Monday, 12 October, 2015

हम कैसे स्मार्ट?

ज्ञानेश उपाध्याय
वो सभ्यताएं दगाबाज होती हैं, जो अपनी विरासत बचा नहीं पातीं। इमारतों और ऐतिहासिक मुकामों से भरपूर जोधपुर तो पूरा का पूरा हमारी विरासत है। हम सभी को यह सोचना चाहिए कि हमने अपनी विरासत को कैसे-कितना बचाया है। विरासत और इस शहर को बचाने में हमारा क्या योगदान है? सबकी आंखों के सामने अतिक्रमण होता है। दुर्भाग्य देखिए, अतिक्रमण होना कोई मुद्दा नहीं है, लेकिन अतिक्रमण हटाना आज शहर का सबसे बड़ा मुद्दा है। अतिक्रमण हटते ही, कहीं न कहीं से राजनीति गरीबी में आटा गीला करने पहुंच जाती है। धन्य है हमारा शहर, जहां अतिक्रमण हटाने गए लोग पत्थर मारकर खदेड़ दिए जाते हैं। आखिर यह शहर किसका है, अतिक्रमण करने वालों का या अतिक्रमण हटाने वालों का या उनका जिन्होंने अतिक्रमण होने दिया? इसी शहर में ऐसे हजारों लोग हैं, जो हर महीने ईमानदारी से किराया अदा कर अपने सिर पर छत का इंतजाम करते हैं, सालों तक अपनी आंखों में अपने घर का सपना संजोए रहते हैं। ऐसे ईमानदार परिवारों, लोगों को याद करने वाली राजनीति कहां है? आज राजनीति तो उन लोगों के लिए आंसू बहाती है, जिन्होंने अतिक्रमण किया, खाली जगह देखकर बस गए, जिन्होंने कानून की पालना नहीं की, जिन्हें यह पता था कि एक बार कहीं बस-बैठ गए, तो फिर हटाने वालों को मिल-जुलकर देख लेंगे। क्या आज की राजनीति ईमानदार लोगों के साथ नहीं है? शहर के राजनेताओं को भी यह सोचना चाहिए कि वे अतिक्रमण हटाने के प्रति कितने समर्पित हैं। काश! आज पुनर्वास के प्रति जो समर्पण दिख रहा है, वही समर्पण अतिक्रमण के विरुद्ध भी दिखता, तो आज यह शहर देश के सुन्दरतम शहरों में शुमार होता।   
सोचिए उन पूर्वजों के बारे में जिन्होंने १९१० में घंटाघर बनवाया था। केवल घड़ी में ३ लाख रुपए लगे थे, यानी आज के हिसाब से ४२ करोड़ रुपए। पूर्वजों के उस दौर में तोला भर सोना १८ रुपए का भी नहीं था, लेकिन विरासत की कीमत थी, सौंदर्यबोध था कि शहर को शानदार और यादगार बनाना है। उस समय से आज तक महंगाई तो १४०० गुणा बढ़ गई है, लेकिन शहर के प्रति हम शहरवासियों की अपणायत कितना गुणा बढ़ी है, फैसला हमें करना चाहिए। विरासत खड़ी करने वालों ने कभी नहीं चाहा होगा कि उनकी योजना के सरदार मार्केट के अलावा भी वहां खचाखच भरा बाजार लग जाए।
हमें स्मार्ट सिटी का दर्जा नहीं मिला, तो क्यों? आज सोलह आने का सवाल तो यह है कि जिस शहर की राजनीति ईमानदार और स्मार्ट नहीं है, क्या उस शहर को स्मार्ट होने का दर्जा मिल सकता है?  शहर की पहाडिय़ों को लूटा जा रहा है, अवैध कब्जों की होड़ मची है, जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत को चरितार्थ किया जा रहा है, क्या यही है स्मार्टनेस की ओर ले जाने वाला रास्ता ?
स्मार्ट होने का दर्जा नहीं मिला, १०० से २०० करोड़ रुपए हाथ से फिसल गए, तो शहर में एक भी रैली नहीं निकली, लेकिन गरीबी और गरीबों की आड़ में (अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के खिलाफ) लंबी रैली निकली है। ऐसी रैली से राजनीति के लिए थोड़ा कुछ निकल सकता है, लेकिन समाधान कतई नहीं निकलेगा। जिस शहर में अवैध बसावट का पुनर्वास होता है, उस शहर में अवैध बस्तियां बसने का सिलसिला कौन रोक पाएगा? उन सरकारी लोगों को सबसे ज्यादा धिक्कार है, जो मोटा पैसा लेकर भी दशकों तक वैध कॉलोनियां नहीं बसा पाते हैं, लेकिन अवैध बस्तियों तक बिजली, पानी, फोन, सडक़ लिए रातों-रात पहुंच जाते हैं। ऐसी बेईमान स्मार्टनेस शहर के दामन पर सबसे बड़ा अतिक्रमण है, इसका इलाज सबसे पहले करना होगा।
(अगस्त पत्रिका में प्रकाशित टिप्पणी)

Tuesday, 7 July, 2015

ए रंगबती रे रंगबती

ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...

यह गाना जब बजता है या याद आता है, तो नोस्टेलजिक बना देता है। मन करता है, भागकर उड़ीसा की गलियों में चले जाएं। इस गीत पर विवाद छिड़ गया है, एमटीवी के एक कार्यक्रम में संगीतकार राम संपत ने इसका एक नया आधुनिक  संस्करण पेश किया है। इस गाने को उनकी ख्यात गायिका पत्नी सोना महापात्रा ने गाया है। सोना कटक की हैं, कुछ भारी लेकिन दमदार आवाज वाली सोना ने रंगबती गाने में नई जान डाल दी है। वैसे सोना इस गाने को पहले भी गाती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने इस गाने को बहुत मन से गाया है।
रविवार को यह गाना मेरे हाथ लगा, मुझसे बड़े भाई ने वाट्सएप से भेजा, सुनकर आंखों में आंसू आ गए। लगा कि हम बेवकूफ रंगबती से जितने दूर आ गए, कितना पीछे छूट गया अपना राउरकेला, उड़ीसा।
वैसे इस गाने में रितुराज मोहंती भी हैं, जो उड़ीसा में ही पुरी के पास के हैं। रितुराज ने रिमिक्स का आगे का हिस्सा गाया है, जिसमें रंगबती के बोल नहीं हैं, कुछ और है.
काश! इस गाने को राम संपत युगल गीत ही रखते। मतलब पुरुष आवाज में रितुराज और महिला आवाज में सोना. वास्तव में रंगबती एक युगल गीत है, उसका पूरा अर्थ तभी उभरता है।
पुरुष पहले गाता है...
ए रंगबती रे रंगबती
रंगबती-रंगबती कनक लोता हसी पदे कह लो कोथा।
उसके बाद स्त्री गाती है...
हाय गो लाजे-लाजे गो लाजे-लाजे
लाज लागे नोई जाउछे माथा गो
नाईकर नाईकर ओथा...
कोई बात नहीं, सोना ने अकेले ही गाया है, लेकिन इससे सुनने वाले का मजा तो इसलिए भी बना रहेगा, क्योंकि यह गीत कालजयी का दर्जा रखता है, लेकिन समझने वाले को दिक्कत होगी।
खैर, बताते चलें कि रंगबती का अर्थ है रंगों वाली या कलरफुल लड़की अर्थात रंगवती।
इस गीत का मुखड़ा कुछ हिन्दी में बनाएं, तो संगीत को पकडऩा कठिन है, लेकिन अर्थ और भाव यों बनेगा - 
नायक गाता है...
ए रंगवती रे रंगवती...
रंगवती-रंगवती कनक लता हंसो कुछ कहो न बात।
नायिका गाती है... 
हाय ओ लाज-लाज ओ लाज-लाज
लाज लगे झुकता है माथा ओ
ना करो ना करो ऐसा।)

यह कोसली या संबलपुरी भाषा है। यह भाषा संबलपुर और उसके आसपास के सभी जिलों में आज भी बोली जाती है। भाषा बड़ी ही मीठी है, तो इसका असर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और बंगाल तक दिखता है। यहां की भाषा शब्दों से अलग अनेक प्रकार की मीठी ध्वनियां हैं.. ए, ऐ, ओ, गो, हाय इत्यादि...
बहरहाल इस गीत को लेकर कॉपीराइट का एक मुकदमा किया गया है, जिसमें इस गीत के वास्तविक लेखक मित्रभानु गोंटिया और संगीतकार प्रभुदत्ता प्रधान ने राम संपत, सोना महापात्रा, एमटीवी व अन्य को घेर लिया है। मूल लेखक, मूल संगीतकार को पूरी तरह से श्रेय नहीं दिया गया है और ना ही इस गीत का रिमिक्स बनाने की मंजूरी ली गई है।
रही बात इसके मूल गायक जीतेन्द्र हरिपाल की, तो उन्हें लोग कम ही याद करते हैं। देश के बड़े पत्रकार पी. साईनाथ ने हरिपाल को आज से करीब 15  साल पहले संबलपुर के स्लम एरिया में खोज निकाला था। हरिपाल जीवित हैं। उनका गाया गीत आज उड़ीसा का सबसे समृद्ध गीत है, लेकिन हरिपाल आज भी गरीब हैं। डोम जाति के हरिपाल शिक्षा और संगीत की दीक्षा से आज भी परे हैं और जानने वाले बताते हैं कि शराब उनकी राह में बड़ी बाधा रही है।
हरिपाल की आवाज जब उड़ीसा और उसके आसपास के लोगों के कानों में गूंजती है या जब उनकी आवाज याद आती है, तो उत्कल प्रेमी हर व्यक्ति मचल उठता है। यह एक तरह से उड़ीसा का उत्सव गीत है। कोई भी पार्टी, पूजा पंडाल हो, यात्रा हो, विवाह हो, बैंड हो, रंगबती का बजना अनिवार्य है। हरिपाल की आवाज में जो लय, मस्ती और मिठास है, वह अंदर तक मन को सजल कर देती है। हरिपाल को याद करें, तो इसी गाने की स्त्री आवाज कृष्णा पटेल को भी अवश्य याद करना चाहिए। ये सब आमतौर पर गुमनामी में जीने वाले लोक कलाकार हैं, जिनको पूरा फोकस कभी नसीब नहीं होता। 
बेशक, रिमिक्स में राम संपत ने गाने को निखार दिया है, यह गाना पिछले सप्ताह यू ट्यूब पर जैसे ही लोड हुआ, उसे लाखों लोग ने हिट किया। कई लोग होंगे, जो इस गाने के लिए राम संपत और सोना महापात्रा को ही श्रेय देंगे, लेकिन क्या हरिपाल, कृष्णा, मित्रभानु, प्रभुदत्ता को भुला दिया जाए? नहीं, इस गीत के असली जन्मदाताओं को भूलना नहीं चाहिए। यह गीत अपने होने में नई पीढ़ी को इतना पुराना लगता है, मानो यह सदियों से उड़ीसा में रहा हो, जबकि इस गीत को बमुश्किल ३५-४० साल हुए हैं। सबसे खूबसूरत बात यह कि इसे बनाने वाले अभी जीवित हैं, लेकिन सबसे दुखद बात यह कि दुनिया उन्हें भूल-सी गई है। आज उन्हें फिर याद किया जा रहा है. रिमिक्स अगर कहीं मारता है, तो कहीं जिंदा भी तो करता है। राम संपत के काम को नकारा नहीं जा सकता। रिमिक्स ने रंगबती और उसके असली सृजनकर्ताओं को चर्चा में फिर जीवित कर दिया है, फैसला तो कोर्ट में होगा, लेकिन कोर्ट से बाहर रंगबती का आनंद क्यों खराब किया जाए। अपने दिल के पास चलते रहना चाहिए
ए रंगबती रे रंगबती...
ओ रंगबती रे रंगबती...

Friday, 20 February, 2015

खींचन गांव/फलोदी, शुक्रवार ३० जनवरी की सुबह

कोई सरहद ना इन्हें रोके...



दूर देश से चले आते हैं पक्षी...दूर देश को चले जाते हैं...क्योंकि  इन्होंने दुनिया को नहीं बांटा...। साइबेरिया और अन्य उसके आसपास के इलाको में जब बर्फ जमने लगती है, जब वहां कुरजां पक्षी दाने को मोहताज होने लगते हैं, तब उन्हें भारत की याद सताती है और सबसे ज्यादा याद आता है फलौदी का खींचन गांव। वे पांच हजार किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी से उड़े चले आते हैं। हवाओं को पहचानते और भारत की सुगंध को याद करते हजारों की संख्या में...आकार बनाकर, समूह बनाकर, अपना एक आदर्श नेता बनाकर पूरे अनुशासन में उड़ते...वाकई इन्हें देखकर मन कह उठता है...कोई सरहद ना इन्हें रोके..


खींचन गांव/फलोदी। लगता है, यह कुरजां का अपना गांव है। एक साथ दस-बारह हजार की संख्या में एक ही प्रजाति के पक्षी को देखना रोमांच पैदा कर देता है। अंग्रेजी के वी अक्षर के आकार में समूह के समूह दूर धोरों से उड़कर आते कुरजांओं के कलरव से इन दिनों खींचन गांव आबाद है। खेतों, तालाबों, धोरों, मैदानों से लेकर आकाश तक कुरजांओं का हुजूम दिखाई पड़ता है।

रंग और मफलर
सजग, तेज, लंबी टांग, सुगढ़ पंखों वाले कुरजां हजारों किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। उन्हें आकाश ने अपना रंग दिया है और प्रकृति ने उनके गले में हल्का काला मफलर-सा डाल रखा है। काफी ऊंचाई पर उड़ते हुए ठंड से ये मफलर ही उन्हें बचाते होंगे। मोर के आकार-आकृति का यह लाल आंखों वाला तीन से पांच किलोग्राम का पक्षी सदियों-पीढिय़ों से भारत और साइबेरिया के बीच की दूरियां नापता आया है। बताते हैं, इनकी उम्र २५ साल तक होती है, यानी वे २५ बार भारत आकर लौट जाते हैं।

छह महीने का डेरा 
वे यहां छह महीने ही रहते हैं और फिर पांच हजार किलोमीटर दूर चले जाते हैं। लोगों को आश्चर्य होता है, दुनिया भर के पक्षी प्रेमी और विशेषज्ञ खींचन आते हैं। बताते हैं कि साइबेरिया में इन्हें देखना मुश्किल है, लेकिन भारत में ये सहज दिखते हैं। इनके जीवन, यात्रा और संघर्ष पर शोध जारी है।

जरा फासले से मिला
रो
वे बहुत सतर्क रहते हैं। मोटरसाइकिल की आवाज सुनकर भी इनकी गर्दनें सीधी हो जाती हैं, इनकी आवाज में चेतावनी का तीखापन बढ़ जाता है। शुक्रवार ३० जनवरी की सुबह एक छोटा-सा पिल्ला कुरजांओं के मैदान में टहल रहा था, कुरजांओं ने उससे भी लगभग दस मीटर की दूरी बरकरार रखी। जब ये अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं, तब उनके कलरव में कमी आ जाती है और दाना चुगने या सुस्ताने लगते हैं। एक समूह दाना चुगकर उड़ता है, तो दूसरा समूह आ जाता है।

जो नहीं लौट पाते
कुरजांओं के समूह में कुछ कुरजां गाढ़े रंग के अलग नजर आते हैं। ये वे कुरजां हैं, जो किन्हीं कारणवश पिछले साल भारत में ही रह गए थे, उड़कर न जा पाए थे। भारत की आबोहवा ने उनका रंग बदल दिया। पक्षी जानकार बताते हैं, अब इस साल जब गर्मियों की आहट पर कुरजां यह देश छोडऩे लगेंगे, तब पिछले साल छूटे हुए कुरजां भी उनके साथ ही उड़ चलेंगे। वे मार्च तक चले जाएंगे, फिर सितंबर में लौट आने के लिए।