मुकाम पर नहीं पहुंच सका, फिर वही लोकलाज, परिवार, समाज इत्यादि-इत्यादि। शायद यह एक तरह से प्रगतिशीलता का आह्वान था कि देखो, व्यक्तिगत प्यार की कोई औकात नहीं, देश को देखो, समाज को देखो और तब फैसला लो। एक तरह से इस दशक में नायक यह तो बोल सका कि मैंने दिल तुझको दिया, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ा सका, क्योंकि उसमें साहस का अभाव था। प्रेम की पुकार की तुलना में देश, समाज और परिवार की पुकार बड़ी थी।
फिर भी १९५० के दशक का फिल्मी नायक सम्पूर्ण हिन्दी सिनेमा का सबसे प्रभावी नायक है, इसकी नकल आज भी हो रही है। हमें यह भी ध्यान देना चाहिए कि १९५० के दशक का नायक ही भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर ले गया था। राज कपूर दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय थे, ठीक वैसे ही जैसे विश्व पटल पर नेहरू राजनीतिक दुनिया में चर्चित थे। पंडित नेहरू समाजवादी थे और उस दौर के राज कपूर भी समाजवादी। यह एक अलग तरह के आश्चर्य का समय था, सरकार भी नैतिकता के साथ समता और संपन्नता के सपने देख रही थी और फिल्मों ने भी यही किया। उस दौर की सरकार भी सेकुलर होने के प्रयास में थी और फिल्में भी ठीक ऐसा ही कर रही थीं। कोई शक नहीं, जब भी भारतीय फिल्मी नायक का विश्वास डिगेगा, उसे १९५० के दशक के पूर्वज नायक से सीखना पड़ेगा और देश को तो अपनी बेहतरी के लिए उस दशक के अनुभवों से हमेशा सीखना चाहिए। इस दशक में बहुत कुछ है सीखने के लिए। 
क्रमश:

पीया तो से नैना लागे रे

प्रेमी नायक : 1960 का दशक
भाग - ५
यह दशक प्रेमियों का दशक था। इस प्रेम का जन्म समाजवाद की कोख से हुआ था, तो उसकी मस्ती भी देखने लायक थी, ताजा खिले फूल की तरह। राज कपूर ने ही एक तरह से प्रेम का ट्रेंड सेट किया, १९६२ में उनकी फिल्म आई 'जिस देश में गंगा बहती है', उसमें एक गाना है, 'प्यार कर ले, नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा।' यह एक तरह से नारा था कि प्यार की ओर बढ़ा जाए, क्योंकि प्यार नहीं, तो कुछ भी नहीं। इसी दशक में 'मुगले आजम' का गीत - जब प्यार किया तो डरना क्या... खूब गूंज रहा था। प्यार की मांग बढ़ गई थी। दरअसल, १९६२ में भारत को युद्ध में पराजय मिली, लोग निराश थे, नेहरू और उनके युग की विदाई हुई। १९६५ में भारत को फिर युद्ध लडऩा पड़ा, ऐसे में, गीत-संगीत और प्रेम ने टूटे व घायल दिलों पर मरहम लगाने का काम किया। फिल्में राहत की तरह थीं।
इस दशक के बिल्कुल मध्य में १९६५ में शानदार गीतों से सजी 'गाइड' रिलीज हुई। प्रेम ही फिल्म का केन्द्र था। एक गाना मानो पूरी कहानी कह रहा है - कहीं बीते ना ये रातें कहीं बीते ना ये दिन, गाता रहे मेरा दिल, तू ही मेरी मंजिल...। १९६४-६५ में ही राज कपूर की फिल्म 'संगम' की धूम थी। मेरे मन की गंगा और तेरे मन की यमुना का, बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं...
नायक की इस मनोकामना ने इस दशक में अपना चरम देखा। प्रेम का दौर था, फिल्में सौभाग्य से रंगीन हो गई थीं। सपनों को चार चांद लग गए थे। 'संगम' में राज कपूर अपना कैमरा लेकर दुनिया घूमने निकल गए। यह रंगीन होने का ही नतीजा था कि फिल्मी नायक विदेश घूमने निकल गया। देश की राजनीति में भी तरह-तरह के बदलाव और प्रयोग चल रहे थे, सत्ता बदल रही थी, सत्ता का स्वभाव बदल रहा था, तनाव बढ़ रहा था, ऐसे में, फिल्मकारों ने महसूस किया कि उनका काम है लोगों को अच्छा अनुभव कराना, क्योंकि लोग पैसे खर्च करके सिनेमा देखने आते हैं। वे अच्छा देखें, अच्छा सुनें, फिल्मकारों का यही लक्ष्य बनने लगा। यह वही दशक है, जब मेकअप का काम बढ़ गया, बनावट पर जोर दिया जाने लगा। वास्तविकता पाश्र्व में जाने लगी। राजू गाइड (गाइड) से हीरामन गाड़ीवान (तीसरी कसम) तक, सारे नायक प्रेम के पीछे भाग रहे थे। दिल का मामला नाजुक हो रहा था। यह गाना भी खूब चला कि आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर सबको मालूम है और सबको खबर हो गई. . .। लोग भी बहुत खुश थे, इस दौर में प्रेम शायद इसलिए भी ज्यादा चल गया, क्योंकि गीतों के शब्द शानदार थे और संगीत भी। 
इस दशक की एक और खास बात है कि नायक और नायिका, दोनों के ही 'सेक्स अपील' में इजाफा हुआ। यह अपील कोई बुरी बात नहीं थी, क्योंकि इस अपील में उस दौर में बहुत साफगोई थी। प्यार था, सुन्दरता थी, लेकिन अनुशासन भी था। किसी के लिए मर मिटने का इरादा था, सुन्दर दिखने की चाहत थी, साफ-सुथरा रहने का प्रयास था। इसका निश्चित रूप से समाज पर गहरा असर पड़ा। एक अच्छा और साफ-सुथरा मध्य वर्ग और मध्यवर्गीय मानसिकता को तैयार करने में इस दौर के नायक ने काफी मदद की। शहरों में सुधार आया, कॉलेजों के माहौल में सुधार आया, कुछ खुलापन आया, परस्पर सामाजिकता बढ़ी, प्रेम की स्वीकारोक्ति बढ़ी, प्रेम विवाहों की संख्या बढ़ी। इस दौर की पारिवारिक फिल्मों ने भी समाज और देश को काफी कुछ सिखाया।
इस दशक के प्रतिनिधि नायक-अभिनेता अगर हम चुनें, तो शम्मी कपूर, देव आनंद और राजेश खन्ना सबसे आगे नजर आएंगे। विशेष रूप से, आज भी न देव आनंद जैसा कोई नायक मिला है और न राजेश खन्ना जैसा। दोनों ही नायकों का अलग-अलग स्नेहिल प्रभाव था, दोनों ही नायक ऐसे थे, जिनके लिए जान देने को लोग तैयार थे। कहा जाता है कि लोग इन नायकों को खून से खत लिखते थे। दोनों ही रोमांटिक और सुदर्शन अभिनेता थे। यह भी एक खास बात है कि इस दौर में अच्छा दिखने वाले अभिनेताओं की भारी मांग थी। इसी दशक में फिल्मी नायक या अभिनेता बनना कठिन हो गया। फिल्म बनाने का खर्च बहुत बढ़ गया था। स्टार छवि की मांग बढ़ गई थी। फिल्म निर्माण की चुनौती बढ़ गई थी। इस दशक के आखिर तक श्वेत-श्याम फिल्मों ने पूरी तरह से विदाई ले ली। रंगीन रुपहले पर्दे पर मजबूती से टिकना आसान नहीं रहा। वैसे प्रेम की डगर पर टिकना भी आसान नहीं होता। हम नहीं भुला सकते कि फिल्मी नायकों ने इस दशक में फिल्मों में जितना आदर्श प्यार किया, उतना अन्य किसी दशक में देखने में नहीं आया।
(क्रमश:)

देना पड़ेगा मोहब्बत का इम्तेहान

असंतुष्ट नायक : 1970 का दशक
भाग - 6
जब यह दशक शुरू हुआ, तो लोगों में असंतोष की भावना आ चुकी थी। यह असंतोष संगीतमय ढंग से भी उभरने लगा था। १९७१ में कमाल अमरोही की फिल्म 'पाकिजा' के एक गाने की देश में बड़ी गूंज थी - इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा...  हमरी न मानो सिपहिया से पूछो, जिसने... भरी बजरिया में छीना दुपट्टा मेरा...। इस दौर का नायक व्यवस्था से निराश होने लगा था। सरकारी नीतियों और सरकारी लोगों का शिकंजा कसने लगा था। देश में लोगों और नायकनुमा तमाम लोगों को यह अहसास हो गया था कि देश की समस्याओं का समाधान उतना आसान नहीं है, जितना कि १९५० के दशक में सोचा गया था। राजनीति कोरे वादों से अपना काम चला रही थी। तत्कालीन राजनीतिक नायक सरकार के समक्ष शिकायत दर्ज कराने लगे थे। साहित्य में भी सरकार के प्रति निराशा और रोष का भाव आने लगा था। नायक विचलित होने लगे थे। ऐसे में, जब यह गाना बजा कि इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा, तो मानो यह अहसास हुआ कि देश की धरती गुहार लगा रही है, शिकायत कर रही है कि उसके साथ बहुत बुरा हो रहा है। 

इस दशक में नायक का गुस्सा धीरे-धीरे बढ़ा, 'जंजीर' आई, तब भी ठीक था, क्योंकि नायक सरकार के दायरे में ही था, वह सरकार का अंग बनकर समाधान तलाश रहा था, लेकिन उसके बाद दशक के ठीक बीच में १९७५ में 'शोले' आई, जिसमें नायक सरकार से बाहर आ चुका था, क्योंकि सरकार में रहते हुए उसे न्याय नहीं मिला था, 'शोले' का ठाकुर पहले पुलिस अधिकारी था, लेकिन जब पुलिस की नौकरी करते हुए उसका परिवार मार दिया गया, उसके हाथ काट दिए गए, तब निराश होकर उसे व्यवस्था से बाहर आना पड़ा और तब उसके सहयोगी बने दो अपराधी। सरकार की व्यवस्था से इतर एक व्यवस्था बनी, जिसने डकैतों से लोगों को मुक्ति दिलाई। एक तरफ पीडि़त पक्ष था, दूसरी तरफ खलनायक था, जिसका व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं था, तो तीसरी तरफ दो अपराधी थे, जो पैसे के लिए ही खलनायक को मारने के लिए तैयार हुए थे। देश की व्यवस्था ऐसे बिगड़ रही थी कि एक भ्रम खड़ा हो गया कि इसमें नायक कौन है। कुछ लोगों ने पीडि़त पक्ष - ठाकुर - को नायक माना, तो किसी ने अपराधी जय-वीरू को नायक माना, तो ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने खलनायक गब्बर सिंह को ही नायक मान लिया। यह कहा जाता है कि असंतोष से क्रोध होता है और क्रोध के माहौल में आदमी अंधा हो जाता है। हम यह देखते हैं कि यह भ्रम समाज में बाद के दशकों में बढ़ता चला गया, एक दौर ऐसा भी आया, जब गब्बर सिंह ही नायक मान लिया गया, 'शोले' के जय (अमिताभ बच्चन) ने गब्बर सिंह जैसा किरदार बहुत शौक से -दूसरों से छीनकर- निभाया। इसमें कोई शक नहीं कि १९७० का दशक असंतुष्ट नायकों का दौर है। तत्कालीन राजनीति पर अगर गौर करें, जहां एक ओर, प्रतिपक्ष (जयप्रकाश नारायण) में असंतोष का भाव था, वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष (इंदिरा गांधी) में देश में फैले असंतोष के प्रति रोष का भाव था। संघर्ष की स्थिति बनी, तो पीडि़त पक्ष को एक हद तक खुशी मिली, लेकिन वह वास्तविक जीत से वंचित रह गया। दोनों पक्ष के नायकों ने उसे निराश किया। सम्पूर्ण क्रांति का उत्थान और उसकी विफलता इसी दशक की घटनाएं हैं। यह असंतोष और विरोधाभास का दशक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता पक्ष ने सेंसरशिप का प्रयोग किया था, आपातकाल लगा था। अखबारों ही नहीं, फिल्मों पर भी नजर रखी जाती थी। एक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' में सत्ता के प्रति विरोध का भाव था, तो इस फिल्म की मूल कॉपी को सत्ता पक्ष के महाबलियों ने नष्ट कर दिया था। कला से राजनीति तक चहुंओर असंतोष का भाव था।
हम यह कह सकते हैं कि इस दशक में भी निराशा, असंतोष या दुख का टोन राज कपूर ने सेट किया था। वर्ष १९७०-७१ में चर्चित रही 'मेरा नाम जोकर' फिल्म की ब्यंजना बहुत गहरी है। गरीबी और प्रेम में जब निरंतर निराशा हाथ लगती है, तब नायक जोकर बन जाता है। हम गरीब जनता ने सरकारों को चुना, बनाया, लेकिन सरकारें कहीं और समर्पित रहीं। इस फिल्म का जोकर भी तो यही करता है, अपने भोलेपन से अपने बड़े होने तक, एक के बाद एक नायिकाओं को चुनता है, चाहता है, आगे बढ़ाता है और नायिकाएं किसी और को समर्पित हो जाती हैं, तो यह अकेला, निराश आम आदमी जोकर ही तो है! वह समस्याओं से भरपूर सर्कस में खड़ा है और उसके हिस्से की तमाम खुशियां-नायिकाएं दूर चली गई हैं। वास्तव में सरकार की उपेक्षा ने आम आदमी को जोकर बनाकर रख दिया। 'मेरा नाम जोकर' को ऐसे भी देखना चाहिए। वैसी बड़े दिल वाली फिल्म बनाने का साहस फिर किसी ने नहीं किया, क्योंकि जनता जोकर दिखना नहीं चाहती। उसे तो उन सबसे बदला लेना है, जिन्होंने उसे ठगा है, लूटा है, तरह-तरह से उत्पीडि़त किया है। इस दशक में यह सिद्ध हो गया कि भारतीय नायक जोकर नहीं बनेगा, वह लड़ेगा, दुश्मनों को चुन-चुनकर मारेगा। पर्दे पर गुंडे जब पिटते थे, तब लोगों की आंखों में खुशी के आंसू आ जाते थे, आज भी आ जाते हैं। गुस्से को हिंसा से रिलीज करने का शौक भारतीय नायकों को १९७० के दशक में ही हुआ है और वे आज भी अपना यह शौक पूरा करते हैं और जनता तालियां बजाती है। १९६० के दशक का प्रेमी फॉर्मूला और १९७० के दशक की मारधाड़ - एक्शन का फॉर्मूला आज भी आजमाया जाता है और हिट होता है। सफल फिल्मी व्याकरण इस दशक में ज्यादा स्पष्ट हुआ। प्रेम, संगीत, ड्रामा, हास्य और मारधाड़, ये पांच विधाएं ऐसी थीं, जिन्होंने भारतीय फिल्मों में खुद को मजबूत कर लिया। इन विधाओं का अच्छा सम्मिश्रण आज भी हिट और सुपर हिट होता है। 
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस दशक के प्रतिनिधि नायक अमिताभ बच्चन हैं। इस दशक का मध्य वर्ष १९७५ बहुत महत्वपूर्ण है, अमिताभ की 'दीवार', 'शोले' और 'फरार' इसी वर्ष की फिल्में हैं, जिनमें वे एंग्री यंगमैन की भूमिका में बेहतरीन तरीके से उभरे। वैसे इस दशक में रोष को जाहिर करने वाले अभिनेताओं में धर्मेन्द्र को नहीं भुलाया जा सकता। कुत्ते, मैं तेरा खून पी जाऊंगा. . . जैसा सिनेमाई संवाद धर्मेन्द्र के अलावा और किसी पर नहीं जमा। अमिताभ समय के साथ खुद को बदलते रहे, लेकिन १९७० के दशक में गुस्से वाले आदमी के रूप में धर्मेन्द्र की जो छवि बनी, उसने उनका पीछा नहीं छोड़ा और इसका प्रभाव उनके बेटे सनी देओल की छवि पर भी पड़ा। ठीक इसी तरह से १९७० के दशक में जो हिंसक मानसिकता पैदा हुई, वह आगे की पीढिय़ों को मिलती चली गई। देश में मुखर रोष के प्रतिनिधि इस दशक ने देश और फिल्मी नायक को भी हमेशा के लिए बदल दिया। 
(क्रमश:)

पापियों के पाप धोते-धोते

यथार्थवादी नायक : 1980  का दशक
भाग - 7
दशक की शुरुआत में ही देश ने समझौता कर लिया। राजनीति में जिन नायकों को देश ने पिछले दशक में सत्ता से बाहर कर दिया था, उन्हीं लोगों को देश फिर सत्ता में ले आया यह सोचकर कि तुलनात्मक रूप से यही बेहतर नायक हैं। यानी देश ने यथार्थ या वस्तुस्थिति को स्वीकार कर लिया। कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस दौर में यथार्थवादी फिल्मों की बाढ़-सी आ गई। नायक का नजरिया जमीनी हकीकत की ओर मुड़ा। आदर्शवाद हो, प्रेम हो, असंतोष हो, हर जगह यथार्थ दिखाने की कोशिश होने लगी। समानांतर सिनेमा का आंदोलन इसी दौर में सशक्त होकर उभरा। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, अनुपम खेर इस दौर के चर्चित यथार्थवादी नायक-नायिका थे। यह उम्मीद एक तरह से टूट चुकी थी कि फिल्मी नायक कोई क्रांति करेंगे, फिल्मी नायक तो उसी कथा को दर्शकों के सामने परोस रहे थे, जो कथा खुद दर्शकों के बीच बिखरी हुई थी। एक होड़-सी थी कि समाज की गंदगी या कमी को कौन बेहतर ढंग से सिनेमा में पेश करेगा, भ्रष्टाचार को कौन सबसे वीभत्स रूप में पेश करेगा। 
इसी दशक के बिल्कुल मध्य में १९८५ में राज कपूर ने 'राम तेरी गंगा मैली' का निर्माण किया। यह फिल्म सुपर हिट हुई। बात खुल चुकी थी, तो स्त्री शरीर बोलिए या स्त्री का सौंदर्य बोलिए, यह भी यथार्थ ही था। इस फिल्म पर अश्लील होने का आरोप लगा, तो फिर लोग क्यों इसे देखने गए? क्या यह एक यथार्थ नहीं है कि लोग अश्लीलता देखना चाहते थे, यह बात अलग है राज कपूर सौंदर्य दिखाना चाहते थे। यह बात ठीक उसी तरह से थी, मानो आपने समाज, शासन, प्रशासन का यथार्थ देख लिया, तो आप शरीर का भी यथार्थ देख लीजिए। भ्रष्टाचार, अन्याय हर किसी के साथ था, तो शरीर भी तो हर किसी के साथ था, फिर भी लोग देखना चाहते थे। पुरुष भी यथार्थ देखना चाहते थे और स्त्रियां भी। 'राम तेरी गंगा मैली' स्त्रियों के बीच भी बहुत चर्चित हुई। एक नदी या गंगा का प्रदूषण भी तो यथार्थ ही था, ...राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते...। नदी का प्रदूषण आज भी व्यावसायिक सिनेमा का विषय नहीं बन पाया है, लेकिन १९८० का दशक ही कुछ ऐसा था कि इस दौर का सबसे बेहतरीन व्यावसायिक सिनेमा भी यथार्थवादी हथियार से लैस था।
इस दशक की प्रतिनिधि फिल्म के रूप में हम 'मशाल' फिल्म को भी देख सकते हैं। दिलीप कुमार और अनिल कपूर की भूमिका वाली इस शानदार फिल्म में बदलते और निष्ठुर होते समाज को बहुत अच्छी तरह से उकेरा गया था। समाज में लोग एक दूसरे की मदद करने से पीछे हटने लगे थे, लोग मतलबी होने लगे थे। लोग घी निकालने के लिए अपनी उंगली टेढ़ी करने लगे थे, इन सब सच्चाइयों को 'मशाल' फिल्म में बखूबी दर्शाया गया। 

इस दशक में टूटते परिवारों की सच्चाई को भी बेहतरीन तरीके से पेश किया गया। फिल्मी नायक ने पारिवारिक परेशानियों से जूझने में काफी वक्त लगाया। प्रेम भी था और हिंसा भी। इस दशक में यथार्थवाद की ऐसी लहर थी कि लगता था कि फिल्में फिर कभी सपनों की ओर नहीं लौटेंगी। व्यावसायिक फिल्में परिवार और मनुष्य सम्बंधों पर केन्द्रित होकर यथार्थ दिखा रही थीं, वहीं दूसरी ओर, समानांतर फिल्में समाज का ठोस यथार्थ दिखा रही थीं। इलाज दोनों में से किसी के पास नहीं था, इसलिए हम यह कह सकते हैं कि फिल्में एक तरह से पलायन की शिक्षा दे रही थीं। नायकत्व दाव पर लग गया था, क्योंकि नायक सताए जा रहे थे, दूसरे चरित्रों द्वारा संचालित होने लगे थे।
 देश की राजनीति में भी ठीक ऐसा ही हो रहा था, देश की राजनीति के नायक भी दूसरों के हाथों की कठपुतलियों-से बन गए थे। उन्हें तरह-तरह की चौकडिय़ां घेरने लगी थीं। नेताओं को मजबूर किया जा रहा था कि वे भ्रष्टाचार, गरीबी, भाई-भतीजावाद, सांप्रदायिकता जैसी सच्चाइयों को स्वीकार कर लें। इस दशक में नायक सांप्रदायिकता की ओर मुड़े, बड़े घोटाले हुए, उच्च स्तरीय धोखेबाजी हुई। असंतोष का इलाज न हुआ, तो आतंकवाद की भी जमीन तैयार हुई। इस दशक में देश का यथार्थ खुलकर सामने आ गया, हम भारतीय भले ही गंगा की पूजा करते हों, लेकिन हम स्वयं अपने हाथों से गंगा का गला घोंट रहे हैं। हम यह कह सकते हैं कि यह भारतीय नायकत्व के ढहने का दशक था। कोई भी नायक नैतिकता के पैमाने पर ज्यादा टिक नहीं पा रहा था, समझौते करने पड़ रहे थे। फिल्मी नायकों ने भी खूब समझौते किए। समाज को समझौतावादी और पलायनवादी बनाने में इस दशक के नायकों का सर्वाधिक योगदान है।
कोरा सच बहुत कम लोगों को अच्छा लगता है, इसलिए जो फिल्में ज्यादा यथार्थवादी थीं, उनको खरीदने वाला कोई न था। विडंबना है कि नायकत्व की हत्या करके स्वयं नायक के रूप में उभरने वाला समानांतर सिनेमा रोजी-रोटी के लिए तरसने लगा था। इस दशक में समाजवादी और कलावादी, दोनों ही तरह के नायक उभरे, इन दोनों को ही व्यावसायिकता पसंद नहीं थी। हालांकि यह भी बड़ा सच है कि दोनों ही तरह के नायक अपने सिद्धांतों पर मुस्तैदी से टिक नहीं सके, दोनों ने ही कम या ज्यादा, देर या सबेर व्यावसायिकता का लाभ लिया। 
इस दशक के अनेक प्रतिनिधि नायक-अभिनेता हैं - अनिल कपूर, ऋषि कपूर, जैकी श्रॉफ, सनी देओल, संजय दत्त, नसीरुद्दीन शाह इत्यादि। अनिल कपूर विशेष रूप से टपोरी वाला अंदाज लेकर आए। टपोरीपना भी अपने समय का एक सच था, जो बाद के दशकों में भी साथ-साथ चलता रहा।
(क्रमश:)

अब यहां से कहां जाएं हम

प्रवासी नायक : १९९० का दशक
(भाग - 8}
आदर्श भी देखे, प्रेम भी, असंतोष भी, यथार्थ भी, तो उसके बाद स्वाभाविक सवाल था ... अब यहां से कहां जाएं हम...। फिल्मी समाज ने समझ लिया कि खुद को बदलना होगा। ज्यादा यथार्थवादी हुए, तो संगीत-गीत की अहमियत घटती जाएगी, फिल्में सपना दिखाने का काम छोड़ देंगी, फिल्म का व्यवसाय मुश्किल हो जाएगा। तो फिल्मों ने यथार्थवाद की ओर से ध्यान हटाना शुरू किया। देशी नायक तो भ्रष्ट हो चुके थे, इतने यथार्थवादी हो चुके थे कि उनके सहारे सपने गढऩे का काम असंभव हो गया था। पिछले दशक में व्यावसायिक सिनेमा का नायक भीड़ में शामिल होकर बौना हो चुका था, नायिका सास या समाज के हाथों बुरी तरह से सताई गई थी, तो दूसरी ओर, खांटी समानांतर सिनेमा का नायक (नसीरुद्दीन शाह) 'पार' के बेघर मजदूर की तरह था या इसी फिल्म की नायिका (शबाना आजमी) की स्थिति एक गर्भवती सुअरी से भी बदतर हो चुकी थी। ऐसे नायक और नायिका सपनों की सौदागरी या कालाबाजारी में सहायक नहीं हो सकते थे, अत: १९९० के दशक में फिल्मों ने नायक-नायिका का विदेश से आयात किया। इसका मतलब यह नहीं कि अंग्रेज नायक-नायिका आयात हुए, आयात तो वही नायक-नायिका हुए, जिनके पूर्वज या पिता विदेश जाकर बस गए थे।
हम देखते हैं कि इसी दौर में देश ने आर्थिक उदारीकरण (वर्ष १९९१) को स्वीकार किया, विदेशियों, विदेश में बसे भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों की अहमियत बढ़ी। प्रवासी भारतीयों के लिए स्वर्ण युग शुरू हुआ। जैसे भारत सरकार ने विदेश में देश का भविष्य देखा, वैसे ही फिल्मों को भी अपना भविष्य विदेश में नजर आया। 

इस दशक के ठीक मध्य में फिल्म आई 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे। यह फिल्म ब्रिटेन-यूरोप से शुरू होती है और भारत आकर संपन्न होती है। प्रेम अंतरराष्ट्रीय हो चुका है और भारत एक मिलन स्थल या विवाह स्थल है। यह फिल्म न केवल सवाल उठाती है कि यहां से कहां जाएं हम, बल्कि उत्तर भी देती है कि तेरी बांहों में मर जाएं हम। यानी सपना फिर हावी हो गया, बांहों में मर जाने का सपना कितना यथार्थवादी है, यह सब जानते हैं, लेकिन लोग फिर भी सपनों की ओर मुड़े, क्योंकि वे कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी के यथार्थ को भूल जाना चाहते थे। अपनी गंदी समस्याग्रस्त गलियों से दूर कहीं किसी मनोरम देश में लोग खुद को महसूस करना चाहते थे। कोई आश्चर्य नहीं, मानव सदा से ऐसा ही रहा है। वह जहां है, वहां से काफी दूर जाकर सोचना चाहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा भी अकसर कहते थे कि 'एक अच्छी रचना पाठकों को दूसरे संसार में ले जाती है।' फिल्में भी तो यही करती हैं, हॉलीवुड की फिल्म हों या बॉलीवुड की।
सुभाष घई की 'परदेश' हो या करण जौहर की 'कुछ कुछ होता है', प्रवासी भारतीय चरित्रों को लेकर ऐसी अनेक फिल्में बनीं, जिन्होंने दुनिया भर में बसे भारतवंशियों को लुभाया, बुलाया। यह फिल्मी नायक के रूप में शाहरुख खान का चरम दौर था। वे ताजा हवा के झोंके की तरह दीवाना बनकर आए थे, यथार्थ का बोझ उनके साथ नहीं था। प्रेम की चाहत थी, जिसके लिए वे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच सकते थे। पूंजी उनके पास बहुत थी। तलाश थी, तो सिर्फ प्रेम की। इसमें कोई शक नहीं कि यही वह दशक था, जब भारतीय समाज का प्रवासी नायकों के प्रति मोह अत्यधिक बढ़ गया। भारतीय बाप अपनी बेटियों के लिए प्रवासी दूल्हे खोजने लगे थे, मानो देश के अंदर पूंजीवाले दूल्हों का अभाव हो गया हो। सपनों को फिर पंख लग गए थे। भारतीय युवाओं को भी लगने लगा था कि उनकी कीमत तभी है, जब वे भी प्रवासी हो जाएं या फॉरेन रिटर्न हो जाएं। विदेश में पढ़ाई, नौकरी करने से नायकत्व हासिल होने लगा। लोग कबूतरबाजों के हाथों में फंसकर कबूतर बनकर विदेश जाने को लालायित थे, क्योंकि नायक होने का रास्ता विदेश में ही खुलने लगा था। यही वह दशक था, जिसमें विदेश में भारतीयों की संख्या बढ़ी और फिल्मकारों को प्रवासी दर्शकों के बारे में भी सोचना पड़ा। जैसे विदेशी पूंजी भारतीय लाभांश की ओर आकर्षित हुई, ठीक उसी तरह से विदेश में बसे अनेक प्रवासी व विदेशी कलाकार रुपहले पर्दे पर हिस्सेदारी के लिए भारत आने के सपने देखने लगे।
(क्रमश:)

इश्क दी गल्ली बिच...

विलासी नायक : २००० का दशक
(भाग - ९)
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के साथ भारत ने नई सदी में प्रवेश किया था। तकनीक, इंटरनेट से उपजी सूचना क्रांति ने देश के मिजाज को बदल दिया था। मल्टीप्लेक्स, मॉल, विदेशी उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों की भरमार, विदेशी गाडिय़ों का चलन बढ़ गया था। युवा भारत की विकास गति सुधर गई थी। ऐसा लगने लगा था कि भारत अब तरक्की करता चला जाएगा, पीछे मुडक़र देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खूब पैसा आया, ऋण लेकर घी पीना आसान हो गया। मध्य वर्ग के जो सपने पिछले दशकों में साकार नहीं हुए थे, वो इस दशक में साकार होने लगे। ऋण लेकर घर बनाना, पढ़ाई करना, विदेश जाना आसान हो गया। मस्ती की पाठशालाएं सज गईं। भारतीय समाज के एक हिस्से में कुछ संपन्नता आई। प्रभु वर्ग की तनख्वाहें बढ़ गईं। सरकारी योजनाओं में गांव के स्तर तक वितरण और लूट की संभावना बढ़ी। समाज में पैसा बढ़ा। तो सिनेमाई नायक विलासी हो गया। महंगी गाड़ी, महंगे ब्रांडेड कपड़े, महंगे विदेश दौरे, महंगे होटल, महंगी गर्लफ्रेंड, महंगे गिफ्ट का दौर आ गया। मुख्यधारा में जो फिल्में बन रही थीं, उनमें पैसा कोई मुद्दा नहीं रहा। नायक के पास ज्यादा काम नहीं था, समाज इत्यादि की ज्यादा चिंता नहीं थी, उसके पास पूरा समय था कि वह जिम जाकर 'सिक्स पैक' बना सके। सिक्स पैक बना लेने से दुश्मनों से लडऩे, शर्ट खोलने, नाचने-गाने, नायिका का दिल जीतने, खलनायकों को डराने और दर्शकों को लुभाने में सुविधा होने लगी। गरीबी से लडऩे वाले, समाज की समस्याओं से पीडि़त होने वाले सिंगल पैक बॉडी वाले नायक पीछे छूट गए, उनकी जगह सिक्स पैक वाली समृद्ध जमात आ गई। एक समय दारा सिंह और धर्मेन्द्र इत्यादि को अच्छी बॉडी का मालिक माना जाता था, ये भारतीय फिल्मों के ऐसे पहलवान थे, जिन्हें दुश्मनों से लडऩे के लिए मांसपेशियों की जरूरत नहीं पड़ी थी। अमिताभ बच्चन भी अपने चरम दौर में सिंगल पैक वाले नायक थे। २००० के दशक में पूरा मिजाज ही बदल गया। जिन फिल्मों को कभी खेतों में काम करने वाले मेहनती गठीले नायकों की जरूरत नहीं पड़ी थी, वे सिक्स पैक वाले नायक मांगने लगीं। इस दशक में यह पूरी तरह से स्थापित हो गया कि अंग प्रदर्शन एकतरफा नहीं रहेगा, नायक को भी ऐसा शरीर बनाना पड़ेगा कि वह भी अंग प्रदर्शन में नायिकाओं से मुकाबला कर सके। इस दशक में विलास का फायदा यह हुआ कि नायक अच्छे शरीर धारी होने लगे, लेकिन चरित्र का पतन भी प्रबल हुआ। 

२००० के दशक के मध्य वर्ष २००५ में एक फिल्म सुपर हिट हुई, 'नो एंट्री। यथार्थ के स्तर पर बेतुकी कॉमेडी फिल्म, लेकिन दर्शकों को खूब पसंद आई। फिल्म के केन्द्रीय नायक थे सलमान खान। अच्छे शरीरधारी नायकों में अग्रणी। वास्तविक जीवन में अविवाहित, लेकिन सिलसिलेवार प्रेम सम्बंधों वाले सबसे चर्चित और प्रशंसित फिल्मी नायक। 'नो एंट्री' में उनका किरदार पूरे इस दशक का प्रतिनिधि किरदार बनकर उभरता है। वे एक ऐसे नायक हैं, जो अपनी समर्पित पत्नी को छोडक़र दूसरी लड़कियों के पीछे भाग रहे हैं, उनके संपर्क आधुनिक गणिकाओं से भी हैं, बल्कि वे उनका अपनी कहानी आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल भी करते हैं। आधुनिक गणिका भी फिल्म की मुख्यधारा में अहम किरदार है, तो इसका श्रेय उस विलासी नायक को ही देना चाहिए, जिसके लिए मौज-मस्ती ही सबकुछ है, उसके सामने चरित्र चर्चा बेकार है। नायक दोगला भी है, वह अपनी पत्नी और प्रेमिका से तो पूरी ईमानदारी की मांग कर रहा है, लेकिन खुद अव्वल दर्जे का बेईमान है।  इस विलासी नायक के दौर में ही हम देखते हैं कि समाज में परिवार, सम्बंध, निष्ठा, बंधुत्व या मित्रता का पतन, भ्रष्टाचार, चारित्रिक पतन इत्यादि चिंता के विषय नहीं रह गए। फिल्मों ने ईमानदारी को क्षणिक तत्व या एक क्षणिक अवस्था मान लिया। इस दशक में विलास के प्रति आकर्षण ऐसे बढ़ा कि बेईमानी भी स्वीकार्य-सी हो गई। अच्छाई या अच्छी बातों का रोमांच खत्म-सा हो गया। पैसे का डंका बज उठा।
इसी दौर में 'थ्री इडियट्स' जैसी फिल्म भी आई, जिसमें नायक बहुत क्षमतावान था, कुशल था, लेकिन छात्र जीवन में ही वह शराब का सेवन करने लगा था। रेंचो नाम का यह नायक सफल रहा, फिल्म भी सफल रही, लेकिन सच्ची बात तो यह थी कि इस नायक ने एक झूठे नाम और परायी पूंजी के दम पर पढ़ाई की थी। उसकी पढ़ाई और उसके नायकत्व के आधार में झूठ था। नायक ने पराई पूंजी का सदुपयोग कर ढंग से पढ़ाई की, इसे तो लोगों ने देखा, लेकिन लोगों ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि नायक ने शराब पीकर और दोस्तों को पिलाकर इस पराई पूंजी का दुरुपयोग भी किया। अनजानी शादी में भोजन करने पहुंच गया, पिं्रसिपल के घर उत्पात में शामिल हुआ और प्रश्न पत्रों की चोरी भी की। इस फिल्म ने यह प्रमाणित कर दिया कि गरीबों के लिए भी नैतिकता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं रही, केवल विलास महत्वपूर्ण हो गया। गरीबों को भी यही शिक्षा दी गई, पूंजी कहीं से भी ले लो, मस्त जीवन जीयो, अपना मतलब साधो और आगे निकल जाओ। इस दौर में नायकों के विलास की भी कोई सीमा नहीं रही, सारे बंधन टूट गए। ऐसी फिल्में भी आईं, जिनमें अधेड़ उम्र के नायकों को नई नवेली नायिकाओं से प्रेम हो गया। पिछली सदी के महानायक घोषित हो चुके अमिताभ बच्चन ने भी ऐसी भूमिकाओं को दो बार (चीनी कम और नि:शब्द) निभाया। विवाहेत्तर सम्बंधों वाले इस विलासी दौर में गरीब और देहाती नायक दुर्लभ हो गए। अमिताभ अपने चौथे फिल्मी दशक में विराजमान थे, लेकिन उन्होंने पूरी तरह से बदलते वक्त का साथ दिया, कभी बैंक में डाका डालने वाले बने, तो कभी डॉन, तो कभी केवल पैसे के पीछे भागने वाले चरित्र। चरित्र की बात करें, तो अमिताभ बच्चन ने 'कभी अलविदा ना कहना में 'सेक्सी सैम जैसे विलासी चरित्र को निभाकर अच्छे चरित्र की अहमियत को गौण कर दिया।
विलास के पीछे भागने और विलास में जीने वाले फिल्मी नायकों की भीड़ लग गई, लेकिन इस दशक के एक प्रतिनिधि अभिनेता-नायक को अगर चुनें, तो बेशक वह नाम सलमान खान का होगा। जो अपनी वास्तविक जिंदगी में भी युवाओं के मॉडल रहे, विश्व सुन्दरी से प्यार, नशा करके महंगी गाड़ी में सवारी, वन्य जीव का शिकार इत्यादि। समय बदल चुका था, कोई आश्चर्य नहीं, वे आदर्श बने और लोगों द्वार खूब पसंद किए गए।
(क्रमश:)

Tuesday 26 November 2013

तोरे नैना बड़े दगाबाज रे

- भ्रमित नायक : २०१० का दशक-
(समापन भाग)
इस दशक की शुरुआत में पूरी दुनिया को आर्थिक मंदी से गुजरना पड़ा। पैसा वापस जाने लगा, नए पैसे ने आना कम कर दिया। विदेशी-प्रवासी-विलासी दूल्हे धोखेबाज निकलने लगे। कई सपने टूटे, नायक आसमान से जमीन पर गिरने लगे, लेकिन जमीन बदल चुकी थी। देश वैसा नहीं था, जैसा पहले सोचा गया था। सरकार और सरकार के नायक भ्रमित थे कि किधर जाएं। फिल्मों में तो प्यार हुक्का बार हो गया था। सुन्दर कन्या भ्रमित हो गई थी - गा रही थी कि मेरे फोटो को सीने से यार चिपकाले सैंया फेविकॉल से। ऐसा नहीं है कि यह बेतुका गाना फ्लॉप हो गया हो, इसे लोगों ने खूब पसंद किया। लोग अलग तरह की आवाज और धुन सुनकर मस्त थे, उन्हें अर्थ से ज्यादा मतलब नहीं रहा। दिखावा पूरी तरह से हावी हो गया। समलैंगिक समूह रैली निकालने का साहस करने लगे। फिल्मों के लिए समलैंगिकता एक प्रिय विषय बन गई। कुछ लोगों को अपने लिंग को लेकर भी भ्रम होने लगा। इस दशक में फिल्मों ने इस विकल्प को और मजबूत करना शुरू कर दिया कि जरूरी नहीं कि नायक किसी नायिका की ही तलाश करे, वह किसी सह-नायक को भी अपनी नायिका मान सकता है, उसके साथ जिंदगी बिता सकता है। ऐसा नहीं है कि केवल फिल्में ही भ्रम का शिकार हों, देश में भी नाना प्रकार के भ्रम चलन में हैं। नेता कितने विश्वसनीय हैं, इसे लेकर भ्रम है। घोटाले हुए हैं, तो कितना नुकसान हुआ है, इसे लेकर भी भ्रम है। हमारे देश का पैसा हमारा है या नहीं, इसे लेकर भी भ्रम है। पैसा जेब में कब तक रहेगा, इसे लेकर भ्रम है। बीवी या प्रेमिका निष्ठावान है या नहीं, इसे लेकर भ्रम है। केवल देश में ही नहीं, उसकी फिल्मों में भी विचारों की मंदी का दौर है। विचार और नैतिकता का ऐसा अकाल पड़ा कि अब पोर्न उद्योग से भी कलाकार लेने में संकोच नहीं रहा। अच्छाई और बुराई के बीच भ्रम को मानो स्वीकार कर लिया गया है। पिछले दशक में एक प्रवासी से विवाह करके विदेश चली गई स्टार अभिनेत्री माधुरी दीक्षित वापस लौट आई। भ्रम खड़ा हो गया कि लौटना था, तो गए क्यों थे? संशय बरकरार है कि यह लौटना सफल होगा या नहीं। हो सकता है, माधुरी एक अपवाद मात्र हों, क्योंकि फिलहाल ज्यादातर लोग देश से भाग जाना चाहते हैं। जो भी सक्षम है, भाग रहा है कि अब इस देश में रखा क्या है? देश के सच से भागते विदेशी निवेशकों, कंपनियों, सरकारों, नेताओं के लिए यह गाना मुफीद है ...कल मिले ये हमको भूल गए आज रे, तोरे नैना बड़े दगाबाज रे... 
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-  ज्ञानेश उपाध्याय 
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संदर्भ ग्रंथ : 1 : हीरो - पहला और दूसरा खंड - लेखक अशोक राज 
2 : वर्तमान साहित्य, सिनेमा विशेषांक - वर्ष 2002 
3 : बॉलीवुड - ए हिस्ट्री, लेखक : मिहिर बोस 
4 : आइडोलॉजी ऑफ हिन्दी फिल्म , लेखक : एम. माधव प्रसाद