Wednesday 12 April 2017

चार चराग तेरे बरन हमेशा


(जितना मैं समझ पाया हूं, उतना पेश है...यह टिप्पणी तब लिखी गई थी जब शाहबाज कलंदर की दरगाह पर हमला हुआ था )
वे भटके हुए लोग सदियों से चीख रहे हैं कि खुद को सूफी संत कहकर पूजा-आराधना लेने वाले शैतान के नबी हैं, रहमान के नबी नहीं! यह गलत विवेचना एक तरह से भारतीय मानस की आलोचना है।  
सूफी नहीं होते, तो आज का भारत नहीं होता। आज का जो सेकुलर भारत है, उसमें रामानंदियों का जितना योगदान है, उससे थोड़ा ही कम सूफियों का है। सेवन शरीफ वाले हजरत लाल (सखी) शाहबाज कलंदर लगभग रामानंद और कबीर के ही समय के हैं। जैसे अजमेर शरीफ में मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, ठीक उसी प्रकार से पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र के दादू जिले में स्थित सेवन शरीफ में शाहबाज कलंदर की दरगाह है। गरीब इन दरगाहों पर मत्था टेककर हज-सा सुख लेते हैं, लेकिन ये बात कइयों को चुभती है। 
वाकई, इसलाम का भारतीय संस्करण है सूफीवाद या सूफीयत। इस्लाम का यह संस्करण उसके अरबी संस्करण से अलग माना जाता रहा है। भारतीय जमीन में जो कलात्मक-विवेचनात्मक उर्वरा, उदारता रही है, उसमें सूफी भाव के जरिये ही इसलाम का बेहतर स्वरूप सामने आया है। भारत में सूफीयत ने ही इस्लाम का वह स्वरूप प्रकट किया है, जिसमें सबके लिए जगह है। जहां सब आसानी से नमाज पढ़ सकते हैं, उर्स मना सकते हैं। वरना अरबी संस्करण के अंदर ही उलेमा की एक कट्टर फौज भी है, जो दरगाहों पर पुष्प चढ़ाने, धूप-अगरबत्ती करने, कुछ प्रसाद-सा बांटने, चौखट चूमने, नमाज पढऩे, वहां नाचने-गाने या धमाल डालने की इजाजत नहीं देती।
यह छिपी हुई बात नहीं है कि अरबी संस्करण का वर्चस्व दुनिया में जिस तरह से बढ़ा है, उसमें सूफीयत के लिए जगह कम होती जा रही है। सूफियों का काम खत्म माना जा रहा है, क्योंकि शायद नाम का इस्लाम बनाने का काम सूफियों का था, जो उन्होंने पूरा कर लिया और अब काम का मुसलमान बनाने का काम अरबी संस्करण ने अपने हाथ में ले लिया है। 
बम-बंदूक की जरूरत पड़ रही है, ताकि दरगाहों में मत्था टेक रहे लोगों को सबक सिखाकर बाकियों को रास्ते पर लाया जा सके। यह रास्ता तबाही की ओर ले जाता है। यह माना जा रहा है कि भारतीय मुस्लिम अपेक्षाकृत उदार है या हो गया है। वह गैर-मुस्लिम और मुस्लिम में सद्भाव की जरूरत को समझने लगा है, इससे कट्टर अरबी संस्करण का प्रचार रुक रहा है, अत: जरूरी है कि अपेक्षाकृत उदार हुए लोगों को पक्का या कट्टर बनाकर फिर प्रचार तेज किया जा सके। 
इसमें कोई शक नहीं कि सूफियों में अभी बहुत ताकत है, उन्हें पराजित करने में कट्टरपंथियों को नाको चने चबाने पड़ेंगे। जिस दिन हजरत शाहबाज कलंदर की दरगाह में नरसंहार हुआ, उसके दूसरे ही दिन सुबह नियम से घंटा फिर बजा और नगाड़ा भी। शाम को धमाल भी डाली गई। सूफी सेवणी हों या अजमेरी...दोनों ने प्रेम और हिम्मत की तलवार हाथों में ले रखी है। तुर्की, भारत, इंडोनेश्यिा से अभी अरब दूर है!
बेशक, दक्षिण एशिया में इस्लाम का प्रचार कराने में सूफी संतों की भूमिका सर्वस्वीकार्य रही है। वे नहीं होते, तो दक्षिण एशिया में पैर जमाना अरबी संस्करण के लिए आसान नहीं होता। आधुनिक दुनिया में सूफीवाद एक बड़ी ताकत है, जहां से कट्टरता को करारा जवाब मिल सकता है। जो लोग हजरत चिश्ती, हजरत शाहबाज, हजरत निजामुद्दीन, बाबा हाजी अली, बाबा फरीद और ऐसे ही हजारों सूफी संतों को नहीं मानते, उनकी इंसानियत पर सवाल वाजिब हैं।  
आप अपने पूर्वजों को ललकार रहे हैं, पूर्वजों को गलत ठहरा रहे हैं। धागा बांधने, पुष्प चढ़ाने का संस्कार, नाचने-झूमने का संस्कार क्या कभी मिट सकता है? 
यह वही भारतीय भूखंड है, जहां आकर ह्वेनसांग ने लिखा था, ‘ये भारतीय कितना नाचते-गाते हैं, भारतीयों ने हर अवसर के लिए गीत-संगीत-नृत्य रच रखे हैं।’ यहां आकर इस्लाम को जो सूफी स्वरूप मिला, वह पूर्ण रूप से वाजिब था और वाजिब है। आप सूफियों को खत्म नहीं कर सकते। सेवण शरीफ के मुस्लिमों ने इस बात को साबित कर दिया। वे नरसंहार से घबराए नहीं, हजरत शाहबाज की दरगाह पर फिर इबादत के लिए जुट गए। दरअसल, पाकिस्तान की मिट्टी भी वही है, जो भारत की मिट्टी है। उस मिट्टी ने सदियों से भारत की मिटï्टी से भी ज्यादा हमले झेले हैं। पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अफगानियों को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्हें महसूस हो रहा है कि उन पर हमले तो पश्चिम से ही हुए हैं, पूरब से नहीं। पाकिस्तान में शांति तभी संभव है, जब वहां सैंकड़ों सूनी पड़ी दरगाहों पर रौनक हो, जब पाकिस्तान पूरे भाव के साथ पूरब की ओर बढ़े। नेकी की राह में कभी देर नहीं। 
पुकार रहा है, चिराग निरंतर जगा हुआ है। आवाज गूंज रही है...
चार चराग तेरे बरन हमेशा, पांजवा मैं बरन आई बला झूलेलालण...

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